चित्रगुप्त को लुभा न पाए अटल के मुखौटे

वीना

स्वर्ग और नरक के दरवाज़ों के बीच चित्रगुप्त अपनी आराम कुर्सी पर विराजमान हैं। टेबल पर लैपटॉप और मोबाइल मौजूद हैं। साथ ही पुराने बहीखाते भी नज़र आ रहे हैं। चित्रगुप्त लैपटॉप पाकर बड़े खुश हैं। पहले स्वर्ग-नरक के जितने उम्मीदवार वो महीने में निपटाते थे अब एक दिन में हिसाब-किताब कर उनकी जगह पहुंचा देते हैं।

चित्रगुप्त मानते हैं कि उनका काम इतना महत्वपूर्ण है कि उसमें भूलकर भी कोई भूल नहीं होनी चाहिये। सो एहतियातन कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाली पुरानी बही भी हर समय मौजूद रहती है। क्या है कि भारत से ऐसे-ऐसे नेता रूपी प्राणी आने लगे हैं कि अब पट्ठे, चित्रगुप्त को चूना लगाने से बाज़ नहीं आते। अक्सर चकमा देकर अपने पाप डिलीट करने की फ़िराक़ में रहते हैं।

कई तो इतने बेशर्म-बेवकूफ हैं कि पकड़े जाने पर चित्रगुप्त पर ही अपनी फर्ज़ी डिगरी का रौब झाड़ने लगते हैं। उस चित्रगुप्त को, जिसके पास पूरी डिटेल मौजूद है कि उन अनपढ़ महाशय ने कब, कहां से, किससे, कितने रोकड़े में डिग्री ख़रीदी है!

सैकड़ों को निपटाकर चित्रगुप्त ने पल भर के लिए आराम कुर्सी से कमर टिकाकर आंखें बंद की ही थी कि लाइन में आपा-धापी का शोर सुनाई दिया। अमूमन पृथ्वीवासी डरे-सहमे, ख़ामोश खड़े अपनी बारी का इंतज़ार किया करते हैं। यहां तक कि धोखे़बाज़-चालबाज़ नेतागण भी। 

चित्रगुप्त समझने की कोशिश कर ही रहे थे कि तभी लाइन में खड़े लोगों को जबरन धकेलता धोती-कुर्ता, जैकेट पहने एक बूढ़ा ठीक चित्रगुप्त के सामने पहले नंबर पर आ डटा। जैकेट की बगल में दोनों हाथों के अंगूठे टांगकर रौब से बोला – ‘‘रार नई ठानूंगा…हार नहीं मानूंगा…नाम तो सुना ही होगा..!’’

चित्रगुप्त ने माथा पीटते हुए कहा – ‘‘लो और एक नेतारूपी बला आ धमकी। आज का दिन बरबाद करके ही छोड़ेगा।’’ चित्रगुप्त ने ऊपर से नीचे तक देखा और पूछा – ‘‘कौन जनाब हैं आप? और लाइन क्यों तोड़ी? जानते हो लाइन तोड़ने की सज़ा के बतौर तुम्हारे खाते से 10 पुण्य घटा दिए जाएंगे?’’

‘‘आपने अटल बिहारी वाजपेयी को नहीं पहचाना!’’ अटल ने हैरान होते हुए कहा। ‘‘आजकल हिंदुस्तान के कोने-कोने में मेरे नाम की ही तो चर्चा है। मेरे अस्थि कलश और तस्वीर ढोते टैम्पू के अलावा और कुछ दिखाई देता है आपको भारतभूमि पर? मैं हूं अजातशत्रु, अटल बिहारी वाजपेयी।’’

‘‘मैं लोगों को शक्लों से नहीं उनकी फाइल देखकर पहचानता हूं। और अभी तुम्हारा नंबर नहीं आया है। सो मेरे लिए अभी तुम कोई नहीं हो। वैसे, जहां तक मुझे पता है अजातशत्रु का मतलब होता है जिसका कोई शत्रु न हो। हज़ार-दो हज़ार दुश्मन तो तुम अभी मेरे सामने बना आए। लाइन तोड़कर। रार नई ठानूंगा…हार नहीं मानूंगा… करते हुए।’’ चित्रगुप्त ने चुटकी लेते हुए कहा।

‘‘लाइन हो या आज़ाद देश की कमान। इनकी फितरत है बिना कुछ किए-धरे हर चीज़ पर कब्ज़ा जमाने की।’’ दूसरी तरफ से किसी महिला की आवाज़ आई। चित्रगुप्त ने उधर देखा और पूछा – ‘‘ओह! अच्छा हुआ गौरी लंकेश, कलबुर्गी जी और पानसरे जी आप लोग इधर आ गए! आप जानते हैं इन महाशय को?’’

‘‘जी हां, हम सब इन्हें जानते हैं। भगत सिंह बचपने में खेतों में बंदूके बोने चला था अंग्रेज़ों को भगाने के लिए। और इन जनाब ने बंदूकें, त्रिशूल-तलवार, वंदे मातरम, भारत माता की जय के नारे और अंध भक्त बोए हैं देशभक्तों को, देश की मासूम जनता को ख़त्म करने के लिए। जो भी इनकी करतूतों से परदा हटाता है, अपने हक़ की मांग करता है ये उन पर अपने त्रिशूल-तलवार, बंदूकधारी अंधभक्तों को छोड़ देते हैं।’’ कलबुर्गी ने अटल के चेहरे पर नज़र टिकाते हुए कहा।

‘‘पर ये तो ख़ुद को अजातशत्रु कह रहे हैं!’’ चित्रगुप्त बोले।

‘‘हमारे कुछ भी कहने-बताने से बेहतर होगा कि आप अपने रिकॉर्ड निकाल कर 5 दिसंबर 1992 की रात में लखनऊ में की गई इनकी सभा को देख-सुन लें। अबकी बार पानसरे बोले।’’

चित्रगुप्त ने अपने लैपटॉप पर सर्च किया तो अटल बोलते नज़र आए – “नुकीले पत्थर निकले हैं, उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता। ज़मीन को समतल करना पड़ेगा। बैठने लायक बनाना पड़ेगा। मेरी अयोध्या जाने की इच्छा थी मगर मुझे कहा गया तुम दिल्ली जाओ। और मैं आदेश का पालन करता हूं। मुझे नहीं पता अयोध्या में क्या होगा।“ मस्ती में मदमाते अटल को देख-सुन चित्रगुप्त अटल की ओर मुड़े।

अटल ने तुरंत सफाई दी – ‘‘ताला राजीव गांधी ने खुलवाया था। रामलला के मंदिर का शिलान्यास भी उन्होंने ही किया था। विश्व हिंदू परिषद को कहा था कि वहां जाकर मंदिर निर्माण करो। मैं तो बस कारसेवकों को यही बता रहा था।’’

‘‘क्या सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद गिराने के लिए कहा था?’’ चित्रगुप्त ने नज़रे गड़ाते हुए वाजपेयी से पूछा।

‘‘मैंने ऐसा कब कहा।’’ अटल ने जैकेट की बगल में अंगूठे ठूसे हुए ठीक वैसी ही बेशर्मी से कहा जैसे 5 दिसंबर 1992 को लखनऊ में कहा था।

‘‘तो फिर वो कौन से पत्थर थे जो तुम्हारे और कारसेवकों की तशरीफ़ों में चुभ रहे थे? वो क्या था जिसे तुम समतल करवा रहे थे?’’

‘‘अ…मैं…मैं…तो ऐसे ही मज़ाक-मज़ाक में…हे…हे…हे… यही मेरी भाषण शैली है। मेरी इसी अदा पर तो लोग मरते थे। वैसे तो मैं एक कोमल हृदय कवि हूं। स…ब जानते हैं।’’  अटल ने हकला कर चित्रगुप्त की तीख़ी नज़रों से बचते हुए कहा।

याद रखो, तुम अपने इस अंदाज़ से धर्म की भांग चढ़ाए पृथ्वी वासियों को मूर्ख बना सकते हो। चित्रगुप्त के रिकार्ड में हेराफेरी नहीं कर सकते। तुम्हारे लड़कपन से लेकर बुढ़ापे तक की ये दोगली शैली बही में सही-सही दर्ज है।

वो तुम ही थे जो भारत छोड़ो आंदोलन के समय लीलाधर वाजपेयी और अपने गांव वालों को फसवा कर ख़ुद बच निकले थे।

वो तुम ही थे जो 1983 में असम में अपने ही देश के बंगाली मुसलमानों को विदेशी बताकर उनके टुकड़े-टुकड़े कर फेंकने की सलाह असमियों को देकर आए थे। और तुम्हारे इसी भड़काऊ भाषण के बाद वहां दंगों में 2 हज़ार से ज़्यादा लोग क़त्ल कर दिए गए। और फिर दिल्ली आकर तुम बगुला भगत बन कर इन दंगों की निंदा करने बैठ गए थे।

और वो भी तुम ही थे जो 2002 के गुजरात दंगों में हज़ारों मासूम बच्चों-औरतों, मर्दों की हत्याएं होते देखते रहे। पहले आंसू बहाकर मोदी को राजधर्म की शिक्षा देते हो और फिर गोवा में कहते हो मुसलमान मिलकर रहना नहीं जानते। शांति नहीं चाहते। गोधरा किसने किया का सवाल उछाल कर ख़ुद को और मोदी को मासूम बता जाते हो। सब लिखा है यहां।‘‘ चित्रगुप्त ने बही ठोकते हुए कहा।

‘‘देखो, इन कलबुर्गी जैसे विधर्मियों ने तुम्हारा दिमाग़ ख़राब कर दिया है। मैं हिंदू राष्ट्र का महान सिपाही हूं’’ अटल ने झल्लाते हुए चकरी की तरह हाथ घुमाकर कहा।

‘‘मैं यहां धर्म-विधर्म नहीं पाप-पुण्य का लेखा-जोखा देखता हूं। इनमें से एक भी तुम्हारी तरह दोगला नहीं। जिसने जो कहा, वही किया। तुम्हारे हिंदू आंतकवाद ने असमय इनकी जान ली। फिर भी ये शांत हैं। और एक तुम हो, पूरी उम्र मजे़ में गुज़ार कर आए हो फिर भी चैन नहीं। यहां मेरे सामने, केरल के बाढ़ पीड़ितों को धक्का देकर पीछे करने में तुम्हें शर्म नहीं आई! 

वैसे मैं तुम्हें एक जानकारी और दे दूं। प्राकृतिक आपदा में जो आम लोग अपनी जान गंवा कर यहां आएंगे उन्हें बिना बही खाता देखे सीधा स्वर्ग में एंट्री देने का प्रावधान कर दिया है हमने। ठीक इसी तरह दंगों में, युद्धों में जो मासूम मारे जाएंगे वो भी सीधा स्वर्ग जाएंगे।’’

‘‘मतलब?’’ अटल ने पूछा

‘‘मतलब अडानी-अंबानी, टाटा-बिड़ला, ट्रंप-फ्रंप, तुम और तुम्हारे चेलों आदि के लिए जो इंसानों को रौंदने में, प्रकृति का गला घोंटने में मसरूफ़ हैं उनका स्थान नरक में निश्चित है।’’ चित्रगुप्त ने आराम से समझाया।

‘‘हिंदू मान्यता के अनुसार पवित्र नदी में अस्थि विसर्जन से सारे पाप समाप्त हो जाते हैं। क्या तुम ये नहीं जानते ? गंगा नदी में अस्थि प्रवाहित होने से ही मैं पाप मुक्त हो जाऊंगा। फिर यहां तो पचासों नदियों में मेरी राख बहेगी।’’ अटल ने इतराते हुए कहा।

‘‘सॉरी अटल! ये लाइफ़ लाइन भी तुम अपनी मूर्खताओं के कारण गवां चुके हो।’’ चित्रगुप्त अटल को देखकर फिर मुस्कराए।

‘‘वो कैसे!’’ अब अटल के होश उड़ गए।

चित्रगुप्त बोले- ‘‘किसी पवित्र नदी में अस्थि विसर्जन होने से पाप में मुक्ति मिलती थी। तुमने और तुम्हारे चहेते उद्योगपतियों ने जिन नदियों को ज़हरीले गंदे नालों में तब्दील कर दिया है उनमें नहीं। इन नदियों से गुज़र कर तो तुम्हें यहां कोई नरक में भी घुसने नहीं देगा।“

कोई दाव न चलता देख अटल ने चित्रगुप्त के कान के पास जाकर कहा – ‘‘सुनो चित्रगुप्त, क्या तुम भूल गए कि मेरे पूर्वजों ने ही तुम्हारी कल्पना की थी। तुम्हें स्वर्ग-नरक का अधिकारी बनाया था। अरे मूरख! मैं ब्राह्मण हूं…सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण। हमें सब माफ़ है। क्या जानते नहीं? क्या तुम मनुस्मृति की प्रति अपने पास नहीं रखते? देखो, ज़्यादा न्यायप्रिय मत बनो। मैं थक गया हूं। जल्दी से मेरे लिए स्वर्ग में एलॉट किया गया स्वीट खुलवाओ। कुछ लज़ीज़ मुर्गा-मछली पकवाओ। नहा-धोकर, खा-पीकर थोड़ा आराम कर लूं, फिर तुम्हारे कान खींचूंगा। हमारी बिल्ली, हमी को म्याऊं!’’ अटल ने अब चित्रगुप्त को चेतावनी दी।

अटल की इस चेतावनी पर चित्रगुप्त टेढ़ा मुस्कराए और बोले – ‘‘ ब्राह्मण अटल बिहारी वाजपेयी जी, अपने पृथ्वी के बहीखातों में आप क्या लिखते हैं क्या नहीं हमें उससे मतलब नहीं। आप पहली बार मरे हैं, इसलिए आपको पता नहीं। हमारे यहां ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ नियम लागू है।’’

चित्रगुप्त ने अपने मोबाइल पर एक नंबर मिलाया और बोला –  ‘‘स्टीव जॉब्स, कोई वायरस स्कैन है ऐसा जिससे इस अटल वायरस को हमेशा के लिए डिलीट किया जा सके या कै़द कर रखा जा सके।

‘‘स्टीव जॉब्स का हमारे हिंदू खेमें में क्या काम? वो तो ईसाई है!’’ अटल ने यूं मुंह बनाकर कहा जैसे सोनिया गांधी सामने आ गईं हों।

‘‘कूल मैन..!’’ चित्रगुप्त ने कहा।

‘‘विदेशी भाषा हमारे स्वर्ग में? हिंदी हमारी मातृभाषा है, चित्रगुप्त। हिंदी में बात करो।’’ अटल ने आदेश देने के अंदाज़ में कहा।

“अच्छा! साथ अंग्रेज़ों का देते हो, और भाषा हिंदी चाहिये। वैसे तुम्हारी अटल हिंदी यूनिवर्सिटी की ख़बर देख रहा था। बंद हो रही है बेचारी। अंग्रेज़ जैसे अपनी भाषा पर काम करते हैं कभी किया तुमने? बस जुमले फेंको घर जाओ। तुम्हारी हिंदी कंप्यूटर का क नहीं जानती। बात करते हो। बहुत हो गई हिंदूगीरी। अब चलो, जहां से लाइन तोड़कर आए थे वापस वहीं, केरल के बाढ़-पीड़ितों के पीछे जाकर खड़े हो जाओ।

(वीना फिल्मकार, पत्रकार और व्यंग्यकार हैं।)

This post was last modified on November 30, 2018 3:08 pm

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