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हीरा सिंह मरकामः गोंडवाना का सूरज अस्त हो गया

कुछ ही समय पूर्व कोरोना संक्रमण के चलते पूर्व विधायक मनमोहन शाह बट्टी के असामयिक निधन के बाद दादा हीरा सिंह मरकाम जी की मृत्यु की दुखद खबर मिली। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। दादा जी के साथ मेरी पहली मुलाकात 1998 में मध्य प्रदेश की विधानसभा में हुई थी। मैं विधानसभा में जब भी कुछ बोलता था तो वे मुझे जरूर बधाई देते थे। जब छत्तीसगढ़ राज्य के गठन का मुद्दा विधानसभा में चर्चा के लिए आया तब सवा सौ से अधिक किताबों का उल्लेख करते हुए मैंने कहा था कि आजादी के बाद पहला पृथक राज्य गोंडवाना बनना चाहिए था, जिसका हजारों साल का इतिहास था, संस्कृति थी और भाषा थी, लेकिन गोंडवाना के साथ अन्याय किया गया। गोंडवाना राज्य आज तक नहीं बना। मैंने आजादी के बाद विभिन्न केंद्र सरकारों एवं नेताओं द्वारा दिए गए आश्वासनों का भी जिक्र करते हुए कहा था कि गोंडवाना के मूल वासियों के साथ दिल्ली की सत्ता में रही हर सरकार और प्रधानमंत्री ने धोखा किया है। मेरे वक्तव्य के बाद हीरा सिंह मरकाम जी का भी वक्तव्य हुआ। उसी समय से मेरी और उनकी जो नजदीकी बनी वह आजीवन कायम रही।

दादा ने शहडोल से लोकसभा का चुनाव लड़ा। मैं कई दिनों तक उनके प्रचार में शहडोल के गांव-गांव में घूमा। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी प्रचार के लिए आए। हमारी संयुक्त सभाओं में दोनों नेता कहा करते थे कि शहडोल का चुनाव जीतने के बाद छत्तीसगढ़ विधानसभा के जब चुनाव होंगे तब हम दोनों मिल कर चुनाव लड़ेंगे तथा छत्तीसगढ़ में सरकार बनाएंगे। दोनों यह भी कहते थे कि शहडोल के चुनाव की तरह डॉ. सुनीलम छत्तीसगढ़ के चुनाव अभियान में भी आएंगे तथा शपथ ग्रहण कार्यक्रम में भी शामिल होंगे, हालांकि उसके बाद जब मुलताई में शहीद किसान स्मृति सम्मेलन के कार्यक्रम में दादा आए और मैंने उन्हें छत्तीसगढ़ चुनाव में गठबंधन की याद दिलाई तब उन्होंने अजीत जोगी जी के साथ कुछ कटु अनुभवों का जिक्र किया। दुखद है वह गठबंधन आगे नहीं चल सका।

मध्य प्रदेश के विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का गठबंधन हुआ। चर्चाओं में मैं भी सक्रिय रूप से शामिल रहा। यह राजनीतिक गठबंधन दादा का आखिरी राजनीतिक गठबंधन था। यही एकमात्र ऐसा गठबंधन था, जिसमें गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जी द्वारा सम्मानजनक स्थान दिया गया। 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में 61 सीटें दी गईं। उसके बाद मेरी मुलाकात फिर सिवनी के कार्यक्रम में दादा जी से हुई। उन्होंने साथ मिलकर काम करने की इच्छा बतलाई। उनसे बाद में एक बार बीमारी में फोन पर आखिरी बात हुई थी।

दादा के बारे में विस्तार से जानना जरूरी है, क्योंकि वे गोंडवाना इलाके के सबसे बड़े जननायक थे। हीरा सिंह मरकाम का जन्म 14 जनवरी 1942 को बिलासपुर जिले के तिवरता गांव के एक खेतिहर मजदूर परिवार में हुआ था, जो अब कोरबा में आता है। पिता का नाम देवशाय मरकाम तथा माता का नाम सोन कुंवर मरकाम था। वे सात भाई बहन थे। गांव में ही प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की तथा गांव से 40 किलोमीटर दूर सूरी गांव से माध्यमिक शिक्षा ग्रहण की। बेसिक टीचर ट्रेनिंग स्कूल की परीक्षा पास की और 2 अगस्त 1960 को प्राइमरी स्कूल में शिक्षक के रूप में नियुक्त हो गए। ग्राम रलिया में नौकरी करते हुए हायर सेकेंडरी की।

पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से एमए किया तथा गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर से 1984 में एलएलबी किया। 1958 में शादी हुई राम कुंवर जी के साथ। उनके तीन बच्चे गीता मरकाम, तुलेश्वर मरकाम, लीलाधर मरकाम हैं। 1980 में अध्यापकों के अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ उन्होंने शिक्षकों का आंदोलन शुरू किया। 2 अप्रैल 1980 को सरकारी सेवा त्याग कर पाली-तानाखार विधानसभा से चुनाव लड़ा। 1985-86 में भाजपा से चुनाव लड़कर मध्य प्रदेश विधानसभा के सदस्य बने। 1990 में जांजगीर चांपा से भाजपा के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा।

गोंडवाना सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं की जानकारी उन्हें मोती रावण कंगाली तथा सुन्हेर सिंह ताराम से प्राप्त हुई। कंगाली जी बैंक में नौकरी करते हुए गोंडवाना संस्कृति का प्रचार प्रसार किया करते थे। 1984 में बीएल कोराम, सुन्हेर सिंह ताराम, शीतल मरकाम और मोती रावण कंगाली के साथ मिलकर उन्होंने गोंडवाना संस्कृति को लेकर कार्य सुनियोजित रूप से शुरू किया तथा गोंडवाना आंदोलन की नींव रखी। 2005 में प्रसिद्ध वैद्य ठुन्नूराम मरकाम के साथ मिलकर उन्होंने फड़ापेन ठाना की स्थापना की, जहां लाखों आदिवासी अपनी संस्कृति और परंपराओं को जानने के लिए लगातार जाते हैं। अमरकंटक में उन्होंने गोंडवाना विकास मंडल की नींव डाली तथा गोंडवाना भवन का निर्माण कराया।

दादा के नेतृत्व में भोपाल से सुन्हेर सिंह ताराम गोंडवाना दर्शन पत्रिका निकालने लगे। तारामजी ने बाद में नागपुर से इस पत्रिका को निकाला तथा गोंडी साहित्य तैयार किया। उस समय परिस्थिति यह थी कि ढोकल सिंह मरकाम और कमला माझी का संबंध कांग्रेस के साथ हो जाने से आंदोलन का सांस्कृतिक पहलू कमजोर होने लगा था। बाद में ढोकल सिंह मरकाम ने राम वंशी गोंड और रावण वंशी गोंड की वंशावली निकाली। जनेऊ संस्कार करवाना शुरू किया। भाग्य और भगवान के चक्कर में गोंड फंसने लगे, तब दादा ने गोंडी धर्म संस्कृति का आंदोलन और तेज कर दिया। उन्होंने कोया पुनीम दर्शन का संस्कार 30 बच्चों को देकर उन्हें गोंडी संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए तैयार किया।

गोंडी संस्कृति को बचाने के लिए उन्होंने गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की नींव रखी, जिसकी शुरुआत दिसंबर 1990 में हुई, लेकिन पार्टी 13 जनवरी 1991 को गठित हुई। 1998 में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के टिकट पर तानाखार विधानसभा चुनाव जीतकर छत्तीसगढ़ विधानसभा के सदस्य हुए। 2003 में मध्य प्रदेश में गोंगपा के 3 विधायक बने। 2003 में पार्टी ने 61 उम्मीदवार लड़ाए जिन्हें पांच लाख 12 हजार 102 वोट मिले। छत्तीसगढ़ में 2003 में 41 उम्मीदवार चुनाव लड़े, जिन्हें एक लाख 56 हजार 916 वोट मिले। 2004 में पांच राज्यों में पार्टी लोकसभा चुनाव लड़ी, लेकिन कोई भी सीट नहीं जीती। 2018 में सपा के साथ गठबंधन में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी 61 सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन कोई भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीता।

वे बार-बार कहते थे कि कांग्रेस और भाजपा ने हमारे बहुत सारे कार्यकर्ताओं को खरीद लिया। पहले वे केवल गोंडवाना संस्कृति की बात करते थे लेकिन बाद में वे किसानों की बात करने लगे। वे कहते थे कि खेत गांव में है, संस्कृति गांव में है, विकास की राह गांव से निकलती है। कोई कागज के नोट खाकर जिंदा नहीं रह सकता। पार्टी के लगातार बिखराव से परेशान होकर उन्होंने गोंडवाना समग्र विकास आंदोलन शुरू किया, जो गरीब हो चुके गांव को समृद्ध बनाने का आंदोलन था।

वे समाज में छह समस्याएं मुख्य मानते थे। भय, भूख, भ्रष्टाचार, भगवान, भाग्य और भटकाव। वे कहते थे कि यदि गोंडवाना को बचाना है तो कोया पुनीम दर्शन का प्रचार-प्रसार करना होगा। पुनीम का अर्थ सच्चा मार्ग है। वे कहते थे कि सच्चे मार्ग पर चलकर ही निडर, समृद्ध, खुशहाल, स्वस्थ गोंडवाना समाज बनाया जा सकता है।

वे जय सेवा, जय फड़ा पेन (जल, अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वी को सामूहिक रूप से फड़ा पेन कहा जाता है) कहने लगे। उन्होंने गांव-गांव में जय श्री राम की जगह जय सेवा कहना शुरू कराया। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक हीरा सिंह मरकाम का मानना था कि शिक्षा गोंड आदिवासियों के लिए सबसे जरूरी ऐसी शिक्षा है जो सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से उत्कृष्ट बनाएं।

दादा गोंडवाना के इलाके में 10 गोटूल (आधुनिक शिक्षा केंद्र) शुरू करना चाहते थे। वे कहते थे कि शिक्षा का उद्देश्य श्रमसेवा होना चाहिए। स्वयं जियो और हजारों लाखों को जीवन दो, शोषण विहीन समाज की रचना करो। असल में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी आदिवासी क्षेत्रों में तो दादा के कारण काफी लोकप्रिय रही, लेकिन संगठन का राजनीतिक वैचारिक काम बहुत कम हुआ। कार्यक्रम मुख्य तौर पर गोंडवाना संस्कृति के इर्द-गिर्द होते थे, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी शामिल हुआ करते थे। पार्टी के गठन के बाद से जितने भी चुनाव हुए पार्टी चुनाव लड़ी, लेकिन हर बार गठबंधन के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों के साथ प्रयास होते थे।

संसाधनों को लेकर चर्चा होती थी पार्टी की संसाधन विहीनता का लाभ कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों ने जब जैसा मौका मिला लाभ उठाया, लेकिन दोनों ही पार्टियों ने कभी भी सम्मानजनक गठबंधन गोंगपा के साथ नहीं किया। इसका परिणाम यह रहा कि हर चुनाव के बाद पार्टी बिखरती और कमजोर होती रही। मनमोहन शाह बट्टी एवं कई नेता पार्टी से जुड़े और टूटे। गोंगपा के कई धड़े मध्य प्रदेश में सक्रिय हुए बाद में दादा के साथ  मिल गए।

दादा के देहांत ने केवल गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के सामने ही अस्तित्व का संकट खड़ा नहीं किया, बल्कि आदिवासियों का प्रखर नेतृत्व करता फिलहाल कोई दिखलाई नहीं देता। आज आदिवासियों की एक अलग पहचान और खोई प्रतिष्ठा के प्रति जो जागरूकता और भूख दिखाई दे रही है, इसमें दादा जी का अतुलनीय योगदान रहा है । दादा जी का आदिवासी समाज सदा ऋणी रहेगा।

मनमोहन शाह बट्टी जी भी लंबी बीमारी के समय मुलाकात के लिए आए थे, उसके बाद कोरोना से उनकी रहस्यमयी मौत हो गई। एक के बाद एक गोंडवाना के दोनों नेताओं की मौत ने गोंडवाना की राजनीति में ठहराव पैदा कर दिया है, लेकिन जो जागरूकता दादा ने आदिवासियों के बीच पैदा की है वह लगातार आदिवासियों को प्रेरणा देते रहेगी।

(डॉ. सुनीलम समाजवादी नेता हैं और आप मध्य प्रदेश विधानसभा में विधायक भी रह चुके हैं।)

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This post was last modified on October 30, 2020 1:32 pm

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