Wednesday, December 7, 2022

फिल्मकारों के फिल्मकार थे गोदार

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गोदार की मृत्यु पर उनकी पार्टनर ने कहा कि वे बीमार नहीं थे, बस थक चुके थे। इसलिए उन्होंने इच्छा मृत्यु चुन ली। गौरतलब है कि स्विट्जरलैंड में इच्छा मृत्यु मान्य है। मनुष्य बुनियादी तौर पर ऐसा रचनाकार है, जो जब तक जीता है, रचता है। जब नहीं रच पाता तो ‘मर’ जाता है।

इस अर्थ में वह ईश्वर से बड़ा रचनाकार है। क्योंकि ‘ईश्वर ने सिर्फ एक बार दुनिया रची’ और फिर हाथ बांध कर बैठ गया और इस तरह उसकी मृत्यु हो गयी। आज हम उसकी दुर्गंध देती लाश को अपने कांधे पर ढो रहे हैं। क्योंकि उसे दफनाने का साहस हममें नहीं है।

गोदार अपनी पहली फिल्म ‘ब्रेथलेस’ से अंतिम फ़िल्म ‘द इमेज बुक’ तक लगातार रचते रहे और कहानी/फॉर्म में लगातार प्रयोग करते रहे। जब उन्होंने देखा कि वे नहीं रच पा रहे हैं, तो उन्होंने चुपचाप मौत चुन ली। उनका मशहूर कथन है- ‘फ़िल्म में निश्चय ही शुरुआत, मध्य और अंत होना चाहिए। लेकिन जरूरी नहीं कि यह इसी क्रम में हो।’

बांग्ला सिनेमा में सत्यजीत राय, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की तिकड़ी ने जो किया वही काम फ्रेंच सिनेमा में गोदार (Jean-Luc Godard), तुफे (Truffaut), और ब्रेसां (Bresson) ने किया।

गोदार का अध्ययन इस दृष्टिकोण से भी बहुत महत्वपूर्ण है कि उनका सिनेमा विश्व के सामाजिक/राजनीतिक आन्दोलनों (68 का छात्र आंदोलन, वियतनाम विरोधी आंदोलन, तीसरी दुनिया का राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और चीन की सांस्कृतिक क्रांति) से किस तरह प्रभावित था।

और जैसे-जैसे ये आंदोलन कमजोर होते गए, गोदार की फिल्मों का प्रगतिशील कथ्य भी कमजोर होता गया और वो फ़िल्म मेकिंग के अतिशय प्रयोगों में लीन होते गए। 2016 में आयी उनकी फिल्म ‘गुडबॉय टू लैंग्वेज’ में वास्तव में उन्होंने भाषा यानी कथ्य को गुडबॉय बोल दिया और कथ्य से पल्ला झाड़ लिया। मेरी नज़र में इसी फिल्म में गोदार की रचनात्मक मौत हो गयी थी।

लेकिन यह बात भी सच है कि विश्व सिनेमा पर, विशेषकर ‘थर्ड (वर्ल्ड) सिनेमा आंदोलन’ पर गोदार का विशेषकर शुरुआती गोदार का वही प्रभाव था जो 20 और 30 के दशक में सर्गेई ऐजेंटाइन (Sergei Eisenstein) का विश्व सिनेमा पर था।

उन्हीं के समकालीन तुफे (Truffaut) ने लिखा-‘आज के बाद सिनेमा गोदार से पहले और गोदार के बाद के रूप में याद रखा जायेगा।’ जिस तरह से ‘एडिटिंग’ (मोंटाज) को सर्गेई ऐजेंटाइन (Sergei Eisenstein) से जोड़ कर देखा जाता है, उसी तरह ‘जम्प कट’ को गोदार का योगदान माना जाता है। इससे फ़िल्म में एक आंतरिक ऊर्जा आ जाती है। हालाँकि गोदार से पहले भी ‘जम्प कट’ का इस्तेमाल हुआ है, लेकिन इसे जिस तरह से गोदार ने अपनी फिल्मों में इस्तेमाल किया, वह बेमिसाल है।

हालाँकि इसके बारे में एक मजेदार कहानी भी प्रचलित है। कहा जाता है कि गोदार ने अपनी फ़िल्म ‘ब्रेथलेस’  कुछ ज्यादा ही लंबी बना दी। एडिटिंग के समय गोदार किसी ‘सीन’ को काटना नहीं चाहते थे। अंततः वे ‘सीन’ के अंदर [within scene] ही कट मारने लगे। फिर इसका जो असर देखा गया, उससे गोदार की फ़िल्म का यह अनिवार्य हिस्सा हो गया।

गोदार, तुफे और अन्य फिल्मकारों ने 60 के दशक में जिस ‘फ्रेंच न्यू वेव’ सिनेमा का आगाज़ किया, उसके प्रति इन फिल्मकारों के ‘पैशन’ को दर्शाते हुए मशहूर फ़िल्म इतिहासकार ‘मार्क कजिन’ [Mark Cousins] अपनी चर्चित पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ़ फ़िल्म’ में लिखते हैं-“तुफे ने एक बार सवाल किया कि ‘क्या जीवन भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना सिनेमा?’ हालाँकि इसका उत्तर ना में ही है,लेकिन तुफे का यह सवाल साफ़ साफ़ यह दिखाता है कि ये नए लड़के सिनेमा के प्रति कितने पागल थे।”

तकनीक ने भी उनके ‘पागलपन’ को रचनात्मक आयाम देने में अपनी भूमिका अदा की। ठीक इसी समय ‘हैण्ड हेल्ड’ कैमरा आया। अब जीवन को स्टूडियो में कृतिम तरीके से रचने की मजबूरी नहीं रही। आप अपने कैमरे के साथ सीधे असल जीवन को कैमरे में कैद कर सकते हैं। शायद इसीलिए उस वक़्त गोदार ने कहा था कि कैमरा प्रति सेकंड 24 सच बोलता है।

गोदार पर चर्चा करते हुए उनके कैमरामैन ‘राउ कुतार्द’ [Raoul Coutard] की चर्चा करनी ही पड़ेगी। ‘मार्क कजिन’ बताते हैं कि ‘राउ कुतार्द’ ने स्टिल कैमरा के लिए प्रयोग होने वाले 18m ‘फ़िल्म’ को इस तरह विकसित किया कि उसे 800 ASA की स्पीड मिल गयी, जो उस वक़्त स्टूडियो कलर फ़िल्म की स्पीड से 10 से 20 गुना ज्यादा था। इसे तकनीकी रूप से समझना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन मैं यहाँ यही कहना चाहता हूँ कि जिस दौर का प्रतिनिधित्व गोदार कर रहे थे, वह वक़्त फ़िल्म तकनीक के क्रांतिकारी रूपांतरण का भी था, जिससे इन फिल्मकारों को जिंदगी के साथ सीधे मुठभेड़ करने में आसानी हुई।   

इस तरह गोदार की पहली फ़िल्म ‘ब्रेथलेस’ को ‘मास्टर पीस’ बनाने में ‘राउ कुतार्द’ की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस फ़िल्म की कहानी बहुत ही साधारण थी। एक कार चोर है, उसकी एक अमेरिकन गर्ल फ्रेंड है और वह एक पुलिस वाले की हत्या कर देता है। कहानी के स्तर पर यह फ़िल्म बहुत ही साधारण है। कहानी उस वक़्त के ‘बोहेमियन’ विचार से प्रेरित है, यानी बिना कारण के विद्रोह [Rebel Without a Cause] ।

लेकिन यह पूरी फ़िल्म प्राकृतिक प्रकाश में शूट की गयी थी। यहाँ तक कि होटल के कमरे में शूट किये गये दृश्य भी प्राकृतिक प्रकाश में लिए गये हैं। इसलिए उस वक़्त यह पूरी तरह ताजगी से भरी, सभी पुरानी परम्परा को तोड़ने वाली फ़िल्म थी। इस फ़िल्म में उन्होंने जिस तरह ‘जम्प कट’ का इस्तेमाल किया उससे यह संकेत भी जाता है, कि आप फ़िल्म ही देख रहे हैं। यानी अमेरिकन मेलोड्रामा फ़िल्म की तरह यह आपको अपने साथ बहा नहीं ले जाती बल्कि इसके प्रति आपको आगाह करती है कि आप अपना दिमाग खुला रखें।

इसलिए गोदार को ‘हृदय’ का नहीं ‘दिमाग’ का फिल्मकार माना जाता है।

ब्रेख़्त के ऐलियनेशन इफ़ेक्ट (Alienation effect) का फ़िल्म में जितना शानदार इस्तेमाल गोदार ने किया वह बहुत कम फिल्मों में मिलता है।

जैसा की मैंने पहले ही कहा था गोदार की 2014 में आयी 3D फ़िल्म ‘गुडबॉय टू लैंग्वेज’ उत्तर-आधुनिक विचारों से प्रेरित है। बहुत से असम्बद्ध विचारों और असम्बद्ध दृश्यों से बनी इस ‘कोलाज़’ फ़िल्म में तकनीक के स्तर पर जरूर कुछ उम्दा प्रयोग हैं, लेकिन खुद गोदार से जब पूछा गया कि इसका सन्देश क्या है, तो उन्होंने कहा कि इसका सन्देश यही है कि इसका कोई सन्देश नहीं है।

उनकी अंतिम फ़िल्म ‘द इमेज बुक’ [The Image Book] पर लिखते हुए ‘द गार्डियन’ ने लिखा-‘इस फ़िल्म में बहुत से इमेज हैं। स्थिर इमेज, मूविंग इमेज, हमारे फ़ोन और आई पैड की इमेज। हम इमेजेज में ही डूब जाते हैं- हमारी सोचने-समझने की क्षमता भी इमेजेज़ के इस दलदल में डूब जाती है………………..आँखों को सुंदर लगने वाले चित्रों की हमारे ऊपर बमबारी होती है, जिनका कोई स्पष्ट सन्दर्भ नहीं होता।’ लेकिन गोदार की शुरुआती फिल्मों में ऐसा नहीं था।

1963 में आई उनकी फ़िल्म ‘द लिटिल सोल्जर’ [The Little Soldier] में गोदार फ्रांस की औपनिवेशिक नीति की कठोर आलोचना करते हैं और स्वतंत्रता, प्यार जैसे सार्वजनीन उसूलों को स्थापित करते हैं।

1965 की उनकी फ़िल्म ‘Alphaville’ साइंस फिक्शन होने के बावजूद रियल लोकेशन पर शूट की गयी और इसमें ऐसे कंप्यूटर को नष्ट करने का बीड़ा उठाया जाता है, जो सभी पर नियंत्रण रखता है। आज के सर्विलांस कैपिटलिज्म में इस फ़िल्म की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।

1972 में आयी उनकी फ़िल्म ‘Tout va bien’ मजदूर आन्दोलन पर है। इसमें वर्ग संघर्ष के विविध आयामों को दिखाने का प्रयास किया गया है। इस फ़िल्म में ब्रेख्त के ‘एलियनेशन इफ़ेक्ट’[Alienation effect] का शानदार प्रयोग हुआ है।

फिर उनकी फ़िल्म ‘La Chinoise’ को कौन भूल सकता है, जो उन्होंने फ्रांस में छात्रों के एक माओवादी समूह और उनके बीच की जीवंत बहसों पर बनाई थी। दिलचस्प है कि यह फ़िल्म फ्रांस के 68 के प्रसिद्ध छात्र आन्दोलन के महज एक साल पहले बनाई गयी थी।

बाद में गोदार, तुफे व अन्य ने मिलकर छात्र आन्दोलन के समर्थन में उस वक़्त ‘कान फ़िल्म फेस्टिवल’ बंद करा दिया था। गोदार उन फिल्मकारों में रहे हैं, जो अपनी कला का इस्तेमाल दुनिया बदलने में करना चाहते थे। चाहे वह सिनेमा की दुनिया हो या हमारे आस-पास की।

उन्हीं की परंपरा के फिल्मकार गी दुबो (Guy Debord) ने एक जगह लिखा है-“दुनिया को फिल्माने का काम बहुत हुआ, असल सवाल उसे बदलने का है।” यह बात गोदार पर विशेषकर शुरुआती गोदार पर हूबहू लागू होती है।

(मनीष आजाद राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता के साथ-साथ लेखक, कवि और अनुवादक भी हैं। ‘अब्बू की नजर में जेल डायरी’ नामक किताब शीघ्र प्रकाशित।)

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