Subscribe for notification

व्यवस्था की कलई खोलती एसिड सर्वाइवर्स पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘ब्यूटी आफ लाइफ’

विकृत आपराधिक घटनाओं के कई रूप हैं, उन्हीं में से एक भयावह रूप है एसिड अटैक। एसिड से जिस किसी पर हमला होता है, उसकी पूरी जिंदगी तबाह हो जाती है। एसिड अटैक के सर्वाइवर्स पर आशीष कुमार की डॉक्यूमेंट्री फिल्म रिलीज हुई है ब्यूटी आफ लाइफ।

(https://cinemapreneur.com/programs/beauty-of-life)

यह कुछ एसिड सर्वाइवर्स को लेकर उनकी जिंदगी पर तैयार की गई कहानी है। फिल्म सुप्रीम कोर्ट के एक खबर से शुरू होती है। एसिड हमले के शिकार लोगों की तबाह हुई जिंदगी दिखाती है कि वे अपना जला चेहरा और शरीर लेकर किस कदर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न के शिकार होते हैं।

इस उत्पीड़न की श्रृंखला में हमलावर से लेकर पुलिस, न्याय पालिकाएं, सरकारी अमला और समाज शामिल होता है। फिल्म दिखाती है कि किस तरह से पुलिस एफआईआर करने में आनाकानी करती है। कई मामलों में क्रॉस एफआईआर हो जाती है और पीड़ित व्यक्ति को ही पुलिस गिरफ्तार करने को खोजती है।

मामला जब कोर्ट के चक्कर में पड़ता है तो न्यायालय में पूरे दिन बैठाया जाता है। कह दिया जाता है कि आज नहीं, अब कल आएं। यह ऐसी अवस्था में होता है, जब पीड़ित व्यक्ति इलाज करा रहा होता है और उसे हर पल सेप्टिक और इनफेक्शन का खतरा बना होता है और उसके घाव से मवाद बह रहे होते हैं।

वहीं सरकार की आर्थिक मदद की घोषणाएं बेमानी साबित होती हैं और पीड़ित को विभिन्न तरह के साक्ष्य जुटाने से लेकर वह मदद पाने के लिए बिचौलियों को धन खिलाना पड़ता है। एसिड के हमले के शिकार का पूरा परिवार तबाह हो जाता है और इलाज व दर्जनों ऑपरेशन में वह पूरी तरह आर्थिक रूप से बर्बाद हो जाता है।

एसिड हमले में चेहरा इस कदर विकृत हो जाता है कि पीड़ित व्यक्ति समाज बहिष्कृत हो जाता है। शादी विवाह से लेकर किसी भी सामूहिक कार्यक्रम में लोग डरते हैं कि ऐसी महिला कार्यक्रम में शामिल होने न पहुंच जाए, जिससे उनके परिवार को आमंत्रित नहीं किया जाता है।

फिल्म को बहुत करीने से सजाया गया है। फिल्मांकन में ऐसे विजुअल्स हैं जो संवेदना उत्पन्न करते हैं, लेकिन भयावह नहीं लगते। लाइट इफेक्ट्स के साथ म्युजिक और गीत इस फिल्म की खूबसूरती को बढ़ाते हैं। इसमें सुखांत कहानियां हैं, जिसमें महिलाओं व पुरुषों ने आगे बढ़कर एसिड के हमले का शिकार हुए लोगों से विवाह कर घर बसाया है।

लेकिन फिल्म यह सवाल लगातार छोड़ती है कि क्या ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी की सरकार कोई ऐसी व्यवस्था नहीं कर सकती है, जिससे इस तरह के पीड़ित लोगों की आर्थिक, मानसिक सामाजिक तबाही को रोका जा सके?  फिल्म सिनेमाप्रेन्योर डॉट कॉम पर रिलीज हुई है, जहां इसे देखा जा सकता है।

(सत्येंद्र पीएस बिजनेस स्टैंडर्ड में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं।)

This post was last modified on August 3, 2020 6:53 pm

Share