Friday, June 9, 2023

किताबें मत जलाइए, ऐसा इंतज़ाम कीजिए कि लोग उन्हें पढ़ ही न पाएं!

‘आप भले मेरी किताबें और यूरोप के सबसे उन्नत मस्तिष्कों की किताबें जला देंगे, लेकिन उन विचारों का क्या जो उन किताबों में समाई थीं और जो करोड़ों रास्तों से आगे बढ़ चुका है और बढ़ता ही रहेगा।’’
-हेलेन केलर, एन ओपन लेटर टु जर्मन स्टूडेंट्स
‘फारेनहाइट 451’!

यही उस फिल्म का नाम है जो साठ के दशक के मध्य में (1966) में रिलीज हुई थी।

चर्चित फ्रेंच निर्देशक त्रूफो Truffaut द्वारा निर्देशित इस एक मात्र इंग्लिश फिल्म की तरफ उस वक्त़ लोगों का अधिक ध्यान नहीं गया था। प्रख्यात अमेरिकी लेखक रे ब्रेडबरी के इसी नाम के प्रकाशित एक उपन्यास (1951) पर आधारित यह फिल्म उस भविष्य की कल्पना करती है जब किताबें गैरकानूनी घोषित की जाएंगी और दमकल विभाग वाले उन तमाम किताबों को जला देंगे, जो उनके हाथ में लगती हैं। ‘फारेनहाइट 451’ दरअसल उस तापमान का आंकड़ा है जब किताबें जलती हैं।

दूसरे विश्वयु़द्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका में जो कम्युनिस्ट विरोध की उन्मादी मुहिम सरकार की शह पर चल पड़ी थी, जब बड़े-बड़े लेखक, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों को जबरदस्त प्रताड़ना से गुजरना पड़ा, एक ऐसा दौर जब ‘लोगों को अपने साये से भी डर लगने लगा था’, उस पृष्ठभूमि में यह उपन्यास लिखा गया था, जिसने शोहरत की बुलंदियों को छुआ है। अब तक उसकी पचास लाख प्रतियां बिक चुकी हैं।

वक्त़ निश्चित ही बदल गया है।

अब आज की तारीख में हम तीस के दशक में नात्सी काल में चले ‘पुस्तक जलाओ अभियानों’ जैसे असभ्य दिखने वाले काम नहीं कर सकते हैं या अमेरिका की तरह ऐसा माहौल भी नहीं बना सकते कि किताबों की अलमारियों से सीधे किताबों को हटाया जाए, यह अलग बात है कि हुकूमती जमात नयी-नयी तरकीबें ढंढते रहते हैं कि लोग किताबें पढ़े ही नहीं।

ब्रिटेन के शिक्षा महकमे द्वारा हाल ही में जारी एक आदेश को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। उसने इंग्लैंड के स्कूलों के लिए यह निर्देश जारी किया है कि वह ऐसे समूहों और संगठनों के संसाधनों का इस्तेमाल करना बंद कर दें, जिन्होंने पूंजीवाद की समाप्ति की इच्छा जाहिर की है। उसके लिए पूंजीवाद विरोध ‘एक अतिवादी राजनीतिक विचार’ है, जिसे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामीवाद विरोध/एंटीसेमिटिज्म और गैरकानूनी गतिविधि’ की हिमायत के साथ जोड़ा जा सकता है।
https://www.theguardian.com/education

उम्मीद की जा सकती है कि हुकूमत में बैठे जानकारों, आलिमों ने इस आदेश के जारी किए जाने से पहले इस मसले पर जरूर गौर किया होगा और इसकी अहमियत तथा पाठयक्रमों पर उसके संभावित असर को जाना होगा, लेकिन इसके बावजूद हम कुछ संभावनाओं की बात कर सकते हैं।

इस निर्देश से एक तरह से ब्रिटेन के अपने इतिहास को पाठयक्रम में रखना गैरकानूनी हो जाएगा, जैसे समाजवाद की एक जमाने की ताकतवर शक्तियां, लेबर पार्टी तथा ट्रेड यूनियन संघर्ष आदि- क्योंकि अपने लंबे इतिहास में उन्होंने हमेशा ही पूंजीवाद से परे जाने, पूंजीवाद को समाप्त करने आदि की बात पर जोर दिया है।

इसका मतलब यह होगा कि महान ब्रिटिश लेखक जैसे थॉमस पेन, इरिस मर्डाक, विल्यिम मॉरिस आदि भी पाठयक्रमों से बाहर कर दिए जाएंगे, क्योंकि उनके लेखन में भी पूंजीवाद विरोध के तत्व मिलते हैं या कम से कम यह बात मिलती है कि इन्सानियत का अंतिम भविष्य मुनाफा हासिल करना नहीं होगा।

इस निर्णय की विसंगतियों को अध्यापकों ने ही नहीं बल्कि आम नागरिकों ने भी रेखांकित किया है।

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एक अध्यापक जो ‘निधर्मी’ है, लेकिन एक कैथोलिक स्कूल में पढ़ाते हैं, उन्होंने संपादक के नाम ख़त में एक दिलचस्प प्रश्न पूछा: ‘दर्शन को सिखाते हुए, क्या मुझे प्लेटो का रिपब्लिक पढ़ाते हुए भी सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि उसमें राज्य द्वारा नियंत्रित, एक गैरपूंजीवादी अर्थव्यवस्था की बात की गई है?’
https://www.theguardian.com/education

जैसा कि उम्मीद की जा सकती है कि टोरी सरकार के इस फैसले की व्यापक भर्त्सना हुई है और उसे सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी के तहत बढ़ रहे ‘अधिनायकवाद’ के तौर पर देखा जा रहा है।

यह निर्णय विचलित करने वाला है अलबत्ता आश्चर्यचकित नहीं करता।

दरअसल कंजर्वेटिव पार्टी ने हमेशा ही लोकतंत्र के मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी बातों के प्रति अपने संदेह को प्रकट किया है और आज की तारीख में जबकि कोविड महामारी को लेकर सरकार के ढुलमुल रुख, ब्रेक्जिट सम्बंधित रणनीति आदि के चलते जब उसकी अपनी कार्य प्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं तो शायद उसने यही नतीजा निकाला है कि यही वह मौजू वक्त है कि किसी अनपेक्षित दिशा में मोर्चा खोल दिया जाए।

उन्हें यह सबसे आसान प्रतीत होता है कि ‘ब्रिटिश मूल्यों’ की रक्षा के नाम पर किसी किस्म के सांस्कृतिक युद्ध को छेड़ा जाए, ताकि अपना खोया जनाधार वापस पाया जा सके और इसके लिए सबसे जरूरी है कि जनता के सामने खड़ी समस्याओं से उसका ध्यान बांटा जाए।

हम देख सकते हैं कि ‘अतिवादी राजनीतिक रुख’’ के प्रति उनकी अचानक चिंता, दरअसल एक ढाल है जिसके इस्तेमाल से वह इस सांस्कृतिक युद्ध को छेड़ना चाहते हैं, जिसके माध्यम से वह उन व्यक्तियों, संस्थाओं को निशाना बनाना चाहते हैं, जो यथास्थिति को लेकर सवाल उठाते हों। चर्चित वामपंथी ब्रिटिश स्तंभकार ओवेन जोंस, अपने एक कॉलम में इस बात को रेखांकित करते हैं कि ओरबान की अगुवाई का हंगरी इन दिनों कंजर्वेटिव पार्टी का मॉडल बना हुआ है और ब्रिटेन के ‘संभावित भविष्य’ को देखना हो तो आप वहां जा सकते हैं।

उनके मुताबिक हंगरी आज भी लोकतंत्र का आवरण पहने हुए है, चुनाव वहां होते रहते हैं, विपक्ष भी मौजूद है, लेकिन सत्ताधारी वर्ग अपना अतिराष्ट्रवादी एजेंडा आगे बढ़ाने में मुब्तिला है, जहां उसका सबसे प्रिय हथियार ‘सांस्कृतिक युद्ध’ है, जिसमें अप्रवासियों को निशाना बनाया जा रहा है या जब ट्रांस अधिकारों (trans rights) के दमन के लिए महामारी का इस्तेमाल किया जा रहा है।
https://uk.reuters.com/article

जितनी आननफानन में ब्रिटेन ने स्कूली पाठ्यक्रम को बदल डाला वह भी अविश्वसनीय लगता है।

दक्षिण एशिया के इस हिस्से में सांस्कृतिक युद्ध- जो पहले के विशाल ब्रिटिश साम्राज्य का ही हिस्सा था- उसी गतिमानता के साथ आगे बढ़ रहा है जहां हम देख रहे हैं कि पाकिस्तान अब अरबीकरण की दिशा में आगे बढ़ा है, जबकि भारत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रणित हिंदू राष्ट्र की दिशा में तेजी से डग बढ़ा रहा है।

हमारी प्रस्तुत चर्चा के लिए यह प्रासंगिक होगा कि शिक्षा के दायरे में किस किस्म के बदलाव किए गए हैं। मिसाल के तौर पर, प्रेस में यह ख़बरें भी छपी हैं कि किस तरह पाकिस्तान की नयी शिक्षा नीति ‘धर्म आधारित समाज’ तैयार करना चाहती है।

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पाकिस्तान के शिक्षा जगत में आ रहे इन बदलावों के बारे में लिखते हुए प्रोफेसर परवेज हुदभॉय, जो लाहौर तथा इस्लामाबाद में भौतिकी के जानेमाने अध्यापक हैं और प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं, अपने नियमित कॉलम में बताते हैं कि इस कदम के कुछ महत्वपूर्ण पहलू हैं।
ttps://www.dawn.com/news

उसका मकसद है कि मदरसा और अन्य स्कूलों को एक ही पलड़े पर रखा जाए। वह मुमकिन बनाती है कि इत्तेहाद तंजिमाज-इ-मदारिस/मदरसा संगठनकर्ताओं का गठबंधन/ से जुड़े नुमाइंदे यह तय करें कि पाकिस्तान के बच्चे क्या पढ़ें, यहां तक मौजूदा पाठ्यपुस्तकों की जांच का जिम्मा भी उन्हें दिया गया है, नर्सरी से आगे की हर कक्षा के लिए धार्मिक सामग्री अनिवार्य होगी। क्लास एक से पांच का पाठ्यक्रम में इतनी धार्मिक सामग्री होगी जितनी सामग्री का स्तर भी बहुत ऊंचा होगा,  धार्मिक पठन सामग्री नर्सरी की कक्षाओं से ही अनिवार्य होगी। कक्षा एक से पांच तक के पाठयक्रम में मदरसों के पाठयक्रमों की तुलना में अधिक धार्मिक सामग्री दिखती है। इसका निहितार्थ ही भेदभाव से भरा होता है, क्योंकि गैरमुसलमानों के लिए इस्लाम की पवित्र किताब कुरान के अध्ययन की मनाही है। पंजाब (पाकिस्तान स्थित) विश्वविद्यालय की डिग्री को पवित्र कुरान और उसके अनुवाद के साथ अनिवार्य तौर पर जोड़ने का प्रस्ताव है।

हम कल्पना ही कर सकते हैं कि मदरसा और अन्य स्कूलों को एक ही स्तर पर रखने तथा धार्मिक विद्वानों को सभी स्कूलों की पाठयपुस्तकें तय करने का अधिकार देने के कितने खतरनाक नतीजे आ सकते हैं। क्या वह इस स्थिति से गुणात्मक तौर पर भिन्न होंगे जब नात्सी समूहों ने किताबों को जलाने की मुहिम 30 के दशक की शुरुआत में चलाई थी, क्योंकि उनका कहना था कि यह सभी किताबें नात्सी विरोध के विचारों को प्रचारित प्रसारित करती हैं। जिन किताबों को उन्होंने निशाना बनाया उनमें यहूदी, शांतिवादी, धार्मिक, उदारवादी, अराजकतावादी, समाजवादी, कम्युनिस्ट और सेक्सोलोजिस्ट जैसे विविध किस्म के विद्वानों की किताबें थीं।

निःस्सन्देह, यह विचार कि आधुनिक शिक्षा को मदरसों के समकक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। यह विचार ही अपने आप में समस्यापूर्ण है, क्योंकि आधुनिक शिक्षा जहां आलोचनात्मक चिंतन पर आधारित है, मदरसे की शिक्षा में ऐसा कोई आधार नहीं होता है। उसका मकसद यही होता है कि धार्मिक परिपाटियों का पालन करने वाले आज्ञाकारी विद्यार्थी का निर्माण किया जाए और मौत के बाद बेहतर जीवन की बात की जाए। साफ बात है कि यहां आलोचनात्मक चिंतन पर पाबंदी रहती है।

पाकिस्तान के शिक्षा जगत के अध्ययनकर्ता बताते हैं कि वहां की शिक्षा व्यवस्था में जिन बदलावों को अंजाम दिया जा रहा है, वैसे बदलावों की कल्पना तो जनरल जिया उल हक ने भी नहीं की होगी, जिन्होंने पाकिस्तान को इस्लामीकरण के रास्ते पर मजबूती से ला खड़ा किया।

विश्लेषक बताते हैं कि इमरान खान, दरअसल इसी वायदे के साथ सत्ता में आए हैं कि वह उसे ‘‘मदीना के स्वर्णिम युग’ में ले जाना चाहते हैं। हम देख सकते हैं कि ‘स्वर्णिम अतीत’ की बातें ‘चिरवैरी’ कहे जाने वाले मुल्क के तमाम प्रबुद्धजनों को आकर्षित करती हैं।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मौजूदा हुक्मरान मुल्क को राम राज्य की दिशा में ले जाना चाहते हैं, जो एक तरह उनके अपने सपनों का हिंदू राष्ट्र है।

अगर ब्रिटेन के कंटर्वेटिव पार्टी ने एक ऐसा मसविदा तैयार किया है ताकि ब्रिटेन के अपने छात्र और युवा अपने खुद के इतिहास को ही पढ़ नहीं सकें, जबकि यहां सत्ताधारी उनके हम खयाल ताकतें इतिहास की सांप्रदायिक चेतना को आगे बढ़ाने में लगी हैं, जिसके तहत अतीत के सांप्रदायिक नज़रिये को आगे बढ़ाने के लिए वह पाठयपुस्तकों के पुनर्लेखन में लगी हैं, जिसके तहत हिंदू राजाओं की तारीफ के पुल बांधे जाएं तथा अन्य लोगों के योगदान को अनुल्लेखित रखा जाए या उसे गलत ढंग से प्रस्तुत किया जाए।

हालांकि इस बार लोगों के सामने गढ़ा हुआ इतिहास (मैन्युफैक्चर्ड हिस्ट्री) भी पेश किया जा रहा है।

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केंद्र में सत्तासीन मोदी सरकार ने बाकायदा एक कमेटी बना कर ‘इतिहास में हिंदू फर्स्ट’ की अवधारणा पर मुहर लगाने के लिए इस कवायद को तेज किया है। यह प्रस्तुत पैनल को ‘बारह हजार साल से अधिक समय से भारतीय संस्कृति के उद्गम और विकास के समग्र अध्ययन और शेष दुनिया के साथ उसकी अंतर्क्रिया’ के अध्ययन के लिए बनाया गया है। (देखें, पेज 63, रिलीजियस नेशनलिज्म, राम पुनियानी, मीडिया हाउस 2020)

‘विशेषज्ञों की इस कमेटी’ के गठन के पीछे का विचार यही है कि सरकार अपने हिंदू वर्चस्वगान के एजेंडे को ही आगे बढ़ाने में मुब्तिला है और उसे इस सच्चाई से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारतीय उपमहाद्वीप में पहला मनुष्य कब पहुंचा इसके बारे में आधुनिक सिद्धांत क्या बताते हैं? (देखें, टोनी जोसेफ, ‘आरंभिक भारतीय, 2019)

विगत साढ़े छह वर्षों में शिक्षा के दायरे को लगातार उद्वेलित रखा गया है।

वह वक्त़ चला गया जब कि विश्वविद्यालय को ‘सार्वभौमिक ज्ञान को सिखाने का स्थान’ कहा जाता था। (जॉन न्यूमैन, द आयडिया आफ यूनिवर्सिटी) https://www.bartleby.com/28/2.html/

अब स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षा संस्थान जो विचारों के मुक्त प्रवाह तथा निःसंकोच आदान-प्रदान की जगहें समझी जाती थीं, अब मायावी लगने लगी हैं।  आज़ाद भारत के इतिहास में यह पहली दफा हो रहा है कि असहमति रखने वाले छात्रों एवं अध्यापकों पर तरह-तरह से लांछन लगाए जा रहे हैं।

क्या किताबें, जिन्हें ज्ञान का भंडार कहा जाता और जो लोगों को सोचने के लिए मजबूर करती आई हैं, इस हमले से बच सकेंगी?

शायद फारेनहाइट फिल्म का आखरी दृश्य इसका जवाब देता प्रतीत होता है।

केंद्र का मुख्य पात्र गाय मोंटाग (Guy Montag ), जो खुद एक फायरमैन है जो खुद भी किताबों को जलाने की मुहिम सक्रिय रहता है, वह पड़ोसी पुस्तक प्रेमी परिवार की बेटी से बातचीत के बाद बदल जाता है और फिर घर छोड़ देता है और ग्रामीण इलाके में पहुंचता है, जहां उसकी मुलाकात उस विशाल समूह से होती है जो बुक पीपल नाम से अपने आप को संबोधित करता है, जिन्होंने किताबों को बचाए रखने के लिए एक अलग किस्म की पहल की है, उन्हें पूरा याद कर लेने की। गाय मोंटाग को भी एक किताब मिलती है और वह तुरंत उसे याद करने में जुट जाता है।

(सुभाष गाताडे लेखक और चिंतक हैं आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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