Wednesday, October 27, 2021

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‘भील विद्रोहः संघर्ष के सवा सौ सवाल’ यानि जुल्म और प्रतिकार का पहला दस्तावेज

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(देश में भीलों की अलग-अलग रूपों में चर्चा होती रही है। इस बात में कोई शक नहीं कि वो जेहनी तौर पर विद्रोही और लड़ाके थे। लेकिन उनके इस पक्ष पर न तो अलग से कोई शोध हुआ और न ही उसका इतिहास या फिर किसी दूसरे रूप में दस्तावेजीकरण। और आम तौर पर उन्हें एक हाशिये के और लुटेरे समुदाय के तौर पर पेश किया जाता रहा। जबकि भारतीय इतिहास में उनकी शानदार भूमिका रही है। एक दौर में न केवल उनके पास राज सत्ताएं हुआ करती थीं बल्कि वो हर तरीके से साधन-संपन्न थे। लेकिन राजपूतों के साथ की लड़ाइयों में हार के बाद उन्हें अपनी ये सारी चीजें गवांनी पड़ी और एक दौर में आकर वो शासक से शासित की श्रेणी में खड़े हो गए। और फिर उसके साथ ही वो हाशिये के हिस्से बन गए। इसी समुदाय और उसके जीवन तथा रहन-सहन को केंद्रित करते हुए इतिहासकार सुभाष चंद्र कुशवाहा ने एक किताब लिखी है जिसका शीर्षक है- ‘भील विद्रोह: संघर्ष के सवा सौ साल’। किताब में लेखक ने जो भूमिका लिखी है उसको यहां दिया जा रहा है-संपादक)

आदिवासी समुदाय के प्रति हमारी दृष्टि, अभिजन बनाम अभिशप्तजन में विभाजित रही है। यह सुघड़ और फूहड़ के मनोरोग से भी ग्रसित रही है। भारतीय भू-भाग पर बाहर से आए अश्वारोही आक्रमणकारियों ने मैदानी सैन्य कुशलता के बल पर जब भील प्रातों पर कब्जा जमाया, तब उन्होंने काली चमड़ी वाले मूल निवासियों को छलबल से बेदखल करने के लिए, उनकी सत्ता में सेंध लगा दी। यह एक प्रकार की आर्थिक और सामाजिक डकैती थी, जिसके द्वारा अभिजनों ने, अभिशप्तजनों के हिस्से की सामान्य और सामूहिक खुशियों पर कब्जा कर, उनकी प्राकृतिक जीवनयापन संपदा को हथिया लिया।

इन अभिजनों ने, शारीरिक ताकत से युक्त भील आदिवासियों तक शिक्षा और आधुनिक साधनों की पहुंच रोक दी। अज्ञान के अंधकार में अंधविश्वास को स्थापित किया गया। अशिक्षा और अज्ञानता के कारण, देश की लगभग तिहाई भू-भाग पर फैले भील आदिवासियों को सामाजिक कुरीतियों का वाहक बना दिया गया। यही कारण रहा कि अज्ञानता और आपदा के बीच जीने वाली इस आदिवासी जाति के अंदर अंधविश्वासों की भरमार होती गयी। डायन प्रथा में विश्वास सघन था और डायनों को दण्डित करना भील समाज की संस्कृति बन चुकी थी। पेट यापन के साधनों के अभाव में भूख मिटाने के लिए लूटमार के लिए छापेमार जीवन शैली ने उन्हें बर्बर और लुटेरे नस्ल के रूप में चिन्हित कर दिया था।

राजपूतों की अश्वसेना से भीलों का मुकाबला नया-नया था। वे उनके सामने मैदानी क्षेत्रों में मुश्किल में पड़ रहे थे। घोड़ों की रफ्तार उन्हें मोर्चाबंदी में कमजोर कर रही थी। इसलिए साहसिक संघर्ष के बावजूद, वे मैदानी क्षेत्रों से पीछे हटते गए। वे जंगलों और पहाड़ियों में जाकर अपनी मोर्चाबंदी संभाल लिए।

अन्न की उत्पादकता मैदानी क्षेत्रों में ज्यादा थी। खेतरहित पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली जानवरों के बीच, जीवनयापन के साधन सीमित थे। धीरे-धीरे आदिवासियों में भूख की व्याकुलता बढ़ने लगी। समय-समय पर प्राकृतिक आपदाएं भूख की चिंगारी बन चटकने लगीं। वे भुखमरी के शिकार हुए। जीवन संघर्ष में भूखे मरने के बजाय उन्होंने हिंसा और लूटपाट का सहारा लिया। खेती-बारी से परे, लूटमार, पेट पालने का तरीका बन गया। वे छापामार युद्धशैली की ओर बढ़े। स्थानीय शासकों, राजे-राजवाड़ों द्वारा धीरे-धीरे भील मुखियाओं के हकों को छीना जाने लगा। जंगलों के उत्पादों पर विभिन्न प्रकार के कर लगा दिए गए। यह देख भीलों ने जंगलों और पहाड़ियों में मोर्चा संभाल लिया। अपने क्षेत्रों से गुजरने वाले बाहरी लोगों पर उन्होंने नियंत्रण स्थापित किया। भीलों की हिंसक कार्यवाहियों के पीछे यही मूल कारण थे। भीलों को उजाड़ने वाले राजपूतों ने उन्हें बर्बर, जंगली, क्रूर और अपराधी नस्ल बताकर दमन का बहाना ढूंढ लिया।

जंगल, पहाड़ और घाटियों में खदेड़ दिए गए एक बड़े आदिवासी वर्ग को, अभिजनों द्वारा मुख्यधारा में जानबूझ कर कभी आने नहीं दिया गया। शिक्षा देने का प्रश्न ही नहीं था। वर्ण व्यवस्था के पोषक अभिजनों की रीति-नीति में शूद्रों को शिक्षा देना वर्जित था। इस कारण भी आदिवासी अज्ञानी बने रहे। अपने हक-हकूक से वंचित रहे। अभिजनों ने अपने स्वार्थी ज्ञान और धार्मिक वितान के छल-बल से जनजातियों की जमीन, जंगल और पहाड़ों की संपदा का दोहन कर, अपनी सेहत को बेहतर किया। ज्यादातर जनजातियों को भूमिहीन रखा गया। वीरान पड़ी विस्तृत जमीन के व्यक्तिगत मालिकाना हक की उत्पत्ति कुलीनों के मस्तिष्क की देन है। उन्होंने बड़ी चालाकी से यहाँ की जल-जमीन से मूल निवासियों की सामूहिक सत्ता को नकारते हुए, व्यक्तिगत हक-हकूक स्थापित किए और स्थायी स्वामी बन बैठे। जब आदिवासियों को इसका भान हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वे सरल हृदय के प्राकृतिक लोग थे। आर्थिक चालाकियों से अभी अपरिचित थे।

ज्यादातर भील राजाओं की सत्ता जाती रही। कुछ राजा से, सामान्य पटेल की हैसियत में आ गए। बहुत कम ऐसे बचे, जिन्होंने अपनी गद्दी को बरकरार रखा मगर उन से भी राजपूत राजाओं ने कर वसूली कर अपनी अधीनता मनवाने का प्रयास किया था। बॉम्बे सरकार के अभिलेखों के अनुसार सगबारा के वासावा परिवार की वंशानुगत सत्ता, भारत की आजादी तक कमोबेश बनी रही और वासावा खानदान के उत्तराधिकारियों को प्रीवी पर्स स्वीकृत हुआ यद्यपि सगबारा को राजपीपला स्टेट के राजपूत राजा के अंतर्गत माना जाता रहा।
इतिहास की अनुगूंजे बताती हैं कि कर्मशील आदिवासियों के हाथों से जर-जमीन और जंगल छीन लेने वाला तथाकथित कुलीन तबका, मनुष्य विरोधी रहा है। वह सबसे पहले निम्नवर्ग को सताता है और फिर उसी के रक्त-मांस को निचोड़ कर अपने चेहरे की लाली चमकाता है।

कालचक्र के काले पन्नों में धीरे-धीरे भील जातियां, विद्रोही दर्ज कर दी गईं। इतिहास में कभी वे बेहद सरल, शांत और वचन के पक्के मानव समूहों में रही हैं। वे अपने बाबादेव घोड़ा की परिक्रमा कर जो वचन ले लेतीं, उसे हर हाल में निभातीं। भील, बाबादेव घोड़ा के अथान पर लिए गए हर वचन पर कायम रहने वाली जनजाति रही है।

जब राजपूताना के भीलों ने मोतीलाल तेजावत के कहने पर ‘एकी’में शामिल होने का वचन ले लिया था, तब अंग्रेजों के धमकाने, मारने-जलाने के बावजूद भील, एकी के वचन से बंधे रहे। उनके वचनों का मूल्य, लिखित दस्तावेजों से ज्यादा था। वे बिना लिखा-पढ़ी के बनियों या साहूकारों से कर्ज ले लेते और हर साल अपनी उपज का पहला हिस्सा, कर्ज के ब्याज के रूप में चुकाते रहते। किश्त-दर-किश्त चुकाने के बावजूद, ठग बनियों या साहूकारों की चालाकियों से वे कर्ज से मुक्त नहीं हो पाते। जब तक बनिये या साहूकार चुकता शेष बताते, वे चुकाते रहते। यह सादगी थी उनके वचनों की। जो वचन दे दिया, सो दे दिया।

भील कितने सीधे, सरल और ईमानदार थे, इसका एक उदाहरण 09 जुलाई, 1868 के ‘बॉम्बे गजट’अखबार में मिलता है।

एक बार एक थानेदार ने एक रईस भील मुखिया पर रुपए 100 का दण्ड लगा दिया। अनपढ़ भील मुखिया को लगा कि यह बहुत बड़ी राशि होगी। उसने थानेदार से पूछा कि क्या वह यह रकम दे पायेगा? अगर थानेदार उसे घर जाने की मोहलत दें तो वह अपनी झोपड़ी में गाड़ कर रखा एक ड्रम रुपया लाकर दे सकता है, उससे अधिक उसके पास नहीं है। थानेदार सुना और उसके साथ घर गया। जब उस भील ने अपना ड्रम खोद कर थानेदार को दिया तो उसमें एक हजार से ज्यादा रुपए थे।1 डब्लू गॉर्डन कमिंग ने अपनी पुस्तक ‘सेन्स इन कैम्प एण्ड जंगल’ में लिखा है कि लुटेरे भीलों के बीच 9 साल भटकते हुए भी उसका एक रुपया कभी चोरी नहीं हुआ जबकि कई बार वह बिना गार्ड के भी रहे।2

राजपूतों ने जब भील मुखियाओं को गद्दियों से बेदखल किया तब भील मुखियाओं के वंशानुगत अधिकारों को हड़पते हुए, प्रतीकात्मक महत्व प्रदान करने का प्रलोभन दिया। उन्हें बहलाया-फुसलाया गया। कहा गया कि गद्दी पर बैठने वाला राजपूत तभी राजा माना जायेगा, जब भील मुखिया अपना अंगूठा चीर, अपने रक्त से राजतिलक करेगा। यह परंपरा मात्र भीलों के विद्रोही तेवर को शांत करने का एक उपक्रम रहा। कुलीनों ने ऐसे अनेक फुसलाने वाले उपक्रमों द्वारा ही शूद्रों को शांत रखने की नीतियों का अनुसरण किया है।

इतिहास इन सच्चाइयों से सदियों से मुख मोड़े रहा कि प्राकृतिक संपदाओं पर जिनकी सत्ता थी, जिनका पहला हक था, उस समाज के सभी मानवीय अधिकारों का हनन किया गया। उन्हें असभ्य बताकर दमन किया गया। एकलव्यों का अंगूठा कटवाकर द्रोणाचार्य, गुरुत्व के भार से मुस्कुराते रहे।

भील समुदाय के लिए भी कुछ मानवीय अधिकारों का होना जरूरी है, ऐसा कभी भी भील क्षेत्रों के राजपूत राजाओं ने नहीं सोचा। इसलिए समय-समय पर भीलों ने बगावत की। इन बगावतों की प्रारम्भिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। यहां भील समुदाय के सवा सौ वर्षों के संघर्ष को निरूपित करने का प्रयास किया गया है। यह अवधि लगभग 1800 से 1925 ईस्वी तक की है। 1925 के बाद, मुख्यतः भील विद्रोह या संघर्ष दिखाई नहीं देता। उसका कारण यह है कि 1920 के असहयोग आंदोलन की शुरूआत के साथ ही औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आम जनमानस, महात्मा गांधी के नेतृत्व में संगठित हो रहा था और राजे-राजवाड़े कांग्रेसी आंदोलन में समाहित हो गए थे। धीरे-धीरे पूरे देश में कांग्रेसी छत्रछाया में धरना-प्रदर्शन, सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे विरोध-प्रदर्शनों में भील समुदाय के स्वर समाहित हो गए। ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति संघर्ष में राजा-राजवाड़ों की गुलामी दब गई। भीलों ने भी अपनी मुक्ति की परिकल्पना राष्ट्रीय आंदोलन के अंतर्गत कर ली थी।

1800 से पूर्व, भीलों ने जो विद्रोह किया होगा, वे, साक्ष्यों के अभाव में सामने नहीं आ पाते। दरअसल अंग्रेजों की सत्ता के साथ ही, एक व्यवस्थित प्रशासन की शुरुआत होती है और साक्ष्यों के उपलब्ध होने की गुंजाइश शुरू हो जाती है।

ब्रिटिश शासकों की एक खासियत यह रही कि उन्होंने अपने प्रशासनिक दस्तावेजों को संभाल कर रखा। इस संग्रह की रचना बिना ब्रिटिश दस्तावेजों के संभव नहीं हो पाती। एक ओर अंग्रेजों ने अपने विभिन्न गजेटियरों में बहुत कुछ लिपिबद्ध करना शुरू कर दिया था तो दूसरी ओर उनके कार्यालय पत्र-व्यवहार और समाचार पत्र, लिखित दस्तावेज के रूप में भारत सहित, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि देशों के अभिलेखागारों में सुरक्षित रहे। अंग्रेजों की प्रशासनिक व्यवस्था, भारतीय राजशाही की तुलना में उत्कृष्ट थी। इसलिए भी घटनाओं को लिपिबद्ध करना उनकी विशेषता थी। अंग्रेजों के गजेटियरों ने आधुनिक भारत के इतिहास को लिपिबद्ध करने में बहुत मदद की है। आप उन्हें औपनिवेशिक दृष्टि का लेखन कह कर खारिज इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि आप इस क्षेत्र में निरा बंजर हैं।
भीलों का ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संघर्ष और विद्रोह जारी रहा। हमारे राजे-महाराजे इतने स्वार्थी और सुख-सुविधाओं में संलिप्त थे कि कभी भी विदेशी आक्रांताओं से मुकाबले के लिए खड़े न हुए।

भीलों ने गद्दारी नहीं सीखी। चुनौती के सामने समर्पण नहीं किया। स्वाभिमान की कीमत पर समझौता नहीं किया। भारत की मैदानी दुनिया ने जब-जब विदेशी आक्रांताओं के सामने अपनी पीठ दिखाई, तब-तब जंगली और असभ्य कही जाने वाली भील जनजातियों ने अपनी धरती और स्वायत्त दुनिया की हिफाजत के लिए धनुषों की प्रत्यंचाओं पर तीर तान लिए। तलवारें मुट्ठियों में आ गईं और फौलादी सीना, सामने तन गया। उन्होंने कभी किसी गैर का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया, अपने खून की कीमत पर प्रतिरोध का झंडा बुलंद किया।

भीलों के बारे में औपनिवेशिक सत्ता की ललक तब से देखी जाती है, जब उसने खानदेश और मध्य भारत में ठीक से अपने पांव भी नहीं जमाए थे। ‘कलकत्ता गजट’ नामक अखबार में 01 नवम्बर 1804 को एक समाचार छपा था, जिसमें लिखा गया था कि- भील एक बहादुर कौम है। इसी अखबार में 16 फरवरी 1809 में लिखा गया कि मध्य भारत के जितने भी दर्रे हैं, उनमें से बड़वानी को छोड़कर, सभी दर्रों पर भील मुखियाओं और अरबी लोगों का नियंत्रण है।3 अंग्रेजों ने जब जमीनों की पैमाइश शुरू की तो पढ़े-लिखे और चालाक राजपूत, ब्राह्मण, बनिया और साहूकारों ने ज्यादातर जमीनों का स्वामित्व अपने नाम करा लिया। अनपढ़ भीलों को स्वामित्व के बारे में कोई खास जानकारी न थी। ज्यादातर भील भूमिहीन रहे। वे खेती-किसानी के बजाय, गाँवों की चौकीदारी करते रहे। साहूकारी और व्यापार को बनियों ने अपने हाथों में ले लिया था। होल्कर, सिंधिया, निजाम, मराठों और राजपूताना के राजपूतों की लूट-दर लूट ने उन्हें अपनी जान बचाने के लिए कभी पिंडारियों के साथ तो कभी अरबों के साथ जाने को विवश किया।

भीलों के विद्रोही बनने, बर्बर और लूटपाट को पैतृक व्यवसाय बनाने की मजबूरी का ठीक-ठीक मूल्यांकन होना चाहिए था मगर हमारे शोध संस्थानों ने इस दिशा में मौन साधे रखा। क्षेत्रीय स्तर पर कुछ काम हुए। डॉ. बृज किशोर शर्मा ने राजस्थान में किसान एवं आदिवासी आन्दोलन पर महत्वपूर्ण काम किया है। इसी प्रकार टंट्या भील पर चारू चंद्र मुखर्जी ने 1890 में अंग्रेजी में और फिर बाबा भांड ने 1940 में हिन्दी में महत्वपूर्ण काम किया। अंग्रेजी में कुछ काम मेजर ए.के. प्रसाद, अरविन्द एम. देशपाण्डेय, अजय सारिका, अल्फ गुनवल्ड निल्सन, वी.के. वशिष्ठ आदि ने किया है।

अब तक प्रकाशित सामग्रियों में एक दर्जन से भी कम भील मुखियाओं का नाम आया है। सम्पूर्णता में भील क्षेत्रों के लगभग दो सौ से अधिक भील मुखियाओं का संघर्ष कभी प्रकाश में नहीं आया। खानदेश, मध्य भारत और महाराष्ट्र के ज्यादातर भील विद्रोह अछूते रह गए। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण पुस्तक-indias struggle for independence बिपिन चंद्रा, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, सुचेता महाजन और के.एन.पन्निकर, में कोली और संथाल जातियों के विद्रोहों का संक्षेप में जिक्र है मगर भील विद्रोह के बारे में मात्र चार-पांच शब्दों का उल्लेख किया गया है। 1857 के विद्रोह के समय भील नायकों को लगभग भुला दिया जाता है। एक दमित, अशिक्षित और प्रताड़ित समाज के संघर्ष के इतिहास की यह अनदेखी वाकई में चिंता का कारण इसलिए भी है कि भीलों ने 1925 तक लगातार संघर्ष किया, अपनी कुर्बानी दी। इस संग्रह में सम्पूर्ण मध्य भारत, खानदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान भील क्षेत्रों के विद्रोहों को नए दस्तावेजों के आधार पर संग्रहित करने का प्रयास किया है। नए दस्तावेजों के आधार पर टंट्या भील एवं उनके सहयोगियों के जीवन संघर्षों को भी सामने लाने का प्रयास किया है। मूलतः नब्बे प्रतिशत साक्ष्य, मूल दस्तावेजों से लिए गए हैं।
वर्तमान अध्ययन में लगभग दफना दिए गए तमाम महत्वपूर्ण भील मुखियाओं यथा नादिर सिंह, जग्गा रावत, गुमानी, रामजी, हिरिया, औचित, कूर वासावा, मोगीर, हटनिया, कलिया चमार, ईचा पुग्गी, ओंकार रावत, बांगचुंद, सूरजमल, कुंवर जीवा वासावा, रे सिंह नायक, रूपा सिंह, नीलमा, रतनिया, जुगतिया, इटिया, श्यामलजी, कीरा सिंह, देवी सिंह, दौलत सिंह, दल्ला, देवा, अनूपजी, पेनचुंद, खेमा नायक, कनिया भील, कालिया चमार, काजी सिंह, भीमा नायक, भागोजी, सीताराम, पुंजा धीरज, पुत्ताजी नायक और चीट्टो नायक आदि के संघर्षों को लिपिबद्ध किया है। लगभग दो सौ से अधिक भील मुखियाओं या भील लड़ाकों का इस संग्रह में उल्लेख किया गया है जिनमें से अधिकांश अभी तक ओझल थे।

भीलों के सवा सौ साल के विद्रोह को समेटने के लिए ज्यादातर प्राथमिक स्रोतों की तलाश की गई है। ब्रिटिश न्यूजपेपर्स आर्काइव्स से प्राप्त तत्कालीन ब्रिटिश अखबार, पहले प्रामाणिक स्रोत हैं, जहां से सैकड़ों भील नायकों के बारे में जानकारी मिलती है। पाठकों के सामने अधिकांश विदेशी समाचार पत्रों के संदर्भों को पहली बार लाया गया है।

अंग्रेजों ने भीलों की जंगली संस्कृति को कौतूहल से देखा था। ज्यादातर अंग्रेज अफसरों ने भील संदर्भों को तत्कालीन ब्रिटिश अखबारों में लिखा था। ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भीलों के विद्रोह के संदर्भों की तलाश में जब मैं ब्रिटिश न्यूज पेपर्स आर्काइव्स से गुजर रहा था, तब तमाम जनजातियों के विद्रोह के साथ, खानदेश के भील विद्रोह के बहुसंख्यक समाचारों से गुजरा। मेरी जिज्ञासा, भीलों के विद्रोह में थी। डिजिटल अखबारों को पलटते हुए भील विद्रोहों के संदर्भ मिलते गए और मेरी जानने-समझने की उत्सुकता बढ़ती गई। पहले मेरी योजना खानदेश के भील विद्रोह को लिखने की थी मगर बाद में लगा कि खानदेश के भील नायकों का हस्तक्षेप रीवा कांटा और माही कांटा क्षेत्रों में भी हुआ है। इसलिए सम्पूर्ण क्षेत्र को अध्ययन में लेना जरूरी लगा।

अध्ययन के शुरूआत में ही लग गया कि भीलों के मुकम्मल विद्रोहों को समेटना, आदिवासी भील नायकों के इतिहास को ठीक से समझने के लिए जरूरी है। हिन्दी भाषा में लिखे गए सामाजिक इतिहासों में इन विद्रोहों की अनुपस्थिति ने प्रेरित किया कि इस कठिन कार्य को किया जाना चाहिए यद्यपि यह अत्याधिक खर्चीला और थकाऊ सिद्ध हुआ। फिर भी कुछ मित्रों की प्रेरणाओं और अभिलेखों से जनमी उत्सुकताओं के चलते 2017 से इस किताब के रचना प्रक्रिया की शुरुआत हुई।

इस किताब में ‘ब्रिटिश न्यूज पेपर आर्कइव’से लगभग सौ से अधिक समाचार पत्रों के सैकड़ों संस्करणों को शामिल किया गया है।
ब्रिटिश लाइब्रेरी के कैटलागों को निहारते हुए मुझे तमाम ऐसे कैटलाग हाथ लगे जो पहली बार देखे-पढ़े जा रहे थे। बारी गाँव के भीलों का विद्रोह और कुंवर जीवा वासावा, काजी सिंह, भीमा नायक, भागोजी, सीताराम आदि पर विस्तृत सामग्री ब्रिटिश लाइब्रेरी से ही जुटाई गई है।

‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ ऑस्ट्रेलिया’, सिडनी, से भी अनेक महत्वपूर्ण सामग्री मिली है। वहां के बहुत सारे अखबारों को भी पलटने का मौका मिला जहां भील विद्रोह के तमाम संदर्भ बिखरे पड़े थे। खासकर मेलबोर्न के लीडर और सिडनी के वल्र्ड न्यूज में छपे धारावाहिक, जो टंट्या भील के साहसिक कारनामों के संबंध में थे, पहली बार हाथ लगे। कुछ समाचार पत्रों को ‘न्यूज पेपर आर्काइव’, यू.एस.ए. से प्राप्त किया गया।

न्यूयार्क टाइम्स और कुछ जर्मनी के अखबारों से भी इस कृति में मदद मिली है। पाठकों को अवगत कराना है कि इस किताब की लगभग आधी सामग्री ब्रिटिश लाइब्रेरी और नेशनल लाइब्रेरी ऑफ ऑस्ट्रेलिया के अभिलेखों पर आधारित है। शेष, राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली, मध्यप्रदेश शासकीय अभिलेखागार और संग्रहालय, भोपाल और कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों से जुटाई गई है। पहली बार पाठकों के सामने खेमा नायक और टंट्या भील के संबंधों पर विस्तृत सामग्री दी जा रही है। लम्बे समय तक टंट्या को ब्रिटिश अधिकारियों से छिपाने का काम खेमा नायक ने ही किया था। सम्पूर्ण भील क्षेत्र के भील विद्रोहियों के विद्रोहों के बारे में एक साथ सामग्री को पहली बार पाठकों के सामने रखते हुए संतोष का अनुभव हो रहा है।

एक वृहद क्षेत्र में रहने वाले भील आदिवासी, जो इंदौर से लेकर पूना तक और औरंगाबाद से लेकर उदयपुर तक लड़ते, मरते रहे, उसका इतिहास, गंभीरता से और उसके असंख्य नायकों के संघर्षों को निरूपित करते हुए अत्यंत थकाऊ कार्य में भी आनंद की अनुभूति हो रही है। चार वर्षों का समय कैसे गुजर गया, कहा नहीं जा सकता। जब देश-दुनिया कोरोना वायरस से आतंकित, घरों में कैद थी, उस समय में मैंने इस कार्य में स्वयं को उलझाकर, बेहद तनावपूर्ण समय को हल्का रखा।

टंट्या जैसे भीलों के विद्रोही, बर्बर बनने और लूटपाट को जीवन यापन के लिए व्यवसाय बनाने की मजबूरी का ठीक-ठीक मूल्यांकन होना चाहिए था मगर हमारे शोध संस्थानों ने इस दिशा में मौन साधे रखा। टंट्या भील पर चारू चंद्र मुखर्जी ने 1890 में अंग्रेजी में और फिर बाबा भांड ने 1940 में हिन्दी में महत्वपूर्ण काम किया। बीच में ताँत्या भीलः कीर्तिभानु राय, 1925; तंट्या भीलः विश्वनाथ सखाराम खोड़े, बाणी खरगोन पत्रिका, निमाड़ अंक, 1930; चाँद का फांसी अंक, 1888, तंट्या भिल्ल (मराठी)ः रामचंद्र विनायक टिकेकर उर्फ छनुछिरी, 1891; तंट्या भील (मराठी):नाथ माधव, 1928; तंट्या भिल्ल (मराठी नाटक)ः शांताराम गोपाल गुप्ते, 1937; ताँत्या उर्फ तंट्या भिल्ल यांचे चरित्र (हिन्दी अनुवाद): मदनमोहन जोशी, 1905; तंट्या भिल्लाया पोवाड़ाः बाल मोहन पाठक, 1905 और ताँत्या मामाः राम कुमार जैसे प्रयास होते रहे हैं।
प्रस्तुत पुस्तक को तैयार करने में मूल दस्तावेजों और विदेशी अखबारों के अलावा दो मुख्य पुस्तकों का संदर्भ लिया गया है-The life of Tantia Bhil, The renowned bandit chief, compilled from the- original records by Charu Chandra Mukharjee, Jannayak Tantia Bhil and the peasant and tribal movement: source material by Baba Bhand और जननायक तंट्या भील, बाबा भांड। ‘ब्रिटिश न्यूज पेपर आर्काइव’ से अनेक समाचार पत्रों के सैकड़ों संस्करणों को शामिल करते हुए लगभग साठ प्रतिशत सामग्री मूल स्त्रोतों से ली गयी है।

इस पुस्तक के पहले भाग में मध्यभारत के ज्यादातर हिस्सों को शामिल किया गया है तो दूसरे भाग में राजपूताना क्षेत्र यानी गुजरात और राजस्थान क्षेत्र के भील विद्रोहों को रखा गया है। यद्यपि कुछ भील विद्रोह, खानदेश, और राजस्थान सीमा के दोनों ओर एक साथ शामिल मिलते हैं। उन्हें सर्वाधिक क्षेत्रफल वाले भाग के अनुसार पहले या दूसरे भाग में रखा गया है। अंतिम भाग टंट्या भील और खेमा नायक पर केन्द्रित है।

ब्रिटिश लाइब्रेरी के तमाम कर्मचारियों यथा- Kathryn Mouncey, Andrew Gough, Mukund Miyangar and Debbie Horner ने बहुत धैर्य से मेरे अभिलेखीय मांगों को समझने और उपलब्ध कराने में जो सहयोग दिया, उसे यहाँ उल्लेख किया जाना जरूरी है। कई बार दस्तावेजों को हासिल करने की प्रक्रिया में कुछ व्यवधान आया। मैंने ब्रिटिश लाइब्रेरी के कर्मचारियों का अत्यधिक समय ले लिया, फिर भी उनका सहयोग मिला, उसके लिए मैं आभारी हूँ। बिना उनके सहयोग के यह कृति पूरी नहीं हो सकती थी।

राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली की लचर व्यवस्था के कारण विलम्ब हुआ है। राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली की वर्तमान दशा इतनी सोचनीय बना दी गई है कि वहां से लगातार निराशा हाथ लगती है। अभिलेख पटल पर लगभग आॅन लाइन भुगतान करने के नौ महीने के बाद भी अभिलेखों के लिए तरसना पड़ा। बार-बार ईमेल और फोन करना पड़ा तब जाकर कुछ अभिलेख उपलब्ध हो सके मगर अधिकांश अभिलेख अनुपलब्ध बताए गए। पहले दिल्ली चुनाव का बहाना बनाया गया और फिर उसके बाद कोरोना और लाॅकडाउन के कारण अभिलेखों को उपलब्ध कराने में दस महीने का समय लग गया। अभिलेखों का अनुपलब्ध होना, चिंता का विषय है। इस निराशा के बावजूद श्रीमती जया रवीन्द्रम, एसिस्टेंट डायरेक्टर ने मेरी मदद की है और मैं उनके सहयोग के बिना कुछ भी हासिल नहीं कर पाता।

मध्यप्रदेश शासकीय अभिलेखागार और संग्रहालय, भोपाल की उप संचालक, डाॅ गीता सभरवाल, सहायक पुरालेख एवं प्रभारी रजिस्ट्रार, पदमसिंह मीणा एवं लिफ्टर, दीपनारायण कुशवाहा का भी आभारी हूं, जिन्होंने कोरोना काल में, बहुत कम समय में ज्यादातर अभिलेखों को उपलब्ध कराया। वहां के एक और कर्मचारी, भरतसिंह मण्डलोई ने, जो स्वयं भीलाला समुदाय के हैं, बड़वानी के बारे में कुछ जानकारियां उपलब्ध कराईं। उन्होंने बड़वानी के सुप्रसिद्ध इतिहासकार एवं पूर्व कुलपति, डाॅ. एस.एन. यादव से परिचित कराया।

भील विद्रोह से संबंधित पूरी सामग्री दो पुस्तकों में प्रकाशित हो रही है-1-भील विद्रोहःसंघर्ष के सवा सौ साल।
2-टंट्या भीलःद ग्रेट इंडियन मूनलाइटर

मार्च 2021
(सुभाष चन्द्र कुशवाहा, इतिहासकार और साहित्यकार हैं। किताब हिन्दयुग्म प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।)

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