‘द लिस्ट : मीडिया ब्लडबाथ इन कोविड टाइम्स’ यानी पत्रकारों पर कोरोना कहर की जिंदा दास्तान

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ऐसा माना जाता है कि पत्रकारिता एवं फिल्में समाज का आईना होती हैं। समाज में जो कुछ हो रहा होता है उसे मुकम्मल तौर पर समाज के सामने लाने की जिम्मेदारी पत्रकारिता की ही होती है। फिल्मों को कुछ हद तक क्या काफी हद तक इस अपराध से माफ किया जा सकता है कि वह समाज का आईना क्यों नहीं बन पाई ! फिल्मों की अपनी एक सीमा होती है। सामाजिक जिम्मेदारी निर्वाह करने के साथ-साथ मार्केट नाम की एक चीज होती है जिस के बोझ तले वह दबा होता है… बावजूद इसके कुछ फिल्में इस तरह से बनाई जाती हैं जो पत्रकारिता के मूल सिद्धांत और फिल्मों के उदार (सिनेमैटिक लिबर्टी ) सिद्धांत पर खरी उतरती है उनमें से एक है महेश राजपूत की शार्ट फिल्म ‘द लिस्ट : मीडिया ब्लडबाथ इन कोविड टाइम्स’।

 यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि  खुद को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ  के रूप में महिमामंडित किए जाने पर खुश होने वाला मीडिया खुद के अपने कत्लेआम पर ‘सब ठीक है’ का चश्मा लगा कर, करोना काल के पहले चरण और अब दूसरे चरण में भी खामोश है।

यह फिल्म है एक मीडिया संस्थान की जहां पर कोरोना के चलते मीडिया हाउस के नुकसान की भरपाई उस मीडिया हाउस के  कर्मचारियों की छंटनी कर करने की कोशिश की जा रही है। वह भी इस  तरीके से कि कोई पत्रकार (रिपोर्टर से लेकर रेज़िडेंट एडिटर तक) तक किसी प्रकार की चूं चां नहीं कर सकता!  दरअसल फिल्म में भले ही यह एक काल्पनिक मीडिया पब्लिकेशन विसलब्लोअर के दफ्तर की कहानी है लेकिन यह कहानी हिंदुस्तान के साथ-साथ विश्व के कई मीडिया संस्थानों के दफ्तर की कहानी है जहां पर कोरोना काल में लोगों को निर्दयता पूर्वक हटा दिया गया वजह बताई गई बिजनेस में आ रही मंदी!

 यह मास्टरपीस नहीं है, लेकिन ये रियल सी मूवी है। फिल्म के कुछ एक्टर जनरलिज्म से ही जुड़े हुए हैं। कहानी out of the box है। दर्शक पात्रों के साथ गहन जुड़ाव रखते हैं। सभी कुछ ऐसा करते हैं जो शायद सबसे महत्वपूर्ण चीज है जो एक फिल्म कर सकती है। वे हमें समय और स्थान के हमारे व्यक्तिगत बॉक्स से बाहर ले जाते हैं, और हमें उनके साथ सहानुभूति रखने के लिए आमंत्रित करते हैं। सहानुभूति सभ्यता का सबसे आवश्यक गुण है। यह निर्देशक की कामयाबी मानी जाएगी।

(यह फिल्म ओटीटी प्लेटफार्म एबीसी टाकीज़ पर देखी जा सकती है।)

(मनमोहन नौला की समीक्षा।)

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