जयंती पर विशेष: देश को मोदी जैसा किसान विरोधी नहीं, चरण सिंह जैसा किसानों का हमदर्द प्रधानमंत्री चाहिए!

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पिछले दिनों इस देश के अन्नदाताओं को दिल्ली के वर्तमान क्रूर, असहिष्णु , बदमिजाज, अमानवीय, फॉसिस्ट, तानाशाही प्रवृत्ति के निजाम के जबरन रोकने की वजह से दिल्ली में प्रवेश नहीं मिल सका। और उन्हें अपनी न्यायोचित माँगों के लिए 378 दिन तक दिल्ली की सीमाओं पर ही आंदोलन करने के लिए बाध्य होना पड़ा। जो 26 नवम्बर 2020 से इस साल 10दिसम्बर 2021 तक चला। पिछले साल दिसम्बर-जनवरी की इस हाड़ कंपा देने वाली ठंड और इस ठंड के मौसम में भयंकर बारिश में भी तमाम पाशविक तरीकों से जबरन रोक देने से इस देश का अन्नदाता खुली सड़क और खुले आसमान के नीचे अन्नदाता होकर भी याचक की मुद्रा में असहाय पड़ा हुआ था। इस भयावह मौसम में इतने दिनों तक इसी स्थिति में पड़े रहने की वजह से मौसम के क्रूर पंजों ने कुल 750 अन्नदाताओं को निगल लिया।

अपवाद स्वरूप दो-चार अन्नदाताओं ने इस क्रूरता भरी कुव्यवस्था से आजिज आकर मानसिक तनाव व अवसाद में जाने के चलते खुद को अपनी रिवॉल्वर से गोली मार ली या फिर उन्होंने सल्फास की गोली खा ली या खुद ही चुपचाप छिपकर फाँसी लगाकर मौत का वरण कर लिया। इस विकट स्थिति के लिए जिम्मेदार वर्तमान समय के इस कथित लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वेसर्वा प्रधानमंत्री मोदी के देश के अन्नदाताओं के प्रति इतनी असहिष्णुता, बर्बरता और वहशीपना के चलते आजीवन किसानों, मजदूरों व आमजन हितैषी प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह की बरबस याद आ जाती है।

भारतीय अन्नदाताओं के हक, अधिकार और उनके जीवन की बेहतरी के लिए आजीवन संघर्ष करने वाला यह अथक योद्घा और सेनापति 23 दिसम्बर, 1902 में मेरठ जिले के नूरपुर नामक एक छोटे से गाँव में एक शिक्षक और किसान के घर पैदा हुआ था, वर्ष 1923 में वे विज्ञान विषय से ग्रेजुएशन किए, बाद में वे आगरा विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री लेकर गाजियाबाद में 1923 से ही वकालत करना शुरू कर दिए थे, उसके पश्चात 1925 में वे कला वर्ग से आगरा विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर लिए, 1937 में वे मात्र 35 वर्ष की अवस्था में बागपत के छपरौली से विधायक चुन लिए गये। पहली बार विधायक बनने के दौरान ही उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा में किसानों के हित और फायदे के लिए एक बिल पेशकर उसे पास भी करा लिया, जो किसानों द्वारा पैदा फसलों को एक निश्चित विक्रय मूल्य तय करती थी, यह बिल किसानों के लिए इतना हितकारी थी कि भारत के कई अन्य किसान-कल्याणकारी राज्य इस बिल की देखा-देखी अपने-अपने राज्यों में ठीक इसी तरह की बिल को लागू किए।

विधायक बनने से काफी पूर्व में ही आजादी के दीवाने चौधरी चरण सिंह सन् 1930 में महात्मा गांधी के साथ नमक कानून तोड़ने के लिए दांडी यात्रा आंदोलन में शामिल हुए थे। गाँधीजी के दांडी के नमक सत्याग्रह से प्रभावित होकर उन्होंने गाजियाबाद में 1940 में स्थित हिंडन नदी पर अपने हजारों साथियों के साथ नमक बनाने का एक आंदोलन भी किया था। जिससे कुपित होकर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार उन्हें 6 महीनों की जेल की सजा दे दी थी। वर्ष 1941में जेल से छूटने के कुछ ही दिनों बाद वे एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन बनाने में जुट गये,वर्ष 1942 में वे भूमिगत होकर गाजियाबाद, हापुड़, सरधना, मेरठ, मवाना और बुलन्दशहर जैसी जगहों पर दिन-रात घूम-घूमकर युवाओं को अपने गुप्त क्रांतिकारी संगठन के लिए ऊर्जा भरने का लगातार काम करने लगे। ब्रिटिश शासन चौधरी चरण सिंह के इस भूमिगत क्रियाकलापों से बहुत ही परेशान और विचलित होने लगा था।

चूँकि तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता चौधरी चरण सिंह को पकड़ पाने में बहुत दिनों तक असफल रही, उनके प्रति अंग्रेजी सल्तनत में गुस्सा इस बात से समझा जा सकता है कि तत्कालीन मेरठ जिला प्रशासन अपने पुलिसकर्मियों को चौधरी चरण सिंह को देखते ही गोली मार देने का आदेश तक दे रखा था। परन्तु एक दिन गुप्त मीटिंग करते समय किसी भेदिया से भेद पाकर ब्रिटिश पुलिस ने चरण सिंह को गिरफ्तार करके पुनः डेढ़ साल के लिए जेल में डाल दिया, लेकिन चरण सिंह जेल में रहते हुए भी अपने समय का सदुपयोग करते हुए जेल में ही ‘शिष्टाचार, भारतीय संस्कृति और समाज के शिष्टाचार के नियम ‘नामक एक पुस्तक लिख डाले। यह पुस्तक अभी भी शिष्टाचार पर भारतीय समाज की एक अमूल्य धरोहर बनी हुई है।

किसानों के लोकप्रिय नेता चरण सिंह ही थे, जो वर्ष 1952 में जमींदारी प्रथा के उन्मूलन का कानून बनवाने में सफल रहे, उसके बाद किसानों के हित को संरक्षित करने के लिए वर्ष 1954 में उत्तर प्रदेश में भूमि संरक्षण बिल को पारित करवा लिए, उत्तर प्रदेश के वर्ष 1967 में उनके मुख्यमंत्रित्व काल में ही देश भर में भयावह दंगे भड़क उठे लेकिन चौधरी चरण सिंह के कुशल, स्वच्छ व ईमानदार नेतृत्व और प्रशासन पर उनकी जबरदस्त पकड़ की बदौलत उत्तर प्रदेश दंगों से पूर्णतः अछूता ही रहा। वे वर्ष 1979 में जब देश के गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री दोनों पदों को कुशलतापूर्वक सम्भाले हुए थे। उस दौरान उन्होंने किसानों को आर्थिक सम्बल प्रदान करने के लिए नाबार्ड मतलब राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जो अभी भी भारतीय किसानों और कृषि के हित में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वे कहते थे कि ‘जिस देश के लोग भ्रष्ट होंगे, वह देश कभी भी तरक्की नहीं कर सकता, चाहे उस समय देश का कोई भी नेता या प्रधानमंत्री हो। ‘

चौधरी चरण सिंह हमेशा या यूँ कहें जीवन पर्यंत गाँव, गरीब और किसानों के उद्धारक और मसीहा बने रहे और अपना सम्पूर्ण जीवन ही किसानों को समर्पित कर दिया। वकालत जैसे पेशे में भी उनकी मिसाल दी जाती है कि वे ऐसे मुकदमों को ही स्वीकार करते थे और पैरवी करते थे, जिन मुवक्किलों का पक्ष न्यायपूर्ण होता था। वे जमीन से जुड़े जननेता थे। किसानों के सदा हित करने के उद्देश्य से वे हमेशा मंत्रिमंडल में कृषि विभाग को ही संभालते थे। वे स्वभाव से ही एक भारतीय किसान की तरह सादा रहन-सहन के हिमायती थे। गाँधीजी की सुनियोजित हत्या के बाद कांग्रेसी नेताओं ने भी आधुनिकता की दौड़ में गाँधी टोपी पहनना त्याग दिया था। लेकिन चौधरी चरण सिंह मरते दम तक आजीवन गाँधी टोपी पनने वाले जननायक बने रहे ! वे अपने किसान हित सम्बन्धित अपने सद्कार्यों से किसानों में इतने लोकप्रिय थे कि अपने जीवन काल में एक भी चुनाव नहीं हारे। उन्होंने अपने सिद्धांत और अपने मर्यादित आचरण से कभी समझौता नहीं किया। वे एक अच्छे लेखक, कुशल वक्ता तथा आमजन, किसानों और मजदूरों के जबरदस्त हिमायती थे। 

किसान नेता होते हुए भी उनकी अंग्रेजी भाषा पर बहुत ही जबरदस्त पकड़ थी उन्होंने अंग्रेजी भाषा में भी भारतीय समाज की तमाम विसंगतियों मसलन जमींदारी प्रथा, भारतीय किसानों की व्यथा और इस देश की गरीबी को केन्द्र में रखकर कई पुस्तकें उदाहरणार्थ अबॉलिशन ऑफ जमीदारी, लिजेंड प्रोपराइटर शिप और इंडियाज पॉवर्टी एण्ड इट्स सोल्यूशंस नामक पुस्तकें लिखीं । चौधरी चरण सिंह हमेशा गरीबों और किसानों के हित के बारे में ही सोचते रहते थे। वे अपने भाषणों में अक्सर कहा करते थे कि ‘बगैर किसानों की खुशहाली के इस देश का विकास ही संभव नहीं है। वे बहुत ही दृढ़ता और स्पष्टता से कहते थे कि ‘इस देश की समृद्धि का रास्ता गाँवों के खेतों और खलिहानों से होकर गुजरता है ‘। किसानों को उनकी फसलों का न्यायोचित दाम मिले, इसके लिए वे जीवन भर संघर्षशील और प्रयत्नशील रहे, उनका कहना था कि ‘भारत का संपूर्ण विकास तभी संभव हो पाएगा जब इस देश का किसान, मजदूर और गरीब आदि सभी लोग खुशहाल रहेंगे। विद्वतजनों का मानना है कि चौधरी चरण सिंह राजनैतिक गलतियाँ कर सकते हैं, लेकिन वे चारित्रिक गलती कभी नहीं कर सकते। इसलिए चरण सिंह केवल एक नेता और एक वित्तमंत्री और एक भूतपूर्व उप प्रधानमंत्री या प्रधानमंत्री तक ही सीमित नहीं थे, अपितु श्रद्धेय स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह स्वयं में एक विचारधारा थे। 

लेकिन मौजूदा दौर की तस्वीर बिल्कुल उलटी है। हमारे 750 अन्नदाताओं की 378 दिन चले किसान आंदोलन में दुःखद मौत हो चुकी है, लेकिन इस आधुनिक निजाम के मुँह से उन शहीद हुए किसानों के बेसहारा बच्चों, विधवा बीवियों और वृद्ध मां-बाप के लिए अभी तक एक उफ् शब्द तक नहीं निकला है। न उसके एक रोम में सिहरन पैदा हुई है। न उसकी आंखों में एक भी बूँद आँसू निकले हैं। अब इस आधुनिक निजाम के असहिष्णु व मानवेत्तर व्यवहार के प्रति इस देश के स्वाभिमानी, लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध अरबों नागरिकों को गौर करना चाहिए कि क्या ऐसे असहिष्णु व आम जनविरोधी व्यक्ति को भारतीय राष्ट्र राज्य का एक दिन भी प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का अधिकार है ?

(निर्मल कुमार शर्मा लेखक और पर्यावरणविद हैं।)

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