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जन्मदिन पर विशेष: भारत का इतिहास गढ़ने वाले राजनेता लालू प्रसाद का ऐसा था बचपन

जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है

ये जान तो आनी- जानी है, इस जाँ की तो कोई बात नहीं ।

फैज अहमद फैज की इन पंक्तियों से जिंदगी और संघर्षों का हौसला लेने वाले लालू प्रसाद इस समय जेल में हैं। एक ऐसा व्यक्ति, जो हमेशा सामंतवादी, जातिवादी और सत्ता पर काबिज लोगों के निशाने पर रहा। सत्ता में रहते हुए वंचितों को सिर उठाकर जीने का हौसला दिया और जिंदगी में कभी भी, किसी भी हाल में सत्ता के लिए समझौता नहीं किया।

लालू प्रसाद बताते हैं कि उन्हें नहीं पता कि कब, किस तारीख को और किस महीने में उनका जन्म हुआ। बचपन में जब लालू अपनी मां से पूछते थे कि उनका जन्म किस तारीख को हुआ तो वह टाल जाती थीं। जब उन्होंने जिद करके पूछा तो बहुत मायूस होकर उनकी मां ने कहा, “हमरा नइखे याद, कि तू अन्हरिया में जन्मला कि अंजोरिया में।” मिलर हाई स्कूल, पटना के प्रमाणपत्र में दर्ज 11 जून, 1948 को उनकी जन्मतिथि मानी जाती है।

बिहार के सारण जिले के एक अत्यंत पिछड़े गांव फुलवरिया में लालू प्रसाद का जन्म हुआ, जो जिले के बंटवारे के बाद अब गोपालगंज जिले में पड़ता है। उनके पिता कुंदन राय एक ग्वाला थे, जो दूध, दही, मक्खन, घी बेचने का काम करते थे। मिट्टी की दीवार और फूस के छप्पर से बने घर के बगल में पीपल के पेड़ पर गौरैया, कौव्वे और गिलहरियां और नीचे कुत्ते बिल्ली, घर की दरारों में बिच्छू और सांपों का बसेरा था। बचपन में इस भय में जीना पड़ता था कि तेज आंधी में कहीं फूस की छत उड़ न जाए।

लालू प्रसाद ने अपनी जीवनी में लिखा है कि कुछ बड़ा होने पर मैंने खुद को भगई में पाया, जो लंगोट की तरह छोटा कपड़ा होता था। यह कमर में बांधकर टांगों के बीच से लपेट दिया जाता था। धान के पुआल से बिस्तर बनाया जाता था। जूट के बोरे में पुआल, फटे पुराने कपड़े और कपास भरकर मां कंबल बनाती थी, जिससे ठंड न लगे।

मुश्किलों के दौर में बचपन गुजारने वाले लालू प्रसाद शुरु से हंसने हंसाने में माहिर थे। वह लोगों के चुटकुले बनाते, लोगों को हंसाते। भैंस की पीठ पर सवारी करने में भी बचपन में ही वह माहिर हो गए। उसी समय उनका एडमिशन गांव के प्राइमरी स्कूल में हो गया। स्कूल में पिटाई, पास के तालाब में खेलने, मेढकों जैसी आवाज निकालने और तरह तरह की शिकायतें आने से उनकी मां काफी नाराज रहती थीं। इसी दौरान गांव में एक हींग बेचने वाला आया और लालू ने शरारत में जब उसका झोला कुएं में फेंक दिया तो नाराज मां ने उन्हें मुकुंद भाई के साथ पटना भेज दिया।

लालू का दाखिला पटना स्थित शेखपुरा के उच्च प्राथमिक विद्यालय में करा दिया गया। वेटेनरी कॉलेज के परिसर में मुकुंद भाई को मिले एक सर्वेंट क्वार्टर से कुछ दूरी पर स्थित इस विद्यालय में लालू प्रसाद पढ़ने जाने लगे। लालू यहां भी स्कूल में भैंस की सवारी और मछलियां पकड़ने की कहानियां सुनाकर, बच्चों पर जोक बनाकर सहपाठियों के नेता बन गए। सर्वेंट क्वार्टर में रहकर उन्होंने दूध उबालना और बर्तन साफ करना सीख लिया।

गांव के लोगों का मजाक उड़ाने व उन पर चुटकुले बनाने की कला तब काम आई, जब उन्होंने बिहार मिलिट्री पुलिस (बीएमपी) कैंपस के सरकारी माध्यमिक स्कूल में दाखिला लिया। उनके दोस्त और शिक्षक दूसरों की नकल कर उसका अभिनय करने का आनंद लेते थे। गांव और स्कूल में चोर सिपाही के खेल से सीखी कला का प्रदर्शन उन्होंने बीएमपी सभागार में शेक्सपियर के नाटक “मर्चेंट आफ वेनिस” में शॉयलाक की भूमिका अदा कर दिखाया। बीएमपी कमांडेंट ब्रजनंदन बाबू ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार से नवाजा।

प्राइमरी और मिडिल स्कूल की पढ़ाई के बाद लालू प्रसाद ने पटना के मिलर स्कूल में हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए एडमिशन लिया। वहां अपने हास्य विनोद से उन्होंने प्रधानाचार्य को न सिर्फ प्रभावित किया, बल्कि अपनी खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देकर स्टेशनरी, किताब आदि का भी इंतजाम स्कूल की तरफ से कराया।

मिलर स्कूल में लालू एक जोशीले फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में उभरे। अक्खड़ होने के कारण उन्हें सबसे ज्यादा येलो और रेड कॉर्ड मिलते थे। अगर उनकी टीम को कोई खिलाड़ी टंगड़ी मार देता, तो लालू प्रसाद निशाना बनाकर उस पर टूट पड़ते थे। ऐसे में रेफरी भले ही उन्हें पसंद नहीं करते, लेकिन टीम में वह खासे लोकप्रिय हो गए।

शर्ट, पतलून, जूते और नाश्ते की सुविधा को देखते हुए उन्होंने पढ़ाई के दौरान एनसीसी में भी एडमिशन ले लिया। एनसीसी में लालू प्रसाद ऐसे रमे कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ कैडेट का अवार्ड मिला। 1965 में लालू अच्छे अंकों के साथ हाई स्कूल उत्तीर्ण हो गए।

1966 में लालू ने पटना विश्वविद्यालय के बीएन कॉलेज में दाखिला लिया। यह कॉलेज उन दिनों उच्च शिक्षा के 3 श्रेष्ठ संस्थानों में गिना जाता था। वह 10 किलोमीटर दूर स्थित सर्वेंट क्वार्टर से कॉलेज तक पैदल जाते थे। वह विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने वाले अपने इलाके के पहले छात्र थे। वह पेशेवर और निजी दोनों ही स्तर पर बहुत बदल गए। उन्होंने राजनीति में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। दूर से पैदल आते जाते उन्होंने उस 10 किलोमीटर की दूरी में तमाम दुकानदारों और बच्चों को अपना मित्र बनाया। उस दौरान कुछ बच्चे साइकिल और मोटरसाइकिल से भी जाते थे, लेकिन ज्यादातर छात्र-छात्राएं पैदल ही पढ़ने जाते थे।

लालू प्रसाद से यह देखा न गया। वह एक दिन कॉलेज की दीवार पर खड़े हो गए। जब विश्वविद्यालय के छात्र जमा हो गए तो उन्होंने भाषण देना शुरू किया। उन्होंने कहा, “हम गरीब हैं, लेकिन पढ़ना चाहते हैं। इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार को हमारी मदद करनी चाहिए। विश्वविद्यालय को उन विद्यार्थियों के लिए बस की व्यवस्था अनिवार्य रूप से करनी चाहिए, जो दूर से आते हैं। लंबी दूरी पैदल तय करने के बाद हम लोग थक जाते हैं। हम भूख और प्यास को मारते हैं। अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए हमें आंदोलन करना होगा ताकि हम लोग पढ़ाई जारी रख सकें।”

हास्य विनोद में माहिर लालू प्रसाद कॉलेज की लड़कियों में खासे लोकप्रिय थे, जो ज्यादातर उच्च जातियों से थीं, क्योंकि निम्न वर्ग के लोगों को लड़कियों को पढ़ाने के लिए पैसे व सुविधा दोनों नहीं थे। असामाजिक तत्वों, छेड़खानी, आते जाते कटाक्ष करने वालों से लड़कियों को बचाने के कारण लालू की लोकप्रियता और बढ़ गई। संभ्रांत छवि वाले पटना वुमंस कॉलेज में लड़कियों को संबोधित करने वाले लालू प्रसाद पहले विद्यार्थी बने। उस समय जब लालू प्रसाद भाषण दे रहे थे तो लड़कियों ने यह नारे लगाकर उनका स्वागत किया, “लालू महात्मा आया है, लालू महात्मा आया है।”

लालू प्रसाद उसी दौरान विदेश से शिक्षा प्राप्त और पिछड़ों की आवाज उठाने वाले डॉ राम मनोहर लोहिया से प्रभावित हुए। प्रसिद्ध समाजवादी और लोहिया के समर्थक रामानंद तिवारी के पुत्र शिवानंद तिवारी ने लालू को युवा राजनीति में उतार दिया। लालू प्रसाद पहली बार पुरी के शंकराचार्य के यह कहने पर कि “हरिजन जन्म से ही अछूत है”, आंदोलन चलाया।

1970-71 में उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (पीयूएसयू) के अध्यक्ष व महासचिव पद पर चुनाव कराने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया। उसके पहले यह एक नामित समिति हुआ करती थी, जिसका केवल कागजी अस्तित्व होता था। जाने माने इतिहासकार और पटना यूनिवर्सिटी के कुलपति केके दत्त ने इन दो पदों पर सीधे चुनाव कराने की बात मान ली। लालू प्रसाद ने महासचिव और पिछड़ी जाति के एक और छात्र राजेश्वर ने अध्यक्ष पद के लिए नामांकन कर दिया।

लालू प्रसाद ने आक्रामक प्रचार अभियान चलाया। मतगणना शुरू हुई तो पता चला कि दो महिला विद्यालयों की करीब 100 प्रतिशत छात्राओं ने लालू और राजेश्वर को वोट दिया था। मुजफ्फरपुर के एक केंद्रीय मंत्री के बेटे ने लालू प्रसाद को जीतता देखकर मतगणना केंद्रों पर धावा बोल दिया और मतपेटियां नाले में और कूड़े के ढेर में फेंक दिया। उस समय लागू समर्थकों ने इसके खिलाफ तगड़ा संघर्ष किया और तत्कालीन एसडीओ नागेंद्र तिवारी से शिकायत की। तिवारी ने मतपेटियां एकत्र कराकर कड़ी सुरक्षा के बीच मतगणना कराई और लालू प्रसाद को महासचिव और राजेश्वर को अध्यक्ष घोषित किया गया।

चुनाव जीतते ही लालू प्रसाद ने कुलपति के समक्ष दूर के छात्रों के लिए बसों की व्यवस्था करने की मांग रखी। कुलपति ने उनकी मांगे स्वीकार करते हुए 12 बसों का इंतजाम किया। गरीब छात्रों की सूची कुलपति को सौंपी, जिन्हें पूअर ब्वाएज फंड से आर्थिक मदद मिली। इसी दौरान उन्होंने बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज के पटेल छात्रावास के प्रभारी उपेंद्र सिंह की मदद कर उस हॉस्टल में रहने वाले पिछड़े वर्ग की समस्याओं को हल करने में सहयोग दिया।

इस बीच लालू ने पॉलिटिकल साइंस में बीए ऑनर्स पूरा कर लिया। उन्होंने आर्थिक संकट को देखते हुए वेटेनरी कॉलेज में क्लर्क की नौकरी शुरू कर दी और साथ ही पटना लॉ कॉलेज में एलएलबी में एडमिशन ले लिया, जिसकी कक्षाएं शाम को चलती थीं। 1973-74 में लालू पीयूएसयू के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़े और जीत गए। तब उन्हें क्लर्क की नौकरी छोड़नी पड़ गई। उसी चुनाव में एबीवीपी से संबद्ध सुशील कुमार मोदी और रविशंकर प्रसाद क्रमशः महासचिव व सचिव चुने गए और इन दोनों नेताओं से लालू की राजनीतिक लड़ाई शुरू हो गई।

लालू प्रसाद, शरद यादव और राम विलास पासवान।

पीयूएसयू के अध्यक्ष के तौर पर लालू प्रसाद 1974 में जयप्रकाश नारायण से मिले। वहीं से लालू प्रसाद ने देश की राजनीति में कदम रखा। इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल के खिलाफ संघर्ष किया और जेल गए। जनता पार्टी के गठन के बाद बिहार की छात्र राजनीति से एकमात्र नेता लालू प्रसाद को छपरा से लोकसभा का टिकट मिला। लोकसभा के टिकट और एलएलबी का परिणाम लालू प्रसाद की जिंदगी में एक साथ आया। एक तरफ उनके सामने एक सफल वकील बनने के लिए डिग्री थी, दूसरी तरफ राजनीति में कदम रखने के लिए जनता पार्टी से लोकसभा का टिकट। लालू प्रसाद छपरा से चुनाव लड़े और 27 साल की उम्र में उन्होंने 3.75 लाख मतों के भारी अंतर से चुनाव जीत लिया और उनके प्रतिद्वंद्वी रामशेखर सिंह को महज 85,000 वोट मिले, 1962, 1967 और 1971 में लगातार तीन बार सांसद रह चुके थे।

इस तरह से बेहद गरीब परिवार के लालू प्रसाद ने भारत की संसदीय राजनीति में कदम रखा। उसके बाद वह राजनीति में कभी नहीं हारे और न्यायालय द्वारा चारा घोटाले में फैसला देने के पहले तक वह लगातार बिहार की विधानसभा या लोकसभा में सदस्य बने रहे। उन्हें कभी राज्यसभा या विधानपरिषद के पिछले दरवाजे से प्रवेश पाने की राजनीति नहीं करनी पड़ी।

(लेखक सत्येंद्र पीएस फाइनेंशियल एक्सप्रेस में एक वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं। ‘मंडल कमीशन-राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी पहल’ शीर्षक से लिखी गयी उनकी किताब बेहद चर्चित रही है।)

This post was last modified on June 11, 2020 3:57 pm

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