Monday, October 18, 2021

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सबसे बेहतर विकल्प है कोल्हू का तेल!

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पिछले दिनों दो खबर पर अपना ध्यान गया। पहली खबर सरसों के तेल में ब्लेंडिंग की फिर से इजाजत दिए जाने की। दरअसल सरसों का जो तेल बड़ी कंपनियां बनाती हैं, उसमें वे बीस फीसदी कोई दूसरा तेल मसलन पाम ऑयल या राइस ब्रान यानी धान की भूसी का तेल मिला सकते हैं। यह छूट उन्हें इस वजह से दी गई, ताकि महंगी सरसों की वजह से उसका तेल गरीब परिवारों की पहुंच से बाहर न हो जाए। पर इस वजह से बाजार से शुद्ध सरसों का तेल गायब हो गया।

उत्तर प्रदेश खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल से लेकर पंजाब, कश्मीर तक में खाने के लिए सरसों के तेल का ही ज्यादा इस्तेमाल होता है, जबकि महाराष्ट्र में मूंगफली तो दक्षिण में नारियल का तेल ज्यादा इस्तेमाल होता है। पर सरसों के तेल की गुणवत्ता आलिव आयल से बेहतर मानी जाती है, जिसकी वजह से परंपरागत रूप से दूसरे तेल का इस्तेमाल करने वाले राज्यों में भी इसकी खपत बढ़ रही है। इसी वजह से इसका बाजार भी बढ़ा तो कीमत भी, जिसके बाद इसमें ब्लेंडिंग के नाम पर दूसरा तेल मिलाने का प्रचलन भी। तकनीकी रूप से इसे ब्लेंडिंग कहें पर है तो यह मिलावट ही। खैर इसी के साथ एक दूसरी खबर भी आई।

मुजफ्फरपुर जिला खादी ग्रामोद्योग ने लकड़ी के कोल्हू में तैयार कच्ची घानी शुद्ध पीला सरसों का तेल बेचना शुरू किया। इसके लिए साठ के दशक का कोल्हू झाड़ पोछ कर बाहर निकाला गया। ऐसे सात कोल्हू मिले लकड़ी के जो पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के समय के हैं। प्रयोग शुरू हुआ और इसकी मांग भी बढ़ी। ग्रामोद्योग की इस पहल से जुड़े कुंदन कुमार ने कहा, शुद्ध सरसों के तेल की मांग है, इसलिए यह सिर्फ यहीं नहीं बाहर भी भेजा जाएगा। पीली सरसों के तेल का भाव 215 रुपये लीटर है और बाहर भेजने की लागत अलग होगी।

यह एक प्रयोग शुरू हुआ तो हमने उत्तर प्रदेश में पता किया। लखनऊ के गांधी आश्रम में भी कोल्हू का तेल मिलता है, पर वह उतराखंड के काशीपुर स्थित कोल्हू से आता है। इसके लिए वे गुजरात की उंझा मंडी से पीली सरसों मंगाते हैं। वहां की पीली सरसों सबसे बेहतर मानी जाती है और उसमें आंखों में लगने वाली झार भी कम होती है। बहरहाल यह दोनों प्रयोग यह बताते हैं कि आज भी शुद्ध सरसों का तेल उपलब्ध है। हो सकता कोल्हू का तेल न मिले पर बिजली से कालने वाले स्पेलर जैसी छोटी यूनिट में भी शहर-कसबे में सरसों का तेल आसानी से मिल जाता है।

गांव में जिनके खेत में सरसों होता है वे स्पेलर से सरसों का तेल निकलवाना पसंद करते हैं। एक लीटर की पिराई करीब पांच सात रुपये पड़ती है। कई तो सरसों की खली के बदले भी सरसों की पिराई कर देते हैं। दरअसल दस किलो सरसों करीब छह सौ रुपये की पड़ती है। इससे तीन साढ़े तीन किलो तेल निकलता है। आप बाजार में जो बोतल बंद तेल लेते हैं वह सवा सौ से डेढ़ सौ रुपये लीटर मिलता है, जिसमें उनका मुनाफा लागत पैकिंग सब शामिल है।

अब आप इस खेल को समझिए। सरसों का एक लीटर तेल बिना मुनाफे का दो सौ रुपए लीटर किसान को पड़ता है तो इतने बड़े-बड़े उद्योगपति जो इस धंधे में हैं, वे कैसे इतना सस्ता तेल बाजार में बेच रहे हैं? जवाब है वह मिलावटी यानी उसमें दूसरा सस्ता तेल मिला देते हैं।

सरसों के तेल में मुख्य रूप से पाम आयल या राइस ब्रान यानी धान की भूसी का तेल मिलाते हैं। धान की भूसी के तेल की बहुत खासियत पिछले कुछ समय में बताई गई। पर यह नहीं बताया गया कि लंबे समय तक इसका इस्तेमाल साबुन बनाने के लिए किया जाता था।

आहार विशेषज्ञ भी इसे कोई अच्छा तेल नहीं मानते हैं। आहार विशेषज्ञ पूर्णिमा अरुण ने कहा, “यह तेल रासायनिक प्रक्रिया के बाद निकाला जाता है और यह स्वास्थ्य के लिए कहीं से भी बेहतर नहीं है। बेहतर यही है आप जो भी तेल बिना ब्लेंडिंग वाला मिले उसे ही इस्तेमाल करें। आज भी गांव में जो लोग सरसों की खेती करते हैं वे तो तेल पिरवा कर ही खाते हैं। प्रयास करें तो यह भी मिल ही जाएगा, क्योंकि बाजार का ब्लेंडिंग वाला तेल नुकसान पहुंचा सकता है।”

दरअसल हमने डिब्बाबंद बोतल बंद खाद्य सामग्री को हाइजिन की वजह से बेहतर मान लिया था, पर ऐसा है नहीं। गोरखपुर आजमगढ़ में बड़े ब्रांड के तेल में मिलावट पाई गई और उन पर जुर्माना भी हुआ, इसलिए यह भ्रम पालना ठीक नहीं। कोल्हू तो पहले गांव-गांव में होता था। पर जबसे हमने बैल को खेती से बाहर किया यह सब भी खत्म होते चले गए। गाय का भी मान सम्मान तभी तक रहता है, जब तक वह दूध देती है। उसके बाद उसकी चिंता करता कोई गो रक्षक हमें तो नहीं दिखा। पर अभी भी कुछ बिगड़ा तो नहीं है। कोल्हू या तेल के स्पेलर को अगर सरकार गांव में बढ़ावा दे तो पशुधन भी काम आएगा और रोजगार का बड़ा अवसर मिलेगा। सबसे बड़ी बात शुद्ध सरसों, मूंगफली, तिल का तेल भी मिल सकेगा।

(अंबरीश कुमार शुक्रवार के संपादक हैं और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)

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