Saturday, October 16, 2021

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श्रद्धांजलि: अपनी किताबों के साथ हमेशा जिंदा रहेंगे लाल बहादुर वर्मा

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पापा नहीं रहे…( डॉ. लाल बहादुर वर्मा )

17 मई, 2021 की भोर जगने के कुछ देर बाद कॉमरेड सत्यम वर्मा के एक लाइन के इस फेसबुक पोस्ट के पहले तीन शब्द पढ़ते ही सभी की तरह समझ गया कौन नहीं रहे। तत्काल समझ नहीं सका उन्होंने अपने पिता का नाम कोष्ठक में क्यों डाल दिया। वह भारत की अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू की एकमेव त्रिभाषी न्यूज एजेंसी, यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई) में हमारे पत्रकार सहयोगी ही नहीं उसके ट्रेड यूनियन आंदोलनों में और दिल्ली, लखनऊ और अन्यत्र भी सामाजिक सरोकार के अनेक जनसंघर्षों में भी कामरेड इन आर्म्स रहे हैं।

पिता की मृत्यु पर पुत्र के दुख को कोई भी समझ सकता है। हम कुछ ज्यादा समझते हैं। वे हमारे पिता तो नहीं थे। पर इतिहास के गुरु स्वरूप थे। भारतीय समाज में गुरु का दर्जा शायद पिता से भी बड़ा होता है। उनका देहरादून के एक अस्पताल में कोविड संक्रमण उपचार चल रहा था। कोरोना से ठीक होने के बाद उन्हें किडनी की पुरानी बीमारी ने घेर लिया। रविवार रात उनकी डायलसिस होनी थी जो किसी वजह से नहीं हो सकी। देर रात उनका निधन हो गया।

सत्यम जी से मिली खबर के कुछ देर बाद मीडिया विजिल के संस्थापक सम्पादक डाक्टर पंकज श्रीवास्तव के फेसबुक पोस्ट पर नजर पड़ी। उसमें लिखा था: नहीं रहे गुरुवर प्रो.लाल बहादुर वर्मा….! बीती रात साढ़े तीन बजे दिल दग़ा दे गया। कई दिनों से देहरादून के एक अस्पताल में कोविड से जूझ रहे थे। अभी कुछ और लिखना मुश्किल है। पर, सफ़र जारी रहेगा सर, वादा है आपसे।

व्यक्तिगत संस्मरण

दिवंगत लाल बहादुर वर्मा से आखिरी मुलाकात 2018 की एक शाम नई दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में हुई थी जहाँ उन्हें पंकज श्रीवास्तव साथ लाए थे। हमारी उनसे पहले भी एक बार 1998 में लखनऊ में कलाकर्मी साथी आदियोग और अलका प्रभाकर के घर हुई थी जहाँ उन्हें समकालीन तीसरी दुनिया के सम्पादक आनंद स्वरूप वर्मा वैकल्पिक मीडिया पर दोनों के नये अभियान के सिलसिले में लाये थे। हमने उस वैकल्पिक मीडिया अभियान का जिक्र भारत की नरेंद्र मोदी सरकार के बनाये नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में देश भर में चले जबर्दस्त जन आंदोलन के दौरान हिंदी मासिक, समयांतर में ‘पीपुल्स मीडिया की जरुरत “ शीर्षक अपने आलेख में बहुत विस्तार से किया है।

रेड गार्ड्स

इतिहासकारों के इन अवामी इतिहासकार के साथ पंकज श्रीवास्तव के प्रेस क्लब में करीब एक घंटे की बातचीत के बारे में ठीक से कभी लिख नहीं सका। आज भी नहीं लिख सके तो कब लिखेंगे वो बातें जो इतिहास की ही बात है ?  उस भेंट में बातों बातों में समकालीन इतिहास की परतें खुलती गईं। हमने कहा : हम दो जनवरी 1990 को सफदर हाशमी की निगमबोध घाट के इलेक्ट्रिक क्रीमेटोरियम में अंत्येष्टि के लिए नई दिल्ली के 9 रफी मार्ग स्थित यूएनआई मुख्यालय के बाउंड्री वाल से लगे वीपी हाउस परिसर से रवाना होने वाले थे। अचानक लाल लिबास में नजर आए लोगों को देख हमने साथ पैदल चलने आये साहित्यकार भीष्म साहनी जी (अब दिवंगत) से जब पूछा ये कौन है? भीष्म साहनी जी का जवाब मिला: रेड गार्ड्स हैं। हमने भी हिंदुस्तान में खुले आम पहली बार इन्हें देखा है।

इतिहासकारों के अवामी इतिहासकार लालबहादुर वर्मा ने बताया : रेड गार्ड्स के भारत में सड़क पर उतरने का वो पहला ही नहीं बल्कि अभी तक का आखिरी मौका था।

अध्ययन और अध्यापन

लाल बहादुर वर्मा ने गोरखपुर विश्वविद्यालय और मणिपुर विश्वविद्यालय में पढ़ाने के बाद 1990 से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन शुरू किया था। वह सेवानिवृत्त होने के उपरांत स्थाई तौर पर रहने 2018 में देहरादून जा बसे। वे उन अवामी इतिहासकारों में अग्रणी हैं जिनकी लिखी पुस्तकें भारत के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं।

डा. लाल बहादुर वर्मा 10 जनवरी 1938 को बिहार के छपरा जिले में पैदा हुए थे। उन्होंने 1953 में गोरखपुर स्कूली पढ़ाई और 1957 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। वे पढ़ाई के दौरान छात्रसंघ अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1959 में स्नातकोत्तर की पढ़ाई के बाद 1964 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की।

कृतियां

डा. लाल बहादुर वर्मा की हिंदी, अंग्रेजी और फ्रांसीसी में ‘अधूरी क्रांतियों का इतिहासबोध’, ‘इतिहास क्या, क्यों कैसे? ’, ‘ विश्व इतिहास ’, ‘ यूरोप का इतिहास ’, ‘भारत की जनकथा ’, ‘ मानव मुक्ति कथा ’, ‘ ज़िन्दगी ने एक दिन कहा था ’ और ‘ कांग्रेस के सौ साल ’ आदि करीब 18 पुस्तकें प्रकाशित हैं। उन्होंने लोकप्रिय इतिहासकार एरिक होप्स बाम समेत कई लेखकों की अंग्रेजी और फ्रेंच पुस्तकों का अनुवाद भी किया। वे अलहदा ‘इतिहासबोध’ पत्रिका भी निकालते थे।

द अमेरिकंस

उन्होंने अमेरिकी साहित्यकार हार्वड फास्ट के अंग्रेजी उपन्यास ‘द अमेरिकंस‘ का भी हिंदी अनुवाद किया। इस अनूदित कृति का प्रकाशन हरियाणा हिंदी अकादमी ने नई सहस्त्राब्दि के प्रारम्भ में किया। गौरतलब है कि हिंदी के महान लेखक प्रेमचंद के सुपुत्र अमृत राय ने हार्वड फास्ट की कई कृतियों का हिंदी अनुवाद किया है। पर वे भी ‘ द अमेरिकंस ‘ का अनुवाद नहीं कर सके। क्योंकि इस पर अमेरिका की सरकार के प्रतिबंध के कारण उसकी दुनिया भर में खरीद बिक्री बिल्कुल बंद थी। इंटरनेट के प्रचलन के बाद नई सहस्त्राब्दि मे द अमेरिकंस सीमित रूप से ही उपलब्ध हो सका।

उसके पहले कामरेड सत्यम वर्मा ने हमसे इस उपन्यास की किसी प्रति का जुगाड़ करने को कहा था। हमारे आग्रह पर अमेरिका जा बसे बचपन के एक डॉक्टर मित्र प्रणव मिश्रा ने किसी कबाड़ी से हासिल कर ये उपन्यास दिल्ली भिजवा दी। लेकिन वो रास्ते में ही गुम हो गई। बहरहाल, इतिहासकारों के एक अवामी इतिहासकार ने अमेरिकी हुकूमत के प्रतिबंध को धता बताकर द अमेरिकंस का हिंदी अनुवाद करने के बाद ही आज अपना नश्वर शरीर त्यागा। वे तो हमारे बीच नहीं रहे। तय है उनकी लिखी किताबें नहीं मरेंगी।

(सीपी झा वरिष्ठ पत्रकार हैं आप यूएनआई में कई वर्षों तक वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं।)

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