Subscribe for notification

जाना समाज की नब्ज पर पकड़ रखने वाले एक संवेदनशील क़लमकार का

नई दिल्ली। चर्चित कथाकार, संपादक और प्रकाशक कैलाश चंद चौहान का 15 जून, 2020 की दोपहर अचानक निधन हो गया। मृत्यु से पहले उन्होंने सांस लेने में तकलीफ़ की शिकायत की थी। कुछ समय से वे पथरी का इलाज करवा रहे थे। उन्हें लीवर में भी दिक्कत थी। उनके जाने से हिंदी दलित साहित्य को गहरा धक्का लगा है।

वे दलित लेखक संघ (दलेस) के सक्रिय सदस्य थे। पिछले कुछ वर्षों से दलेस, जलेस, जसम, प्रलेस, न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव के जो साझा कार्यक्रम हो रहे थे, उसमें उनकी उत्साहपूर्ण भागीदारी होती थी। वे दलित अधिकारों को लेकर जागरूक थे और समान विचार वालों को एक मंच पर देखना चाहते थे जिससे समाज के साधनहीन तबके के अधिकारों को महफूज़ रखा जा सके।

कैलाश चंद चौहान का जन्म एक मार्च 1973 को दिल्ली के एक वाल्मीकि परिवार में हुआ था। पेशे से कम्प्यूटर इंजीनियर कैलाश ने किशोरावस्था से ही सरिता, मुक्ता आदि पत्रिकाओं तथा राष्ट्रीय सहारा, राजस्थान पत्रिका, जनसत्ता, हिंदुस्तान, नभाटा जैसे दैनिक अखबारों के लिए लिखना शुरू कर दिया था।

बाद में वे दलित लेखन की तरफ मुड़े और दलित साहित्य को समृद्ध किया। दलित कथा-लेखन में उनका विशिष्ट योगदान याद रखा जाएगा।

उनकी एक कहानी ‘संजीव का ढाबा’ कथादेश पत्रिका के वर्ष 2011 के किसी अंक में प्रकाशित हुई और सराही गई। बाद में उनका कहानी संग्रह इसी नाम से छपा। उनके तीन उपन्यास हैं- सुबह के लिए, भंवर और विद्रोह।

उनका सुगठित, निर्दोष और सादगीपूर्ण साफ-सुथरा गद्य उनके लेखन को खास बनाता है। उन्होंने अपनी पत्रिका ‘कदम’ का एक दलित प्रेम कहानी विशेषांक भी निकाला। इसकी व्यापक चर्चा हुई। बाद में यह किताब के रूप में भी प्रकाशित हुई। मराठी के चिंतक-लेखक अरविंद सुरवाडे ने इस अंक की कई कहानियों का मराठी अनुवाद किया और उसे पुस्तक के रूप में छपवाया। ‘कदम’ पत्रिका का ओम प्रकाश वाल्मीकि विशेषांक भी खासा चर्चित रहा।

पिछले बरस कथादेश पत्रिका का दलित साहित्य विशेषांक (सितंबर, 2019) छपा। इसमें कैलाश की एक कहानी है – ‘मोबाइल पर रिश्ते की सीधी बात’। यह कहानी ब्याह के बाज़ार में लड़की पक्ष को मजबूती से रखती है। अपनी गरिमा या स्वाभिमान के प्रति सचेत और संघर्षशील लड़कियों की जो नई पीढ़ी आयी है उसकी झलक इस कहानी में है। वह वरपक्ष को दृढ़ता से नकहना जानती है। उसका परिवार भी उसके साथ खड़ा होता है।

इस कहानी में कैलाश चंद चौहान ने अनायास ही ये पंक्तियाँ लिखी हैं-

“किसी इंसान की मृत्यु तक में ज्यादातर लोग उसके परिजनों को शक्ल दिखाने या बुराई होने से बचने के लिए जाते हैं। बहुत से लोग तो पहले से पहुँच गए लोगों से मोबाइल द्वारा सम्पर्क में रहते हैं, ‘जैसे ही तैयारी हो… लेकर चलें, मुझे बता देना … कितने बजे लेकर जाएंगे?’… आदि आदि। समय की आपाधापी ही है कि गम में डूबे परिवार के घर में जो दरी किसी समय दस-पंद्रह दिन बिछी रहती थी, अब दो-चार दिन भी बिछी रहे तो गनीमत है।”

यह पर्यवेक्षण छीजती सामाजिकता को तो दर्शाता ही है, कोरोना काल द्वारा रचित उस विडंबनापूर्ण स्थिति को भी सामने लाता है कि कैलाश चंद चौहान के अंतिम संस्कार में सिर्फ दो लेखक – हीरालाल राजस्थानी तथा डॉ. गुलाब सिंह ही मौज़ूद थे!

जनवादी लेखक संघ कैलाश चंद चौहान के प्रति श्रद्धांजलि ज्ञापित करता है और दुख की इस घड़ी में व्यथा संतप्त परिवार को अपनी शोक-संवेदना प्रेषित करता है।

(जनवादी लेखक संघ की प्रेस विज्ञप्ति।)

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

Leave a Comment
Disqus Comments Loading...
Share
Published by

Recent Posts

ऐतिहासिक होगा 25 सितम्बर का किसानों का बन्द व चक्का जाम

देश की खेती-किसानी व खाद्य सुरक्षा को कारपोरेट का गुलाम बनाने संबंधी तीन कृषि बिलों…

11 mins ago

लेबर कोड बिल के खिलाफ़ दस सेंट्रल ट्रेड यूनियनों का देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन

नई दिल्ली। कल रात केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा में 3 लेबर कोड बिल पास कराए…

1 hour ago

कृषि विधेयक: ध्वनिमत का मतलब ही था विपक्ष को शांत करा देना

जब राज्य सभा में एनडीए को बहुमत हासिल था तो कृषि विधेयकों को ध्वनि मत से…

3 hours ago

आशाओं के साथ होने वाली नाइंसाफी बनेगा बिहार का चुनावी मुद्दा

पटना। कोरोना वारियर्स और घर-घर की स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशाओं की उपेक्षा के खिलाफ कल राज्य…

4 hours ago

अवैध कब्जा हटाने की नोटिस के खिलाफ कोरबा के सैकड़ों ग्रामीणों ने निकाली पदयात्रा

कोरबा। अवैध कब्जा हटाने की नोटिस से आहत कोरबा निगम क्षेत्र के गंगानगर ग्राम के…

4 hours ago