Thursday, December 9, 2021

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सांस्कृतिक भड़ैंती और फूहड़पन के विरुद्ध, जन संस्कृति के संवर्द्धन का बिगुल बजाता ‘लोकरंग’

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“सांस्कृतिक भड़ैंती और फूहड़पन के विरुद्ध, जन संस्कृति के संवर्द्धन के लिए” टैगलाइन के साथ साल 2008 में शुरु हुआ लोकरंग 10 अप्रैल 2021 से शुरु हो रहे 14वें आयोजन के मंच सजाये खड़ा है। लोकरंग का 14 साल का सफ़र, उसके उद्देश्य, उपलब्धियों और विभिन्न महत्वपूर्ण पड़ावों पर लोकरंग के संचालक संस्थापक, संपादक सुभाषचंद्र कुशवाहा ने कई अहम बातें साझा की हैं। पेश है उनसे बातचीत का संपादित अंश-

लोकरंग किस सोच, किस उद्देश्य के साथ शुरु हुआ इस सवाल के जवाब में सुभाष चन्द्र जी बताते हैं कि साल 2008 में पहला लोकरंग कार्यक्रम हुआ। मेरा ये मानना है कि जो लोकसंस्कृतियां हैं ये निम्न जाति समाज की संस्कृतियां हैं। अभिजात्य वर्ग जबर्दस्ती उस पर कब्ज़ा किये हुए है। सीधी सी बात है कि जो निम्न समाज है जिसको कि पढ़ने का कोई अधिकार आपने नहीं दिया ही नहीं था, वो अपनी पीड़ा को कैसे व्यक्त करे खास करके स्त्री, दलित। तो वो गा सकता था, गाकर अपनी बात को निकाल देता था। जितने भी लोकगीत आप देखिये उनमें स्त्री पीड़ा और दलित पीड़ा के स्वर हैं। निम्न जातियों की पीड़ा के स्वर हैं। कम उम्र ब्याह करने का जो दर्द है वो है। बूढ़े पति के साथ ब्याह कर देने का दर्द है। या पति द्वारा घर पर छोड़कर विदेश चले जाने का दर्द है तो सारे स्वर निकलते हैं लोकगीतों में।

सुभाषचंद्र कहते हैं मैं तो यही मानता हूं कि लोकगीत ही अनपढ़ समाज का वेदशास्त्र है। और उन्होंने इसमें अपना समय समाज राजनीति व संघर्ष को रचा क्योंकि आपने स्कूल उनको नहीं दिया, किताबें नहीं दी। तो उन्होंने वाचिक परंपरा में चीजों को रचकर अपनी संघर्ष की आवाज़ को यू बुलंद किया है। तो मुझे लगा अगर हम लोग अपने कथा साहित्य में अपने लेखन में सबअल्टर्न इतिहास की ओर ध्यान देते हैं तो ये लोकसंस्कृति भी उसी का हिस्सा है। उसी समाज का हिस्सा है। तो उस पर भी ध्यान देना चाहिए। क्योंकि वो समाज बड़े अभाव में जीते हुए भी लोक संस्कृति से ऊर्जा ग्रहण करता रहा है, और उसी के सहारे दिन भर खटता रहा है खेतों में। इन्हीं कारणों से हमने सोचा कि लोकरंग की शुरुआत किया जाये और गाँव के लोगों में जो अपसंस्कृति फैल गई है, भोजपुरी का नाम लेते ही लोगों के जुबान पर अश्लील शब्द निकल आते हैं दरअसल भोजपुरी में ये है नहीं। मूल रूप से भोजपुरी में बड़ी मार्मिक और दर्द भरे गीत हैं। ये कुछ लोगों ने बाद में किया है। लोकसंस्कृतियां कुलीनतावादियों की संस्कृति नहीं थी बाद में उन्होंने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया है मंच पर, संस्थाओं में। और फिर वो भोजपुरी में, बंबईया फिल्मों में अश्लीलता के रूप में सामने आने लगी। तो हम लोगों ने इसका विरोध किया। हमारा नारा ही है कि “ये है सांस्कृतिक भड़ैंती और फूहड़पन के विरुद्ध। जन संस्कृति के संवर्द्धन के लिए”।

सर्वहारा लोकसंस्कृति का संरक्षण लोकरंग का उद्देश्य

सुभाष चंद्र कुशवाहा आगे कहते हैं कि निम्नजातीय समुदाय ने लोकसंस्कृतियों को वाचिक परम्परा में सदियों से रचा है और पीढ़ियों तक ढोया है। यह इनके शोध ग्रन्थ हैं।  समाज के कुलीन तबके ने लोकसंस्कृतियों के संवर्द्धन में नकारात्मक भूमिका निभाई है। नौटंकियों में अधिकांशतः दलितों ने भाग लिया। तमाम नाच यथा हुड़का, पखावज, फरी, जांघिया, राई, लोरिकायन, पंवरिया, ये सब जाति विशेष के नाच थे और इनमें मात्र दलितों की ही भागीदारी थी। कुलीन तबका इनको नचाकर अपना मनोरंजन करता था और बदले में अपनी कुलीनता की धाक जमाने के लिए अभद्र टिप्पणियों से इन्हें नीच और अपने को कुलीन दर्शाता था। आप देखिये कि सारी लोक गायकी और नृत्य, दलितों के ही नाम क्यों है। जब कुलीन तबके को लगा कि अब उसके सामने मनोरंजन के दूसरे साधन आ चुके हैं और श्रम के लिए सिर्फ दलितों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है, तब उन्होंने लोकसंस्कृतियों की उपेक्षा कर अश्लील संस्कृतियों को बढ़ाने में रुचि दिखाई। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि लोकसंस्कृतियां दलितों की थाती हैं। वे अनपढ़ और कमजोर समाज की अभिव्यक्ति हैं। उनका संरक्षण, सर्वहारा संस्कृति का संरक्षण है।

गांव की महिलायें करती हैं कार्यक्रम की शुरुआत

सुभाष चंद्र कुशावाहा बताते हैं कि लोकरंग की एक खास बात ये भी है कि कार्यक्रम का उद्घाटन गांव की महिलायें करती हैं। चाहे वो दस मिनट का ही कार्यक्रम करें पर गांव की महिलायें मंच पर जाती हैं और बिना वाद्ययंत्र के गांवों में गाये जाने वाले परंपरागत लोकगीत गाकर कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत करती हैं। तो इस तरह से गांव की महिलाओं की हर साल लोकरंग में भागीदारी होती है।

लोकरंग की प्रेरणा से शादियों में ऑर्केस्ट्रा की जगह फरुवाही नाच ले जाने लगे लोग

लोकरंग की 14 साल की यात्रा में कितनी लोकचेतना का निर्माण और प्रचार प्रसार हुआ इस सवाल पर सुभाष चंद्र कुशवाहा बताते हैं कि ‘फरुवाही’ नाच हमारे इलाके से खत्म हो गई थी। ये यादव जातियों व निम्न जातियों का एक नृत्य था। इसको लोकरंग ने रिवाइव किया। अब ये कई जगहों पर छोटे बच्चों को शामिल करके टीमें बन गई। हम लोगों ने लोकरंग के माध्यम से समाज को ये प्रेरणा दी कि शादियों में जो ऑर्केस्ट्रा ले जायी जाती है तो ऑर्केस्ट्रा में अधिकाशंतः बंगाल साइड के आस-पास की गरीब घरों की लड़कियों को बंद करके रखा जाता है हाईवे के किनारे और फिर नचाया जाता है ऑर्केस्ट्रा में। हमने लोगों को कहा कि शादियों में ऑर्केस्ट्रा के बजाय ‘फरुवाही’ ले जाइये। तो इसकी शुरुआत हुई है। ‘फरुवाही’ वालों की पूछ हुई। कुछ लोग ले जाने लगे। दूसरे लोगों की एक आम धारणा बन गई थी कि मंच पर भोजपुरी का मतलब या तो जागरण हो या फिर फूहड़पन हो। दो का ही पर्याय था। हमने दोनों को मंच पर स्थान ही नहीं दिया। तो लोकरंग के माध्यम से लोगों में ये चेतना गई कि भोजपुरी जागरण और फूहड़पन के अलावा भी बहुत कुछ है। उन्होंने देखा कि 14 साल लोकरंग मनोरंजन भी करता है और उद्देश्य भी देता है।

सुभाषचंद्र कुशावाहा आगे बताते हैं कि हम लोग गीतों के चयन पर ध्यान देते हैं। जिन टीमों को हम बुलाते हैं उनसे उनके गीतों के बारे में ज़रूर पूछते हैं कि आप गाएंगे क्या। क्योंकि उनके पास बहुत सारे गीत हैं लेकिन उनको पता ही नहीं है उनको कौन से गीत गाने चाहिए कौन से नहीं गाने चाहिये फिर भी वो गा रहे हैं। तो लोकरंग उन्हें बताता है कि आपके इस लोकगीत से गलत संदेश जा रहा है।

लोकचेतना का प्रसार कैसे होता है इसका उदाहरण देते हुए सुभाष चंद्र कुशवाहा बताते हैं कि जैसे एक फरुवाही लोकगीत हमने लोकरंग के मंच पर गवाया कि  “माई रे माई विहान होई कहिया, भेड़ियन से खाली सिवान होई कहिया।” तो जब एक फरुवाह ने इसे गाया तो तमाम फरुवाह गाने लगे। तो एक तरीके से उनमें चेतना आई। उनके पास गीत ही नहीं है, जो गीत मिलेगा वही तो गाएंगे। तो इस पर व्यापक पैमाने पर काम होना चाहिये। अगर लोकरंग जैसे कार्यक्रम और जगह होते तो ये लोकगायक अपने आप प्रशिक्षित हो जाते।

इसके अलावा हमने कई स्थानीय लोकगीत टीमों को दिया भी है। और उनसे तैयार करके लोकरंग के मंच पर गाने का आग्रह किया है। “जनता के आवेला पलटनिया हिलेला झकझोर दुनिया” लोकरंग का ये लोकगीत इलाके में चर्चित है और बच्चे की जुबां पर है। इसी तरह गोरख पांडे का लोकगीत ‘समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई’ है। आपको ये गीत गाते हुए तमाम लड़के इलाके में मिल जायेंगे यही लोकरंग की सफलता है। जनपक्षधरता, जनचेतना के लोकगीत लोकरंग के मंच का खासियत है।

सुभाष चंद्र कुशावाहा आगे बताते हैं कि हमारी पीढ़ी के बाद की पीढ़ी का गांव से उतना पलयान नहीं हुआ। तो युवक घर में पड़े रहते हैं मोबाइल में अश्लील फिल्में देखते हैं, दारु पीते हैं। खेतों में नहीं जाते, घर के बुजुर्ग खेती में काम करेंगे तो होगा, नहीं तो नहीं होगा। तो हमने लोकरंग के माध्यम से 40-50 ऐसे युवकों को जोड़ा जिनका आचरण लोकरंग में आने के बाद बदल गया। अब न तो वो मोबाइल देखते हैं, न कोई अश्लील बात करते हैं। अब वो लोकरंग की ही तरह अपने घर के लोगों को भी प्यार करते हैं। लोकरंग से गांव की युवा पीढ़ी में एक समाजिक चेतना भी पैदा हुई है। ये लोकरंग की बहुत बड़ी उपलब्धि है। आज समाज में जिस तरह से लंपटई बढ़ी है। हर चीज को लेकर दक्षिणपंथी रुझान भी बढ़ा है। लोकरंग का उद्देश्य है कि युवकों में समाजिक चेतना बढ़े।

लोकभाषा और लोकशब्दों को बचाने के लिए लोकगीतों का संकलन

हिंदी, अंग्रेजी और तकनीकी शब्दों की अधिनायकवादी सत्ता से लुप्त होते लोकभाषा और लोकशब्द के सवाल पर सुभाष चंद्र कुशावाहा बताते हैं कि – “लोकभाषा को लेकर हम हर साल ‘लोकरंग’ के नाम से एक किताब निकालते हैं, और अब तक हमने तीन संग्रह निकाले हैं। जोकि महत्वपूर्ण आलेखों का संकलन है। इसके अलावा ‘लोकरंग’ पत्रिका निकालते हैं। उसमें हमने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक की तमाम लोकभाषाओं के लोकगीत संकलित किये हैं। जिस भाषा में लोकगीत होता है उसी में देते है और साथ में उसका हिंदी तर्जुमा भी देते हैं। और उन पर एक विस्तृत आलेख भी हर साल छापते हैं।”

सुभाष चंद्र जी लोकरंग में होने वाले बौद्धिक विमर्श पर बताते हैं कि लोकरंग में सिर्फ़ जनपक्षधर लोगों को बुलाते हैं। बावजूद उसके मंच पर हमारा नियंत्रण रहता है। कार्यक्रम में गोष्ठी होती है। जिसमें वैचारिक विमर्श होता है। इसमें जो भाग लेना चाहते हैं वो लेते हैं। हर टीम से जो बौद्धिक व्यक्ति होता है वो भाग लेते है। हिरावल पटना और इप्टा सिवान की पूरी टीम इन बैद्धिक गोष्ठियों में भाग लेती हैं। लोकसंस्कृति के विद्वान, साहित्यकार प्रोफेसर इन गोष्ठियों में भाग लेते हैं। 

गांव में कोई वर्कशॉप नहीं करना चाहता

क्या इप्टा या हिरावल की तरह लोकरंग की भी कोई टीम आने वाले समय में निकलेगी। इस सवाल पर सुभाष चंद्र कुशवाहा कहते हैं लोकरंग के बच्चों ने ‘पंचलाइट’ और ‘एक और नाटक’ का मंचन लोकरंग के मंच पर किया है। लेकिन बच्चों से नाटक कराने का मतलब है कि गांव में वर्कशॉप हो। गांव में वर्कशॉप करने वाला कोई है नहीं। गांव में वर्कशॉप का मतलब है कि वर्कशॉप कराने वाला गांव में जाकर रहे, अपना खाना खुद बनाकर खाये। हालांकि दो बार ये संभव हुआ है। एक बार छत्तीसगढ़ के योगेन्द्र चौबे ने छत्तीसगढ़ से एक युवा रंगकर्मी को भेजा था उसने गांव में रहकर एक महीना वर्कशॉप किया था। इसी तरह एक बार अभिषेक पंडित ने गांव में रहकर वर्कशॉप किया था तो गाँव के लड़के नाटक के लिए तैयार हुए थे। लेकिन गांव में वर्कशॉप करने के लिए जल्दी लोग तैयार नहीं होते हैं। हालांकि हमारी कोशिश होती है कि बीच-बीच में लोकरंग के बच्चे मंच पर जायें।

मीडिया का इंट्रेस्ट नहीं है लोक उत्सव में

मीडिया पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए सुभाष चंद्र कुशावाहा कहते हैं कि- हमारे देश की मीडिया का इंट्रेस्ट लोकरंग जैसे कार्यक्रमों में नहीं है। वो बताते हैं कि राज्यसभा टीवी में रहते हुए इरफान जी ने शुरुआत के पांच साल लगातार कवरेज किया था। इरफान जी की टीम चार दिन पहले गांव में आ जाती थी और बैठ जाती थी। बच्चों के साथ ही वो भी खाना खाते थे। सुभाष चंद्र जी बताते हैं कि विदेशी मीडिया लोकरंग का कवरेज करके ले गई। लेकिन स्थानीय और राष्ट्रीय न्यूज चैनलों के लिए ये ख़बर होती है। ये आते हैं घूमकर चले जाते हैं। लेकिन कुल मिलाकर आयोजन की ख़बर हर जगह पहुंची है। लोग जानने लगे हैं कि लोकविधाओं को लेकर लोकरंग कार्यक्रम होता है।

वरिष्ठ कवि केदार नाथ सिंह को याद करते हुए सुभाष चंद्र कुशवाहा बताते हैं कि उन्होंने एक बार मंच से कहा था कि मैं कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तमाम सांस्कृतिक उत्सवों में घूमता रहता हूं लेकिन लोकरंग सा आयोजन कहीं नहीं देखा। जो गांव में इस तरह होता हो और जिसमें सभी लोक विधायें जैसे कि चित्रकला, कविता पोस्टर, भित्ति चित्र, मूर्ति कला। हर साल कुछ न कुछ मैसेज भी दिया जाता है। जैसे कि इस साल तमाम भित्ति चित्र व मूर्तियां किसान आंदोलन पर बन रही हैं, जबकि पिछले साल बलात्कार और नारी उत्पीड़न पर केंद्रित रहा था।

लोकरंग के आयोजन का श्रेय आस पास के गांव के लोगों को

सुभाष चंद्र कुशवाहा लोकरंग के आयोजन का पूरा श्रेय गांव के लोगों को देते हैं। वो कहते हैं मैं तो कभी कभार ही जाता हूं, आयोजन की पूरी तैयारी गांव के लोग ही करते हैं, जिसकी तैयारी कई सप्ताह पहले से शुरु हो जाती है। लोकरंग के आयोजन के लिए 4 से 5 गावों के लोग एक साथ बैठते हैं। सब गांव के बच्चे करते हैं। 14 साल से करते करते अब वो ट्रेन्ड भी हो गये हैं और सबके सब गरीब घर के बच्चे हैं।

कार्यक्रम की फंडिंग पर सुभाष चन्द्र कुशवाहा बताते हैं कि लोकरंग पत्रिका को मिलने वाला विज्ञापन ही फंडिंग का मुख्य स्त्रोत है। पत्रिका में ज्यादातर विज्ञापन वे गोरखपुर के लेते हैं। जो उनके बड़े भाई के माध्यम से दवा कंपनियों के बहुतायत विज्ञापन में मिल जाता है। इसके अलावा आस-पास के ग्राम प्रधानों से 2000 रुपये सहयोग राशि के रूप में लिया जाता है। साथ ही फ़ाजिलनगर बाज़ार से गांव के बच्चे पर्चियां काटकर कलेक्ट करते हैं। 500, 1000, 1500, 2000, 2500 की पर्चियां काटते हैं। 500 से कम के सहयोग के लिए गुल्लक को प्रयोग में लाया जाता हैं। इसके अलावा दोस्त लोग कुछ मदद कर देते हैं।

सुभाष चंद्र बताते हैं कि पैसा देने वालों का नाम और विज्ञापन दाताओं का ब्यौरा एक आदमी मंच से पढ़ देता है। इससे उत्साह में भी लोग पैसा देते हैं। लोकरंग के मिलने वाले फंड के बाबत पूरी पारदर्शिता बरती जाती है।

सुभाषचंद्र कुशावहा लोकरंग के आयोजन में सहकारिता भाव का उल्लेख करते हुए बताते हैं। भोजन पर संस्था का एक पैसा खर्च नहीं होता। बस दाल और मसाले खरीदने पड़ते हैं। बाकी सब्जी, आटा चावल, आलू, सरसों का तेल, दही सब गांव के लोग स्वेच्छा से दे जाते हैं, तो खाने पर खर्चा नहीं है। भोजन बनाने का काम भी वही करते हैं।

वो आगे बताते हैं कि मुख्य खर्च लाइट, साउंड और टेंट का है, वो भी फिक्स है पिछले 14 साल से। संस्था से इनको वैचारिक रूप से जोड़ा गया है। एक मुस्लिम व्यक्ति का टेंट है। वो कभी भी तय नहीं करते है कि कितना पैसा लेंगे। उसका बस इतना सा आग्रह है कि लोकरंग कार्यक्रम तब करियेगा जब लगन न हो, तो पिछले 14 साल में हमने कभी भी लगन के सीजन में नहीं किया।

लोकरंग-2021 कार्यक्रम शिड्यूल

स्थान – जोगिया जनूबी पट्टी , फाजिलनगर, कुशीनगर (उत्तर प्रदेश)

(फाजिलनगर बाज़ार, गोरखपुर – तमकुहीराज हाईवे पर स्थित है। यह देवरिया और गोरखपुर से सड़क मार्ग से जुड़ा है। विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्थल – कुशीनगर रास्ते में पड़ता है। गोरखपुर से दूरी 70 किलोमीटर तथा देवरिया से 60 किलोमीटर)

पहली रातः शनिवार 10 अप्रैल, रात्रि 8.30 – 9.00, ‘लोकरंग-2021’ पत्रिका का लोकार्पण/ कार्यक्रम का अनौपचारिक उद्घाटन।

रात्रि 9.05 – 9-15, गांव की महिलाओं/बालिकाओं द्वारा पीड़िया गीत (मतिरानी देवी, पूजा, अंशु, प्रीति और अमृता)

रात्रि 9.20 – 9.55, लोकगीत/जनगीत, परिवर्तन रंग मंडली, जीरादेई, सिवान, बिहार। मुख्य गायक-आशुतोष, फिरोज आलम, अजीत शाह, पंकज राम, विवेक सिंह, आकाश यादव, अनूप कुमार, प्रतिमा कुमारी, नितम कुमारी, अंशु शर्मा, कविता एवं अन्य साथी।

रात्रि 10.00 – 10.35, केम चंदलाल, डरबन, दक्षिण अफ्रीकी भोजपुरी गायक (गिरमिटिया वंशज) की प्रस्तुति।

रात्रि 10.40 – 11, बिहू नृत्य, नटरंग कल्चरल एसोसिएशन, जपरकुची, नालबारी, असम। निर्देशन-संगीता बर्मन। कलाकार-नाबाजीत बर्मन, पल्लवी बर्मन, अस्मिता बर्मन, पिनाकी राजबोंगशी, पल्लबी राजबोंगशी, शताब्दी शर्मा, गीतेन वैश्य, सोनू, दीपांकर, करूणा और हिरक दास।

रात्रि 11.05 – 11.35, राई नृत्य, बुन्देलखण्ड राई नृत्य पार्टी, ललितपुर, उत्तर प्रदेश। कलाकार-करन सेन, प्रियंका, संध्या, सुजान सिंह, नन्द किशोर, भगवान दास, प्रकाश, कमलेश, भजनलाल सोनी, रामेश्वर प्रसाद, कुंजी लाल।

रात्रि 11.40 – 12.20, राजस्थानी लोकगीत एवं नृत्य, पारंपरिक मांगणियार कलाकारों द्वारा। उस्ताद आरबा म्यूजिक एण्ड डांस ग्रुप, जैसलमेर, राजस्थान की प्रस्तुति। अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलाकारों द्वारा हारमोनियम, करताल, ढोलक, मोरचंग ढोल आदि की जुगलबंदी। मुख्य कलाकार-ईमामदीन, जैसलमेर, राजस्थान। अन्य कलाकार- राधा, चिरमी सपेरा, पपिया कालबेलिया, जस्सा खान, बीरबल खान, टगा राम भील एवं अन्य।

रात्रि 12.25 – 1.25, नाटक- तुम सम पुरुष न मो सम नारी, लेखक-उर्मिलेश थपलियाल, निर्देशक- आशुतोष मिश्रा, पात्र-रंगा-फिरोज आलम, छंगा-अजीत साह, सूत्रधार- अनूप कुमार प्रसाद, बलई-पंकज कुमार राम, रामकली-प्रतिमा कुमारी, बुधईया-विवेक कुमार सिंह, काकी- नीतम कुमारी, चोर/ग्रामीण एवं अन्य। परिवर्तन रंग मंडली, जीरादेई, सिवान, बिहार की प्रस्तुति।

दूसरा दिन, रविवार  11 अप्रैल, पूर्वाह्न 11 से अपराह्न 2 बजे: ‘विचार गोष्ठी’

विषय- ‘लोक का संकट और लोक साहित्य’

सहभागिता- तैय्यब हुसैन (लोकसंस्कृति मर्मज्ञ, पटना), प्रो. दिनेश कुशवाह (वरिष्ठ कवि, रीवा), बलभद्र (कवि/आलोचक, गिरिडीह), मदनमोहन (वरिष्ठ कहानीकार,गोरखपुर), जितेद्र भारती (साहित्यकार, देहरादून), विनोद मल्ल, (निदेशक- बुद्ध से कबीर तक)   धीरेन्द्र  नाथ (साहित्यकार, देहरादून),  डॉ. सदानंद शाही (बीएचयू),  डॉ. अनिल राय, राजेश मल्ल, महेन्द्र प्रसाद कुशवाहा (प्राध्यापक हिन्दी, बनारस), रामजी यादव (कहानीकार, वाराणसी), रमाशंकर (इलाहाबाद), मृदुला शुक्ल (लोकसंस्कृति मर्मज्ञ), पी.डी. मालवीय (साहित्यकार), संतोष पटेल (अध्यक्ष, भोजपुरी जनजागरण अभियान, दिल्ली), विद्याभूषण रावत (लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता, नोएडा), अविश्रांत, बृजेश प्रसाद (कोलकाता), अमरेन्द्र आर्य: सभी साहित्यकार, अपर्णा (सामाजिक कार्यकर्ता, बनारस), दीनानाथ मौर्य, मनोज कुमार सिंह (वरिष्ठ पत्रकार, गोरखपुर), संजय स्वदेश, प्रवीण कुमार यादव, आशीष मौर्य, बृजमोहन कुशवाहा, जितेन्द्र यादव, बृजेश मौर्य पंचम एवं अन्य साहित्यकार/रंगकर्मी।

दूसरी रात, रविवार  11 अप्रैल, रात्रि 8.30 – 9.10, हिरावल, पटना का गायन। मुख्य गायक-संतोष झा एवं प्रीति प्रभा, ब्यूटी रंजना, खुशबू, राजन कुमार, राजेश रंजन, सुमन कुमार और संतोष सहर ।

रात्रि 9.15 -9.45, केम चंदलाल, डरबन, दक्षिण अफ्रीकी भोजपुरी गायक (गिरमिटिया वंशज) की प्रस्तुति।

रात्रि 9.50 – 10.20, फरुवाही नृत्यः रामवृक्ष कुशवाहा, रामअवध, रामध्यान (नगाड़ा वादक), जयचन्द कुशवाहा, ग्राम- माधोपुर, सखवनिया, कुशीनगर।

रात्रि 10.25 -10.45, बिहू नृत्य, नटरंग कल्चरल एसोसिएशन, जपरकुची, नालबारी, असम। निर्देशन-संगीता बर्मन। कलाकार-नाबाजीत बर्मन, पल्लवी बर्मन, रिंकी वैश्य, अस्मिता बर्मन, हिमाखी बर्मन, स्वीटी सरकार, गौतम वैश्य, ज्योर्तिमय कलिका, उदीप्त कलिका।

रात्रि 10.50 – 11.25, बिरहा गायन। मुख्य कलाकार- मंगल यादव एवं साथी, डबरिया, चहनिया, चंदौली, उ.प्र.। जीतेन्द्र मिश्र (ढोलक), अमेरिका राम (हारमोनिया), विजय लाल यादव, छोटेलाल गोंड़ और चन्द्रशेखर प्रसाद (कोरस)।

रात्रि 11.30 – 12.20, राजस्थानी लोकगीत एवं नृत्य, पारंपरिक मांगणियार कलाकारों द्वारा। उस्ताद आरबा म्यूजिक एण्ड डांस ग्रुप, जैसलमेर, राजस्थान की प्रस्तुति। अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलाकारों द्वारा हारमोनियम, करताल, ढोलक, मोरचंग ढोल आदि की जुगलबंदी। मुख्य कलाकार-ईमामदीन, जैसलमेर, राजस्थान।

रात्रि 12.25 – 1.25, नाटक-बूढ़ी काकी, कहानीकार-मुंशी प्रेमचंद । निर्देशन-अभिषेक पंडित, ममता पंडित। पात्र- डी.डी. संजय, डॉ अलका सिंह, ममता पंडित, रितेश रंजन, विवेक सिंह, सत्यम कुमार एवं अन्य कलाकार। सूत्रधार, आजमगढ़ की प्रस्तुति।

प्रातः 1.30 – 1.35, धन्यवाद ज्ञापन/ग्रुप फोटोग्राफी/समापन ।

संचालन, प्रो. दिनेश कुशवाह, हिन्दी विभागाध्यक्ष, रीवा विश्वविद्यालय (म.प्र.), देश के जाने-माने वरिष्ठ कवि।

संभावना कला मंच, गाजीपुर, कविता पोस्टर, भित्ति चित्र, मंच और मंच परिसर की सज्जा। निर्देशन-डॉ राजकुमार ।

बहुरुपिया कलाकरों का प्रदर्शन। राजू बहुरुपिया एवं अन्य, जयपुर, राजस्थान।

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