Sunday, October 17, 2021

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डॉ. श्रीराम लागू ने कहा था, ‘ईश्वर को रिटायर करो’

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“A good world needs knowledge, kindness, and courage; it does not need a regretful hankering after the past or a fettering of the free intelligence by the words uttered long ago by ignorant men’
-Bertrand Russell

वह 1938-39 का साल था, जब पुणे के भावे स्कूल में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में एक छोटे बच्चे को गोपाल कृष्ण गोखले की भूमिका के लिए उसके अध्यापक ने प्रेरित किया। उत्साह में बच्चे ने हामी भरी। अलबत्ता जब नाटक शुरू हुआ तो सभागार में बैठी भीड़ देख कर इतना डर गया कि उसने स्टेज पर पहुंचने से ही इनकार किया। बाद में किसी तरह स्टेज पर वह पहुंचा और बुत बन कर खड़ा हो गया। नाटक में शामिल अन्य सहपाठियों द्वारा कुछ संवाद प्रांप्ट किए जाने पर अचानक उसने नाटक के संवाद बोलना शुरू किया और पूरे नाटक के संवाद एक के बाद एक बोलता गया।

उस वक्त़ इस बात का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल था कि यह बच्चा बाद में मराठी रंगमंच के महान अभिनेताओं में शुमार किया जाएगा। एक गांधीवादी परिवार में जन्मे इस बच्चे का नाम था श्रीराम लागू, जिनका पिछले दिनों इंतक़ाल हो गया।

पेशे से नाक-कान-गले के डॉक्टर लागू ने बाद में अपनी मेडिकल प्रैक्टिस को अलविदा कह कर अभिनय क्षेत्र के लिए ही अपने आप को समर्पित किया था। उन्होंने कई नाटकों एवं फिल्मों में काम किया। बताया जाता है कि अपने सबसे चर्चित नाटकों में से एक ‘नट सम्राट’ के चलते, जिसमें वह बीते दौर के अभिनेता रहे गणपतराव बेलवलकर की केंद्रीय भूमिका अदा करते थे और उस अभिनेता के पात्र को इस तरह जीते थे कि उन्हें पहला दिल का दौरा पड़ा था। वैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जबरदस्त हिमायती श्रीराम लागू की दूसरी छवि से हिंदी भाषी लोग बहुत कम परिचित हैं।

वह नास्तिकता के प्रचारक थे और समाज की कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष में भी मुब्तिला रहते थे। शनि शिंगणापुर स्थित मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी के खिलाफ चले सत्याग्रह के दौरान उन्होंने अन्य साथियों के साथ कारावास भी भुगता। इतना ही नहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए नियमित आर्थिक सहायता सुनिश्चित करने के लिए बने ‘सामाजिक कृतज्ञता निधि’ के लिए धनराशि इकटठा करने के लिए उन्होंने अन्य अभिनेताओं के साथ मिल कर एक चर्चित नाटक के कई चैरिटी शो किए तथा लाखों रुपये की धनराशि इकट्ठा की। अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने व्याख्यान भी दिए, किताबें भी लिखीं।

‘बुवाबाजी या धोखाधड़ी’ शीर्षक पर दिए गए एक छोटे व्याख्यान में, जिसके वीडियो टेप का निर्माण अंधश्रद्धा विरोधी मुहिम में लंबे समय तक सक्रिय श्याम मानव ने किया था। श्रीराम लागू ने स्पष्ट किया था कि किस तरह कुरीतियों के संघर्ष से लड़ने की 2,500 साल पुरानी परंपरा हमारे यहां मौजूद है, जिसमें चार्वाक, बुद्ध से लेकर संत तुकाराम जैसी शख्सियतें दिखती हैं।

उन्होंने बताया था कि किस तरह अंध श्रद्धा से सबसे ज्यादा नुकसान यह होता है कि मनुष्य की चिकित्सा करने की प्रवृत्ति समाप्त होती है और उन्होंने मन की दीवारें खोलने के लिए, मन पर लगे तालों को खोलने तथा स्वतंत्र विचार करने के लिए लोगों को प्रेरित किया था। उनका यह भी कहना था कि जहां शब्द को ही प्रमाण माना जाता है, वहां अंध श्रद्धा बखूबी पनपती है, इसलिए उन्होंने शब्द प्रमाण्य छोड़ कर बुद्धि प्रामाण्य स्वीकारने के लिए लोगों का आवाहन किया था।

उनके लेखों का संकलन ‘रूपवेध’ नाम से प्रकाशित है। उनकी आत्मकथा ‘लमाण’ अर्थात पोर्टर/कुली चर्चित रही। यह शीर्षक उनके प्रसिद्ध नाटक नट सम्राट के एक संवाद पर आधारित है, जिसमें गणपत राव बेलवलकर अपने बारे में बताते हैं कि ‘‘मैं सिर्फ लमाण, जिसका काम है इधर का माल उधर पहुंचा देना।’

मालूम हो उन्होंने डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और उनके साथियों ने बनाई अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति के साथ जुड़ कर काफी काम किया। उनके इंतक़ाल के बाद समिति के एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता राहुल थोरात, जो अंध श्रद्धा निर्मूलन वार्तापत्रा के व्यवस्थापकीय संपादक एवं प्रकाशक भी हैं, उन्होंने श्री लागू को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है कि नब्बे के दशक में अंधश्रद्धा निर्मूलन का आन्दोलन को महाराष्ट के ग्रामीण इलाकों में पहुंचाने का श्रेय निलू फुले/ जो खुद एक बड़े अभिनेता थे तथा समाजवादी आंदोलन से भी जुड़े थे और श्रीराम लागू इस जोड़ी को जाता है। डॉ. दाभोलकर ने निलूभाउ और डॉ. लागू की शोहरत का इस्तेमाल करते हुए ग्रामीण इलाकों में अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति के सैकड़ों कार्यक्रमों का आयोजन किया था। 

कार्यकर्ते डॉ. लागू

खुद डॉ. दाभोलकर भी अपनी किताब में जनता को जागरूक बनाने के लिए समिति द्वारा हाथ में ली गई ‘विवेक जागरण वाद-संवाद’ मुहिम की चर्चा करते हैं, जिसे डॉ. श्रीराम लागू ने बढ़ चढ़ कर सहयोग दिया। डॉ. श्रीराम लागू ‘बुद्धि प्रामाण्यवादी अर्थात रैशनेलिस्ट’ थे और उन्होंने अपने नास्तिक होने को लेकर अपने विचार जगह-जगह प्रकट किए थे। इसी बात को ध्यान में रखते हुए ऐसे वाद-संवाद समिति की तरफ से महाराष्ट्र में जगह-जगह आयोजित किए जाने लगे।

इसमें सबसे पहले 15 मिनट डॉ. लागू तर्कशीलता के बारे में, अपने नास्तिक होने के बारे में लोगों से बात करते थे और बाद के पंद्रह मिनट डॉ. दाभोलकर समिति के कामकाज पर रोशनी डालते थे और उसके बाद खुली चर्चा चलती थी। एक शहर से दूसरे शहर की यह यात्राएं डॉ. लागू की अपनी कार में ही चलती थी। सोलापुर जिले के बार्शी नामक स्थान पर इस संबंध में पहला कार्यक्रम आयोजित किया गया था, उसके लिए प्रकाशित पोस्टर आकर्षित करनेवाले थे।

नास्तिकता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के चलते उन्होंने एक अग्रणी अख़बार में बाकायदा लेख लिख कर ‘ईश्वर को रिटायर करो’ का आवाहन किया था, जिसको लेकर महाराष्ट्र के बौद्धिक जगत में जबरदस्त हंगामा मचा था। ‘ईश्वर को रिटायर करो’ यह उनका कहना सिर्फ सनसनी पैदा करने के लिए नहीं था बल्कि यह उनका वैचारिक आग्रह था।

(सुभाष गाताडे वरिष्ठ लेखक और चिंतक हैं आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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