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स्मृति शेष: ‘जुल्म और दमन के खिलाफ इंसाफ और लोकतंत्र की निर्भीक आवाज थे भाई चितरंजन सिंह’

आदरणीय चितरंजन भाई से अभी 10 अक्टूबर को टॉउनहाल बलिया में बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई थी। PUCL के साथियों द्वारा जय प्रकाश जी की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम का अवसर था। उन्हें बेहद अस्वस्थ देखकर धक्का लगा था। वहां उपस्थित बलिया के तमाम जनपक्षधर नेताओं-कार्यकर्ताओं, गणमान्य नागरिकों ने उनके स्वास्थ्य के प्रति चिंताकुल भाव से अपने नेता के सम्भवतः अंतिम सार्वजनिक वक्तव्य को सुना।

वक्ताओं में विभिन्न राजनैतिक विचारों के लोग थे, लेकिन हमेशा की तरह निर्भय, व्यक्तिगत सम्बन्धों की परवाह के बगैर, बिना लाग लपेट के कमजोर लेकिन दृढ़ स्वर में उन्होंने अभिव्यक्ति की आज़ादी कुचलने पर आमादा ताकतों की शिनाख्त किया और उन पर हमला बोला।

हर तरह के जुल्म और दमन के खिलाफ बेखौफ़, बेलौस बोलने और लड़ने का साहस यह अंदाज़, यह जज्बा ही भाई चितरंजन सिंह की पहचान थी, फिर वह दमनकारी ताकत चाहे, पुलिस-प्रशासन-नौकरशाही, दबंग सामन्त, गुंडे-अपराधी-बाहुबली हों या फिर निरंकुश सत्ता ही क्यों न हो।

पूर्वांचल के एक सवर्ण सामन्ती पृष्ठभूमि के परिवार से निकलकर कम्युनिस्ट योद्धा और सुसंगत लोकतंत्र के सेनानी बनने तक की लम्बी यात्रा, उदार सामन्ती आदर्शवादी मूल्यों से जनवाद और मार्क्सवाद तक की लम्बी दूरी भाई चितरंजन सिंह ने तय किया था।

उनके इस रूपांतरण के प्रारंभिक दिनों की कहानी तो उनके उस समय के साथी ही authentic ढंग से बता सकते हैं ।

मेरे मन में उनकी पहली सार्वजनिक छवि उन दिनों की है जब जनता पार्टी के सत्ताच्युत होने और उसके बिखराव के बाद इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल में बढ़ती निरंकुशता के खिलाफ क्रान्तिकारी लोकतांत्रिक ताकतों की ओर से राष्ट्रीय पटल पर वैकल्पिक जन राजनैतिक केंद्र के निर्माण की कोशिशें चल रही थीं।

राष्ट्रीय स्तर पर इंडियन पीपुल्स फ्रंट (IPF) के निर्माण की तैयारी के क्रम में उत्तर प्रदेश में जो संयुक्त जन मोर्चा बना था उसके वे प्रदेश के सहसंयोजक थे। अमीनाबाद के ऐतिहासिक झंडेवाला पार्क में उसकी प्रादेशिक रैली हुई थी, जो मेरे जीवन का भी पहला राजनैतिक कार्यक्रम था जिसमें शामिल होने हम लोग इलाहाबाद से आये थे।

IPF बनने के बाद चितरंजन भाई उसके नेतृत्व में थे। इलाहाबाद में उनकी सक्रियता और उपस्थिति बेहद कठिन परिस्थितियों से जूझते खड़े होते छात्रान्दोलन के हम तमाम साथियों के लिए प्रेरणा, रक्षा कवच और सम्बल थी।

सबकी हौसला अफजाई करते, हिम्मत बढ़ाते, हर किसी की हर तरह की मदद के लिए वे आत्मीय प्यार से मुस्कराते हमेशा हाजिर रहते।

निजी जीवन व वैचारिक-राजनैतिक जीवन के उलझावों ने उन्हें सामाजिक सक्रियता के एक नए दौर में पहुँचा दिया, जिसका दायरा PUCL से लेकर तमाम जन-आंदोलनों तक फैल गया, जिसके लिए सबसे बड़ा कॉम्पलिमेंट उन्हें सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी से मिला जिन्होंने उनके ऊपर लिखे अपने लेख में कहा, “आंदोलन यानी चितरंजन सिंह”।

बहरहाल, जहां भी वे रहे, जनता और जनता के लिए लड़ने वालों के लिए उनका आत्मीय प्यार तथा जनता के दुश्मनों के लिए उनकी नफरत अविचल रही।

चितरंजन भाई आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा अन्याय और जुल्म के खिलाफ बेखौफ लड़ाई की प्रेरणा बने रहेंगे तथा अपने चाहने वालों के दिलों में अपनी निश्छल, आश्वस्तकारी मुस्कान के साथ जिंदा रहेंगे।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। और आप एक दौर में मानवाधिकार कार्यकर्ता चितरंजन सिंह के सह राजनीतिककर्मी भी रहे हैं।)

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This post was last modified on June 27, 2020 1:50 pm

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