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शहादत दिवस पर विशेष: शहादत देकर जगदेव प्रसाद ने रखी थी बिहार में सामाजिक न्याय की नींव

अपने देश में जितने दार्शनिक हुए, राजनीति विज्ञान के विद्वान हुए। अभी बहुत गहराई में यह बात नहीं बता पाए हैं कि ‘राष्ट्र और देश’ क्या है? क्या दोनों में मौलिक फर्क है? देश को हम लोग अंग्रेजी में ‘कंट्री’ बोलते हैं और राष्ट्र को ‘नेशन’ बोलते हैं। दोनों अलग-अलग चीजें हैं। इसका घालमेल आपके दिमाग में नहीं होना चाहिए। तब पता चलेगा कि ‘राष्ट्र निर्माण’ की प्रक्रिया क्या है और उसमें बाबू जगदेव प्रसाद का योगदान क्या है?

पहली बात तो यह कि जो देश होता है, जिसको हम लोग कंट्री बोलते हैं, वह भूगोल आधारित है। देश को अपनी आंखों से देख सकते हैं, छू सकते हैं। मूर्त चीज है। यहां से नहीं दिखाई पड़ रहा है तो उड़ जाइए आसमान में और देख लीजिए। ‘देश’ दिखाई पड़ जाएगा। लेकिन ‘राष्ट्र’ नहीं दिखाई पड़ेगा। ‘राष्ट्र’ अमूर्त चीज है। उसे न आप देख सकते हैं और ना ही छू सकते हैं। वह हृदय की ऐक्य भावना है। ये फर्क है- देश और राष्ट्र में।… और राष्ट्र का निर्माण कभी भी सिर्फ जाति, धर्म, भाषा और संस्कृति के आधार पर नहीं होता है। नहीं हो सकता है। उदाहरण के लिए आप देख लीजिए।

इंग्लैंड के लोग भाषा अंग्रेजी बोलते हैं और अमरीका के लोग भी भाषा अंग्रेजी बोलते हैं। इंग्लैंड के लोगों का धर्म ईसाई है और अमरीका के लोगों का भी धर्म ईसाई है। इंग्लैंड के लोग श्वेत प्रजाति के हैं और अमरीका के लोग भी श्वेत प्रजाति के हैं। इंग्लैंड और अमरीका के लोग भाषा, धर्म और प्रजाति के आधार पर एक हैं। बावजूद इसके इंग्लैंड और अमरीका दो राष्ट्र हैं। क्यों नहीं एक राष्ट्र हो जा रहे हैं? उसका कारण मैं अभी बताऊंगा कि वे दोनों एक क्यों नहीं हो रहे हैं और क्या करने पर हो जाएंगे।

आप स्विट्जरलैंड का उदाहरण लीजिए। वहां तीन जाति के लोग रहते हैं- जर्मन, इटैलियन और फ्रेंच जाति के लोग। तीन जातियों के लोगों से पूरा स्विट्जरलैंड बना हुआ है। इसीलिए स्विट्जरलैंड में तीन राज भाषाएं हैं- फ्रेंच, इटैलियन और जर्मन। बावजूद इसके स्विट्जरलैंड एक राष्ट्र है। जबकि वहां तीन जातियां हैं, तीन भाषाएं हैं।

संस्कृति के रूप में उदाहरण लीजिए बलूच लोगों का। बलूची एक संस्कृति है, जिसके नाम पर पाकिस्तान में बलूचिस्तान है। बलूच लोगों की भाषा बलूची है। बलूच लोग ईरान में रहते हैं। पाकिस्तान में और अफगानिस्तान में रहते हैं। उनकी संस्कृति, भाषा, जाति सब एक है। उनका धर्म भी एक है। फिर भी देश तीन हैं। अब आपको थोड़ी – सी बात मेरी समझ में आयी होगी कि ‘राष्ट्र’ और ‘देश’ में क्या अंतर है। अब बात उठती है कि  फिर ‘राष्ट्र’ बनता कैसे है? देश तो जबर्दस्ती बना दिया जा सकता है। शासक वर्ग देश बना देता है। लेकिन राष्ट्र बनाना, जो क्रूर सत्ता है, उसके भी बूते की बात नहीं है। राष्ट्र निर्माण का जो मुख्य बिंदु है, वह है सामाजिक-आर्थिक समानता। सामाजिक और आर्थिक उद्देश्य किसी देश के आदमी का एक जैसा हो, तभी वह ‘राष्ट्र’ है।

अगर किसी देश में आर्थिक असमानता बहुत अधिक हो और अर्थ के मामले में लोगों के बीच ज़मीन और आसमान का फासला हो, तो वह मुल्क कभी राष्ट्र नहीं बन सकता। संभव नहीं है। राष्ट्र बनने के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता बहुत जरूरी है। क्योंकि समाज के निचले तबके का सामाजिक उद्देश्य अलग हो और समाज के ऊपरी तबके का सामाजिक उद्देश्य अलग हो तो राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकेगा। राष्ट्र बन ही नहीं सकता है। वो तो एक उधर खींच रहा है और दूसरा इधर खींच रहा है। तो जगदेव प्रसाद ने अपनी भाषा में यह बात कही थी। उनका कहना था कि समाज में 90 प्रतिशत जो शोषित हैं, उनको समाज की मुख्य धारा में लाइए, ताकि उनकी आर्थिक और सामाजिक  विषमता को पाटा जा सके। तभी भारत एक ‘राष्ट्र’ बनेगा।

देश की जो अहंकारी सत्ता होती है, जो फासिस्ट सत्ता होती है, वह राष्ट्र को लोगों पर थोपती है। राष्ट्रवाद की भावना जबर्दस्ती थोपने की चीज नहीं है। क्रूर सत्ता क्या करती है, हिंसक साधनों का प्रयोग करती है। उसकी सत्ता के हिंसक औजार क्या हैं- कर्फ्यू, लाठी चार्ज, फौज, पुलिस। आजकल तो ये सब भी औजार हो गए हैं- ईडी, सीबीआई और क्या-क्या। वह देश को एक बड़े जेलखाना में तब्दील कर देती है और स्वयं एक ऐसा व्यूह रचती है, जाल बुनती है कि देश की जनता को लगता है कि कोई निरंकुश सरकार देश के किसी वाच टावर से हमारी गतिविधि पर निरंतर नज़र बनाई हुई है।

आप उसकी सीसीटीवी कैमरे के घेरे में हैं। आप डरे हुए हैं। सहमे हुए हैं। सरकार अगर चाहे कि हम हिंसक औजारों से देश की पूरी आबादी को एक सांचे में जबर्दस्ती पुलिस और फौज के माध्यम से रौंद करके ‘राष्ट्र’ बना दें तो यह कभी संभव नहीं है। ‘राष्ट्र’ एक स्वैच्छिक चीज है। जो हाशिए के लोग हैं उनको विश्वास में लेकर और उनको मुख्य धारा में लाकर ही एक देश को ‘राष्ट्र’ के रूप में तब्दील किया जा सकता है।

जगदेव प्रसाद केवल राजनीतिक चेहरा नहीं थे। उनका सांस्कृतिक पक्ष भी बहुत महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि जो राजनीतिक गुलामी होती है वह कुछ पीढ़ियों की गुलामी है। लेकिन सांस्कृतिक गुलामी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। क्योंकि राजनीतिक गुलामी में आपका केवल शरीर गुलाम होता है। आपका दिमाग आजाद होता है। लेकिन सांस्कृतिक गुलामी आपके दिल और दिमाग पर इस तरह से छा जाती है कि आप अपने ही खिलाफ अनेक काम करने लगते हैं और अपने ही हाथों अपने पैरों में जंजीर लगा लेते हैं और आपको पता नहीं चलता है। इसका नाम है सांस्कृतिक गुलामी ।

यह दिमाग के पिछले दरवाजे से प्रवेश करती है और गुलाम व्यक्ति को इसकी जरा भी खबर नहीं होती है। इसके लिए बाबू जगदेव प्रसाद ने माननीय रामस्वरूप वर्मा के संगठन ‘अर्जक संघ’ को अपनाया था। जिसको रामस्वरूप वर्मा ने ‘अर्जक’ कहा, उसको ही गौतम बुद्ध् ने ‘बहुजन’ कहा था और उसे ही जगदेव प्रसाद ने ‘शोषित’ कहा। एक ही चीज है यदि कोई फर्क है तो वह काल और दिशा का है।

हिंदी बेल्ट में डॉ. अंबेडकर को जानने की जो मुकम्मल प्रक्रिया है वह 1980 के आसपास दिखाई पड़ती है। फुले की मुकम्मल पहचान की प्रक्रिया 90 में और जगदेव प्रसाद को पहचानने की प्रक्रिया 2000 ईसवी में। यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि 90 से पहले आप ज्योतिबा राव फुले पर हिंदी में किताब खोजिएगा तो मुश्किल से मिलेगी। मुझे याद है कि 1990 में पहली बार सिविल सर्विस में एक नंबर का सवाल पूछा गया था- ‘सत्यशोधक’ समाज की स्थापना किसने की थी?

और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हम सभी प्रतियोगी बताने में असमर्थ हो गए। इसलिए कि तब फुले को जानने वाले हिंदी बेल्ट में कम थे। किसी को पता ही नहीं था। सोच लीजिए। 1990 का वह सवाल कि ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना किसने की थी, कोई नहीं बता पाया। अब सभी चेतना से लैस लोगों को यह पता है। इसलिए मैं कह रहा हूं कि 90 के दशक से फुले की मुकम्मल  पहचान हिंदी बेल्ट में शुरू हुई और पुस्तकें आने लगीं।

जगदेव प्रसाद पर भी उनकी पहली जीवनी 1999 में अशोक कुमार सिन्हा द्वारा लिखी गई थी। अशोक कुमार सिन्हा जगदेव बाबू के बेटे नागमणि जी के आप्त सचिव थे। उनकी किताब आयी थी ‘कृत्या पब्लिकेशन’ पटना से। वही जगदेव प्रसाद की पहली जीवनी है। दूसरी जीवनी सच्चिदानंद श्याम ने लिखी है। सच्चिदानंद श्याम उसी हाईस्कूल में पढ़ाते थे, जिस हाई स्कूल के हेडमास्टर जगदेव बाबू हुआ करते थे।

यह स्कूल परैया में बना था। जब स्कूल पर नाम रखने के लिए मीटिंग हुई तो जगदेव बाबू ने सुझाव दिया था कि इस स्कूल का नाम सम्राट अशोक के नाम पर रखा जाय। जगदेव बाबू के साथ वह पढ़ाते थे, इसलिए उनको अच्छे से जानते थे। उनकी पुस्तक आयी 2004 ईसवी में अलका प्रकाशन, पटना से।

मैं दावे के साथ कहता हूं कि भारत के इतिहास में किसी राजा ने अपने शिलालेखों में पहली बार ‘बहुजन कल्याण’ शब्द का प्रयोग किया तो वह सम्राट अशोक थे और उसको आप उनके दूसरे स्तंभ लेख में पढ़ सकते हैं। बुद्ध ने पहली बार ‘बहुजन’ शब्द का इस्तेमाल किया है हमारे साहित्य में और सम्राट अशोक ने अपने आदेश में लिखा ‘बहुजन कल्याण के लिए शासन चलेगा।’ उनका लिखा हुआ उपलब्ध है, आप चाहें तो उसे पढ़ सकते हैं। इसके लिए उन्होंने ‘बहुकयाने’ शब्द का प्रयोग किया है, जिसका मतलब होता है ‘बहुजन कल्याण के लिए’। वही जो ‘बहुजन’ शब्द है, उसी बुद्ध के दर्शन से आपका पूरा संविधान प्रभावित है। इसीलिए संसद में ‘सर्वसम्मति’ से कुछ भी पास नहीं होता है। ‘बहुमत’ से होता है। क्योंकि ‘सर्वसम्मति’ कभी हो ही नहीं सकती है। कोई निर्णय ही नहीं हो सकेगा।

जगदेव बाबू पर तीसरी किताब 2005 में बजरंग प्रताप केसरी ने लिखी। डॉ . केसरी की पुस्तक ‘ शोषित क्रांति की मशाल अमर शहीद जगदेव प्रसाद’ मूल रूप से 2005 ई. में लिखी गई, जिसका संशोधित संस्करण 2007 ई. में ” हिंद केसरी 391, पनवासो इंक्लेव, अशोकपुरी, पटना से प्रकाशित हुआ था। बजरंग प्रताप केसरी फिलहाल आरा में जो विश्वविद्यालय है, उसमें हिंदी के प्रोफेसर हैं। चौथी किताब 2006 में लिखी गई। उसको ‘शोषित पत्रिका’ के संपादक प्रोफेसर जयराम प्रसाद सिंह ने जीवनी के रूप में लिखी और उनके भाषणों का संपादन किया। वह किताब शहीद जगदेव मिशन, बोकारो से छपी है।

उन्होंने शीर्षक दिया है- ‘क्रांतिबीज’। शोषित पत्रिका जगदेव बाबू ही निकालते थे। मुझे लगता है कि पहला अंक जगदेव बाबू निकाले थे और बाकी सबका संपादन प्रो. जयराम प्रसाद सिंह ने किया था। जगदेव बाबू ने कहा था कि ‘मीडिया का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। ये लोग केवल सत्ता पक्ष का गुणगान करते हैं।’ शोषित पत्रिका की कवर डिजाइन ‘श्याम बिहारी प्रेस, मछुआ टोली’ से बनी थी। तबसे लेकर आज तक (बीच में रूकती/टूटती) यह पत्रिका निकल रही है। आजकल इसके संपादक ‘रघुनीराम शास्त्री’ हैं।

जगदेव प्रसाद पर अगली किताब 2007 में आयी थी। उसका संपादन अशोक कुमार सिन्हा ने ही किया था। उसका नाम है- ‘शहीद का संग्राम’। साहित्य संसद, दिल्ली ने प्रकाशित किया है। 2009 में जगदेव बाबू पर छठी किताब आयी थी, जिसे राकेश कुमार मौर्य ने लिखी थी। वह शाक्य पब्लिकेशन, इलाहाबाद से छपी है। 2011 में मैंने जगदेव बाबू के संपूर्ण वाङ्मय का संपादन किया, जिसे दिल्ली के सम्यक प्रकाशन ने छापा है। यह जगदेव प्रसाद के भाषण, लेख, साक्षात्कार सहित उन पर केंद्रित वैचारिक लेखों का अब तक का सबसे बड़ा काम है।

जगदेव प्रसाद क्या बोले, क्या लिखे और उनके समय में क्या-क्या हुआ, इसके लिए हमारे पास बहुत अच्छे स्रोत नहीं हैं। क्योंकि जो शोषितों के नेता थे, उनका वक्तव्य मीडिया नहीं लेता था। छापता ही नहीं था। छापा भी है ‘जगदेव प्रसाद’ को तो संक्षेप में लिख दिया ‘जेपी’। अब कौन ‘जेपी’। ये ‘जेपी’ या वो ‘जेपी’। पता ही नहीं। यह मीडिया का जाल है। ऐसा छापा सब कि पता ही नहीं चला।

बिहार में दो समानांतर आंदोलन हुए। एक ‘जेपी’ ( जयप्रकाश नारायण ) आंदोलन और दूसरा इस ‘जेपी’ ( जगदेव प्रसाद ) का भी आंदोलन हुआ और इसी आंदोलन में जगदेव प्रसाद मारे गए थे। वे ‘जेपी’ आदोलन में शामिल नहीं हुए। खुद जेपी आंदोलन किए। उस ‘जेपी’ आंदोलन में कोई सामाजिक समानता लाने वाला मौलिक सूत्र नहीं था। वह पूरी तरह से राजनीतिक गतिविधि थी। इसीलिए कुछ लोगों ने जेपी आंदोलन को हवा-हवाई बताया था। जेपी आंदोलन पर मैं कुछ अधिक नहीं कहना चाहूंगा। लेकिन जगदेव प्रसाद मानते थे कि जेपी आंदोलन का जो नेतृत्व है, वह सामंतों के हाथ में है, पूंजीवादियों के हाथ में है।

इसलिए उसको वे पसंद नहीं करते थे। लिखने वाले तो यह भी लिखते हैं कि जेपी संघ के लोगों से मिले हुए थे। बाद में जो जनता पार्टी बनी, उसमें जनसंघ भी शामिल हो गया। तब इंदिरा गांधी सामंतों के खिलाफ थीं। जो प्राइवेट बैंक थे, उस पर हमला बोल दी थीं। सारे लोग बिलबिला रहे थे। उसी की आड़ में जेपी को खड़ा किया गया था। इस तरह का भी विश्लेषण आप को पढ़ने को मिलेगा।

      जगदेव प्रसाद पर केंद्रित आठवीं पुस्तक भी सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली से छपी। डॉ. जितेंद्र वर्मा ने ‘ अमर शहीद जगदेव प्रसाद ‘ के नाम से 2012 ई. में उनकी जीवनी लिखी है। हिंदी साहित्य में जगदेव प्रसाद पर केंद्रित न सिर्फ गद्यात्मक कृतियाँ आई हैं बल्कि अनेक पद्यात्मक ग्रंथ भी आए हैं, जिसमें चंद्रप्रकाश लाल रचित ‘ शहीद जगदेव महाकाव्य ‘ ( सूर्यपूरा, अंबा, 1990 ) तथा जगनारायण सिंह रचित ‘अमर शहीद जगदेव प्रबंध काव्य’ ( करगहर, रोहतास 2000 ) काफी विख्यात हैं। साल 2018 में गुलाब चंद्र आभास का प्रबंध काव्य ‘लेनिन बिहार के’ प्रकाशित हुआ। इसे विद्या निकेतन, वाराणसी ने छापा है। एकदम ओजस्वी शैली में लिखी गई यह छंदोबद्ध रचना है। क्रांति से लैस भाषा जगदेव बाबू के व्यक्तित्व के अनुरूप है। गुलाब चंद्र आभास हिंदी के प्रोफेसर हैं। सेवानिवृत्त हैं और सासाराम में रहते हैं।

        जगदेव प्रसाद पर पहला शोध – कार्य करने का श्रेय हरेन्द्र कुमार को जाता है। हरेन्द्र कुमार रोहतास जिले के गाँव अररूआ के निवासी हैं। उन्होंने यह शोध- कार्य वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के राजनीति विज्ञान विभाग में किया है। इस शोध- कार्य के एक हिस्से को ‘जगदेव प्रसाद वाङ्मय’ में संपादित किया गया है। जगदेव प्रसाद पर पत्रिकाओं के विशेषांक भी आए। मगर बाबू जगदेव प्रसाद पर सालाना स्मारिका प्रकाशित करने का काम संत कुमार सिंह कर रहे हैं। इसका 30 वाँ अंक 2019 में आने वाला है। तीस सालों से निरंतर वे इस कार्य को कर रहे हैं। संत कुमार सिंह एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

जगदेव प्रसाद के विचारों के कायल हैं। स्मारिका भी कोई दुबली-पतली नहीं बल्कि भारी भरकम प्रकाशित करते हैं। स्मारिका का हर अंक जगदेव प्रसाद के जीवन और विचारों से संबंधित महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध कराता है। जगदेव प्रसाद की अनेक मूर्तियां बिहार में स्थापित हैं। राजधानी पटना से लेकर दूर – दूर के क्षेत्रों में। सरकार ने डाक टिकट भी जारी किए हैं। अनेक स्कूल, यहाँ तक कि काॅलेज भी स्थापित हैं इनके नाम पर। ये सब बाबू जगदेव प्रसाद के तेज का प्रभाव है।

जगदेव बाबू को ‘बिहार का लेनिन’ कहा जाता है। लेकिन जगदेव प्रसाद लेनिन और मार्क्स दोनों थे। यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि मार्क्स ने साम्यवाद के सिद्धांत दिए। मगर वे इसे लागू होते अपनी आँखों से नहीं देख पाए। मार्क्स की मृत्यु के बाद लेनिन रूस में साम्यवाद को लागू किए। लेकिन जगदेव प्रसाद ने शोषितवाद का सिद्धांत दिए और इस शोषितवाद के सिद्धांत को बिहार में लागू भी कर दिए। बिहार में हाशिए के लोगों को सत्ता पर काबिज कर दिए। यदि वे जीवित होते तो शायद भारत में शोषित राज की स्थापना हो गई होती क्योंकि वे ऐसा कहा करते थे और उनमें यह कर गुजरने की क्षमता भी थी।

इसलिए जगदेव प्रसाद मार्क्स और लेनिन दोनों थे। उन्होंने सिद्धांत दिए भी और लागू भी किए। इसीलिए मैं कहता हूं कि भारत का जो राजनीति विज्ञान है, वह डरा हुआ है, घबराया हुआ है। यहां गांधीवाद है, समाजवाद है, लोहियावाद है, फेबियन समाजवाद है। पता नहीं और कितने सिद्धांत ये लोग पढ़ाते हैं। लेकिन ‘शोषितवाद’ के सिद्धांत को अपने पाठ्यक्रम में डालने से ये लोग डरते हैं। जबकि जगदेव प्रसाद का बहुत ठोका-पीटा हुआ सिद्धांत है- ‘शोषितवाद’।

शोषित शब्द का जितना प्रयोग बाबू जगदेव प्रसाद ने किया है, उतना आजादी से लेकर आज तक किसी राजनेता ने नहीं किया है। ‘शोषित’ शब्द उनकी जुबान पर था। इतना कि उनके हर बात में यह शब्द जरूर आता था। उनके झंडा में, उनके राष्ट्रीयगान में, उनके सिद्धांत में, वक्तव्य में, उनकी पार्टी के नाम में, हर जगह शोषित। इसलिये जगदेव प्रसाद मानते थे कि भारत में वर्ग संघर्ष नहीं है बल्कि भारत में वर्ण-संघर्ष है। इसके खिलाफ भारत की जनता लड़ रही है। यहां फ्रायड का ‘यौन कुंठा का मनोविश्लेषणवाद’ नहीं चलेगा। यहां तो जातीय कुंठा का उबाल है। आप पूरे देश में देख रहे हैं। फ्रायड के सिद्धांत से भारत की समस्याओं को नहीं सुलझाया जा सकता। यहां जातीय कुंठा है। इसलिए जगदेव प्रसाद कहते थे कि भारत में वर्ग-संघर्ष नहीं बल्कि वर्ण-संघर्ष है।

जगदेव प्रसाद बड़े जगे हुए आदमी थे। उनके जन्म के बारे में कुछ लोग लिख दिए हैं कि उनका जन्म अरवल जिले में हुआ था। कुछ लोगों ने और भी बहुत कुछ लिख दिया है। उसको मैं दुरुस्त करना चाहता हूं। जगदेव प्रसाद का जब जन्म हुआ था, उस समय उनका जिला ‘गया’ था। लेकिन वर्तमान में वह जगह जहानाबाद में है। अरवल जिले के ‘कुर्था ब्लाक’ में उनकी हत्या हुई थी। लेकिन उनका गांव ‘कुरहारी’ जहानाबाद में है। ‘कुरहारी’ शकूराबाद कस्बे का एक टोला है। उसी में जगदेव प्रसाद का जन्म हुआ था।

स्कूल की शिक्षा शकूराबाद में उन्होंने प्राप्त की थी। उसी स्कूल में उनके पिता जी शिक्षक थे। मिडिल स्कूल पास करने के बाद वे हाई स्कूल में पढ़ने गए। लेकिन आसपास में उस वक्त कोई हाई स्कूल नहीं था। हाई स्कूल जहानाबाद में ही था। उस समय जहानाबाद में एक ही हाई स्कूल था- वीटी हाई स्कूल। इस स्कूल की स्थापना तब हुई थी, जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय की हुई थी  -1916 ई. में। 1916 ई. में एक अंग्रेज अधिकारी थे, जिनका नाम था सैमुअल वीटी। उन्होंने उस हाई स्कूल की स्थापना की थी। अभी उस स्कूल का नाम बदलकर गांधी जी वगैरह पर हो गया है। लोग नाम ही बदलते हैं, स्कूल तो बनाते नहीं।

जगदेव प्रसाद वीटी हाई स्कूल के विद्यार्थी थे। कुर्मी समाज के एक बहुत बड़े नेता हुए भोला प्रसाद सिंह। गूगल पर खोजिएगा तो इनके बारे में एक लाइन नहीं मिलेगा। जगदेव प्रसाद को भी गूगल पर खोजिएग तो सामग्री नहीं मिलेगी। इधर बीच उनके बारे में कुछ जानकारियाँ आने लगी हैं। भोला प्रसाद सिंह जो आगे चलकर बिहार के प्रभावशाली नेता हुए, जगदेव प्रसाद के साथ पढ़ते थे। ये वही भोला प्रसाद  हैं, जिन्होंने कर्पूरी ठाकुर को प्रकारांतर से मुख्यमंत्री बनवाया। मुख्यमंत्री बनने जा रहे थे शिवानंद तिवारी के बाबू जी रामानंद तिवारी। भोला बाबू ही उनका विरोध किए। बहुत जबर्दस्त लीडर थे और जब जगदेव बाबू को मार दिया गया तो उसमें भोला बाबू ही सबसे ज्यादा सक्रिय थे। लेकिन उनका कहीं नाम नहीं आता। भोला प्रसाद सिंह और जगदेव बाबू हाई स्कूल के सहपाठी थे।

तब सिर्फ गया जिले में लगभग साढ़े नौ हजार ज़मींदार थे। जगदेव बाबू का जो गांव था, वहां के स्थानीय ज़मींदार पंडुई के थे। ‘पंडुई’ घराने की ज़मींदारी थी। उधर के जमींदारों  की प्रथा थी कि हर कास्तकार को (एक बिगहा में बीस कठा होता है) पांच कठा उनके हाथी को चराने के लिए देना है। तरह-तरह का कर लगता था पहले। तेली पर तेल का कर लगता था। अहीर पर घी का कर लगता था। जैसे दीवाली आ गयी तो तेली को सोलह सेर तेल देना होता था। हर सोहराई को यह करना होता था। यह नियम था। ….तो वहां पचकठिया प्रथा थी। पचकठिया प्रथा में पांच कठा आपको देना है ज़मींदार के हाथी के लिए। जगदेव बाबू ने कुछ छात्रों के साथ मिलकर इसका विरोध किया। जब महावत हाथी ले आया तो जगदेव बाबू ने कहा कि आप यहां से निकल जाइए। वह अड़ गया तो मारपीट करके भगा दिए। तब जगदेव प्रसाद हाई स्कूल में पढ़ते थे। उन्होंने इस प्रथा का विरोध करके बंद ही करवा दिया।

जगदेव बाबू जब मिडिल स्कूल पास किए थे तो प्रथम श्रेणी से पास किए थे। इनके बाबू जी बहुत खुश हुए। इनके दादा बहुत बड़े पहलवान थे। उनका नाम इंद्रजीत महतो था। एक पोरसा लंबे थे। एक पहलवान था। उससे लड़ने के लिए जमींदारों के उकसावे पर दादा इंद्रजीत के पास आदमी भेजा गया। उनके दादा इंद्रजीत खेत पर थे। इंद्रजीत महतो ने हल का फाल निकालकर उसे टेढ़ा कर दिया और उसको देकर बोले कि जाओ, इसे सीधा करवाकर लाना, तब चलेंगे लड़ने के लिए।

वह आदमी जब टेढ़ा फाल पहलवान के पास ले गया, तब वह पहलवान भाग खड़ा हुआ। तो जगदेव बाबू के दादा ताकतवर आदमी थे। दादा जी बहुत दुलार करते थे जगदेव बाबू को। जगदेव बाबू का रंग सांवला था। शरीर गठा हुआ था। ललाट उन्नत और चमकदार था। छाती चौड़ी और स्वभाव चंचल था। व्यक्तित्व निर्भीक, साहसी और विद्रोही था। मगर भीतर से उतना ही करुण और दानी था।

प्रथम श्रेणी से पास करने के कारण जगदेव प्रसाद के बाबू जी ने उनके लिए नया कपड़ा खरीद दिए। नया कपड़ा पहनकर जब निकले तो वहां के ज़मींदार घराने का जो कारिंदा था, उसने उन पर छींटा-कसी की- ‘ई केकर लइका ह हो? जवाब था- ई प्रयागवा के लइका ह।’ यह बात जगदेव बाबू सुन लिए। उस समय सात-आठ के विद्यार्थी थे। सुन लिए तो उठाए धूल और उसकी आंख में झोंक दिए। बड़े हिम्मती थे। वह ऐसा समय था कि ऐसा करना दुस्साहसिक कार्य था।

जब जगदेव बाबू हाई स्कूल के छात्र थे, तब वह सहजानंनद सरस्वती का समय था। किसान आंदोलन चल रहा था बिहार में। उस समय आंदोलन के लोगों ने जहानाबाद में मीटिंग बुलाई थी। एक वक्ता ने जहानाबाद में कहा कि ‘हजार अंबेडकर भी पैदा हो जाएंगे तो जमींदारी प्रथा नहीं मिटेगी’। इसका विरोध हाई स्कूल में जगदेव प्रसाद ने किया। लाठियाँ खायीं। हाई स्कूल पास ही किए थे कि उनके पिता जी का देहांत हो गया। तो इन्होंने क्या किया? पिता जी की बहुत दवा-दारू हुई। ठीक नहीं हुए। उनके घर में देवी-देवता की बहुत पूजा होती थी। उन्होंने कहा कि यह सब मूर्तियां बेकार हैं। पिता जी के लिए इनसे कुछ नहीं हुआ और नहीं उन्हें यह सब बचा सके। उन्होंने पिता जी की अर्थी पर ही सारी तस्वीरें और मूर्तियां उठाकर रख दिए। वे लोग भी जल गए।

बाद में जगदेव बाबू पटना के बीएन काॅलेज चले गए। वहां से उन्होंने अर्थशास्त्र में बी.ए. की डिग्री हासिल की। फिर पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने एम.ए. किया। तब हाॅस्टल की बहुत समस्या थी। हालांकि आजकल डीयू में भी वह समस्या है। बहुत सारे छात्रों को नहीं मिल रहा है। वह समस्या उस समय भी थी। एक राजनेता थे चन्द्रदेव प्रसाद वर्मा। वह बाद में केंद्रीय मंत्री हुए। वह लोकसभा का चुनाव आरा से जीतते थे। उस समय वह भी विद्यार्थी थे। जगदेव बाबू को वह अपने ही छात्रावास में रखे। कुछ किताबें वगैरह उन्होंने उपलब्ध करवाई।

एम.ए. में जगदेव बाबू का एक वैचारिक दृष्टिकोण बनने लगा। यहां से उनका सामाजिक-राजनीतिक जीवन शुरू हुआ। बाद में एम.ए. पास कर वह बीपीएससी की परीक्षा दिए और साक्षात्कार में जाति के आधार पर उनका चयन नहीं हुआ।

जगदेव प्रसाद पांच बार चुनाव लड़े। दो बार एम.एल.ए. हुए थे। तीन बार मंत्री हुए थे। दारोगा प्रसाद राय जब मुख्यमंत्री हुए, तब इन्होंने दारोगा प्रसाद राय से कहा कि महोदय आप साक्षात्कार में नंबर घटवाइए। इसी के बलबूते ऊंचे तबके के लोग मजिस्ट्रेट, आफिसर और डी.एस.पी. बन जा रहे हैं। तब पहली बार दारोगा प्रसाद राय ने ही साक्षात्कार का अंक कम कर दिए थे।

बहुत सारे इतिहासकार लिख दिए कि मुंगेरी लाल कमीशन की फाइल भोला पासवान शास्त्री  के समय में आगे बढ़ी। जबकि वह फाइल दारोगा प्रसाद राय के समय में ही आगे बढ़ी थी। क्योंकि शास्त्री जी सामंतों के कब्जे में थे। मंत्रिमंडल में उन्हीं लोगों की चलती थी। इसलिए इतिहास में इस तरह की समस्याएं हैं।

जगदेव प्रसाद एम.ए .पास करने के बाद सचिवालय में तीन महीना नौकरी किए। फिर परैया के स्कूल में जाकर हेडमास्टरी किए और फिर छोड़ दिए। लोहिया के साथ हो गए। उस समय सोशलिस्ट पार्टी का मुखपत्र (जनता नाम की पत्रिका थी) था, उसके संपादक हो गए। यह 1953 की बात है। इसके बाद वह हैदराबाद गए। सिटीजन (इंगलिश) और एक दूसरी पत्रिका उदय (हिंदी) 1956 के संपादक हुए जो हैदराबाद से निकलती थी। उस समय तक लोहिया जी का केंद्र हैदराबाद में भी हो गया था। वहीं सोशलिस्ट पार्टी का अधिवेशन हुआ था। जगदेव बाबू की हिंदी और अंग्रेजी दोनों में बहुत अच्छी पकड़ थी।

वो दोनों पत्रिकाओं का संपादन किए। उसके बाद 1957 का लोक सभा चुनाव आ गया। उसी में लोहिया जी ने इनको टिकट दिया। पुस्तकों में उस क्षेत्र का नाम मिलता है बिक्रमगंज। लेकिन तब विक्रमगंज लोकसभा क्षेत्र नहीं था। उस समय सासाराम के दो हिस्से थे- उत्तरी लोक सभा क्षेत्र और दक्षिणी लोक सभा क्षेत्र। दक्षिणी लोक सभा क्षेत्र से जगजीवन राम चुनाव लड़ते थे और जो उत्तरी लोक सभा क्षेत्र था (जो आजकल बिक्रमगंज है), वहां से जगदेव बाबू चुनाव लड़े।

जगदेव प्रसाद का यह पहला लोकसभा चुनाव था। (राम स्वरूप वर्मा चुनाव जीत गए थे।) जगदेव बाबू को टिकट मिल गया, लेकिन पूंजी इतनी नहीं थी। उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे- राम सुभग सिंह। वह जीत गए। वह बाद में कांग्रेस सरकार में रेलवे मिनिस्टर हुए। फिर जगदेव बाबू को 1962 में टिकट मिला। सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर कुर्था से विधान सभा का चुनाव लड़े । यह चुनाव भी हार गए। वह पहली बार चुनाव जीते 1967 में। संसोपा के टिकट पर कुर्था से। वहां सुखदेव प्रसाद वर्मा को हराकर चुनाव जीते थे। सुखदेव प्रसाद वर्मा ने 1957 में टिकारी के राजा को हराया था। राजा को प्रजा ने हराया। लेकिन यहां लोक ने प्रजा को हराया। सुखदेव प्रसाद वर्मा प्रजा थे तो जगदेव बाबू लोक थे।

1967 के चुनाव में संसोपा 69 सीटें जीतकर बिहार विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। ‘संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी’ (संसोपा) बड़ी पार्टी और मुख्यमंत्री बन गये ‘जन क्रांति दल’ के महामाया प्रसाद सिन्हा। कैसे हो गए? यह सवाल है। इसमें एक सिद्धांत घुसेड़ दिया गया- जो पहले वाले मुख्यमंत्री को हराए हैं, वही मुख्यमंत्री बनेंगे। पहले मुख्यमंत्री के.बी. सहाय को महामाया प्रसाद सिन्हा ने हराया था पटना से। के.बी. सहाय पटना और रामगढ़, दो जगह से चुनाव लड़े थे। दोनों जगह से हार गए। रामगढ़ में उन्हें रघुनंदन प्रसाद (कोईरी थे) ने हराया था।

इस हिसाब से तो रघुनंदन प्रसाद को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए था क्योंकि वे मुख्यमंत्री को हराए थे और उनकी पार्टी ‘संसोपा’ के पास सबसे अधिक विधायक भी थे। उनको कोई पूछा ही नहीं। इसलिए कि वे शोषित तबके से थे। अपने ही बन गए। उनकी पार्टी ‘जन क्रांति दल’ बहुत बड़ी पार्टी नहीं थी। जन क्रांति दल का निर्माण किए थे- रामगढ़ के जमींदार कामाख्या नारायण सिंह। बिहार के चुनाव में पहली बार हेलीकाप्टर और हवाई मार्ग का इस्तेमाल कामाख्या नारायण सिंह ने किया था। उन्होंने खरीद लिया था। बाद में ऐसा हो गया कि कोई जहाज उड़ता तो गांव के लोग बोलते थे कि कामाख्या नारायण सिंह का जहाज है। इतने समृद्ध आदमी थे। उन्हीं की जेबी पार्टी थी ‘जन क्रांति दल’ और उसके मुख्यमंत्री बने महामाया प्रसाद सिन्हा।

महामाया प्रसाद सिन्हा ने के.बी. सहाय पर ‘अय्यर आयोग’ बैठा दिया। इससे कांग्रेसी खड़बड़ा गए। क्योंकि जांच होती तो बहुत लोग लपेटे में आते। सिन्हा जी की सरकार गिराने की प्रक्रिया शुरू हो गई। जगदेव प्रसाद तो पहले से नाराज थे। क्योंकि उस सरकार में सब उनके ही लोग थे। एक भी अनुसूचित जाति/जनजाति/मुस्लिम को मंत्री नहीं बनाया गया था। यह लोहिया के सिद्धांत के परे की बात थी। इस आंकड़े से जगदेव बाबू को बहुत बेचैनी थी।

कांग्रेस का सहाय ग्रुप और के.बी. सहाय कमीशन बिठाने के कारण नाराज़ थे। इसलिए वह जगदेव प्रसाद की तरफ मिल गए थे और उन्होंने ही परमानंद नाम के कायस्थ एमएलसी की सीट खाली करवायी थी और बीपी मंडल को एमएलसी बनाया गया। उसके बाद उनको बिहार का मुख्यमंत्री बनाया गया। इससे बीपी मंडल का कद बढ़ा। आगे चलकर वे मंडल कमीशन के अध्यक्ष हुए। तब मंत्रिमंडल में शोषितों की संख्या पचास प्रतिशत से ऊपर चली गई थी। तब पहली बार सचिव, पुलिस पदाधिकारी और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर पहली बार शोषित वर्ग के अधिकारियों को बैठाया गया। बिहार में बड़े पैमाने पर बदलाव किया गया।

‘शोषित दल’ लोहिया से असंतुष्ट लोगों का गुट था। पहले सब ‘संसोपा’ के ही विधायक थे। ‘शोषित समाज दल’ नाम बाद में पड़ा। 25 अगस्त 1967 को पटना में पहले ‘शोषित दल’ बना। उसी दिन बीपी मंडल का जन्म दिन है। कुर्मी, कोईरी, यादव, दलित वर्ग के प्रतिनिधि आदि कई जातियों के लोग संगठित हुए और ‘शोषित दल’ की स्थापना हुई। ‘शोषित दल’ की स्थापना के लिए इन लोगों ने जो मीटिंग की, उसकी अध्यक्षता की यादव एमएलए शिवपूजन शास्त्री जी ने। बाद में ‘शोषित दल’ का अध्यक्ष बीपी मंडल को बनाया गया। बाद में 7 अगस्त 1972 को शोषित दल का नाम शोषित समाज दल कर लिया गया। रामस्वरूप वर्मा का समाज दल इसमें जुड़ गया।

शोषित दल का गठन हो गया और बिहार की सत्ता पलट गई। उसके बाद जगदेव प्रसाद ने महामाया प्रसाद सिन्हा और उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार की जांच के लिए आयोग बैठाया- मधुलकर आयोग ( 4 मार्च, 1968)। पूरा हड़कंप मच गया। अब उन लोगों ने षडयंत्र  किया कि किसी तरह बीपी मंडल की सरकार को गिराया जाए। अंततः उसी कांग्रेस में फूट डालकर बीपी मंडल की सरकार को इन लोगों ने गिरा दिए।

जगदेव बाबू एक सजग आदमी थे। जब एम.एल.ए. हुए तो उन्होंने जो दरवान रखा, उनका नाम था जूठन पासवान। जगदेव बाबू उसका नाम बदल कर ‘राजेश्वर पासवान’ कर दिए। देखिए यही सजगता है। सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़ा हुआ राजनेता सूक्ष्म चीजों को कैसे पकड़ता है, यह समझने की बात है। लोहिया जी के सचिव थे उर्मिलानंद झा। जब उनसे कोई मिलने जाता था, जगदेव प्रसाद भी मिलने जाते थे तो झा बहाना कर देते थे। जबकि जगदेव प्रसाद से कोई मिलने आता था तो राजेश्वर पासवान ले जाकर उनको मिलवा देते थे। छोटी-छोटी चीज पर भी आदमी को ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर आप एक चपरासी की भी बहाली करते हैं तो वह बहुत काम का होता है। आफिसर का करते हैं तो मत पूछिए। कितने लोगों का भला होगा। कितने लोगों को न्याय मिलेगा। इसलिए ये सब चीजें बहुत जरूरी होती हैं।

      जगदेव प्रसाद मनोविज्ञान के बड़े पारखी थे। वे कहा करते थे कि हम जिनके लिए बोलते हैं, वे गूंगे और बहरे हैं। हम जिनके लिए नहीं बोलते वे इतने चुस्त और चालाक हैं कि मेरी बात को वे ही जल्द पकड़ लेते हैं। परंतु जिस दिन सारे लोग जग जाएंगे तो निश्चय ही उनको नेस्तनाबूद कर देंगे। वह दिन जल्द ही आने वाला है। बड़े ही आत्मविश्वासी और आशावादी थे जगदेव प्रसाद।

जैसा कि मैंने बताया कि जगदेव प्रसाद स्वयं पत्रिका निकालते थे। यदि वह ‘शोषित पत्रिका’ नहीं निकलती तो जगदेव प्रसाद का पूरा भाषण और उनके विचार आज भी संग्रहीत नहीं हो पाते। कारण कि किसी पत्र-पत्रिका में उनके बारे में कुछ है ही नहीं। अब गूगल पर टाइप करने पर एक-दो लेख आ रहा है। अभी सुखदेव प्रसाद वर्मा, जिनको जगदेव प्रसाद हराये थे, उनके बारे में जानकारी खोज रहा था, उन पर एक लाइन कहीं नहीं मिला। ऐसे लोगों के बारे में जानकारी खोजना बहुत कठिन है।

1967 से लेकर अब तक का ‘शोषित पत्रिका’ का पूरा अंक हमें मिल गया। उसी में जगदेव प्रसाद की सारी गतिविधि दर्ज थी। उसी माध्यम से मैंने जगदेव प्रसाद वाङ्मय का संपादन किया। जगदेव प्रसाद ने कब, किस तारीख को क्या बोला था, उसका पता हो सका। नहीं तो जगदेव प्रसाद की पूरी विचारधारा और उनका पूरा सिद्धांत खत्म हो गया होता। ऐसी चीजों को बचाने के लिए हम लोगों द्वारा निकाली गईं छोटी-बड़ी पत्रिकाएं बहुत काम की चीजें हैं। उन्हें बचा कर रखा जाना चाहिए।

राजनीतिक पार्टी बनाते वक्त जगदेव प्रसाद ने कहा था कि मैं सौ वर्षों की राजनीतिक लड़ाई की नींव डाल रहा हूँ। यह एक क्रांतिकारी पार्टी होगी, जिसमें आने और जाने वालों की कमी नहीं होगी, परंतु इसकी धारा कभी बंद नहीं होगी। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जाएंगे,  दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जाएंगे और तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। आजाद भारत के पूरे इतिहास में ऐसे बहुत कम राजनेता हुए, जिनकी सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि जगदेव प्रसाद की तरह साफ हो। उनका मानना था कि भारत का समाज साफ तौर पर दो तबकों में बंटा है – शोषक और शोषित। शोषक सौ में दस हैं और शोषित सौ में नब्बे। परंतु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दस प्रतिशत शोषकों का कब्जा है, जिससे नब्बे प्रतिशत शोषितों को मुक्ति दिलाना ही हमारा लक्ष्य है। 

(प्रोफेसर (डाॅ.) राजेंद्र प्रसाद सिंह सासाराम स्थित एसपी जैन कॉलेज में अध्यापक हैं। आप अंतरराष्ट्रीय भाषा वैज्ञानिक और आलोचक होने के साथ इतिहास के जानकार हैं।)

This post was last modified on September 4, 2020 10:52 pm

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