लोकरंग महोत्सव की पहली शाम: गीत व नृत्य में दिखी विलुप्त हो रही भारतीय साझा संस्कृति 

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कुशीनगर। सांस्कृतिक भड़ैती व फूहड़फन के खिलाफ जनसंस्कृति को स्थापति करने के संकल्प के साथ 15 अप्रैल को कुशीनगर के जोगिया जनूबी पट्टी गांव में 16 वां दो दिवसीय लोकरंग महोत्सव शुरू हुआ। महोत्सव की पहली शाम अपने साझा संस्कृति के नाम रही। पूरब से लेकर पश्चिम तक हासिये पर रहे जनजाति समाज की साझा संस्कृति एक मंच पर दिखाई पड़ी। इनका प्रतिनिधित्व करनेवाले अधिकांश कलाकारों ने गीत व नृत्य की अपनी जीवंत प्रस्तुति से जहां लोगों का मनोरंजन कराया वहीं अपसंस्कृति के खिलाफ अपनी लोक संस्कृति स्थापित करने का संदेश भी दे गए।

हाल में दिवंगत हुए प्रख्यात आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय व संभावना कला मंच के संस्थापक व जाने माने चित्रकार राजकुमार सिंह को समर्पित 16 वें लोकरंग महोत्सव का उद्घाटन लोक रंग पत्रिका के लोकार्पण और गांव की महिलाओं के संझापराती गीत से हुई। लोक रंग पत्रिका के लोकार्पण में सहभागी बने, मुख्य अतिथि लेखक एवं वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. सुरेश खैरनार, वरिष्ठ आलोचक प्रो शंभु गुप्त, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक चन्द्रभूषण, बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल प्रो के. पी. कुशवाहा, रीवा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो दिनेश कुशवाह, लोक रंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष सुभाष कुशवाहा, असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशा सिंह, डॉ. अपर्णा, डॉ. विजयश्री मल्ल, डॉ. रामनरेश, कहानीकार रामजी यादव, अपर्णा, वरिष्ठ पत्रकार मनोज सिंह, डॉ. दीनानाथ मौर्य।

लोकरंग की पत्रिका का लोकार्पण

लोकरंग पत्रिका 2023 में लोक साहित्य और दलित विमर्श पर प्रख्यात लेखक कंवल भारती, लोक लय पर तैयब हुसैन, बिरहा के बालेश्वर पर हरिशंकर राढी, लोक से गायब होते गीत पर ज्योति यादव सहित नौ आलेख हैं। जोगिया गांव की मतिरानी देवी, ज्ञानति, सुशीला, रुखसाना और सुभागी ने संझापराती लोकगीत प्रस्तुत किया। इसके बाद गीत व नृत्य की जो श्रृंखला शुरू हुई वह पूरी रात चलती रही। कलाकारों की प्रस्तृति में उनकी जीवंतता इस कदर रही की दर्शक दीर्घा पूरे कार्यक्रम के दौरान भरा रहा।

मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले से आये मालवा के बीर गायन टीम ने कबीर गायन प्रस्तुत किया। कलाकार प्रीतम मालवीय, मदनलाल मालवीय और उनके साथियों ने सद्गुरू मिले तो खुल जाए अंदर की खिड़की व बहुत दिन सो लियो रे जाग मुसाफिर जाग गीत के माध्यम से कबीर का संदेश देने का काम किया। इनके गीतों ने धार्मिक पाखंड के खिलाफ समरसता की बात रखी।

मध्य प्रदेश के धार जिले के मांडव से आए मांडव लोक कला सांस्कृतिक संस्था के भगोरिया लोक नृत्य ने हमारी सांस्कृतिक विविधता की एक तस्वीर पेश की। इनकी टीम के कृष्णा मालीवाड़ के साथ रीतेश, पारगी,गणेश दांगी, दीपक गावर, लक्ष्मण मालीवाड़, राम मालीवाड़, जीवन गावर, संजय फूलफगर, प्रकाश वास्केल, उमराव वास्केल, ओमप्रकाश डावर, अंतर सिंह वाडेकर, सचिन डावर, अजय डावर,धर्मेन्द्र गावर और संजय निनामा ने नृत्य में अपनी भागीदारी के साथ अपने कला का शानदार परिचय कराया। जनजाति समाज के बीच प्रचलित यह लोक नृत्य समय के साथ अपनी पहचान खोती जा रही है।

मध्यप्रदेश का भगोरिया लोकनृत्य

बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले के हरनाटांड से आये तारकेश्वर काजी थारु कल्चरल ग्रुप की थारु नृत्य, जंतसारी और झमटा व झकरा गीत की प्रस्तुति ने लोगों गहरे तक प्रभावित किया। गीत व नृत्य में सुनीता, लीलावती, सावित्री, फूलकुमारी और तारामती तथा पुरूष कलाकारों में तारकेश्वा काजी, अखिलेश कुमार, सत्यनारायण काजी, गिरधारी महतो और खूबलाल महतो शामिल रहे।

बिहार की राजधानी पटना से आये दस्तक टीम के कलाकारों ने कृष्ण चन्दर की कहानी जामुन का पेड़ को आधार बनाकर नाटक प्रस्तुत किया। पुंज प्रकाश के परिकल्पना और निर्देशन में प्रस्तुत नाटक में सरकारी तंत्र में जीवन और मृत्यु के बीच झूलते आम इंसान की व्यथा कथा को प्रदर्शित किया गया। एक दिन जोर की आंधी चलती है। सरकारी दफ्तर का जामुन का पेड़ गिर पड़ता है और उसके नीचे एक इंसान दब जाता है। अब समस्या यह कि इसे निकाले कौन और कैसे समाज को फुर्सत नहीं है और पूरा का पूरा सरकारी तंत्र तो फाइलों के सहारे चलता है। अंततः फाइल चलती है और इधर एक दिन इंसान के जीवन की फाइल मुकम्मल हो जाती है। यह सब कुछ यथार्थ होते हुए भी किसी परिकथा की तरह लगता है, जिस पर सहज यकीन करना मुश्किल प्रतीत होता है। नाटक के माध्यम से कलाकारों ने सरकारी मशीनरी के भ्रष्टाचार की तस्वीर पेश की।

नाटक जामुन के पेड़ का मंचन

खास बात यह रही कि लोकरंग मंच सहित पूरे गांव को संभावना कला मंच के कलाकारों ने सजा संवार कर कला ग्राम में बदल दिया था। इस बार संभावना कला मंच के कलाकार अपने कला गुरु राजकुमार सिंह की याद करते हुए अपनी कूंचियों से चित्रों में रंग भर रहे थे। सुधीर सिंह व राजीव कुमार गुप्ता के संयुक्त नेतृत्व में सम्भावना कला मंच की टीम एकदम उनके सपनों, उम्मीद और विचारों के साथ लोकरंग-2023 को एक अलग ही रंग दिया।

सम्भावना कला मंच के साथी सुधीर सिंह, राजीव कुमार गुप्ता, आशीष कुमार गुप्ता, कृष्ण कुमार पासवान, बृजेश कुमार , मीरा वर्मा, नूपुर वर्मा, निहाल सिंह, शाहिद, मुकेश चैधरी, शिवांशी शर्मा, अंजलि विश्वकर्मा, राहुल यादव, श्रेयांश कुशवाहा, रीती सिंह और साथी कलाकारों ने लोकरंग की कलाकृतियों की रूपरेखा तैयार की। सम्भावना कला मंच के सबसे छोटे कलाकार उत्कर्ष सिंह भी लोकरंग में अपने लेआउट के साथ पहुंचे। इस बार इंस्टालेशन आर्ट में राज कुमार की प्रतिकृति के रूप में “ जब तक जिया रंग भरते हुए जिया” शीर्षक इंस्टालेशन बनाया गया जो मुख्य आकर्षण का केंद्र रहा।

टीम के कलाकारों द्वारा के बखारों व दीवारों पर किए गए भित्ति चित्रांकन लोगों को बरबस अपनी और खींच रहे थे। बखारो और भित्तियों पर लोककला, समकालीन कला और इंस्टालेशन के माध्यम से आधुनिकता का भी प्रयोग किया था। इन चित्रों में लोक संस्कृतियों की व्यवस्था को समझने व संवारने के साथ लोक को बदलने हेतु नए बिम्ब (आदर्श) व स्वप्न को भी प्रस्तुत करने की कोशिश की गई थी।

( जोगिया जनूबी पट्टी से जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट।)

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