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Wednesday, September 29, 2021

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‘एक सुलझा हुआ रहस्य’: एक दिलचस्प विज्ञान-कथा संग्रह

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जब विज्ञान-कथाएं तो क्या, कथा-साहित्य और यहां तक कि खुद साहित्य अस्तित्व के संकट से जूझ रहा हो, ऐसे दौर में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रकाशित युवा कहानीकार अमित कुमार की विज्ञान-कथाओं का संग्रह ‘एक सुलझा हुआ रहस्य’ एक ताजा हवा के झोंके जैसा है। यह संग्रह संस्थान की ‘बाल साहित्य संवर्धन योजना’ के तहत प्रकाशित किया गया है।

अमित कुमार की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पाठक की जिज्ञासा और कौतूहल को निरंतर बनाये रखते हैं जिससे इन्हें पढ़ना शुरू करना ही अपने हाथ में होता है, कहानियां अपने को बीच में छोड़ने की इजाज़त बिल्कुल नहीं देतीं। पिछले कुछ दशकों में कथा-साहित्य में यह गुण दुर्लभ हो गया था। अमित कुमार की अन्य कहानियों की तरह ही इस संग्रह की कहानियों में भी जबर्दस्त क़िस्सागोई मौजूद है जो पाठक को अपनी रौ में बहा ले जाती है।

नवीनतम वैज्ञानिक शोधों पर आधारित परिकल्पनाओं से बुनी हुई ये कहानियां विज्ञान-कथाओं के पारंपरिक सांचे को तोड़ने वाली कहानियां हैं। कथाकार ने ‘कुछ अपनी बात’ बताते हुए लिखा भी है कि “सामान्यतः विज्ञान-कथा शब्द का आशय किसी ऐसी रचना से लिया जाता है, जिसमें मशीनों की बातें होंगी, रोबोट की बातें, अंतरिक्ष या परग्रहियों की बातें होंगी। साथ ही यह भी महसूस किया जाता है कि विज्ञान-कथा के सिद्धांतों पर आधारित कोई गूढ़ विषय उसका कथानक होगा। विज्ञान-कथा के संदर्भ में ये बातें आंशिक रूप से सही हैं।”

इस संग्रह की कहानियां अपनी सौम्य प्रस्तुति में बड़ी कहानियां हैं। इनमें बड़े-बड़े चमत्कारिक आविष्कारों के आतंक की जगह हमारे इर्द-गिर्द की निरंतर बदल रही दुनिया की दशा और दिशा की ही पड़ताल है। कहानियों का रहस्य, रोमांच और कौतूहल पाठक को हिलने नहीं देता और लगभग सभी कहानियां इंसानियत के सामने मंड़रा रहे बड़े संकटों के किसी न किसी पहलू से हमें अवगत और आगाह कराती चलती हैं। इस लिहाज से ये वृहत्तर सरोकार वाली कहानियां हैं।

संग्रह की सभी ग्यारह  कहानियां अपने सरल प्रवाह में बहाते हुए ही बहुत चुपके से हमारे ज्ञान के क्षितिज को भी समृद्ध और विस्तृत करती चलती हैं। ‘एक सुलझा हुआ रहस्य’ शीर्षक कहानी में सभी आधुनिकतम सुरक्षा-चक्रों को भेद कर की गयी बैंक चोरी के रहस्य को सुलझाने में लगी जांच एजेंसियों को एक संदिग्ध की ब्रेन मैपिंग के दौरान एक ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत वाली रहस्यमय समानांतर सभ्यता के अस्तित्व का पता चलता है जो धरती पर ही है किंतु धरती से परे है। ‘डर’ कहानी एक खूंखार आतंकवादी के भीतर बैठे साइनोफोबिया के वर्णन के जरिये न केवल पाठक को झुरझुरी पैदा करने वाले डर से रूबरू कराती है, बल्कि इसके साथ ही डर के मनोविज्ञान को भी परत-दर-परत उधेड़ती चलती है।

‘पुनर्मिलन’ कहानी में दवाओं पर भी भोजन की तरह ही निर्भर होते जा रहे समाज में एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी और अविनाशी होते जा रहे सूक्ष्मजीवों के सामने मनुष्य की विवशता का आंखें खोल देने वाला वर्णन है। इस कहानी का पुनर्मिलन केवल नायक-नायिका का न होकर पूरी मनुष्यता के वैकल्पिक प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से पुनर्मिलन का भी प्रतीक बन गया है। इसी तरह ‘प्रत्याशा’ कहानी में एक हजार प्रकाश वर्ष की यात्रा से लौटे वैज्ञानिकों का सामना अपनी धरती के ऐसे वारिसों से होता है जो निरंतर बढ़ते गये ध्वनि-प्रदूषण के चलते अपनी सुनने की शक्ति खो चुके हैं और पूरी तरह से गूंगे बहरे हो चुके हैं।

‘अंतर्दृष्टि’ में किसी एक इंद्रिय को हुए नुकसान की भरपायी शरीर द्वारा अन्य इंद्रियों की संवेदना शक्ति के अत्यधिक विकास द्वारा करने की क्षमता का वर्णन है। ‘बदलता क्षितिज’ में जीवों की अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्रों में विकसित प्रजातियों में कृत्रिम तौर पर किये जा रहे जेनेटिक बदलावों, यानि ‘आनुवांशिक प्रदूषण’ के फलस्वरूप पैदा होने वाले जीवों में सामूहिक तौर पर नरभक्षी होने जैसे असामान्य व्यवहारों के पनपने की चिंता है। ‘सब कुछ ठीक-ठाक है’ में मानव-क्लोन बनाने की पुरातन विकसित क्षमता का ज़िक्र है, जबकि ‘अप्रत्याशित’ में एक बेहतर लोकतंत्र बनाने का सपना लिये हुए एक वैज्ञानिक द्वारा एक रोबो को विकसित करके उसे रेलमंत्री बना देने की रोमांचक कहानी है।

‘वाइरस’ और ‘रक्ताभ होता आसमान’ कहानियां वर्तमान कोविड महामारी के साये में उम्मीदों और आशंकाओं से हमें रूबरू कराती हैं। इनमें वाइरसों द्वारा खुद जीनोम स्वैपिंग करते हुए स्वस्थ मानव देह में भी हमेशा के लिए अपनी जगह बना लेने से लेकर चीन के वुहान की वाइरोलॉजी प्रयोगशाला में चल रहे जैविक हथियारों के प्रयोगों जैसे प्रचलित सिद्धांतों को विषय बनाया गया है। इस दौरान हमारे पारिस्थितिकी तंत्र में कीटों के अस्तित्व के महत्व को बड़े ही सशक्त तरीक़े से रेखांकित किया गया है।

‘वीरान धरती के वारिस’ कहानी में धरती खुद सक्रिय होकर कहीं समुद्री लहरों से, कहीं भीषण भूकंप पैदा करके और जमीन धंसाकर, कहीं बादल फटने के माध्यम से, तो कहीं रेत-समाधि के द्वारा और कहीं विनाशकारी विषाणुओं द्वारा बड़ी संख्या में मनुष्यों का संहार करते हुए अपना संतुलन स्थापित करती है। इस कहानी में प्रकृति की प्रलयंकारी शक्तियों के सामने असहाय मनुष्य की जिजीविषा के संघर्ष को जबर्दस्त तरीक़े से प्रस्तुत किया गया है।

इस संग्रह की सभी कहानियां किसी न किसी तरह से लोभ और लालच के वशीभूत मनुष्य द्वारा अपनाये गये विकास के वर्तमान मॉडल के चलते मनुष्यता के समक्ष पेश आसन्न संकट को रेखांकित करती हैं और प्रकृति के साथ बेहतर संतुलन वाले विकास मॉडल को अपनाने और एक नयी जीवन शैली अपनाने का आह्वान करती हैं। ये कहानियां बेहद दिलचस्प तरीक़े के साथ ही सरलतापूर्वक विज्ञान के मामलों को रखते हुए ही मनुष्यता के दरपेश व्यापक सरोकारों के प्रति हमें जागरूक करती चलती हैं। यह संग्रह न केवल विज्ञान-कथा साहित्य को बल्कि समूचे हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाला संग्रह है।

(स्वतंत्र टिप्पणीकार शैलेश की समीक्षा।)


किताब समीक्षा : ‘एक सुलझा हुआ रहस्य’ (विज्ञान कथा संग्रह), लेखक : अमित कुमार,


प्रकाशक : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ

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