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जन्मदिन पर विशेष: अंग्रेजों से लोहा लेने वाली माखनलाल की कलम ने आज़ादी के बाद दिखाया समाज को रास्ता

बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में अनेक महापुरुषों ने राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपने बहुआयामी व्यक्तित्व और कालजयी कृतित्व की छाप छोड़ी। ऐसे ही महापुरुषों में दादा माखनलाल चतुर्वेदी का नाम बड़े ही सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है। वे सुधी चिंतक, कवि और प्रखर पत्रकार होने के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम के सेनापतियों में से एक थे। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर एक बार जो उन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने का निश्चय किया, तो उस निश्चय पर जिंदगी भर अटल रहे। कोई भी लालच और प्रलोभन उनके विश्वास को खंडित नहीं कर पाया। साहित्यकार के रूप में भी माखनलाल चतुर्वेदी की ज्यादातर कवितायें देश प्रेम पर केन्द्रित हैं।

‘प्रभा’ और ‘कर्मवीर’ जैसे प्रतिष्ठित पत्रों के संपादक के तौर पर उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जोरदार प्रचार किया और नई पीढ़ी का आह्वान किया कि वह गुलामी की जंजीरों को तोड़ कर बाहर निकलें। इसके लिये उन्हें कई बार ब्रिटिश साम्राज्य का कोपभाजन बनना पड़ा। माखनलाल चतुर्वेदी सच्चे देशभक्त थे। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आदि सभी आंदोलनों में उन्होंने हिस्सेदारी की और जब इसके लिए गिरफ्तारी देने का मौका आया, तो वे इससे जरा सा भी पीछे नहीं हटे। माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के छोटे से गांव बाबई में 4 अप्रैल, 1889 को हुआ था। प्राथमिक शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने घर पर ही संस्कृत का अध्ययन किया। 16 साल की उम्र थी, जब वे अध्यापक हो गए।

माखनलाल चतुर्वेदी, पत्रकारिता में कैसे आये ? इसका किस्सा कुछ इस तरह से है, समाचार पत्र ‘हिन्दी केसरी’ ने साल 1908 में ‘राष्ट्रीय आंदोलन और बहिष्कार’ विषय पर एक निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया। प्रतियोगिता में नौजवान माखनलाल चतुर्वेदी भी शामिल हुए और उनका निबंध अव्वल नंबर पर आया। अखबार के यशस्वी संपादक माधवराव सप्रे को माखनलाल चतुर्वेदी की लेखनी में अपार संभावनाओं से युक्त पत्रकार-साहित्यकार के दर्शन हुए। सप्रे ने चतुर्वेदी को इस दिशा में और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। माखनलाल चतुर्वेदी अब नियमित लिखने लगे। कविताओं के साथ-साथ उन्होंने पत्रकारिता भी शुरू कर दी। आखिर वह दिन भी आया, जब वे अपनी अध्यापक की नौकरी छोड़कर, पूरी तरह से पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित हो गए।

खंडवा के हिन्दीसेवी कालूराम गंगराडे एक मासिक पत्रिका निकालना चाहते थे और इसके लिए उन्हें योग्य संपादक की तलाश थी। उनकी तलाश माखनलाल चतुर्वेदी पर जाकर खत्म हुई। अप्रैल, 1913 में ‘प्रभा’ का प्रकाशन आरंभ हुआ, जिसके संपादन की जिम्मेदारी माखनलाल चतुर्वेदी ने संभाली। उनके संपादन में इस पत्रिका के कई महत्वपूर्ण अंक निकले, जिनकी चर्चा पूरे देश में हुई। ‘प्रभा’ के सम्पादन काल के दौरान ही माखनलाल चतुर्वेदी का परिचय एक और महान देशभक्त एवं पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी से हुआ। जिनके देश-प्रेम और लेखन से वे बहुत प्रभावित हुए।

माखनलाल चतुर्वेदी ने आगे चलकर साल 1919 में जबलपुर से समाचार पत्र ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन शुरू किया। इस अखबार के लेख बड़े तेवर वाले होते थे। अखबार का स्वरूप और उसके विषय के चलते ‘कर्मवीर’ जल्दी ही लोगों में बेहद लोकप्रिय हो गया। अखबार की लोकप्रियता अंग्रेजी हुकूमत से देखी नहीं गई और 12 मई, 1921 को माखनलाल चतुर्वेदी को राजद्रोह के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया गया। वे एक साल तक जेल में रहे। साल 1922 में उन्हें कारागार से रिहाई मिली। जेल से रिहाई के बाद वे फिर पत्रकारिता में लग गए। जेल का कारावास भी उनका हौसला नहीं तोड़ पाया। इस दौरान ‘प्रताप’ के सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी पर अंग्रेज हुकूमत की गाज गिरी और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ्तारी के बाद ‘प्रताप’ का सम्पादकीय कार्य-भार संभालने की जिम्मेदारी माखलाल चतुर्वेदी को मिली। जो उन्होंने कुशलता से निभाई। परतंत्र भारत में पत्रकारिता सांस्कृतिक जागरण, राजनीतिक चेतना, साहित्यिक सरोकार और दमन का प्रतिकार इन चार पहियों के रथ पर सवार थी। यही वजह रही कि उस दौर के राष्ट्रवादी और निर्भीक पत्र-पत्रिकाओं को अंग्रेजी हुकूमत के बार-बार दमन, तथाकथित कानून, मुचलकों, जब्ती, जमानतों का सामना करना पड़ा। जाहिर है कि पत्रकारिता करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी को भी इन सब परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके वे अंग्रेज हुकूमत के आगे कभी नहीं झुके। उनकी लेखनी सरकार के खिलाफ हमेशा आग उगलती रही।

माखनलाल चतुर्वेदी के महान कृतित्व के तीन आयाम हैं एक, पत्रकारिता जिसमें ‘प्रभा’, ‘कर्मवीर’ और ‘प्रताप’ का संपादन शामिल है। दूसरा, साहित्यिक अवदान जिसमें उन्होंने कविताएँ, निबंध, नाटक और कहानियां लिखीं। तीसरा, उनके अभिभाषण और व्याख्यान। इन अभिभाषण और व्याख्यानों में भी उनकी राष्ट्रवादी सोच परिलक्षित होती है। 4 अप्रैल, 1925 को जब खंडवा से माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ का पुनः प्रकाशन किया तब उनका देशवासियों से आह्वान था,‘‘आइए, गरीब और अमीर, किसान और मजदूर, उच्च और नीच, जीत और पराजित के भेदों को ठुकराइए। प्रदेश में राष्ट्रीय ज्वाला जगाइए और देश तथा संसार के सामने अपनी शक्तियों को ऐसा प्रमाणित कीजिए, जिसका आने वाली संतानें स्वतंत्र भारत के रूप में गर्व करें।’’

पत्रकारिता और अखबारों के संपादन के साथ-साथ माखनलाल चतुर्वेदी अनवरत साहित्य साधना करते रहे। इसमें कहीं कोई रुकावट नहीं आई। ‘हिमकिरीटिनी’, ‘हिम तरंगिणी’, ‘युग चरण’, ‘समर्पण’, ‘मरण ज्वार’, ‘माता’, ‘वेणु लो गूंजे धरा’, ‘बीजुरी काजल आँज रही’ आदि माखनलाल चतुर्वेदी की प्रसिद्ध काव्य कृतियाँ हैं। वहीं ‘कृष्णार्जुन युद्ध’, ‘साहित्य के देवता’, ‘समय के पांव’, ‘अमीर इरादे-गरीब इरादे’ आदि उनकी प्रमुख गद्यात्मक कृतियाँ हैं।

हिन्दी साहित्य में माखनलाल चतुर्वेदी के उच्च कोटि के योगदान को देखते हुए उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान से सम्मानित किया गया। साल 1943 में काव्य संग्रह ‘हिम किरीटिनी’ पर उन्हें ‘देव पुरस्कार’ मिला, जो उस समय का हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार था। साल 1955 में साहित्य अकादमी ने माखनलाल चतुर्वेदी को काव्य संग्रह ‘हिमतरंगिणी’ के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। ‘पुष्प की अभिलाषा’ और ‘अमर राष्ट्र’ जैसी ओजस्वी रचनाओं के रचयिता महाकवि माखनलाल चतुर्वेदी के कृतित्व को सागर विश्वविद्यालय ने साल 1959 में डी. लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया।

साल 1963 में भारत सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम, पत्रकारिता और साहित्य में माखनलाल चतुर्वेदी के अमूल्य योगदान को सराहते हुए, उन्हें पद्मभूषण सम्मान से अलंकृत किया। माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्यिक अवदान का एक परिचय उर्दू के नामवर हस्ताक्षर रघुपति सहाय यानी फिराक गोरखपुरी की इस टिप्पणी से मिलता है,‘‘उनके लेखों को पढ़ते समय ऐसा मालूम होता था कि आदि शक्ति शब्दों के रूप में अवतरित हो रही है या गंगा स्वर्ग से उतर रही है। यह शैली हिन्दी में ही नहीं, भारत की दूसरी भाषाओं में भी विरले ही लोगों को नसीब हुई। मुझ जैसे हजारों लोगों ने अपनी भाषा और लिखने की कला माखन लालजी से ही सीखी।’’

माखनलाल चतुर्वेदी ने अपनी जिन्दगी में चाहे पत्रकारिता की हो या फिर साहित्यिक लेखन अपने स्वाभिमान और उच्च जीवन मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। देश में स्वराज्य आये, यह उनके जीवन और लेखन का मुख्य ध्येय था। खुद तो इस राह पर चले ही, बल्कि दीगर साहित्यकारों को भी इसके लिए प्रेरित किया। मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में माखनलाल चतुर्वेदी ने बाकायदा यह प्रस्ताव पारित कराया था,‘‘साहित्यकार स्वराज्य प्राप्त करने के ध्येय से लिखें।’’

साहित्य के संदर्भ में उनकी स्पष्ट अवधारणा थी,‘‘लोग साहित्य को जीवन से भिन्न मानते हैं, वे कहते हैं साहित्य अपने ही लिए हो। साहित्य का यह धंधा नहीं कि हमेशा मधुर ध्वनि ही निकाला करे… जीवन को हम एक रामायण मान लें। रामायण जीवन के प्रारंभ का मनोरम बालकांड ही नहीं, किंतु करुण रस में ओत प्रोत अरण्यकांड भी है और धधकती हुई युद्धाग्नि से प्रज्वलित लंका कांड भी है।’’ 30 जनवरी, 1968 को कलम के इस बेजोड़ सिपाही, पत्रकारिता के शिखर पुरुष माखनलाल चतुर्वेदी ने हमसे अपनी आखिरी विदाई ली।

(ज़ाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल आप मध्य प्रदेश के शिवपुरी में रहते हैं।)

This post was last modified on April 4, 2020 4:23 pm

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