Thursday, December 9, 2021

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बांग्ला दलित साहित्य का शब्दकोश: डॉ. सुरजीत कुमार सिंह

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“तुम जितनी ही सीख लो धनुर्विद्या,

अर्जुन सदा तुम्हारा अगूंठा काटता ही रहेगा।

क्योंकि उसके सिर पर एकाधिक,

द्रोणाचार्यों के वरद हस्त हैं”।।

— ‘लंतराई के एकलव्य’ पूर्वोत्तर के कवि विजय देववर्मा की कविता की लाइनें

(इसी पुस्तक के पृष्ठ 126 से)।

सुप्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार आदरणीय सुनील गंगोपाध्याय और हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. काशीनाथ सिंह ने इस पुस्तक के लेखक प्रो. कृपाशंकर चौबे के बारे में एक बार कहा था कि “वह बांग्ला भाषा और हिन्दी भाषा के बीच सेतु हैं और दोनों संस्कृतियों के मध्य सांस्कृतिक दूत का दायित्व भी निभाते हैं”। लेखक प्रो. कृपाशंकर चौबे वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। उन्हें महान लेखिका हजार चौरासी की माँ महाश्वेता देवी, वैश्विक करुणामयी माँ मदर टेरेसा, सुप्रसिद्ध लेखिका तसलीमा नसरीन और प्रख्यात संपादक प्रभाष जोशी का सानिध्य प्राप्त हुआ है। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया निवासी प्रो. कृपाशंकर चौबे बचपन में पिता के साथ कलकत्ता जा बसे, अब वे यहीं के हैं और बांग्ला भाषा उनकी दूसरी मातृभाषा ही है।

उन्होंने अब तक लिखी डेढ़ दर्जन पुस्तकों में से एक तिहाई लेखन अर्थात आठ पुस्तकों को बांग्ला कला संस्कृति साहित्य का परिचय हिन्दी भाषायी क्षेत्र को कराने के लिए लिखा है। उनके लेखन व चिंतन का क्षेत्र विस्तृत एवं बहुआयामी है। इसी परिप्रेक्ष्य में प्रो. चौबे ने “दलित आंदोलन और बांग्ला साहित्य” नामक 128 पृष्ठों की महत्वपूर्ण मौलिक कृति की रचना की है, कुल आठ अध्यायों में विभाजित यह पुस्तक हमें ‘बांग्ला के दलित आंदोलन और साहित्य’ को समझने में एक संदर्भ ग्रंथ का मौलिक कार्य करती है। हिन्दी भाषा में अब तक इस तरह का लेखन नहीं हुआ था कि बांग्ला क्षेत्र में हुये दलित व आदिवासी लेखन व आंदोलन को सामने प्रस्तुत करता, इस लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण कृति बन जाती है। इस पुस्तक के अध्याय हैं- दलित विमर्श की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, दलित आंदोलन और बंगाल, बांग्ला दलित काव्य का इतिहास, बांग्ला दलित उपन्यासों का इतिहास, बांग्ला दलित आत्मकथाओं का इतिहास, आदिवासी समाज और बांग्ला साहित्य, त्रिपुरा का दलित आंदोलन और दलित साहित्य, पूर्वोत्तर की जनजातीय कविता

इस पुस्तक के प्रथम अध्याय दलित विमर्श की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लेखक प्रो. कृपाशंकर चौबे दलित शब्द का अभिप्राय बताते हैं कि “दलित अर्थात दलन किया हुआ, यानी जो दबा कुचला है। मार्क्सवादी जिस शोषण की बात करते हैं, भारत का दलित उसी प्रकृत अर्थ में प्रताड़ित है, जिसे डॉ. अम्बेडकर ‘डिप्रेज्ड क्लास’ कहते हैं। भारत के दलित पूंजीपतियों द्वारा शोषित हैं और सवर्णों द्वारा विभाजित व शासित हैं। यह शोषण व शासन वर्णगत है। वर्ण के भीतर दो भाग होते हैं। एक जाति और दूसरा क्लास (श्रेणी)। क्लास और कास्ट मिलकर वर्ण बनाते हैं। ब्राह्मण कास्ट है किंतु पुरोहित क्लास कास्ट एक सामाजिक पहलू है जबकि क्लास आर्थिक पहलू है। भारत के अधिकतर दलित आज सामाजिक अन्याय के सबसे बड़े भुक्तभोगी हैं। ये श्रेणी द्वारा अनवरत शोषित है। चिरकाल से ही यह शोषण जारी है”।

प्रो. चौबे लिखते हैं कि इस शोषण से उपजे दलित विमर्श की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए बांग्ला की जो किताबें काम करती हैं, ये हैं ‘भारतवर्ष जाति भेद’ (क्षिति मोहन सेन), ‘भारतीय समाज उन्नयनधाराः डॉ. अम्बेडकर’ (स्वपन कुमार विश्वास), ‘भारतवर्षे जातउ श्रेनीर उभय संकट’ (वी. टी. राजशेखर), ‘भारतवर्षेर मूल निवासी उ आर्य आक्रमण’ (स्वपन कुमार विश्वास), “बौद्ध धर्मः सिंधु हड़प्पाकालेर भारतीय धर्म’ (स्वपन कुमार विश्वास), ‘भावना चिंता’ (नकुल मल्लिक), ‘मतुआ आंदोलन उ बांग्लार अनुन्नत समाज’ (कपिल कृष्ण ठाकुर), ‘जातेर विनाशः अम्बेडकर एवं तार अग्रजेर अवदान’ (डॉ. कनिष्क चौधरी), ‘ब्राह्मणवाद सदर दफ्तरे कामान दागो’ (अनंत आचार्य), ‘बांग्लार दलित आंदोलनेर इति वृत्त’ (संपादन –डॉ. चित्त मंडल व डॉ. प्रथमा रायमंडल) और ‘दलित साहित्य’ (संपादक नीतीश विश्वास)। आचार्य क्षिति मोहन सेन शास्त्री की किताब ‘भारतवर्षे जाति भेद’ का हिंदी अनुवाद ‘भारत वर्ष में जाति भेद’ शीर्षक से आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने प्रकाशित कराया था और उन्होंने ही उसका संपादन भी किया था। इस अध्याय में सम्पूर्ण भारत के दलित आंदोलन की चर्चा की गई है, जिसमें प्रमुख है बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के योगदान को रेखांकित करना।

     द्वितीय अध्याय “दलित आंदोलन और बंगाल” में प्रो. कृपाशंकर चौबे बताते हैं कि बंगाल में दलितों की शिनाख्त कई रूपों में हो सकती है। एक, जिसमें दलित लोग दलन के प्रतिवाद में संग्रामरत हैं, कहीं-कहीं विजय भी उन्हें मिल रही है और दूसरे, अनार्य भूमिपुत्र जो दलित के रूप में चिन्हित हैं। इसके अलावा प्राचीन इतिहास में जिन्हें आदिवासी कृष्णांग कहा गया है-आर्य शासकों ने जिन्हें बाहर का यानी बहिष्कृत भारतीय कहा है, वे भी आज दलित हैं। प्रो. चौबे लिखते हैं कि “प्राचीन भारत में जो श्रम विभाजन किया गया था, उसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य मस्तिष्क से श्रम करते थे और जो शारीरिक श्रम कर उत्पादन करते थे, उन्हें अस्पृश्य माना जाता था, वे शूद्र ही खेती करते थे। मछली की खेती, घर की साज-सज्जा करते थे। दलितों का कानूनगत विभाजन सबसे पहले ब्रिटिश शासनकाल में हुआ-ट्राइबल (आदिवासी), सेडुल्ड कास्ट (अनुसूचित जाति), अदर बैकवर्ड क्लास (अन्य पिछड़ा वर्ग), सेडुल्ड ट्राइब (अनुसूचित जनजाति) और रिलिजियस माइनारिटी (धार्मिक अल्पसंख्यक) के खानों में इन्हें विद्यासागर के समय तक अछूत माना जाता था”।

     यह पुस्तक हमें बताती है कि बंगाल के समाज में आदिकाल से ही विषमता के तत्त्व मौजूद रहे हैं और उस विषमता के खिलाफ बंगाल के दलित संग्राम भी करते रहे हैं। उस संग्राम की शुरुआत पाल शासनकाल में हुई थी। सन 1070 ई. में पाल वंश के महीपाल द्वितीय के शासन काल के खिलाफ निम्न मानी जाने वाली कैवर्त जाति के लोगों ने विद्रोह किया था।’ दिव्य नामक कैवर्त ने उसका नेतृत्व किया था। बंगाल में दलितों का वह पहला संगठित प्रतिरोध था। कैवर्तों के तीर-धनुष और वल्लभ के आगे महीपाल द्वितीय की विशाल सेना नहीं टिक पाई और महीपाल द्वितीय खुद अपनी जान भी नहीं बचा पाए। उस विद्रोह के उपरांत कैवर्त समाज ने राज गद्दी संभाली थी। संध्याकर नंदी ने अपनी किताब रामचरित में उन्हें दस्यु, कुत्सित कैवर्त नृप कहा है। नंदी ने लिखा है कि महीपाल द्वितीय प्रजा उत्पीड़क थे, इसीलिए उनके विरुद्ध कैवर्तों ने विद्रोह किया।

     प्रो. चौबे जानकारी देते हुये लिखते हैं कि “पाल वंश के समय में भी कैवर्त समाज इतना आधुनिक था कि उनके यहां दहेज प्रथा नहीं थी। तलाक व विधवा विवाह भी प्रचलित था। उत्तर बंगाल बंगाल में आज भी कैवर्त जाति के लोग हैं। उनका पेशा मत्स्य पालन व खेती है”। आगे यह पुस्तक हमें बताती है कि कैवर्त विद्रोह से शुरू हुई प्रतिरोध की वह परंपरा बाद में 1776-77 के चकमा विद्रोह से जुड़ती है। चटगांव के तत्कालीन कलेक्टर ने गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंगस को पत्र लिखकर उस विद्रोह की सूचना दी थी। उस विद्रोह का नेतृत्व शेर दौलत और रामू खां ने किया था। अंग्रेजी शासन की राजस्व उगाही के विरुद्ध हुए उस विद्रोह ने समाज के अत्यंत पिछड़े चकमा जनजाति में एका कायम की थी। चकमा लोगों ने सन 1782, 1784 और 1787 में भी आंदोलन किया था। वे सभी आंदोलन चटगांव व आसपास केंद्रित थे। बीरभूम की निचली जातियों ने सन 1788 में महाजनों तथा अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन किया। उस आंदोलन का विस्तार विष्णुपुर तक में हो गया। चकमा जनजाति की तरह गारो जनजाति ने भी 1837 से 1882 के बीच बार-बार विद्रोह किया। 1871 में फरीदपुर के गोपालगंज में नमशूद्रों ने संगठित होकर सवर्णों के अत्याचार का प्रतिरोध प्रारंभ किया। उसका नेतृत्व गुरुचंद ठाकुर ने किया था।

     इस अध्याय में प्रो. चौबे लिखते हैं कि “सन 1872 में पूर्वी बंगाल के पांच जिलों-जसोर, खुलना, फरीदपुर, बरीशाल और पावना के शूद्रों ने अस्पृश्यता के खिलाफ लगातार चार महीने तक हड़ताल की और उस दौरान किसी सवर्ण के खेत में या घर में कोई मजूरी करने से इंकार कर दिया। तब जूता पहनने, पालकी में दलित नवव्याहता के बैठने के लिए भी शूद्रों को लड़ना पड़ा। ढाका जिले के पारडगाई गांव में जूता पहनने के अधिकार के लिए शूद्रों ने जूता पहनकर ही पूरे गांव की परिक्रमा की थी। तब शूद्रों को चांडाल कहकर पुकारा जाता था। उसके खिलाफ भी उन्होंने आंदोलन किया। उस आंदोलन ने 1880-81-82 में बहुत जोर पकड़ा। बंगाल के दलितों ने सरकारी दस्तावेजों में अपनी जाति की जगह चांडाल लिखे जाने के विरुद्ध वह आंदोलन किया था। वह आंदोलन नमशूद्र आंदोलन के नाम से विख्यात हुआ।

उस आंदोलन का ही परिणाम था कि 1883 में ब्रिटिश सरकार ने चांडाल की जगह उस जाति के लोगों के नवशूद्र लिखे जाने का आदेश जारी किया। 09-09-1883 को असिस्टेंट कमिश्नर डब्लू.सी. मैकफर्सन के दस्तखत से जारी उस आदेश में कहा गया था कि जो नवशूद्र नहीं लिखेंगे, उनकी नौकरी चली जाएगी। कहने की जरूरत नहीं कि वह आदेश दलित आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि थी। नमशूद्र आंदोलन की सफलता को देखते हुए गुरुचंद ठाकुर ने 1881 में बागेरहाट के देवडांगा गांव में ईश्वरचंद्र गायेन के घर पर ऐतिहासिक नमशूद्र महासम्मेलन किया था”।

आजकल राजनैतिक क्षेत्र में मातुआ समाज की चर्चा बहुत हो रही है, इसके बारे में प्रो. कृपाशंकर चौबे महत्वपूर्ण जानकारी देते हुये लिखते हैं कि बंगाल में कपिल कृष्ण ठाकुर की पुस्तक ‘मतुआ आंदोलन उ बांग्लार अनुन्नत समाज के अनुसार चांडाल विद्रोह के बाद दलितों में नई गौरव चेतना हरिचंद ठाकुर (1882-1878) के मतुआ आंदोलन ने जगाई। बंगाल में दलितों को धर्म का अधिकार सबसे पहले हरिचंद ठाकुर ने ही दिया। उन्होंने उन्नीसवीं शती के मध्य में फरीदपुर के गोपालगंज में मतुआ धर्म की स्थापना की थी। मतुआ यानी जो मतवाले हैं। जो जाति, धर्म, वर्ण से ऊपर उठे हुए हैं। जो हिंदू रीति नहीं मानते, तंत्र-मंत्र नहीं मानते। स्वपन कुमार विश्वास की पुस्तक ‘हरि-गुरुचाँद बग्लिार चांडाल उ भरातवर्षेर बहुजन अभ्युत्थान’ के अनुसार हरिचंद ने अपने महासंघ के लोगों को दूसरों से स्नेह, एक दूसरे के प्रति सहनशीलता, स्त्री-पुरुष में समानता, जाति आधारित भेदभाव को न मानने के साथ लालची न होने की शिक्षा दी थी।

विश्वास व समर्पण का भाव रखने और किसी वैदिक कर्मकांड को नहीं मानने की शिक्षा भी उन्होंने दी। हरिचंद ठाकुर ने उन्नीसवीं शती के मध्य में फरीदपुर के गोपालगंज में मतुआ धर्म की स्थापना की और इसे कुसंस्कार मुक्त सूक्ष्म सनातन धर्म कहा था। हरिचंद ने आजीवन पिछड़ी जातियों, जनजातियों की अपने मतुआ धर्म में शामिल कर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया तब बंगाल में शूद्रों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं था। वैदिक मंत्रोच्चार का भी अधिकार नहीं था। कहने का आशय यह है कि बंगाल में जब बहुचर्चित नवजागरण आ रहा था, तो उसी के समानांतर दलितों में नवजागरण लाने का काम हरिचंद ठाकुर ने किया। हरिचंद ठाकुर ने ‘मुख में नाम, हाथ में काम और सबको शिक्षा का अधिकार’ का नारा दिया और दलितों के लिए अनेक स्कूलों की स्थापना की। अपने मतुआ धर्म महासंघ के बारे में कहा जाता था कि ‘जार दल नेई, तार बल नेई’ अर्थात जिसका दल नहीं है, उसका बल नहीं है।

प्रो. कृपाशंकर चौबे लिखते हैं कि पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में बनगांव के पास है मतुआ धर्म महासंघ का मुख्यालय। इसे ठाकुरनगर के नाम से जाना जाता है। कोलकाता से करीब 75 किलोमीटर की दूरी पर है, यहीं पर हर साल 24 मार्च को मतुआ संप्रदाय का मेला लगता है। इसे बारुनि मेला कहते हैं। इस मेले को मतुआ महासंघ के संस्थापक हरिचंद ने बांग्लादेश के उड़ाकांदी गांव में शुरू किया था। अब यह 1948 के बाद से पश्चिम बंगाल के ठाकुरनगर में लगता है। ठाकुरनगर में हरिचंद गुरुचंद ठाकुर मंदिर है। इसी मंदिर से लगा एक तालाब है, जिसे मतुआ लोग कामनासागर कहते हैं। लाखों मतुआ श्रद्धालु इस कामनासागर में स्नान करते हैं। 24 मार्च को शुरू होने वाला उत्सव हफ्ता भर चलता है। एक सप्ताह बाद बाकी संप्रदायों के लोगों को भी इस मेले में शामिल होने की इजाजत मिल जाती है। मतुआ धर्म महासंघ बंगाल में अपने डेढ़ करोड़ अनुयायियों के साथ आज भी दलितों-जनजातियों और शरणार्थियों के लिए संघर्षरत है। प्रो. चौबे लिखते हैं कि “बंगाल में आज सबसे बड़ा दलित आंदोलन मतुआ आंदोलन ही है। उसके अलावा नमशूद्र महासम्मेलन, पश्चिम बंग दलित समन्वय समिति, सहममी, उद्भास्तु फ्रंट, ऐकतान गवेषणा संसद, पौंड्र महासंघ, बांग्ला दलित लेखक शिल्पी संघ, बंगीय दलित लेखक परिषद भी दलित आंदोलन को अपने अपने ढंग से गति देते रहे हैं”।

हरिचंद ठाकुर और उनके पुत्र गुरुचंद ठाकुर के बाद उनके अनुयायियों रसीकलाल विश्वास, मुकुंद बिहारी मल्लिक, विराटचंद मंडल और विश्वदेव दास ने बंगाल के दलित आंदोलन को गति दी। उसके उपरांत बांग्लाभाषी समाज में दलितों के जागरण के लिए जिस व्यक्ति ने समर्पित होकर काम किया, उसका नाम है, जोगेंद्रनाथ मंडल, जो स्वयं नमशूद्र समुदाय से थे। उस समुदाय के हितों की रक्षा के लिए वे निरंतर आंदोलनरत रहे, इससे उनकी जनप्रियता बढ़ती गई। उनकी जनप्रियता इतनी थी कि 1937 में अविभाजित बंगाल की एसेंबली के चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में वे खड़े हुए और कांग्रेस के उम्मीदवार को हराकर विजयी हुए। जोगेंद्रनाथ मंडल पूरी तरह बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के समर्थक थे। महाराष्ट्र में डॉ. अम्बेडकर के हार जाने पर मंडल ने उन्हें बंगाल से लड़ाया और जिताया। जोगेंद्रनाथ मंडल ने डॉ. अम्बेडकर के साथ मिलकर बंगाल अनुसूचित जाति संघ की स्थापना की। नेताजी सुभाष चंद्र बोस और शरतचंद्र बोस के समर्थन से जोगेंद्रनाथ मंडल कलकत्ता कार्पोरेशन के सदस्य भी चुने गए।

यह पुस्तक हमें बताती है कि देश विभाजन के समय पूर्वी बांग्ला को पाकिस्तान में मिलाने की बात आई तो जोगेंद्रनाथ मंडल ने उसका विरोध किया। लेकिन अंततः देश विभाजन होने पर वे पूर्वी बंगाल में ही रह गए। तत्कालीन पूर्वी बंगाल में दलितों की स्थिति में सुधार लाने का सपना लेकर जोगेंद्रनाथ मंडल पाकिस्तान की पहली कैबिनेट में कानून और श्रम मंत्री बने। लेकिन लाख कोशिश कर भी जोगेंद्रनाथ मंडल अपने सपने को पूरा न कर सके। मुस्लिम लीग से उनका किस तरह मोहभंग हुआ, इसका पूरा विवरण विस्तार से उन्होंने पाकिस्तान सरकार के मंत्री पद से अपने त्याग पत्र में दिया है। अमर विश्वास द्वारा संपादित पुस्तक ‘जोगेंद्रनाथ मंडल भारतीय राजनीतिर स्वतंत्र अध्याय’ में संकलित कपिल कृष्ण ठाकुर के लेख का शीर्षक है-भारतीय राजनीतिर ट्रैजिक नायक।

इस लेख में ठाकुर ने बताया है जिस व्यक्ति ने पूर्वी व पश्चिमी बंगाल में दलितों के उद्धार के लिए। बहुविध और आजीवन प्रयास किया, उसके बारे में विरोधियों ने तरह-तरह से दुष्प्रचार किए। पूर्वी बंगाल में अनुसूचित जातियों समेत हिंदुओं पर मुस्लिमों व शासन का हमला बढ़ता गया तो पाकिस्तान सरकार में कानून व श्रम मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद जोगेंद्रनाथ मंडल पश्चिम बंगाल आए और वामपंथियों के सहयोग से डॉ. अम्बेडकर की रिपब्लिकन पार्टी के लिए काम करते रहे। सन 1968 में बनगांव में पार्टी के लिए प्रचार करते हुए ही उनकी तबीयत खराब हुई और वे चल बसे। जोगेंद्रनाथ मंडल जैसे नेताओं और मतुआ धर्म महासंघ के प्रयासों से बंगाल में दलित आंदोलन सिर्फ कोलकाता व आसपास ही नहीं फैला, उसका विस्तार सुदूर जिलों तक में पहुंच गया।

इस पुस्तक में प्रो. कृपाशंकर चौबे लिखते हैं कि सन 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में कुल आबादी के 28.5 प्रतिशत दलित और 5.8 प्रतिशत आदिवासी हैं। दलितों में चार जातियां- राजवंशी, नमशूद्र, बागदी और पौंडू क्षत्रिय वृहत्तम हैं। बंगाल के दलितों में राजवंशी 18.3 प्रतिशत, नमशुद्र 17.4, बागदी 14.8 और पौंड्रक्षत्रिय 12 प्रतिशत हैं। इन दलितों में अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल नहीं है, जबकि बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग के ए ग्रुप में मुस्लिम दलित ही आते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग भी दलित है और इसीलिए पश्चिम बंगाल में दलित शब्द का वही अभिप्राय नहीं होता, जो दूसरे प्रदेशों में होता है। इस तरह बंगाल में दलित शब्द व्यापक अर्थों में प्रयुक्त होता है। अन्य पिछड़ा वर्ग को जोड़ने पर यहां दलितों की संख्या काफी बढ़ जाती है। कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व संयुक्त कुलसचिव नीतीश विश्वास की पुस्तिका ‘भारते बांगाली दलितेर समस्या’ में तो बंगाल में दलितों की संख्या कुल आबादी का 82 प्रतिशत बताया गया है। प्रो. चौबे की चिंता है कि बंगाल में बड़ी आबादी होने के बावजूद नौकरी में भी 10% और उच्च नौकरी में 6% ही हैं पश्चिमी बंगाल सरकार की नौकरियों में आरक्षण 1995 के बाद शुरू हुआ वह भी वामपंथी सरकार के शासन के दौर की बात है।

बांग्ला दलित काव्य का इतिहास नामक अध्याय में बताया गया है कि बांग्ला कविता की एक हजार साल की लंबी, बहुआयामी और समृद्ध परंपरा रही है। बांग्ला कविता की यात्रा दसवीं शताब्दी से शुरू होकर मध्य और आधुनिक काल होते हुए आज जहां पहुंची है, उसकी परिणति सहज स्वाभाविक है। इतिहास गवाह है कि आदिकाल से ही समाज विषमता थी। मनु के परवर्ती टीकाकारों के मुताबिक बंगाल में सेन युग के समय से ही मुख्यतः दो ही जातियां प्रचलित थीं। एक ब्राह्मण और दूसरा अब्राह्मण यानी शूद्र ‘यम संहिता’ में कहा गया है-‘युगे जघन्ये द्वे जाति ब्राह्मणः शूद्र एवच’ बांग्ला कविता के आदि काल में ही दलित साहित्य की नींव पड़ गई थी। बौद्ध धम्म व दर्शन के प्रभाव को रेखांकित करते हुये इस पुस्तक में प्रो. कृपाशंकर चौबे लिखते हैं कि बांग्ला में पहला दलित साहित्य प्रायः एक हजार वर्ष पहले बौद्ध सहजिया कवियों द्वारा रचित ‘चर्यापद’ को माना जाता है।

इस तथ्य का संधान हरप्रसाद शास्त्री ने 1907 में नेपाल दरबार ग्रंथागार में पाया था। उन्होंने 1916 में प्रकाशित अपनी किताब ‘हजार बछरेर बांग्ला भाषाय बौद्ध गान उ दोहा’ में इसका विवरण दिया है। ‘चर्यापद’ में कुल 51 पद थे किंतु उसकी प्रति तैयार करने के लिए नकल करते समय कुछ पृष्ठ नष्ट हो गए। ‘चर्यापद’ के अलावा बांग्ला में पुकारवचन व खननवचन संबंधी काफी पद मिलते हैं। ये पद मुख्यतः बौद्ध धर्म के प्रभाव में रचे गए हैं। इनमें जी तोड़ मेहनत करने वाले निचली जाति के मनुष्यों के श्रम को महत्त्व दिया गया है-‘धर्म करिते हबे जानि। पोखारी दिया राखिबो पानी।’ ‘चर्यापद’ तथा पुकार व खननवचन के बाद तीसरा चरण है-‘प्रवाद’ व ‘छड़ा। बांग्ला में एक खास तरह के छंद को छुड़ा कहते हैं। इसमें भी हाशिए के समाज का मार्मिक चित्रण मिलता है कि ‘एक कन्या ना खेये बापेर बाड़ी जान।’ चौदहवीं शताब्दी में बांग्ला मनीषी चंडीदास ने कहा था, ‘सुनो ह मानुष भाई। सबार ऊपोरे मानुष सत्य। ताहार ऊपोरे नाई।’

इस पुस्तक के ‘दलित बांग्ला उपन्यासों का इतिहास’ नामक अध्याय में दलित बांग्ला उपन्यासों के इतिहास का एक विस्तृत विवरण प्रो. कृपाशंकर चौबे द्वारा दिया गया है। वे लिखते हैं कि उपन्यास आधुनिक काल की बहुपठित विधा है। बांग्ला उपन्यास की यात्रा उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में आरंभ हुई । बांग्ला में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की उंगली पकड़कर उपन्यास ने जीवन पाया था, किंतु उनके उपन्यासों के पात्र ऊंचे वर्ग के थे। शरतचंद्र के उपन्यासों में निचले वर्ग की महिलाओं के जीवन का थोड़ा भाष्य मिलता है। शैलजानंद मुखोपाध्याय, प्रबोध कुमार सान्याल, नरेशचंद्र सेनगुप्त और जगदीशचंद्र के उपन्यासों में भी दलित पात्र उपस्थित हुए। मानिक बंद्योपाध्याय, ताराशंकर बंद्योपाध्याय और विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यासों में भी दलित पात्र आए, किंतु दलितों की वह खंडित उपस्थिति है। दलित जीवन की समग्र उपस्थिति बांग्ला उपन्यास में पहली बार ‘तितास एकटि नदीर नाम’ में ही दर्ज हुई। इसीलिए ‘तितास एकटि नदीर नाम’ को बांग्ला के पहले दलित उपन्यास का दर्जा हासिल है। इसके लेखक अद्वैत मल्ल बर्मन खुद दलित मालो समुदाय से थे। सन 1956 में जब यह उपन्यास छपा था, तब तक अद्वैत मल्लबर्मन की अकाल मृत्यु हो चुकी थी। वर्णव्यवस्था और उसके भीतर से पैदा होने वाली सामाजिक विकृतियों का मुखर प्रतिरोध इस उपन्यास को नया परिप्रेक्ष्य देता है।

‘बांग्ला दलित आत्मकथाओं का इतिहास’ नामक अध्याय में लिखा है कि आत्मकथा निःसंदेह सर्जनात्मक अभिव्यक्ति की अत्यंत शक्तिशाली विधा है। दलित विमर्श को गतिशील बनाने में इस विधा की बहुत बड़ी भूमिका रही है। दलित विमर्श के जोर पकड़ने के पहले ही 1959 में बांग्ला में पहली दलित आत्मकथा प्रकाशित हो गई थी। बांग्ला साहित्य में पहली दलित आत्मकथा चार खंडों में है, ‘दीनेर आत्मकाहिनी या सत्य परीक्षा’, इसके लेखक राइचरण सरदार हैं। राइचरण सरदार ने ‘पौंड़ क्षत्रिय समस्या’ और ‘श्रीमनमहाप्रभुर कृपा पात्र आर्यपुंडु’ शीर्षक दो दूसरी किताबें भी लिखी थी किंतु चर्चित हुए वे अपनी आत्मकथा ‘दीनेर आत्मकाहिनी वा सत्य परीक्षा’ से ही। इस आत्मकथा में महात्मा गांधी और राजेंद्र प्रसाद का पत्र व्यवहार भी है और दोनों नेताओं के जवाब में जस के तस उद्धृत किए गए हैं। यह उनके जीवनकाल में नहीं छप सकी, सन 1959 में छप पाई। उसका पुनर्प्रकाशन 2012 में दलित लेखक प्रो. सनत कुमार नस्कर ने करवाया है।

इस अध्याय में प्रो. कृपाशंकर चौबे आगे लिखते हैं कि राइचरण सरदार के बाद बांग्ला में डॉ. मनोरंजन सरकार की आत्मकथा ‘एकजन दलितेर आत्मकथा’, वनमाली गोस्वामी की आत्मकथा ‘अबर बेलाय पाड़ी’, धीरेंद्रनाथ • विश्वास की ‘पितृ स्मृति’, यतीन बाला की ‘शिकड़ छेड़ा जीवन’, मनोहर मौलि विश्वास की आत्मकथा ‘आमार भुवने आमि बेंचे थाकी’ मनोरंजन व्यापारी की आत्मकथा ‘इतिवृत्ते चांडाल जीवन’ और कल्याणी ठाकुर की आत्मकथ ‘आमि केनो चांडाल लिखी’ प्रकाशित हुई। इसके अलावा डॉ. अनिल रंजन विश्वास की ‘रंग बिरंगेर दिन गुली” और ‘आमार छेलेबेला’’, विमलेंदु मल्लिक की ‘चेना मुख अचेना मानुष”, सनातम सरकार की ‘आत्मगाथा’, मनोरंजन बड़ाल की मने पोड़े” और प्रो. जगबंधु विश्वास की आत्मकथा ‘स्मृतिर पाता थेके भी बांग्ला में उल्लेखनीय दलित आत्मकथाएं रही हैं। वनमाली गोस्वामी (1894-1976) ‘अबर बेलाय पाड़ी’ में बताते हैं कि उनके दलित परिवार में अंधविश्वास का आलम यह था कि उनके पिता को लगता था कि उनके वंश में कोई पढ़ाई करेगा तो मर जाएगा। जबकि तथ्य यह था कि गांव में लोग मलेरिया से अमूमन मरते थे। वनमाली गोस्वामी पढ़ना चाहते थे किंतु उनके पिता पेंसिल और खाता तक खरीदकर देने को तैयार नहीं थे।

‘आदिवासी समाज और बांग्ला साहित्य’ नामक अध्याय में प्रो. चौबे लिखते हैं कि 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल की आबादी के 5.80 प्रतिशत आदिवासी हैं और उनकी प्रमुख भाषा संथाली है। संथाली भाषा का इतिहास बहुत पुराना है। चर्यापदों में संथाली के कई शब्दों के प्रयोग मिलते हैं। आधुनिक काल में संथाली में उन्नीसवीं सदी के आखिर में माझी रामदास दुडू ने ‘खेरवाल बोंसा धरम पुथि’ नामक ग्रंथ की रचना कर संथाली के महत्त्व को प्रतिपादित किया। उसके बाद 1936 में पॉल झुझार सोरेन ने ‘ओनोड्हें बाहा डालवाक’ नामक कविता संग्रह प्रकाशित किया। साधु रामचंद मुर्मू ने संथालीभाषी समाज में अपनी भाषा व संस्कृति के गौरव का गान किया। पश्चिमी मेदिनीपुर के कामारबंदी गांव में जन्मे साधु रामचंद मुर्मू संथाली के महाकवि माने जाते हैं। सांस्कृतिक अस्मिता, सांस्कृतिक मूल्य और समाज सुधार को उपजीव्य बनाकर उन्होंने कविताएं, निबंध और नाटक लिखे। ‘धरम सेरेंग पुथि’ (दो भाग), ‘लीटा गोडेक’, ‘ओल दोहो अनरहे’ और ‘इसरोड़’ उनकी प्रसिद्ध कृतियां हैं। साधु रामचंद मुर्मू ने अपनी एक कविता में संथालीभाषियों का आह्वान किया कि वे अपने मन को दूसरे के मन से जोड़ें।

इस पुस्तक के ‘त्रिपुरा का दलित आंदोलन और दलित साहित्य’ नामक अध्याय में प्रो. चौबे ने त्रिपुरा के दलित आंदोलन और दलित साहित्य पर महत्वपूर्ण लेखनी चलाई है। वे लिखते हैं कि “त्रिपुरा का इतिहास बहुत पुराना है। उसे त्रिपुरा नरेश के बारे में ‘राजमाला’ गाथाओं तथा मुसलमान इतिहासकारों के वर्णनों से जाना जा सकता है। त्रिपुरा का उल्लेख महाभारत, पुराणों तथा अशोक के शिलालेखों में भी मिलता है। आजादी के बाद भारतीय गणराज्य में विलय के पूर्व यहां राजशाही थी। कहा जाता है कि राजा त्रिपुर, जो ययाति वंश के 39 वें राजा थे, उनके नाम पर इस राज्य का नाम त्रिपुरा पड़ा। एक मत के मुताबिक स्थानीय देवी त्रिपुर सुन्दरी के नाम पर यहाँ का नाम त्रिपुरा पड़ा। एक अन्य मत के मुताबिक यह शब्द स्थानीय काकबरक भाषा के दो शब्दों का मिश्रण है-त्वि और प्रा। त्वि का अर्थ होता है पानी और प्रा का अर्थ है निकट। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में यह समुद्र (बंगाल की खाड़ी) के इतने निकट था कि इसे इस नाम से बुलाया जाने लगा।

राजमाला के अनुसार त्रिपुरा के शासकों को ‘फा’ उपनाम से पुकारा जाता था, जिसका अर्थ ‘पिता’ होता है। माणिक्य वंश के राजाओं ने लगभग पांच सौ वर्ष तक यहां राज किया। उन राजाओं को जब-तब जनजातियों के तीव्र प्रतिरोध का भी सामना करना पड़ा। राज सत्ता के शोषण व अत्याचार के खिलाफ सन 1850 में त्रिपुरा की जनजातियों ने विद्रोह किया था जिसकी कमान परीक्षित एवं कीर्ति नामक आदिवासी युवकों ने संभाली थी । उस विद्रोह के बाद कुछ समय के लिए राज सत्ता का अत्याचार जरूर थम गया था। सन 1850 के उस विद्रोह को तिप्रा विद्रोह के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरा की जमातिया जनजातियों ने 1863 में राज सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया था, जिसे जमातिया विद्रोह के नाम से जाना जाता है। राज्य की कुकी जनजातियों ने राज सत्ता के खिलाफ 1844 से लेकर 1890 तक संग्राम किया जिसे कुकी विद्रोह के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरा की रियांग जनजातियों ने भी 1942 में विद्रोह कर राज सत्ता तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद का प्रतिरोध किया था।”

यह पुस्तक बताती है कि त्रिपुरा में दलित आंदोलन और दलित साहित्य का स्वर्णिम युग अनिल सरकार के द्वारा आया। समाज सेवा के लिए अम्बेडकर एक्सेलेंसी अवार्ड भी त्रिपुरा में प्रदान किया जाने लगा। त्रिपुरा में सरकारी तौर पर 14 अप्रैल से अम्बेडकर जयंती पखवाड़ा पंद्रह दिन का मनाया जाता है। संगोष्ठियों की जाती है। व्याख्यान दिए जाते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। प्रो. कृपाशंकर चौबे लिखते हैं कि त्रिपुरा के हर समुदाय के अपने नृत्य की प्रस्तुति होती है, जैसे रियांग का होजागिरि नृत्य, त्रिपुरी का गडिया, झूम, मालमिता, मसक सुमनी और लेबांग चूमनी, चकमा का बीजू, लुसाई का केर और वेल्कम, मलसुम का हाई-हाक, गारो का बंगाला, मोग का संगरेका चिमिथांग, पडिशा और अभंगमा, कटई और जमतिया का गडिया, बंगाली समुदाय का गंजन, धर्मेल, सरी क्विज प्रतियोगिताएँ अम्बेडकर फुटबाल व कबड्डी प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है। पूरा त्रिपुरा पखवाड़े भर के लिए अम्बेडकरमय हो जाता है। आज त्रिपुरा का बच्चा-बच्चा अम्बेडकर को जान गया है।

त्रिपुरा सरकार के कार्यों के कारण दलितों व जनजातियों में आत्म-सम्मान का बोध बढ़ा है। इसके साथ ही हर दलित व आदिवासी छात्र के पढ़ने, आगे बढ़ने और उसे रोजगार का अवसर उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण कार्य त्रिपुरा प्रशासन ने किया। आरक्षण को कड़ाई से लागू कराया त्रिपुरा की लगभग आधी आबादी अनुसूचित जाति और आदिवासियों की है। 2011 की जनगणना के अनुसार त्रिपुरा की कुल आबादी में 17.80 % दलित और 31.80 % आदिवासी हैं। पहले दशरथ देव जनजातियों के एकछत्र नेता थे, परवर्ती काल में अनिल सरकार त्रिपुरा के दलितों आदिवासियों के एकछत्र नेता रहे।

इस पुस्तक में अंतिम व आठवाँ अध्याय पूर्वोत्तर की कविताओं के नाम से है। इसमें पूर्वोत्तर की जनजाति कविताओं के नाम से कविताओं का उल्लेख किया गया है और प्रमुख कविताओं की कुछ पंक्तियाँ हिन्दी अनुवाद के रूप में दी गई हैं। इसमें लेखक प्रो. कृपाशंकर चौबे ने उत्तर पूर्व की पहचान को सामने रखने का काम किया है और वहां की कविताओं को उन्होंने हिंदी अनुवाद के रूप में प्रस्तुत किया है, जो प्रशंसनीय कार्य है। कुल मिलाकर यह पुस्तक बांग्ला दलित आंदोलन के इतिहास और दलित साहित्य को बहुत विस्तार से रेखांकित करती है और इस विषय पर हिन्दी में एक महत्वपूर्ण शोधपरक शब्दकोश बन गई है। इसके लिए प्रो. कृपाशंकर चौबे ने एक अनछुए विषय पर बहुत ही मनोयोग से मौलिक पुस्तक लिखकर सराहनीय कार्य किया है।

(डॉ. सुरजीत कुमार सिंह, पूर्व प्रभारी निदेशक एवं सहायक प्रोफेसर, डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र व डॉ. अंबेडकर अध्ययन केंद्र, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र)

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