पूर्वाग्रहों से इतिहास और विध्वंस से पुरातत्व का निर्माण नहीं होता

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इतिहास कोई सीधी रेखा नहीं होती और इसीलिए वह कालक्रमों में लिखे होने के बावजूद अपने भीतर कई कालखंडों को समाए हुए होती है। पुरातत्व और इतिहास के बहुत सारे तथ्य और स्रोत इतिहास लेखन को बदलते रहते हैं। इतिहास की सबसे बड़ी खूबी होती है कि यह अपने भीतर से ही उन तत्वों को लेकर सामने लेकर आती है जिनसे वह बनी होती है। इसे विकास की गति कहा जाता है। यहां हम मानव समाज के इतिहास की बात कर रहे हैं जिनके अध्ययन, या यूं कहें कि अपने वजूद की तलाश और भविष्य की दिशा तय करने में, अपने वर्तमान के होने के कारणों को ढूंढ़ने में, …एक ऐसे कालक्रम और कालखंडों का निर्माण होता है जिसमें इंसान अपने होने को देख सकता है और मनुष्य होने के अहसास में वह जीव, फसल, धरती और ब्रह्मांड की उत्पत्तियों के तलाश में लग जाता।

इतिहास का अध्ययन इंसान को उसके अस्तित्व और समाज के साथ उसकी समाहिती के साथ जोड़ देता है। इतिहास एक ऐसी निर्माणकला है, जो उसके विश्व दृष्टिकोण से जुड़ी हुई और उसे बदलती रहती है। यह इंसान के साथ विकसित होती हुई एक प्रक्रिया है, जो इंसान से स्वतंत्र रूप ग्रहण करती है और उसके साथ एक द्वंदात्मक रिश्ता बनाए हुए रहती है। दोनों एक दूसरे को बदलते हैं, आगे ले जाते हैं, …वे एक दूसरे को नष्ट नहीं करते हैं।

इतिहास और इंसान के निर्माण में सबसे घातक बात पूर्वाग्रह है। जब पूर्वाग्रहों से इंसान और इतिहास का निर्माण होता है, तब वे एक दूसरे को नष्ट करना शुरू कर देते हैं। मसलन, सामंतवाद के खिलाफ हुई लड़ाईयों से जिस राष्ट्रवाद का जन्म हुआ, उसने सिर्फ इतिहास लेखन को ही नहीं बदला, उसने समाज को बदल डाला। इसने धर्म दर्शन से लेकर विज्ञान, समाज से लेकर व्यक्ति की अवधारणा को बदल डाला। समाज और इतिहास ने एक नई दुनिया का द्वार खोल दिया। अब विकास की स्थितियां राष्ट्रवाद के दौर से आगे निकल चुकी थीं। लेकिन, समाज के शासक और प्रभुत्वशाली वर्ग ने जब मानव समाज के विकास की नई स्थितियों को नकारना शुरू किया और राष्ट्रवाद को अपने पूर्वाग्रहों के चलते जोर देकर इसे बढ़ाना शुरू किया तब यह राष्ट्रवाद नहीं रहा। इसका दौर तो खत्म हो चुका था। यह समाज का नहीं सिर्फ शासकों और प्रभुत्वशाली वर्ग का राष्ट्रवाद था।

इतिहास इतने एकतरफा और पूर्वाग्रहों से निर्मित होता नहीं है। उन्होंने जोर लगाकर जिसे बनाया और राष्ट्रवाद कहा, वह फासीवाद में बदल गया। राष्ट्रवाद की जमीन पर पैदा हुआ लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं को ही खाने लग गया, उन्हें वह नष्ट करने लगा, यह आम नागरिकों को, अपने ही लोगों को बेरहमी से मारना शुरू कर दिया। यह अपने समय को पूरे समाज को, इतिहास और विज्ञान को नष्ट करने में लग गया।

विश्वयुद्ध की विभिषिका एक नये दौर में पहुंचने लगी। यह जनसमाजों और मजदूरों का संघर्ष ही था जिससे इस पर लगाम लगी। खासकर, लोकतंत्रवादी और समाजवादी-साम्यवादी लोगों ने मोर्चेबंदी किया, विध्वंस और युद्ध को रोका और समाज को सांस लेने की राहत दी। दुनियाभर में लोकशाही और साम्यवादी सत्ता का उत्कर्ष हुआ। दोनों ही स्तर पर एक बार फिर से दुनिया, देश और समाज के इतिहास को समझने, लिखने और संवाद की प्रक्रिया की शुरूआत हुई।

इस समय तक भारत में इतिहास लेखन और इतिहास निर्माण पर यूरोपीय प्राच्यवादी और अंग्रेजी हुकूमत का प्रभाव और बोलबाला था। पुरातत्व एक संयोगवश उभरकर आया विषय बन गया। सारा जोर धर्म, मिथक, भाषा और कई बार अंधविश्वासों पर था और उसी से इतिहास गढ़ा जा रहा था। राष्ट्रवाद की यूरोप में जो फासीवादी उभार हुआ था, उसका असर भारत के इतिहास लेखन पर दिख रहा था। पुराने तरह के राष्ट्रवाद के मूल्यों का प्रभाव खाने में नमक से अधिक नहीं था। एक क्षीण सी धारा समाजवाद और साम्यवाद के मूल्यों को लेकर आगे बढ़ रही थी। मार्क्सवाद का असर दिख रहा था। लेकिन, धर्म का बोलबाला इस कदर था कि इतिहास को ही इस आधार पर खंडित किया गया।

इसका असर भारत की राजनीति और फिर समाज पर आया। धर्मांधता का प्रयोग प्राच्यवादी, अंग्रेजी हुकूमत और इनकी तारीफ और आलोचना में तल्लीन सभी कर रहे थे, और कुछ अपवादों के साथ स्वीकार कर रहे थे। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भारत में जो विध्वंस और नरसंहार हुआ, जितने बड़े पैमाने पर लोग प्रवासी बने और अपनी संपत्तियां खो दीं, वह अभूतपूर्व था। यह कुछ महीनों में खत्म होने वाली प्रक्रिया नहीं थी। यह चलती ही रही और समय-समय पर यह युद्ध और नरसंहारों में बदलता रहा।

आज भी इतिहास, इतिहास लेखन, पुरातत्व और इससे जुड़ी खोजें उपरोक्त विध्वंसक धारा के साथ अलग नहीं हुई हैं। ये उससे जुड़ी हुई हैं। राष्ट्रवाद की शक्ल धर्म, देश, मिथक, अंधविश्वास और सबसे अधिक इतिहास के प्रति पूर्वाग्रहों के साथ गढ़ी जा रही है और इसे कानून, संविधान, राज्य और राज्येतर संस्थाओं और उसकी कार्यवाईयों के साथ समाज और नागरिकों पर लादा जा रहा है। इस प्रक्रिया में सिर्फ इतिहास ही नहीं, पुरातत्व को नष्ट करने तक जाया जा रहा है।

पुरातत्व को एक ऐसा काल्पनिक ढांचा बनाया जा रहा है जिसमें मध्यकाल, पूर्वमध्यकाल नहीं आता। इसमें इसके पहले का काल आता है। इसमें भी यह बौद्ध काल नहीं आता। यह महाभारत और रामायण काल और उससे भी पहले वैदिक काल तक जाता है जिसका समय मानव विकास की समयावधियों को भी पार कर पीछे चली जाती हैं। जहां मुनष्य नहीं सिर्फ ‘देवता’ बसते थे। हाल के दिनों में, रामायण और महाभारत काल खोजने के लिए पुरातात्विक खुदाईयों की बाढ़ सी आ गई है।

यह सब देश की मूल संस्कृति की खोज के लिए हो रहा है, जहां से इतिहास पैदा हुआ और यहां तक एक पवित्र धारा बनकर आया। इसे ही सनातन नाम दिया जा रहा है। इसके बाद के सारे अवशेष सिर्फ विच्युतियां, विकृतियां और विध्वंस पर आधारित निर्माण हैं। इनका कोई मूल्य ही नहीं है। वे सोचते हैं कि इन्हें हटा देने से ही मूल स्वरूप सामने आयेगा। बहुत सारे कारणों में से एक कारण यह भी है जिसकी वजह से पुरातत्वविदों का एक हिस्सा जिस तेजी से ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व की इमारतों और स्थलों की खुदाई की ओर बढ़ता है, उससे विध्वंस का खतरा ही अधिक दिखता है। संयोग से सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से कई इमारतें अधिक नुकसान की शिकार नहीं हुई। लेकिन विध्वंस की प्रक्रिया जारी है।

यहां यह समझना जरूरी है कि इतिहास विध्वंस की प्रक्रिया में बनता नहीं है और न ही समाज को आगे की ओर ले जाता है। इससे इतिहास और समाज के बीच का रिश्ता टूटता है। यह जितना टटूता है उतना ही विध्वंसक होता है और इसमें जोड़ने वाली धारा जितनी मजबूत होती है नये समाज के निर्माण की संभावना भी उतनी ही प्रबल होती है। हम जरूर ही उम्मीद कर सकते हैं कि इतिहास के विध्वंस की जो प्रक्रिया चल रही है, उसके सामानान्तर इतिहास और समाज के बीच निर्माण को संभव बनाने वाले लोग भी आगे बढ़ रहे हैं। डा. लालबहादुर वर्मा के शब्दों में इतिहास, इतिहास निर्माण के लिए सिर्फ इतिहास का पन्ना नहीं एक जीवंत दस्तावेज है।

(अंजनी कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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