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हिन्दी दिवस: समावेशी संस्कृति की जीवन रेखा है हिन्दी

डॉ. राजू पाण्डेय

देश की 78 प्रतिशत आबादी आसानी से हिन्दी बोल-समझ लेती है। अपने देश में लोकप्रियता के मामले में हिन्दी चीन की मंदारिन को पीछे छोड़ देती है जिसे केवल 62 प्रतिशत चीनी ही समझ और बोल पाते हैं। दरअसल चीन में प्रचलित 56 बोलियां अथवा उपभाषाएं मंदारिन से नितांत भिन्न हैं। हमारे देश में हिन्दी बोलने वालों की संख्या बढ़ी है। सन 2001 से 2011 के मध्य 10 करोड़ नए लोगों ने हिंदी बोलना प्रारंभ किया और वर्तमान में हिन्दी को मातृ भाषा मानने वालों की संख्या 52 करोड़ है। 2011 की जनगणना के अनुसार हिन्दी 43.63 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा बन गई है जो 2001 के 41.03 प्रतिशत से लगभग ढाई प्रतिशत अधिक है।

हिन्दी विश्व भाषाओं में उपयोगकर्ताओं की संख्या की दृष्टि से कौन से स्थान पर है यह विवाद का विषय रहा है। कई विद्वान विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली मंदारिन के संबंध में चीन द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों को संदेहास्पद बताते हैं। इनके मतानुसार मानकीकृत चीनी भाषा का दर्जा मंदारिन को प्राप्त है किंतु चीन सरकार अपने आंकड़ों में गुआन (उत्तरी मंदारिन), वू, यू, मीन, शियान, हाक्का और गान बोलियों अथवा उपभाषाओं के प्रयोगकर्ताओं के समेकित आंकड़े प्रस्तुत करती है। टोकियो विश्विद्यालय के प्रो. होजुमी तनाका ने 1999 में यांत्रिक अनुवाद पर केंद्रित एक संगोष्ठी में मंदारिन को प्रथम और हिन्दी को द्वितीय स्थान दिया था। जबकि डॉ. जयंती लाल नौटियाल ने अपने विभिन्न शोधों से हाल के वर्षों में यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि हिन्दी अब संख्यात्मक दृष्टि से प्रथम स्थान पर आ गई है।

अंग्रेजी भले ही अब संख्यात्मक दृष्टि से पिछड़ रही है लेकिन इसके वैश्विक दबदबे को सब स्वीकार करते हैं और इसके रुतबे से भयभीत भी होते हैं। हम हिंदुस्तानी यह गर्व से कह सकते हैं कि हिन्दी कभी भी शोषकों की भाषा नहीं रही। यह कभी भी उपनिवेशवाद के समर्थन में खड़ी नहीं दिखती। यह धर्मप्रचारकों का औजार भी कभी नहीं रही। हिन्दी के जितने भी बोलने-लिखने-जानने वाले हैं हिन्दी उनके हृदय की भाषा रही है। विश्व के जिस भी देश में हिंदुस्तानी लोग पहुंचे -मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो-कभी बतौर श्रमिक और कभी बतौर व्यापारी- अपने परिश्रम एवं प्रतिभा से उन्होंने उस देश को समृद्ध किया तथा हिन्दी को न केवल जीवित रखा बल्कि वैश्विक स्वरूप भी दिया। आज जब हम हिन्दी को भविष्य की विश्व भाषा के रूप में देखते हैं और विश्व आर्थिक मंच हिन्दी को विश्व की दस सबसे शक्तिशाली भाषाओं में शुमार करता है तो इसका कारण यह है कि हमारे देश का युवक वैश्वीकण के इस दौर की व्यापारिक-वाणिज्यिक-वैज्ञानिक गतिविधियों को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है- हिन्दी इस प्रतिभावान युवक की भाषा ही नहीं उसका संस्कार है,उसकी तहजीब है जो उसे पूरी दुनिया को अपना परिवार समझने की सीख देती है एवं पूरा विश्व भी इस बात की तसदीक करता है कि हम उदार और सहिष्णु हैं क्योंकि हम हिंदुस्तानी हैं।

कई बार इस बात का भय होता है कि कहीं हिन्दी को सम्मान दिलाने की हमारी कोशिशों के मूल में उसे अंग्रेजी के समकक्ष खड़ा करने की आकांक्षा तो नहीं है ? हिन्दी, अंग्रेजी का स्थान ले ही नहीं सकती और ले भी क्यों ? औपनिवेशिक गुलामी से संघर्ष में हिन्दी की उल्लेखनीय भूमिका रही है। रामविलास शर्मा ने सर्वप्रथम हिन्दी नवजागरण शब्द का प्रयोग करते हुए यह रेखांकित किया कि भक्ति कालीन लोकजागरण आम जनता की आवाज़ था जबकि उपनिवेशवाद से आक्रांत भारत का नवजागरण उच्च शिक्षा प्राप्त मध्यवर्ग द्वारा संचालित था और इसका प्रभाव कुछ शहरों तक सीमित था। भले ही इसमें अंग्रेज शासकों के राजनीतिक विरोध का स्वर बहुत क्षीण था किंतु सामाजिक-धार्मिक जागृति लाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कुछ विद्वानों ने यह रेखांकित किया है कि हिन्दी नवजागरण में समाज सुधारकों से अधिक साहित्यकारों की भूमिका देखने में आती है। पराधीन भारत में स्वातंत्र्य चेतना की उत्पत्ति और विकास को हिन्दी पत्रकारिता तथा साहित्य से गुजर कर ही देखा-समझा जा सकता है। स्वाधीनता संग्राम के शीर्ष नेताओं-  महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और इन जैसी कितनी ही विभूतियों का हिन्दी प्रेम हिन्दी को मुक्ति और स्वाधीनता की भाषा बना देता है।

हिन्दी सहयोग और सहकार की भाषा है। हिन्दी भाषी इतना उदार हैं कि वह अपनी भाषा को लेकर कभी हिंसक नहीं होता। वह भाषा की राजनीति नहीं करता। अपनी इसी उदारता और विनम्रता के कारण ही हिन्दी विरोधियों से भी अपने लिए आदर अर्जित कर लेगी। यदि हमारा हिन्दी प्रेम हिन्दी का आधिपत्य स्थापित करने की ओर अग्रसर होने लगा तो क्षेत्रीय भाषाओं के साथ टकराव के अवसर भी बढ़ेंगे।

हिन्दी का तत्समीकरण शायद उसे अन्य भारतीय भाषाओं- विशेषकर दक्षिण की भाषाओं के निकट ला सकता है किंतु यह उसे लोकव्यवहार की हिन्दी से बहुत दूर ले जाएगा। संस्कृतनिष्ठ होना शुद्ध हिन्दी की पहचान नहीं है। हिन्दी के विकास और प्रकृति को समझने के लिए केवल संस्कृत के साथ उसके संबंधों का विवेचन काफी नहीं। संस्कृतनिष्ठ हिंदी को पवित्र समझना उसी प्रकार अनुचित है जिस प्रकार फ़ारसी बहुल उर्दू को असली उर्दू मानना गलत है। हमारे बोलचाल की भाषा में हिन्दी और उर्दू की सीमा रेखा मिट जाती है। भाषा की शुद्धता का विचार जब हिन्दी को हिंदुओ और उर्दू को मुसलमानों की भाषा बनाने की ओर अग्रसर होता है और धार्मिक अस्मिता के साथ जुड़ता है तब यह विभाजनकारी रूप ले लेता है।

किसी भाषा को अपनी शक्ति, सामर्थ्य, स्वीकार्यता, प्रामाणिकता और व्यापकता के निरंतर प्रदर्शन करने पर ही शासन तंत्र के काम-काज की भाषा होनी चाहिए। इन कसौटियों पर हिन्दी एकदम खरी उतरती है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने सर्वसहमति से हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने का निर्णय लिया। किन्तु हमारे देश में विडम्बना यह है कि हिन्दी जनता की चहेती और दुनिया की लाडली तो है लेकिन सत्ताधीश तथा सरकारी अफसर जनता को जिस तरह हीन समझते हैं उसी प्रकार हिन्दी को भी उपेक्षापूर्ण दृष्टि से देखते हैं। अंग्रेजी अभी भी सत्ता को प्रिय है और शोषण का औजार बनी हुई है।

हिन्दी को शासन तंत्र में प्रवेश देने से रोकने के लिए जो युक्तियां अपनाई जाती हैं वह बचकानी होते हुए भी बहुत कारगर रही हैं। कभी हिन्दी में प्रशासनिक शब्दावली के अभाव का अस्वीकार्य तर्क दिया जाता है फिर हिन्दी की शुद्धता के दुराग्रह को मूर्खता की सीमा तक खींचते हुए हास्यास्पद प्रशासनिक शब्दावली के निर्माण के लिए वर्षों का समय लगाया जाता है। हिन्दी अपने ही देश में इतनी पराई हो गई है कि इसके प्रयोग हेतु प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ने लगी है।

हिन्दी के प्रति अविश्वास और आत्महीनता की भावना के दर्शन समाचार पत्रों और टीवी चैनलों की उन सुर्खियों में होते हैं जिनमें हमारे नेताओं द्वारा विश्व मंच पर हिन्दी में दिए गए भाषणों को उनके व्यक्तित्व की विलक्षण विशेषता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जबकि सुर्खियां तब बननी चाहिए थीं जब हिंदुस्तानी नेता अपनी भाषा छोड़कर अंग्रेजी में भाषण देते। विश्व हिन्दी सम्मेलनों में हिन्दी की शान में कई बार अंग्रेजी में कसीदे पढ़े जाते हैं। न ही वह इन सम्मेलनों में पारित उन प्रस्तावों से रंच मात्र प्रभावित होती है जिनमें हिन्दी के लिए चांद-तारे तोड़ लाने के कभी पूरे न होने वाले वादे किए जाते हैं।

हिन्दी पर बाजारवादी शक्तियों तथा नव उपनिवेशवादी व्यवस्था की प्रतिनिधि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आक्रमण को रोकने के स्थान पर नाम, पैसे और ताकत की लड़ाई में लग जाते हैं तब भी हिन्दी विचलित नहीं होती। उसे देश की आम जनता पर भरोसा जो है। हिन्दी कितनी ही धाराओं-उपधाराओं में अविराम प्रवाहित हो रही है। हिन्दी सिनेमा अपने संवादों और गीत संगीत के जरिए दुनिया के लोगों को हिन्दी का दीवाना बना रहा है। कहीं लोकप्रिय टीवी सीरियलों के पात्र कभी खालिस तो कभी अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी बोलते दिखते हैं तो कहीं समाचार चैनलों के एंकर कभी धाराप्रवाह तो कभी लड़खड़ाती हिंदी का प्रदर्शन करते नजर आते हैं। जनभाषा हिन्दी किसी शासकीय संरक्षण की मोहताज नहीं है न ही वह इतनी दयनीय है कि किसी दिन विशेष पर उसे खैरात में कुछ मीठे बोल दिए जाएं। हिन्दी हमारी उदार और समावेशी संस्कृति की जीवन रेखा है। विनम्रता हिन्दी की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत है।

(डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 30, 2018 7:48 pm

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