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पेरियार पर आईं पुस्तकें बदलेंगी हिंदी पट्टी का दलित चिंतन

साहित्य के शोधकर्ताओं के लिए यह एक शोध का विषय है कि ईवी रामासामी पेरियार (17 सितंबर, 1879-24 दिसंबर, 1973) के मूल लेखन का कोई संग्रह आज तक उस तरह से हिंदी साहित्य में क्यों उपलब्ध नहीं था, जिस तरह से बीआर आंबेडकर, ज्योतिबा फूले, रवीन्द्र नाथ टैगोर या भगत सिंह का रहा है।

हाल ही में पेरियार के विचारों एवं उनके लेखन को डॉ. प्रमोद रंजन हिंदी पट्टी में तीन संपादित पुस्तकों के माध्यम से सामने लाए हैं। ये पुस्तकें हैं ‘जाति व्यवस्था और पितृसत्ता’, ‘धर्म और विश्व दृष्टि’ तथा ‘सच्ची रामायण’। इन पुस्तकों का प्रकाशन राधाकृष्ण प्रकाशन ने किया है। साथ ही इन पुस्तकों में हिन्दी, अंग्रेज़ी और तमिल भाषा के पेरियार के सर्वश्रेष्ठ अध्येताओं के आलेख संकलित हैं, जो पेरियार के विचारों पर प्रकाश डालते हैं।

‘जाति व्यवस्था और पितृसत्ता’ के संपादकीय में डॉ. रंजन पेरियार के साहित्य एवं विचार के बारे में एकदम सही ही लिखते हैं, “पेरियार के विचार हिंदी की दुनिया में परिचय के मोहताज हैं।”

जाति व्यवस्था एवं पितृसत्ता के विभिन्न आयामों को उजागर करतीं ये पुस्तकें पेरियार के जीवन एवं उनके संघर्षों का सम्पूर्ण चित्रण करती हैं। एक रूढ़िवादी परिवार में जन्म लेने के बावजूद पेरियार विचारों से क्रांतिकारी थे। उन्हें ‘पेरियार’ या ‘महान’ की उपाधि मद्रास में सन् 1938 में ‘तमिलनाडु वुमेन कॉन्फ्रेंस’ में दी गई थी।

पेरियार ने समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, दमन एवं शोषण के खिलाफ वंचित, शोषित वर्ग को जागरूक किया तथा साथ ही साथ महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए अनेक महिला आंदोलनों को जन्म दिया। सन् 1904 ईस्वी में पेरियार काशी भ्रमण के दौरान धर्म के एक विकृत एवं घृणित पक्ष से परिचित होते हैं।

जब उन्हें सिर्फ ब्राह्मणों के लिए आरक्षित धर्मशाला में भोजन नहीं दिया जाता सिर्फ इसलिए क्योंकि वे ब्राह्मण नहीं थे, जबकि यह धर्मशाला एक द्रविड़ व्यापारी की बनवाई हुई थी। कई दिनों के भूखे पेरियार ने भोजन प्राप्त करने के लिए ब्राह्मण का वेश धारण किया ताकि उनकी भूख मिट सके, किन्तु उन्हें वो भी नसीब नहीं हुआ सिवाय दुत्कार के।

अंततः कई दिनों से भूखे पेरियार ने मजबूर होकर गली में पड़ी जूठी पत्तलों में बचा खुचा खाना, उसे खा रहे कुत्तों के साथ मिलकर खाया। मानवीयता को शर्मशार करने वाली इस घटना ने पेरियार के मन में भेदभावमूलक आर्य संस्कृति और उनके तमाम देवी-देवताओं के प्रति एक गहरी घृणा पैदा कर दी।

तार्किकता और बुद्धिवाद के आधार पर अपनी बात रखने वाले पेरियार का खंडन, समाज से तर्क और विवेक का खंडन करना है। पेरियार ने अपने लेखों के माध्यम से वंचित एवं शोषित वर्ग से आने वाले आमजन को बताया कि वेदों, शास्त्रों, संस्कारों, कर्मकांडों के माध्यम से ईश्वर में आस्था का भय दिखाकर उनका शोषण किया जा रहा है और उन्हें रसातल में ढकेला जा रहा है। जाति व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करते हुए पेरियार जाति एवं उसकी कार्यपद्धति का खुलासा करते हैं तथा ज़ोर देकर कहते हैं कि इस जाति व्यवस्था की क्षय हो।

पेरियार अपने एक लेख में बताते हैं कि ब्राह्मणों को आरक्षण से घृणा क्यों है? पेरियार के प्रयासों के फलस्वरूप तमिलनाडु में दलितों को मंदिरों और थियेटरों में प्रवेश करने का अधिकार मिला। मुख्य सड़कों पर चलने का अधिकार मिला।

बस में यात्रा करने का अधिकार मिला। सार्वजनिक तालाबों से पानी लेने का अधिकार मिला। इतना ही नहीं पेरियार के प्रयासों से ही तत्कालीन जस्टिस पार्टी की सरकार ने म्यूनिसिपल स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए मुफ्त मध्याह्न भोजन की शुरुआत की और महिलाओं को वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार दिया।

यह देश की तत्कालीन ऐसी पहली सरकार थी, जिसने हिन्दू धर्म से संबंधित चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की; जो मंदिरों के धन का प्रबंधन करता था और इस धन को सरकार के कल्याण कार्यक्रमों पर खर्च किया जाता था।

पेरियार ने हिन्दू धर्म के विवाह जैसे धार्मिक कर्मकांडों से भरपूर व्यवस्था पर भी चोट की और ‘आत्माभिमान विवाह’ या ‘सेल्फ रेस्पेक्ट मैरेज’ की अवधारणा का विकास किया। इसमें जाति वर्ग या धर्म के लिए कोई जगह न थी। इस विवाह में न तो पुरोहितों की आवश्यकता थी और न ही अभिभावकों की सहमति की।

वंचित तबकों को धर्म के धंधे से बचाने के लिए और अपने विवाह का निर्णय खुद करके अपने जीवन का निर्णायक खुद बनने की यह एक क्रांतिकारी पहल थी। जिसे फुले दंपति महाराष्ट्र में ‘सत्यशोधक विवाह संस्कार’ के नाम से चार दशक पूर्व से प्रचारित करने में संघर्षरत थे।

“यद्यपि पेरियार ने उनका नाम भी नहीं सुना था तथापि उन्होंने फुले के काम को ही आगे बढ़ाया।” (पुस्तक का अंश)। पेरियार ने अपनी पत्नी को ‘थाली’ या मंगलसूत्र का त्याग करने के लिए राजी किया और वे अपनी पत्नी को बराबरी का दर्जा देते हुए अपने साथ सभी सभा-सम्मेलनों में लेकर जाते।

‘आज़ादी ने आरक्षण को खत्म किया’
दलित एवं पिछड़े वर्ग से आने वाले सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक अधिकारों से वंचित समूह के लिए आरक्षण कितना जरूरी है, ये बातें पेरियार ने आज़ादी से पूर्व ही महसूस कर ली थीं। पेरियार के आरक्षण संबंधी विचारों पर भी ये पुस्तकें महत्वपूर्ण प्रकाश डालती हैं। पेरियार का मानना था कि आज़ादी ने आरक्षण का खात्मा किया। 1935 ई. से ही पेरियार सामाजिक व्यवस्था में दलितों, पिछड़ों को उनका हक़ दिलाने के लिए आरक्षण के हिमायती थे।

पेरियार के प्रयासों से आज़ादी के पूर्व ही केंद्र सरकार की संस्थाओं में भी 72 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू हुई। इसमें 14 प्रतिशत पद ब्राह्मणों के लिए, 44 प्रतिशत गैर ब्राह्मणों के लिए और 14 प्रतिशत पद दलितों के लिए आरक्षित किए जाते थे।

देश के आज़ाद होने के कुछ समय बाद ही इस आदेश को ब्राह्मणवादी प्रशासकों ने वापस ले लिया। पेरियार को इसका अंदेशा था और उन्होंने ये बात पहले ही कह दी थी कि ऐसा ही होगा। पेरियार अपने संघर्षों को इस तरह मरता हुआ नहीं देख सकते थे।

उन्होंने अपने अधिकारों को वापस पाने के लिए फिर से संघर्ष छेड़ा और तमाम विरोध-प्रदर्शनों और हड़तालों के बाद सरकार ने उनकी अपील पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 में संशोधन किया और इस प्रकार ही भारत वर्ष के तमाम बहुसंख्यक ‘सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए’ या ‘अनुसूचित जातियों’ और ‘अनुसूचित जनजातियों’ के लिए संविधान में विशेष उपबंध जोड़े गए।

प्रमोद रंजन द्वारा संपादित ये पुस्तकें बताती हैं कि पेरियार ने किस प्रकार हिंदुस्तान की भ्रष्ट जागीरों और हिन्दुत्व के खोल में छिपे सत्ता-संस्थानों की कलाई मरोड़ी और पूंजीवाद के दुश्चक्र को उद्घाटित किया। पेरियार के प्रजातंत्र पर, शूद्र-अतिशूद्र की व्याख्या पर विचारों को रखते हुए ये पुस्तकें जाति के उन्मूलन के प्रति पेरियार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाती हैं।

गांधीवाद को अपना आदर्श मानकर अपने संघर्षों की शुरुआत करने वाले पेरियार ने कभी समझौता नहीं किया, और जब उन्हें लगा कि कांग्रेस पार्टी में व्याप्त ब्राह्मणवाद या गांधीवाद उनके सुधारवादी कार्यक्रमों में अवरोध उत्पन्न कर रहा है तो उन्होंने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया।

गांधी के विचारों को भी उन्होंने तर्क और विवेक की कसौटी पर जांच परख कर उनकी समालोचना की। शूद्रों और अछूतों के प्रश्न पर, समाज में महिलाओं की स्थिति के प्रश्न पर या श्रमिकों के विभाजन के प्रश्न पर, जातीय उन्मूलन के प्रति प्रतिबद्धता के प्रश्न पर पेरियार और आंबेडकर के विचार समान थे।

दोनों ने ही संप्रभुता की अवधारणा पर पुनर्विचार किया और दोनों का ही मानना था कि संप्रभुता जनता में निहित है। ये पुस्तकें दलितों और पिछड़ों के हक़ के लिए लड़ने वाले दूसरे महान योद्धा आंबेडकर के साथ पेरियार की बौद्धिक मैत्री पर भी प्रकाश डालती हैं।

‘वे जन्मजात उदात्त मानव हैं जबकि द्रविड़ लोग जन्मना अधम, अनाचारी’
प्रमोद रंजन अपने संपादकीय में हिंदी में पेरियार के लेखन के अभावों की गहरी पड़ताल करते हैं। उत्तर भारत में पेरियार की पहचान एक नास्तिक एवं हिंदी विरोधी विचारक के रूप में है। प्रमोद अपने संपादकीय में लिखते हैं कि “यह ग़लत तो नहीं, लेकिन उनका एकांगी चित्रण है।”

यह आश्चर्यजनक बात है जिस पेरियार ने समाज को तर्कशील होकर विवेकपूर्ण व्यवहार का रास्ता दिखाया उसी पेरियार के बारे में हिंदी समाज के पास कुछ सुनी-सुनाई और आधी-अधूरी बातें ही हैं! हों भी क्यों न! आखिर मुकम्मल जानकारी होने के लिए पेरियार के लिखे हुए का हिंदी में अभाव जो था, एक लंबे समय से! सिवाय ‘सच्ची रामायण’ के।

राम-कथा की व्याख्या पर केन्द्रित तमिल में पेरियार की रामायण ‘रामायण पाथीरांगल’ के नाम से 1944 में छपी थी। इसका हिन्दी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ शीर्षक से रामाधार (कुछ स्रोतों के अनुसार श्री रामाधार कानपुर के शिक्षक थे) ने किया था और जिसे बाद में ‘अर्जक संघ’ से जुड़े लोकप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक ललई सिंह ने प्रकाशित किया।

इसमें पेरियार लिखते हैं कि महाभारत की तरह रामायण भी एक पौराणिक कथा है, जिसे आर्यों ने यह दिखाने के लिए रचा है कि वे जन्म जात उदात्त मानव हैं, जबकि द्रविड़ लोग जन्मना अधम, अनाचारी हैं। इसका मुख्य उद्देश्य ब्राह्मणों की श्रेष्ठता, समाज में स्त्रियों की दोयम दर्जे की हैसियत और द्रविड़ों को निंदनीय प्रदर्शित करना है।

ललई सिंह के द्वारा इस किताब के प्रकाशन के बाद राम-पूजक उत्तर प्रदेश में हड़कंप मच गया और दिसम्बर 1969 में तत्कालीन सरकार ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में ‘सच्ची रामायण’ को प्रतिबंधित कर दिया और उसके हिंदी अनुवाद की प्रतियां ज़ब्त कर लीं।  ललई सिंह द्वारा लंबी न्यायिक लड़ाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रतिबंध को गलत बताया और ज़ब्त की गई प्रतियां ललई सिंह को लौटाने का निर्देश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद सरकार ने ‘सच्ची रामायण’ से प्रतिबंध नहीं हटाया था। 1995 में कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी के सत्ता में आने के बाद इस किताब से प्रतिबंध हटा। जाति की राजनीति पर आधारित प्रदेश में पेरियार द्वारा लिखित एवं हिंदी में अनूदित ‘सच्ची रामायण’ अन्य राजनीतिक दलों को राजनीति करने का एक अस्त्र लगा।

2007 में ‘सच्ची रामायण’ का एक बार फिर ज़ोरदार राजनीतिक विरोध हुआ। मज़ेदार बात ये है कि जिस किताब का विरोध करने के लिए दो प्रमुख राजनीतिक दल एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे थे उनमें से किसी भी दल के पास ये किताब उपलब्ध नहीं थी।

लेखक अपनी संपादकीय में इन समस्त घटनाक्रमों को सिलसिलेवार ढंग से रखते हुये बताते हैं कि इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार अलका पांडेय ने सात नवंबर 2007 को प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में लिखती हैं कि उस समय ‘सच्ची रामायण’ की प्रतियां लखनऊ की किसी भी दुकान पर उपलब्ध नहीं थीं।

यहां तक कि विरोध करने वालों के पास ‘सच्ची रामायण’ की प्रतियां जलाने के लिए भी उपलब्ध नहीं थीं। ये किताबें पेरियार के बारे में व्याप्त तमाम भ्रांतियों का पर्दाफ़ाश करती हैं एवं उन अभावों को पूरा करती हैं जिनसे हमें पेरियार के विचारों को मुकम्मल तरीके से जानने में मदद मिलती।

“पेरियार की ‘सच्ची रामायण’ ऐसी अकेली रामायण नहीं है, जो लोक प्रचलित मिथकों को चुनौती देती है और रावण के बहाने द्रविड़ों के प्रति किए गए अन्याय का पर्दाफ़ाश कर उनके साथ मानवोचित न्यायपूर्ण व्यवहार करने की मांग करती है।

दरअसल, पेरियार ने इसे एक ऐसे लम्बे कथात्मक निबन्ध के रूप में लिखा है; जिसमें पहले रामायण पर उनके विचार दिए गए हैं और बाद में उसके हर चरित्र की आलोचना की गई है। रामायण के बारे में वह बड़ी साफगोई से कहते हैं कि रामायण वास्तव में कभी घटित नहीं हुई। वह तो एक काल्पनिक गल्प मात्र है।” (पुस्तक का अंश)

पेरियार ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन के साथ ही ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ जैसे कई आंदोलन भी चलाए, जिनके माध्यम से वे लगातार वर्णाश्रम धर्म और जन्म आधारित भेदभाव के अंत पर बल देते रहे। ‘धर्म और विश्वदृष्टि’ पुस्तक में संपादक ने पेरियार के ईश्वर, धर्म, दर्शन, कर्मकांड, आस्था एवं जाति के विनाश तथा शोषित वर्ग से संबंधित लेखों का संग्रह किया है। इन लेखों से पेरियार के ईश्वर, धर्म एवं जाति संबंधी विचारों का पता चलता है।

पेरियार का मानना था कि ईश्वर की अवधारणा मनुष्य रचित है और हमारे पास ईश्वर की शक्ल तब से है जबसे आर्य देश में आए। पेरियार धर्म को प्रकृतिक नियमों के विरुद्ध मानते हैं और मनुष्य को तर्कशील बनने पर ज़ोर देते हैं। पेरियार ने अपनी अंतिम सांस तक जातिवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखी।

इन पुस्तकों में संकलित लेखों में टी थमराईकन्नन, वी गीता, ललिता धारा, ब्रजरंजन मणि, आदि लेखकों के आलेख भी काफी महत्वपूर्ण हैं।

इन पुस्तकों के प्रकाशन के लिए राजकमल प्रकाशन समूह (राधाकृष्ण पेपरबैक्स) विशेष धन्यवाद के पात्र हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब ये पुस्तकें अकादमियों और पुस्तकालयों में अपनी पहुंच और उपलब्धता बना सकेंगी।

  • अनिरुद्ध कुमार

(लेखक असम विश्वविद्यालय के रवीन्द्रनाथ टैगोरे स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज में अध्यापक हैं। उन्होंने हरिश्चंद्र पाण्डेय की कविताओं पर जेएनयू दिल्ली से एमफिल की है। फ़िलहाल वह आधुनिक हिंदी की छह लंबी कविताओं पर जेएनयू से ही पीएचड कर रहे हैं।)

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This post was last modified on August 4, 2020 3:34 pm

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