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Tuesday, September 21, 2021

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रांगेय राघव की पुण्यतिथि: शोषण की घुटन सदैव नहीं रहेगी

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रांगेय राघव हिंदी के सर्वोच्च रचनाकारों में से एक हैं। वे विलक्षण रचनाकार थे, जिनके लिए लिखना ही जीवन था। उन्होंने कम उम्र में विपुल लेखन किया। रांगेय राघव को महज उनचालीस साल उम्र मिली और उन्होंने इतने ही उपन्यास लिखे। दस कहानी संग्रह, छः काव्य संग्रह, तीन नाटक और इसके अलावा रिपोर्ताज, आलोचना, इतिहास और दर्शन आदि पर कई किताबें लिखीं। उनकी कुल किताबों की संख्या 100 से ज्यादा है। अध्ययन के शुरुआती पच्चीस साल अलग कर दें, तो उन्होंने महज चौदह सालों में बेशुमार काम किया। हिंदी साहित्य में इस मामले में सिर्फ राहुल सांकृत्यायन ही उनकी जोड़ी के हैं। पराधीन भारत में अंग्रेजी साम्राज्य विरोधी चेतना के विकास और स्वाधीनता आंदोलन में उनकी सक्रिय हिस्सेदारी रही। न सिर्फ अपने लेखन से बल्कि एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर उन्होंने आंदोलनों में भाग लिया। भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुराणों का उनका विस्तृत अध्ययन था। खास तौर से पुरातत्व और इतिहास से उन्हें प्यार था। जो कि उनकी रचनाओं में भी झलकता है। रांगेय राघव की मातृभाषा हिंदी नहीं थी, लेकिन वे हिंदी के लिए अपनी आख़िरी सांस तक कुर्बान रहे। उन्होंने भारतीय परम्परा, संस्कृति और कला का मूल्यांकन मार्क्सवादी नज़रिए से किया। अपने लेखन से दलित, शोषित, वंचितजनों में एक नई चेतना विकसित की।

     उत्तर प्रदेश में आगरा के बागमुजफ्फर खां इलाके में 17 जनवरी, 1923 को एक तमिल भाषी आयंगर परिवार में जन्मे तिरूमल निम्बाक्कम वीर राघव ताताचार्य उर्फ टीएन वीर राघव आचार्य का नाम रांगेय राघव कैसे पड़ा, उन्हीं की ज़बानी, ‘‘मेरा एक नाम तो टी.एन.वी. आचार्य और दूसरा वीर राघव था। मैं कोई वीर था नहीं और टीएनवी हिंदी के लिए उपयुक्त नाम नहीं था। मेरे पिता का नाम रंगाचारी था, अतः मैंने अपना नाम रंगा का बेटा रांगेय राघव कर लिया।’’ पन्द्रह साल की छोटी उम्र से ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। यही नहीं आज़ादी के आंदोलन में जब भी मौका मिलता, वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की मदद करते। अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ पैम्फलेट तैयार करके, उन्हें बांटते। नौजवानी में अंग्रेजी कहानियों से प्रभावित होकर, उन्होंने ‘अंधेरी की भूख’ नाम का कहानी संग्रह लिख डाला था। इस संग्रह की ज्यादातर कहानियां भूत-प्रेतों की कहानियां थीं। बाद में वे कविताओं की ओर उन्मुख हुए। शुरुआत में उन्होंने कविताएं ही ज्यादा लिखीं। साल 1944 में आया ‘अजेय खंडहर’, रांगेय राघव का पहला खंडकाव्य था। इस खंडकाव्य में उन्होंने स्तालिनग्राद में लड़े गए युद्ध में लाल सेना की बहादुरी और नाजियों की बर्बरता की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति की थी।

स्तालिनग्राद के संघर्ष को उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ दिया था। ‘अजेय खंडहर’ के अलावा ‘मेधावी’ और ‘पिघलते पत्थर’ कविता संग्रह में भी उन्होंने साम्राज्यवाद, सामंतवाद, शोषण, असमानता और वर्गभेद के खिलाफ अपनी आवाज उठाई। ‘मेधावी’ प्रबंध काव्य जो बेहद चर्चित एवं पुरस्कृत हुआ, उसमें एक जगह उनके क्रांतिकारी विचार हैं,‘‘विश्व होगा केवल सुख स्थान/एक घर सी होगी यह भूमि/बनाएंगे मानव वह पंथ/जहां शोषण का रहे न नाम/जहां का सत्य वास्तविक सत्य/जहां स्वातंत्रय साम्य, सुख शांति/करेंगे निषिदिन नृत्य।’’ ‘मेधावी’, ‘राह के दीपक’ और ‘पिघलते पत्थर’ रांगेय राघव के शुरूआती कविता संग्रह हैं।

रांगेय राघव की आला तालीम आगरा के सेंट जोंस कॉलेज और आगरा कॉलेज से हुई। ‘गोरखनाथ और उनका युग’ विषय पर उन्होंने पीएचडी की। यह शोध कार्य उन्होंने शांति निकेतन में रहकर किया। ‘शांति निकेतन’ के माहौल से उन्हें जो प्रेरणा मिली, उसके बाद तो उनके लेखन का सिलसिला रुका नहीं। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद रांगेय राघव चाहते, तो एक अच्छी नौकरी कर शानदार जीवन बिताते, लेकिन उन्होंने लेखन को चुना। लेखन को ही अपनी आजीविका और समाज सुधार का माध्यम बनाया। लिखने की रफ्तार उनकी ऐसी थी कि कहानी, एक दिन में ही लिख देते थे। कहानी ही नहीं, उनके कुछ उपन्यास भी एक-दो दिन में लिखे गए हैं। ‘पराया’ और ‘काका’ उपन्यास उन्होंने सिर्फ दो-दो दिन में लिख डाले थे। शेक्सपियर के पन्द्रह नाटकों का अनुवाद रांगेय राघव ने सिर्फ पन्द्रह दिन में पूरा कर लिया था। यही नहीं अपनी प्रसिद्ध किताब ‘प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास’ उन्होंने सिर्फ एक महीने में लिखी थी। इसी तरह उनकी अद्वितीय कहानी ‘गदल’ लिखी गई थी। यह कहानी अपने समय की चर्चित लघु पत्रिका ‘कहानी’ में छपी। कहानी छपते ही हिंदी साहित्य में तहलका मच गया। आज भी यह कहानी हिंदी साहित्य की श्रेष्ठ कहानी मानी जाती है। आलोचक शिवदान सिंह चौहान ने ‘गदल’ की प्रशंसा करते हुए लिखा था, ‘‘गदल को भारतीय भाषाओं की उत्कृष्ट प्रतिनिधि कहानियों के साथ रखा जा सकता है।’’ ‘गदल’ का अनुवाद भारतीय भाषाओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओं में भी हुआ। ‘गदल’ के अलावा ‘पंच परमेश्वर’, ‘देवदासी’, ‘नई जिंदगी के लिए’ आदि उनकी कहानियां भी अपने समय में काफी चर्चा में रहीं।

     साल 1946 में आया ‘घरौंदे’ रांगेय राघव का पहला उपन्यास है। इसी साल बंगाल अकाल पर उनका एक और उपन्यास ‘विषादमठ’ आया। ‘मुर्दों का टीला’ वह उपन्यास है, जिससे रांगेय राघव को देशव्यापी प्रसिद्धि मिली। ईसा से 3500 वर्ष पूर्व मोअन-जो-दड़ो की सभ्यता को केन्द्र बिंदु बनाकर लिखे गए इस उपन्यास में उनका विस्तृत अध्ययन देखते ही बनता है। हिंदी के ऐतिहासिक उपन्यास में ‘मुर्दों का टीला’ का विशेष स्थान है। देश के प्राचीन इतिहास से रांगेय राघव का गहरा लगाव था। ‘अंधेरे के जुगनू’, ‘प्रतिदान’, और ‘चीवर’ में ऐतिहासिक और पौराणिक किरदारों के इर्द-गिर्द उन्होंने उपन्यास बुने हैं। उनका ऐतिहासिक उपन्यास ‘महायात्रा’ दो खंडों ‘अंधेरा रास्ता’ एवं ‘रैन और चंदा’ शीर्षक से है। ‘अंधेरा रास्ता’ में जहां प्रागैतिहासिक काल वर्णित है, तो वहीं ‘रैन और चंदा’ में उन्होंने जनमेजय से लेकर अजातशत्रु तक यानी बर्बर दासप्रथा से सामंती व्यवस्था के उदय तक की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों का ब्यौरा दिया है। ‘एक छोड़ एक’, ‘जीवन के दाने’, ‘साम्राज्य का वैभव’, ‘समुद्र के फेन’, ‘अधूरी मूरत’, ‘अंगारे न बुझे’, ‘इंसान पैदा हुआ’, ‘मेरी प्रिय कहानियां’ आदि रांगेय राघव के प्रमुख कहानी संग्रह हैं।

रांगेय राघव का आलोचना कर्म भी काफी व्यापक है। ‘काव्य, कला और शास्त्र’, ‘भारतीय चिंतन’, ‘समीक्षा और आदर्श, ‘काव्य, यथार्थ और प्रगति’, ‘हिंदी साहित्य की धार्मिक और सामाजिक पूर्वपीठिका’, ‘भारतीय पुनर्जागरण की भूमिका’, ‘तुलसीदास का कथा-शिल्प’ और ‘आधुनिक हिंदी कविता में विषय और शैली’ उनकी प्रमुख आलोचना संबंधी किताबें हैं। इसमें भी उनकी किताब ‘गोरखनाथ और उनका युग’ एवं ‘प्रगतिशील साहित्य के मानदंड’ हिंदी आलोचना में मील का पत्थर मानी जाती हैं। साल 1943-44 में बंगाल में जब सदी का भयंकर अकाल पड़ा, तो उन्होंने न सिर्फ यह देखने, जानने-समझने के लिए बंगाल की यात्रा की, बल्कि इस पूरी यात्रा में उन्होंने जो जाना-भोगा उसे रिपोर्ताज के तौर पर लिखा। ये रिपोर्ताज उस वक्त की चर्चित पत्रिकाओं ‘हंस’ और ‘विशाल भारत’ पत्रिका में सिलसिलेवार प्रकाशित हुए। बाद में यह रिपोर्ताज ‘तूफानों के बीच’ किताब की शक्ल में आए। ‘तूफानों के बीच’ हिंदी साहित्य का पहला रिपोर्ताज माना जाता है। इस रिपोर्ताज में रांगेय राघव ने बड़े ही संवेदनशील तरीके से अकाल को चित्रित किया है। साम्राज्यवादी अंग्रेजी हुकूमत और देशी मुनाफाखोरों द्वारा कृत्रिम तौर पर पैदा किए गए इस भीषण अकाल की विभीषिका को उन्होंने रिपोर्ताज के ज़रिए पूरे देश तक पहुंचाया।

रांगेय राघव एक साहित्यकार के साथ-साथ संस्कृतिकर्मी भी थे। वे ‘आगरा कल्चरल स्क्वैड’ से भी जुड़े रहे। बाद में जब आगरा इप्टा का गठन हुआ, तो वे इसके सक्रिय सदस्य हो गए। इप्टा से रांगेय राघव अपने आखिरी समय तक जुड़े रहे। एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह वे इप्टा के आयोजनों में शिरकत किया करते थे। बंगाल अकाल पर उन्होंने कई जज़्बाती और जोशीले जन गीत और एक नृत्य नाटिका लिखी। उनके जनगीत ‘‘टेम्स हो या यांक्सी क्यांग/वोल्गा हो या गंगा हो/सबकी एक लड़ाई है/दुनिया की आज़ादी की’’, ‘‘गांव-गांव नगर-नगर में आज यही ललकार उठे/परदेशी का राज न हो, बस यही हुंकार उठे’’ और ‘‘बापू बोल-बोल/यह है देश की पुकार/जिन्ना बोल-बोल…’’ उस समय देश भर में काफी लोकप्रिय हुए। इप्टा के कलाकारों के साथ वे खुद ये गीत गाते थे। इप्टा की प्रस्तुतियों के जरिए उन्होंने बंगाल अकाल पीड़ितों के लिए चंदा इकट्ठा करने का काम भी किया। गोवा के मुक्ति आंदोलन पर लिखा उनका पूर्णकालिक नाटक ‘आखि़री धब्बा’ आगरा इप्टा द्वारा अनेक बार मंचित हुआ। नाटक के गीत, संवाद और छाया अभिनय हर चीज मशहूर हुई। खास तौर पर इस नाटक में इस्तेमाल गीत जो शैलेन्द्र, राजेन्द्र रघुवंशी और खुद रांगेय राघव ने लिखे थे। उन्होंने नाटक की जरूरत के मुताबिक इसमें कई मानीखे़ज गीत लिखे। मसलन‘‘उठ-उठ रक्त उबाल/देख धरती आकाश/आज हुए दोनों लाल/मां तेरी सौगंध हमें, हम हथकड़ियां तड़कायेंगे/हो सुहागिनी बन रणचंडी तेरा दूध निभायेंगे।’’

रांगेय राघव के कई चर्चित उपन्यास और कहानियां समाज के बीच से ही निकलकर आई हैं। नटों के जीवन पर ‘कब तक पुकारूं’ और लोहपीटे या गड़रिया लोहारों पर उन्होंने ‘धरती मेरा घर’ जैसे क्लासिक उपन्यासों की रचना कर दी थी। ‘कब तक पुकारूं’ का नायक करनट ‘सुखराम’ से वे अपनी ज़िंदगी में मिले थे। उससे करनटों की जिंदगी को न सिर्फ उन्होंने बारीकी से जाना था, बल्कि नटों की बस्ती में जाकर उन्हें रू-ब-रू भी देखा था। यही वजह है कि उपन्यास के किरदार और हालात यथार्थ के करीब दिखलाई देते हैं। साल 1955 में जब यह उपन्यास आया, तो इसने हिंदी साहित्य में हलचल मचा दी। बीसवीं सदी की चौथी और पांचवीं दहाई में हिंदी साहित्य के अंदर जो प्रगतिशील आंदोलन चला, उसमें भी रांगेय राघव की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

आगरा में प्रगतिशील लेखक संघ की जो बैठकें होती, उनमें वे नियमित शामिल होते थे। बाबू गुलाबराय, डॉ. नगेन्द्र, नेमिचंद जैन, डॉ. रामविलास शर्मा, अमृतलाल नागर और भारतभूषण अग्रवाल जैसे नामवर साहित्यकार भी इन बैठकों में उनके साथ हिस्सा लिया करते थे। प्रगतिशील लेखन में रांगेय रागव ने रचनात्मक, वैचारिक योगदान दिया। साल 1954 में आई उनकी किताब ‘प्रगतिशील साहित्य के मानदंड’, कई महत्वपूर्ण सवालों की पड़ताल करती है। इस किताब में उन्होंने बड़े ही बेबाकी और तर्कशीलता से अपने विचार रखे हैं। रांगेय राघव की मार्क्सवाद में गहरी आस्था थी। लेकिन वे देश, काल और परिस्थितियों के मुताबिक इस विचारधारा पर चलने को कहते थे। उनका साफ कहना था,‘‘मार्क्सवाद यह नहीं कहता कि प्रत्येक देश में एक-सा ही विकास होता है। वह यही बतलाता है कि अनेक विभिन्नताओं के बीच एक समता होती है, पर इसका अर्थ यह नहीं होता है कि इंग्लैंड में जो कुछ हुआ, वही सब जर्मनी में भी होना चाहिए। या चीन में भी उसकी पुनरावृत्ति होनी चाहिए।

यह समझने पर अनेक भ्रांतियां दूर हो जाती हैं। जिस देश पर हम विचार करें, पहले उस पर मार्क्सवाद लागू न करें, वरन् उस भूमि को समझें, जिस पर मार्क्सवाद लागू करना है। अर्थात् जिस देश के विषय में सोचें उसका इतिहास जान लें। मार्क्स के महान सिद्धांत हवा में पैदा नहीं हुए, इतिहास के मनन के परिणाम थे।’’ (‘प्रगतिशील साहित्य के मानदंड’, पेज-256) रांगेय राघव का मानवता और वैश्विक भाईचारे में गहरा यकीन था। उनके मन में एक ऐसे समाज की कल्पना थी जिसमें असमानता, अत्याचार और शोषण न हो। महिलाओं और दलित, वंचितजनों को उनके अधिकार मिलें। समाज के आधार में समानता हो। एक वर्गविहीन समाज जिसमें न कोई छोटा, न कोई बड़ा हो। जाति, धर्म, लिंग, रंग, भाषा और नस्ल के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव न हो। उपन्यास ‘कब तक पुकारूं’ में वे एक जगह कहते हैं,‘‘शोषण की घुटन सदैव नहीं रहेगी। वह मिट जाएगी। सत्य सूर्य है। यह सदैव मेघों से घिरा नहीं रहेगा। मानवता पर से यह बरसात एक दिन अवश्य दूर होगी। और तब नयी शरद में नए फूल खिलेंगे, नया आनंद व्याप्त हो जाएगा।’’       

(जाहिद खान लेखक, समीक्षक और वरिष्ठ पत्रकार हैं आप आजकल मध्य प्रदेश के शिवपुरी में रहते हैं।)

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