पुण्यतिथि पर विशेष : चार्ल्स कोरिया; आधुनिक भारत की वास्तुकला को जिसने दुनिया में नई पहचान दी

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चार्ल्स कोरिया उस अज़ीम शख्सियत का नाम है, जिन्होंने आधुनिक भारत की वास्तु कला को दुनिया भर में एक नई पहचान दी। वास्तुकार और शहरी योजनाकार चार्ल्स कोरिया, देश के आधुनिक वास्तुकला का चेहरा माने जाते थे। स्वतंत्र भारत की वास्तुकला को विकसित करने में उनकी निर्णायक भूमिका थी। उन्होंने देश में कई बेमिसाल संरचनाएं डिजाइन कीं। अहमदाबाद के साबरमती आश्रम का ‘महात्मा गांधी संग्रहालय’ और मध्य प्रदेश में ‘भारत भवन’ की कलात्मक संरचनाएं चार्ल्स कोरिया की ही बेहतरीन कला और शानदार हुनर का जीता-जागता नमूना हैं।

यही नहीं जब 1970 के दशक में नवी मुंबई की परिकल्पना की गई, तो इस योजना को पंख लगाने का काम भी चार्ल्स कोरिया ने ही किया। वे नवी मुंबई के मुख्य वास्तुकार थे। कोरिया के वास्तुकला के नमूने मुंबई में जगह-जगह दिखलाई देते हैं। वास्तुकला के अलावा भारतीय कलाओं और विचार के क्षेत्र में भी उनका विशाल योगदान है। उनका एक विस्तृत आभामंडल था। जो कोई भी उनके संपर्क में आता, वह उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता था।  

1 सितम्बर, 1930 को अविभाजित आंध्र प्रदेश के सिकंदराबाद में जन्मे चार्ल्स कोरिया ने मुंबई के ‘सेंट जेवियर कॉलेज’ से शुरूआती पढ़ाई की। इसके बाद ऊंची तालीम और विशेष डिग्रियां उन्होंने ‘यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन’ और प्रतिष्ठित ‘मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ (एमआईटी) से हासिल कीं। अपनी तालीम पूरी करने के बाद, उन्होंने वास्तुकला को अपना करियर बनाया। थोड़े से ही अंतराल में कोरिया का शुमार देश के श्रेष्ठ वास्तुकारों में होने लगा। दिल्ली की ‘जीवन भारती’ बिल्डिंग, ‘ब्रिटिश काउंसिल’ बिल्डिंग, दिल्ली नेशनल क्राफ्ट म्यूजियम, कोलकाता के साल्ट लेक क्षेत्र में सिटी सेंटर, मध्य प्रदेश का विधानसभा भवन, नवी मुंबई का जवाहर कला केन्द्र, गोवा में कला अकादमी जैसे देश के कई बेहतरीन भवन चार्ल्स कोरिया की कल्पनाओं और मेधा की देन हैं।

अपने देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी उन्होंने विलक्षण वास्तु संरचनाएं कीं। लिस्बन, एमआईटी अमेरिका, बोस्टन,टोरंटो आदि में चार्ल्स कोरिया का काम देखा जा सकता है। टोरंटो में उनके द्वारा डिजायन ‘आगा खां म्युजियम’ और ‘इस्माइली सेंटर’ की तारीफ करते हुए, वास्तुकला समीक्षक ह्यू पीयरमैन ने लिखा था,‘‘कोरिया ने यहां जिस तरह से प्रार्थना घर का निर्माण किया है, वह अद्भुत है। अत्याधुनिक और उतना ही रहस्यमयी।’’ चार्ल्स कोरिया, वास्तुकार के साथ-साथ एक अच्छे शहरी योजनाकार भी थे। 1970 के दशक में जब सरकार के दिमाग में नई शहरी योजनाएं बनाने का विचार आया, तो उन्हें बनाने से लेकर सही तरह से क्रियान्वयन करने की जिम्मेदारी चार्ल्स कोरिया के ही कंधों पर डाली गई। उन्होंने दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और बेंगलुरू की टाउनशिप का  डिजाइन किया। आज हम देश में कम आय वर्ग के लिए कई किफायती आवास निर्माण योजनाएं देखते हैं, इन योजनाओं की शुरुआत कोरिया ने ही की थी। आज जिस तरह से महानगरों में बिना किसी योजना के अंधाधुंध बिल्डिंगें बन रही हैं, वे इनके बर खिलाफ थे। उनका कहना था,‘‘बाजार की शक्तियां शहर नहीं बनातीं, बल्कि उन्हें बर्बाद करती हैं।’’

कला अकादमी।

चार्ल्स कोरिया एक श्रेष्ठ वास्तुकार और कलाकर्मी थे। दिल्ली के कनॉट प्लेस को डिजाइन करने वाले रॉबर्ट रसेल टोर से वे खासे प्रभावित थे, लेकिन उन्होंने जल्द ही अपनी एक अलग पहचान बना ली। अपनी मौलिक सोच, भारतीय परम्परा के अनगिनत तत्वों और आधुनिकता के मेल से उन्होंने एक नई वास्तुभाषा विकसित की, जो कि बिल्कुल अनूठी है। उनके डिजाइन किए गए भवनों में एक खास तरह की भव्यता और सौंदर्य है। ये इमारतें अपनी भव्यता से हमें चकाचौंध नहीं करतीं, बल्कि इन्हें देखना एक अच्छा तजुर्बा होता है। उन्होंने वास्तुकला में कई नए प्रयोग किए।

‘ओपेन टू स्काई स्पेस’ को उन्होंने मूल मंत्र की तरह अपनाया था। चार्ल्स कोरिया इमारतों का डिजाइन कुछ इस तरह से करते थे कि उनमें सूरज की किरणें दिन में एक बार जरूर आएं। वास्तुशास्त्र और आधुनिक वास्तुकला की लंबी-लंबी डींग मारने वाले कई वास्तुकार, इस जरूरी चीज को ही अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि किसी भी इमारत में रोशनी कहां से और किस तरह से आए ? इसकी एक अलग अहमियत है। चार्ल्स कोरिया के डिजाइन की हुई इमारतों की और भी कई खास विशेषताएं हैं। मसलन इनमें जालियां और छज्जे। ये जाली और छज्जे, वे मौसम को ध्यान में रखकर डिजाइन करते थे। चार्ल्स कोरिया इस बात का भी हमेशा ख्याल रखते थे कि उनके द्वारा बनाये भवनों में हवा और रोशनी के लिए अलग से ऊर्जा न खर्च करना पड़े, वे सहजता से उपलब्ध हों।

चार्ल्स कोरिया ने जिन इमारतों की संरचना तैयार की, उसमें मध्य प्रदेश के ‘भारत भवन’ का एक अहम स्थान है। यह इमारत देश की शान है। ‘भारत भवन’ का डिजाइन कुछ इस तरह से बनाया गया है कि भूकंप में भी इस इमारत का कुछ नहीं बिगड़ेगा। इस इमारत का हर एक कोना कलात्मक है। यही नहीं इमारत में किस जगह क्या मटेरियल इस्तेमाल किया गया है, यह भी साफ दिखलाई देता है। ‘भारत भवन’ की एक खासियत इसकी रोशनी व्यवस्था भी है। यहां हर एक कोने में प्राकृतिक रोशनी पहुंचती है।

राजस्थान के ‘जवाहर कला केंद्र’ की उत्कृष्टता भी सभी का ध्यान अपनी ओर खींचती है। इस इमारत का डिजाइन भी चार्ल्स कोरिया ने ही किया था। जयपुर की नागर शैली और भवन निर्माण योजना को ध्यान में रखकर चार्ल्स ने इमारत के निर्माण, शैली और भित्तिचित्रों में स्थानीय परंपराओं का निर्वहन किया है। जयपुर को महाराजा जय सिंह ने वास्तु के आधार पर नौ खण्डों में बसाया था। ये नौ खण्ड नौ ग्रहों के प्रतीक थे। जवाहर कला केंद्र में भी चार्ल्स कोरिया ने इसी नवखण्डीय वास्तु को अपनाते हुए नौ चौकों को मिलाकर परिसर की रचना की है, जो कि एक अद्भुत नजारा देती है।

जवाहर कला केंद्र, जयपुर।

वास्तुकार चार्ल्स कोरिया ने शहरों और इमारतों को डिजाइन देने के अलावा देश और विदेश के कई विश्वविद्यालयों में अध्यापन का कार्य भी किया। शहरीकरण पर राष्ट्रीय आयोग के वे पहले अध्यक्ष थे। यही नहीं, साल 1984 में उन्होंने मुंबई में शहरी डिजाइन अनुसंधान संस्थान की स्थापना की थी। यह संस्थान पर्यावरण संरक्षण और शहरी समुदायों में सुधार के लिए काम करता है। चार्ल्स कोरिया को अपनी वास्तुकला के लिए ना सिर्फ देश और दुनिया में खूब शोहरत हासिल हुई बल्कि उन्हें कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। उन्हें वास्तुकला के लिए ‘आगा खान पुरस्कार’, ‘प्रीमियर इम्पीरियल ऑफ जापान’ और रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स (रीबा) के ‘रॉयल गोल्ड मेडल’ समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने वास्तु कला में उनके योगदान को सराहते हुए, साल 1972 में ‘पद्मश्री’ और साल 2006 में ‘पद्म विभूषण’ सम्मान से सम्मानित किया।

रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स, चार्ल्स कोरिया को भारत का महानतम वास्तुकार मानती थी। जब उन्हें यह खिताब मिला, तो चार्ल्स ने इस सम्मान पर अपनी पहली प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बड़े ही विनम्रता से कहा,‘‘शायद सबसे ज्यादा प्रयोगधर्मी ठीक रहता…..लेकिन महानतम कहने के बाद कोई स्पेस नहीं बचता।’’ चार्ल्स कोरिया ने अपनी जिंदगी भर का काम तकरीबन छह हजार रेखांकन, मॉडल, नोट्स और प्रोजेक्ट्स आदि ‘रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स’ को ही दे दिया था। ताकि उनका ठीक तरह से रखरखाव हो सके। अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में वे पानी के पुनर्चक्रण, ऊर्जा पुनर्नवीकरण, ग्रामीण बसाहट और क्षेत्रीय जैव विविधता को लेकर अध्ययन-अनुसंधान कर रहे थे। उनके दिमाग में और भी कई योजनाएं थीं, जो साकार होतीं, उससे पहले 16 जून 2015 को 84 साल की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। आज भले ही वास्तुकार चार्ल्स कोरिया हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन पूरे देश में ऐसी कई इमारतें हैं, जो हमें लंबे समय तक उनके बेमिसाल काम की याद दिलाती रहेंगी।

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल एमपी के शिवपुरी में रहते हैं।)

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