Wednesday, December 8, 2021

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मातृसत्ता बनाम पितृसत्ता : ऐतिहासिक विवेचन

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किसी भी समाज में व्यक्ति की पदस्थिति और भूमिका सम-सामायिक सामजिक मूल्यों तथा आदर्शों पर आधारित होती है। कोई भी स्थिति चिरंतन व स्थाई नहीं रह सकती समय के साथ-साथ सामाजिक परिस्थितियां परिवर्तित होती जाती हैं। साथ ही साथ परम्परागत आदर्शों और मूल्यों में परिवर्तन होते रहते हैं।

19वीं शताब्दी के इतिहासकार बैकोफेन और मार्गन मातृसत्ता को पितृसत्ता का पूर्ववर्ती मानते हैं। मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय के शोघ के अनुसार 50 करोड़ वर्ष तक सिर्फ स्त्रियों की ही दुनिया थी। एफ.मडॉक ने दावा किया है कि उन्होंने 570 जनजातियों में स्त्रियों की स्थिति और वैवाहिक प्रथाओं पर अनुसंधान किया है। ऐसा लगता है कि मातृसत्तात्मक पद्धति उन जनजातियों में पाई जाती है, जो बागवानी पर निर्भर है। मानव विकासक्रम के अदिम युग की यायावर संस्कृति के उस दौर में जब जीवित रहना ही जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य था, उस समय पुरुष के समानान्तर स्त्री की भूमिका कहीं दोहरी थी। गर्भाधान और प्रजनन की अनिवार्यता के मध्य स्त्री को उन्हीं परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था जिसका सामना पुरुष करता था।

शिकार पर गए पुरुष की अनुपस्थिति में संभावित खतरों का सामना करने के अतिरिक्त उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। शिकार करने में भी स्त्रियाँ दोहरी भूमिका निभाती थी, फिर शिकार करने के बाद वे उनको लाने में बराबर की साझीदार होती थी। मानव शिशु के पालन – पोषण में लगने वाले श्रम और समय की अधिकता ने स्त्री के विकास के अवसर कम किए और स्वयं के लिए नये अन्वेषणों का मार्ग अवरुद्ध किया। कृषि जीवन में प्रवेश के साथ ही जीवन की यायावरता थमी। प्रकृति से संघर्ष के साथ-साथ प्रकृति के सहयोग से जीवन के विकास के मार्ग प्रशस्त हुए। नृवैज्ञानिकों एवं पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार बुनाई, कताई और छोटी कुदाली से खेती का आविष्कार स्त्रियों द्वारा हुआ।

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ‘लोकायत’ नामक पुस्तक में लिखते हैं कि कृषि के प्रारम्भिक चरण में देव स्तर पर स्त्री और पुरुषों की प्रधानता उलटी हो गई। स्त्री आगे बढ़ गई और पुरुष को या तो पृष्ठभूमि में पीछे धकेल दिया गया या कम से कम इतना हुआ कि उसे स्त्री का नकल करने के लिए बाध्य होना पड़ा। जे.डी. बरनाला के अनुसार, चूंकि खाद्य सामग्री इकट्टा करना स्त्रियों का काम था, इसलिए संभवतः उन्होंने ही कृषि की खोज की।

जहां-जहां शिकार से अधिक महत्व खाद्य-सामग्री जुटाने के लिए कृषि को मिला वहॉँ स्त्रियों का स्तर ऊंचा उठा और मातृकुल के अनुसार वंशानुक्रम चलाने की बजाय पितृकुल के अनुसार वंशानुक्रम चलाने की प्रवृत्ति बढ़ी और इसे उलट दिया गया। पितृकुल के अनुसार वंशानुक्रम चलाने की प्रवृत्ति सबसे पहले शिकारवाले चरण मे आरम्भ हुई थी। केवल उन्हीं स्थानों पर जहॉँ पशुपालन ही प्रमुख व्यवसाय था जैसे कृषि प्रधान बस्तियों के आस-पास के क्षेत्रों में पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था पूर्ण रुप से स्थापित हुई। कृषि हेतु मानव श्रम की आवश्यकता ने स्त्री की प्रजनन क्षमता का महत्व स्थापित किया।

धरती एवं स्त्री की उर्वरा क्षमता को स्वीकार किया गया। धरती पर अधिकारों के साथ-साथ सम्पत्ति की अवधारणा विकसित हुई। अपनी सृजनात्मक क्षमता की जानकारी के साथ ही पुरूष ने मातृत्व के महत्व को कमत्तर करके आंँकना प्रारम्भ किया। औजारों, उपकरणों, हलों के अनुप्रयोग, कृषि-सामग्री का सृजन, भूमि पर कब्जा, एवं संतानोत्पत्ति में पुरूष की सृजनात्मक क्षमता के ज्ञान ने उत्तरोत्तर पुरुष को शक्ति संपन्न बनाया। अपना वंशज और अपने वंशज की सम्पत्ति सौंपने की कामना ने पितृसत्ता के लिए जमीन तैयार की। इस चाह ने स्त्री और धरती पर अधिकार के लिए संसाधनों पर अधिकार पुरुष सत्ता के महत्वपूर्ण अस्त्र थे।

धरती पर अधिकार के लिए उत्तराधिकार एवं स्त्री पर अधिकार के लिए विवाह संस्था अनिवार्य हो गई।3 पुरूष ने न तो विचार में, न श्रम में, न संतानोत्पत्ति में स्त्री का साझा स्वीकार किया, स्त्री को एक निष्क्रिय एवं अक्षम साथी की तरह स्वीकार किया जिसकी देखभाल का दायित्व पुरुष ठीक उसी प्रकार करता था जिस प्रकार पशुधन एवं जमीन की देखभाल का था। कालान्तर में पुरूष शोषण का दमनचक्र स्त्री के खिलाफ गहरा होता चला गया। सभ्यताओं के विकास में विश्व की सभ्यतम कही जानेवाली सभ्यता, संस्कृति एवं परम्पराओं में स्त्रियों के प्रति सामाजिक मापदंड सदैव परिवर्त्तित होता रहा है।

प्राचीन यूनानी एवं रोमन साम्राज्य में स्त्रियाँ पुरुषों की सम्पत्ति समझी गईं। सुकरात ने स्त्री के प्यार को पुरुष की घृणा से अधिक भयावह माना, जबकि अरस्तु ने स्त्री की तुलना में पुरुष को श्रेष्ठ बताया। त्रिवन ने कहा कि नारी अनुसरण एवं आज्ञापालन के लिए आजीवन अभिशप्त है। बुद्धि और विवेक की उससे कोई अपेक्षा नहीं की जाती थी। यूनान के अभिजात्य वर्ग का कहना था कि वेश्याएँ उनका मनोरंजन करती है, उपपत्नियाँ दैनन्दिन स्वास्थ्य रक्षण करती है और पत्नियाँ उनकी वैध संतानों को जन्म देने के साथ-साथ स्वामिभक्त गृहस्वामिनी होती हैं। प्राचीन जापान मे स्त्रियाँ प्रार्थनाओं तथा अन्य धार्मिक अधिकारों से पूर्णतः वंचित थीं। प्राचीन चीन में भी उन्हें देवालय में प्रवेश का अधिकार नही था। स्पेन के लोग संकल्प लेते थे कि वे दुष्ट स्त्रियों से बचेंगे और सुन्दर स्त्रियों के मोहपाश में नही बँधेगे।

इटली के प्राचीन निवासी कहा करते थे कि घोड़ा चाहे जैसा हो उसे ऐड़ लगाना जरूरी है वैसे ही स्त्री चाहे अच्छी हो या बूरी उसकी ताड़ना आवश्यक होती है। स्त्रियों के प्रति प्राचीन अरबवासियों का दृष्टिकोण और भी क्रुरतापूर्ण था। अरब समाज में स्त्री का जन्म अशुभ माना जाता था और वहाँ के लोग प्रायः पुत्रियों को जिन्दा दफन कर दिया करते थे।6 भारतीय परम्परा के दीर्धकालीन इतिहास में स्त्री की स्थिति सदैव एक सी नहीं रही उसमें उतार- चढाव आते रहे। साहित्यिक ग्रंथों में अद्वितीय परमात्मा के स्वरुप के दो अंशों को पति – पत्नी का नाम दिया गया।

सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ने आत्मस्वरूप के आधे अंश से पुरुष और आधे अंश से स्त्री को उत्पन्न किया। ऐतिहासिक विकास क्रम में उनकी स्थिति बदली, पहले वह पुरुष की अर्द्धांगिनी बनी फिर मित्र, सहचरी और गृह संचालन की धूरी तथा अंत में दासी एवं भोग्या बना डाली गई। इतिहासकारों ने वैदिक समाज व्यवस्था को आदर्श व्यवस्था स्वीकार किया है। वैदिक सूत्रों के आधार पर यह काल स्त्री की गौरवपूर्ण सम्मानजनक स्थिति का काल रहा। उन्हें पुरुषों के समान ही सामाजिक एवं धार्मिक प्रतिष्ठा मिली हुई थी। शतपथ ब्राह्मण में स्त्री को पुरुष की अर्द्धांगिनी बताया गया है तथा ऐतरेय ब्राह्मण में स्त्री के ’जाया’ कहा गया है।

महाभारत के अनुसार गृहिणी ही वस्तुतः गृह कही जाती है, गृहणी के बिना गृह अरण्य के समान है। स्त्रियों की सदा पूजा की जानी चाहिए, जहाँ स्त्रियों का सम्मान है, वहाँ सभी देवता प्रसन्न रहते है तथा जहाँ उनका अपमान है वहाँ सभी क्रियायें निरर्थक हो जाती है। ऋक् संहिता में पत्नी को पति का ’नेम’ कहा गया है। पत्नी को पुरुष की सखा बताया गया है तथा दोनों के परस्पर सम्बन्ध को प्रेममय और सरस माना गया है क्योंकि इससे धन लाभ और प्रशंसा मिलती है। पत्नी को पुरुष की जाया इसलिए कहा गया है कि उससे पति गर्भ रूप में उत्पन्न होता है। महाभारतकार ने यह भी लिखा है कि स्त्रियाँ समृद्धि की देवी है समृद्धि चाहने वाले व्यक्ति को उनका सम्मान करना चाहिए।

मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है कि जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता रमण करते है और जहाँ स्त्रियाँ की पूजा नहीं होती वहाँ के सभी कार्य व्यर्थ हो जाते है। आगे यह बताया गया है कि जिस कुल में नारियों का अपमान होता है वह कुल विनष्ट हो जाता है। वाराहमिहिर के कथनानुसार स्त्रियाँ परिवर में लक्ष्मी होती है अतः उनका सम्मान किया जाना चाहिए जो लोग उनके चरित्र में दोष देखते है वे स्वयं अधम है तथा उनके विचार सद्भाव से प्रेरित नहीं होते, वस्तुतः स्त्रियाँ सभी प्रकार से पवित्र होती है। कालिदास ने ’सम्मति देनेवाली सहचरी तथा एकान्त की सखा के रुप में‘ स्त्री की सत्ता को स्वीकार किया है।

महाभारत में पत्नी को अर्थ, धर्म और काम का मूल बताया गया है। संतानोत्पत्ति द्वारा प्रजावृद्धि वैदिक युग की महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। परिणामस्वरुप माता के रूप में स्त्री की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं केन्द्रीय बनी। माता का स्थान पत्नी से श्रेष्ठ माना गया। देवी की परिकल्पना में भी माता के महत्व को स्वीकार किया गया। देवत्व में मातृत्व के गुण को महत्व दिया गया। लेकिन ऋग्वैदिक धर्म में पुरुष भावों की ही प्रधानता थी। सैन्धव सभ्यता में मातृदेवी अपने पुरुष साथी आदिशिव के बराबर मानी गई थी परन्तु वैदिककाल की देवियाँ अदिति, उषा, सरस्वती, भारती, इड़ा को पुरुषों से निम्न स्थान प्राप्त था। लेकिन अदिति नामक देवी में पूरा ब्रह्माण्ड, देश, काल सभी को समाहित बतलाया गया है।

माता की महत्ता को बताते हुए बशिष्ठ कहते है कि आचार्य का गौरव दस उपाध्यायों से बढ़कर होता है, पिता का गौरव सौ आचार्यों से बढ़ कर होता है, किन्तु माता का गौरव एक हजार पिताओं से भी बढ़कर होता है। वैदिककालीन साहित्य में कन्या जन्म एवं उसके लालन-पालन में पुत्र के समान स्तर के सम्बन्ध में परस्पर विरोधी तथ्य सामने आते है। वृहदारण्यक उपनिषद् में कन्या जन्म का ‘दुहिता में पांडित्य जायते’ कहकर आदर किया गया है एवं वाराह गृह-सुत्र में सुन्दर कन्याओं की उत्पत्ति पर प्रसन्नता व्यक्त की गई है। यहाँ कन्या के प्रति कुछ श्लोकों में पुत्री के प्रति स्नेह की अभिव्यक्ति भी मिलती है एवं अभिभावक एवं उसकी पुत्री के सम्बन्धों की स्वर्ग एवं पृथ्वी की उपमा द्वारा अभिव्यक्ति की गई है।

वृहदारण्यक उपनिषद् में विदुषी पुत्री के जन्म की कामना करने के लिए एक अनुष्ठान का उल्लेख मिलता है। लेकिन अथर्ववेद में कहा गया है कि हमारे यहाँ पुत्र का जन्म हो और कन्या का जन्म किसी ओर के घर में हो। आगे कहा गया है कि पुत्र के बाद पुत्र का ही जन्म हो न कि कन्या का। तैतिरीय संहिता के अनुसार पुत्र का जन्म होने पर पिता आनन्दपूर्वक माता के पास लेटे हुए नवजात शिशु को उठा लेता था किन्तु यदि कन्या होती थी तो उसे वहीं लेटे रहने देता था। ऐतरेय ब्राह्यण में तो कन्या की उत्पत्ति को स्पष्ट शोक का कारण माना गया है। लेकिन आगे चलकर कन्याओं के प्रति आर्यों की चाहत कुछ बढ़ी।

वृहदारण्यक उपनिषद में पुत्र की कामना के साथ ही कन्या जन्म को आदर दिया गया है। वराह गृहसुत्र में बताया गया है कि अच्छी संतान विशेषकर सुन्दर कन्याओं की उत्पत्ति के समय वधुएं दुंदभी, गोमुख आदि वाद्यों का वादन कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करती थीं। उत्तरवैदिक युग एवं महाकाव्य काल तक आते-आते पुत्र की कामना अत्यंत बलवती होने लगी। कन्यादान को गोदान से तुलनीय समझने वाले समाज में कन्या का जन्म, सुरक्षा, की जिम्मेदारियों, विवाह के बाद कन्या के दूसरे के घर में चले जानेवाले धन एवं पिण्डदान में पुत्र की आवश्यकता के कारण, घर में गाय आने से भी कम प्रसन्नता का कारण बनता था। अथर्ववेद में सभा एवं समिति को प्रजापति की पुत्रियाँ कहा गया है।

आदर्श राजनीतिक संस्थाओं की तुलना पुत्रियों से की गई है पुत्रों से नहीं लेकिन पित्तरों के उद्वार के लिए वह अपने माता – पिता और पति तीनों कुलों के लिए संकट थी। मनुस्मृति तक कन्या की स्थिति अपनी हीनतम स्थिति में पहुँच गई एवं उस पर नियंत्रण एवं बंधन कठोरतम होते चले गये। मनु ने पुत्री को पुत्र के समान ही माना है। नारद और वृहस्पति ने पुत्र के अभाव में कन्या के पुत्र को पिता की संतान होने से सम्पत्ति का उत्तराधिकार बताते हैं। वेदों में कुछ श्लोक इस बात को रेखांकित करते हैं कि कुमारियों के लिए शिक्षा अपरिहार्य एवं महत्वपूर्ण मानी जाती थी। एक शिक्षित लड़की का विवाह एक ऐसे दूल्हे से किया जाना चाहिए जो उसके समान ही शिक्षित हो। ऋग्वेद और अथर्ववेद में 25 ऋषिकाओं के नाम हैं वे 422 मंत्रों की द्रष्टा है।

वाक्, आम्भृणी, घोषा, अपाला, उर्वशी, इन्द्राणी, सची, रोमशॉ, श्रद्धा, कामायनी, यमी, वैवस्वती आदि प्रख्यात् ऋषिकाएँ हैं। ऋग्वेद (1.179.2) में लोपामुद्रा का कथन सारगर्भित है कि सत्य की साधना करने वाले देवतुल्य ऋषियों ने भी संतति प्रवाह चलाया है, वे भी जीवन के अंत तक ब्रह्मचारी ही नहीं रहे, उनकी भी पत्नियाँ थीं। वैदिक स्त्री दब्बू और शोषक नहीं है, वह खुलकर बात करती है, लोपामुद्रा भी अपने ऋषि पति से भी संवाद करते हुए खुलकर बोलती है, ऐसी ही एक ऋषिका है इन्द्राणी। इन्द्राणी कहती है कि ‘मैं मूर्धन्य हूँ, उग्र वक्ता हूँ।’ एक अन्य श्लोक में रोमशा की उद्घोषणा है कि जिस प्रकार गंधार प्रदेश की भेड़े रोमों से भरी रहती है उसी प्रकार मैं गुणों से भरपूर हूँ।

उत्तरवैदिक काल मे महिलाओं की सामाजिक और धार्मिक प्रतिष्ठा ऋग्वैदिक काल की तुलना में कुछ कम हो गई थी। ऐतरेय ब्राह्मण में कन्या को चिन्ता का कारण बताया गया है। मैत्रायणी संहिता में स्त्री को द्यूत तथा मंदिरा की श्रेणी में रखा गया है। शतपथ ब्राह्मण में स्त्रियों को असत्य बतलाया गया है। कई अवसरों पर स्त्री और शूद्र के साथ शिक्षितों के भाषण को अनुचित बतलाया गया है। स्त्री को निष्कृष्ट मानते हुए ब्राह्मण गृहसूत्र, धर्मसूत्र स्मृति और पुराणों में शूद्र के साथ उल्लेखित किया गया है।

धर्मशात्रों में स्त्री को आजीवन दास बतलाया गया है। मनु और याज्ञवल्वय के अनुसार स्त्री कभी स्वतंत्र नहीं है, जब तक कुमारी रहती है पिता उसकी रक्षा करता है युवावस्था में पति उसे नियंत्रित करता है और बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करता है। स्त्री कभी भी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है। यह बतलाया गया है कि पुरुष स्त्रियों को सदैव अपने नियंत्रण में रखे। कालान्तर मे पति की प्रभुता लगातार बढ़ती चल गई। पति को पत्नी का देवता माना जाने लगा।

मनु ने स्त्री को अपने पति की देवतुल्य आराधना करने का उपदेश दिया है। रामायण और महाभारत में भी पति को देवतुल्य मानने के संकेत मिलते है। वहीं स्त्री पुजनीय होगी जो दुराचारी, कामी, लम्पट शीलगुण विद्याहीन पति को भी देवता की तरह पूजे। तैतरीय संहिता में कहा गया है कि एक सदाचारी स्त्री, दुराचारी पति से भी निःकृष्ट है। रोम के वर्ग विभाजित पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों एवं दासों को एक ही श्रेणी में रखा जाता था। उसी प्रकार भारत में भी स्त्रियों और शुद्रों को एक ही श्रेणी में रखा जाता था। संस्कृत के मूल पाठों के अनेक परिच्छेदों में स्त्रियों और शुद्रों के साथ समान व्यवहार का उल्लेख है।

उत्तरवैदिक काल में दोनों को वेद पढ़ने और वैदिक अनुष्ठानों में भाग लेने का अधिकार नहीं था। स्त्रियों और शूद्रों को बराबर समझने का सर्वप्रथम उल्लेख लगभग छठी शताब्दी ई. पूर्व के ग्रंथ शतपथ ब्राह्यण में पाया जाता है। लेकिन गुप्त पूर्व और अधिकत्तर गुप्तोत्तर ग्रंथों से अभिप्रमाणित होता है कि स्त्रियाँ शूद्रों की, जो खिदमती वर्ग के होते थे; कोटि की समझी जाती थी और पराधीन थी। यह वहीं स्त्री थी जिसे वैदिक युग में घर में रानी की तरह प्रतिष्ठित किया जाता था। धार्मिक अनुष्ठानों में साधिकार प्रवेश पाती थी।

ऋग्वैदिक ऋचाओं में कुछ महिलाओं को यज्ञ करते हुए पाया गया है। ऋग्वेद में एक कन्या का उल्लेख है जो यज्ञ में इन्द्र देवता को सोमरस प्रदान करती है। स्त्रियाँ केवल रजस्वला की दशा में ही अमेध्य समझी जाती थी। बाद में प्रत्येक माह इस प्रकार दूषित होने के कारण स्थाई रूप से यज्ञ के लिए अमेध्य समझी जाने लगी। स्त्रियों का अयोग्य होना तथा आर्यो द्वारा अनार्य स्त्रियों के साथ विवाह सम्बन्ध भी पत्नी को यज्ञाधिकार से बहिष्कृत करने का एक मुख्य कारण रहा होगा। ये अनार्य पत्नियाँ वैदिक कर्मकाण्ड में अनेक भूलें कर सकती थी। इसी कारण उनसे यज्ञकार्य का अधिकार छीनना वांछनीय समझा गया।

कैलाशचन्द्र जैन का विचार है कि छठी सदी ई. पूर्व में बालविवाह का प्रचार होने से स्त्रियों में उपनयन की प्रथा अप्रचलित होने लगी। स्त्रियों को उपनयन के अभाव में शूद्र समझा जाने लगा और यज्ञ और मंत्रोच्चारण का अधिकार छिन लिया गया। 7-8वीं सदी के पराशर स्मृति के अनुसार शूद्र और स्त्री की हत्या का दण्ड एक जैसा होगा। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्त्री, वैश्य या शूद्र को अधम कोटि का प्राणी बताकर उसके उद्धार की बात करते है। सांख्यायन गृहसूत्र के अनुसार स्त्री और शूद्र के निकट वेदपाठ वर्जित है।

संस्कृत नाटकों एवं महाकाव्यों में स्त्री एवं शूद्र पात्रों को संस्कृत बोलते हुए दिखाया गया है। बाणभट्ट की कादम्बरी, श्रीहर्ष की नैषध चरित और कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतल में स्त्री और निम्न जाति के लोग प्राकृत भाषा का इस्तेमाल करते है, जबकि राजवंशी पुरुष संस्कृत का। बौद्धधर्म मे भी नियमानुसार समर्पित भिक्षुणी के भी सदैव नवीनतम प्रशिक्षित भिक्षु के अधीन ही रहना पड़ता था। रामशरण शर्मा के अनुसार यह सभी प्राचीन वर्ग विभाजित समाजों का सामान्य लक्षण प्रतीत होता है कि जहाँ पुरुष का स्त्री पर तथा पुरोहितों एवं योद्धाओं का छोटे-छोटे व्यापारियों एवं उत्पादक श्रमिकां पर आधिपत्य रहता है, वैसे समाज में स्त्रियाँ और श्रमिक वर्ग एक ही कोटि में रखे जाते थे। वैदिक काल में पति को पत्नी की हत्या करने या प्रताड़ित करने का कोई अधिकार नहीं था।

कौटिल्य के अनुसार पत्नी को अनुशासन में रखने के लिए प्रताड़ा जा सकता है। मनु ने भी पति को पत्नी के अपराध करने पर उसे दंडित करने का निर्देश दिया है। पति को कुछ दशाओं में एक पत्नी के होते हुए भी दूसरी स्त्री से विवाह का तथा भार्या त्याग का अधिकार प्राप्त था। पत्नी के शराबी होने, कुल्टा, प्रतिकूल, रोगिणी, अपव्ययी, तथा वंध्या होने पर उसे त्यागा जा सकता था। परन्तु भार्या को त्यागने पर पति को उसका भरण – पोषण करना अनिवार्य था।9 वृहस्पति ने जब प्रमादपूर्वक अपनी प्रमदा जुहू का परित्याग कर दिया तब वह जरा भी विचलित हुए बिना निर्णायक मंडल के पास चली गई। निर्णायकों के आदेश से पत्नी त्याग का प्रायश्चित कर वृहस्पति फिर से गृहस्थाश्रम में दाखिल हुए थे।

बौद्ध साहित्य में भी महिलाओं की स्थिति का जो चित्रण मिलता है वह प्रशंसनीय नहीं है। बौद्धकाल में उनके सामाजिक और शैक्षणिक अधिकारों में कमी आई थी। चुल्लवग्ग जातक से पता चलता है कि महात्मा बुद्ध स्त्रियों के संघ में प्रवेश के विरोधी थे और प्रथम बार उन्होंने अपने पोषण करने वाली प्रजापति गौतमी को संघ में लेने से स्पष्टतः इंकार कर दिया था लेकिन जब आनन्द के परामर्श से वैशाली में बुद्ध ने गौतमी को संघ में प्रवेश के साथ ही प्रवज्जा की अनुमति प्रदान कर दी तो अत्यंत अशांत और क्षुब्ध हो गए थे तथा संध के विनाश की भविष्यवाणी तक कर डाली थी। साथ ही उन्होंने स्त्रियों के आचरण सम्बन्धी कठोर नियम भी बना दिए। इस नियम के अनुसार भिक्षुणी को अपने साथी भिक्षुओं से हीनतर माना गया है।

बुद्ध स्त्रियों के प्रति सदैव संशयशील रहे, वे आनन्द से अक्सर कहा करते थे कि जहाँ नारियॉँ घर छोड़कर संध में प्रवेश करती है वहॉँ धर्म स्थाई नही रह पाता। सामाजिक स्तरीकरण में उच्च जातियों की तुलना में शूद्र महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। ब्राह्मणिक ढाँचे पर आधारित वर्णव्यवस्था के कारण भी स्त्रियों की स्थिति में अन्तर था। बौद्धायन धर्मसूत्र से ज्ञात होता है कि उसके आर्थिक कारण थे। बौद्धायन के अनुसार कृषि आदि सेवा कर्म में सन्नद्व होने के कारण वैश्य एवं शूद्र स्त्रियों को वश में रखना संभव नहीं है।

निम्न जातियों की स्त्रियां घर बाहर दोनों जगहों पर काम करती थीं। इससे उसमें पति पर निर्भरता नहीं रहती थी। इसके विपरीत उत्पादन कार्यों से उच्चवर्णों का अलगाव उनकी स्त्रियों के पतियों पर आश्रित होने का कारण था। साथ ही उच्चवर्ण की स्त्रियों का अपने पति की सम्पत्ति पर अधिकार का अभाव भी वह प्रमुख कारण था जिसके चलते पति पर उच्चवर्ण की स्त्रियों की निर्भरता बढ़ गई थी। महिलाओं को स्वयं सम्पत्ति मानते हुए उनको उत्तराधिकार से वंचित रखा गया था। वैदिक युग में स्त्री की सामाजिक स्थिति अत्यंत अच्छी होने के बावजूद उनके साम्पत्तिक अधिकार उपेक्षित थे।

ऋग्वेद मे यह उल्लेख मिलता है कि भाई अपनी बहन को पैतृक सम्पत्ति में कोई हिस्सा नहीं देता था। तत्कालीन कुछ उदाहरणों से ऐसे संकेत मिलते है जिससे स्पष्ट होता है कि वैदिक युग के प्रारम्भ में स्त्रियों को कुछ सम्पत्ति के अधिकार भी प्राप्त थे। संहिताओं में पत्नी के पारिग्राह्य अर्थात् घर की वस्तुओं की स्वामिनी स्वीकार किया गया है। स्त्री को अपने लिए धन का कुछ विशिष्ट भाग प्राप्त होता था जिस पर केवल उसी का अधिकार था। स्त्रीधन में से नारी ब्राह्मणों को दान भी दे सकती थी। किन्तु संभवतः वैदिक युग के अंत में विदित होता है कि पत्नी पति के दाय की उत्तराधिकारिणी होती थी।

याज्ञवल्क्य के संन्यास ग्रहण करने का निश्चय करने पर एक पत्नी मैत्रेयी का दूसरी पत्नी कात्यायनी के साथ संपत्ति का संविभाग करने को कहा गया था। ऋग्वैदिक काल में स्त्री को सम्पत्तिऔर शासन के अधिकारों से वंचित रखने के पीछे कुछ विशेष कारण उत्तरदायी थे। भू-सम्पत्ति का अधिकारी वह होता था जो शक्तिशाली शत्रुओं से बलपूर्वक उसकी रक्षा करने में समर्थ होता था। चूँकि यह कार्य स्त्री के वश का नहीं था अतः उसके धन सम्बन्धी अधिकारों को मान्यता नहीं मिली थी। थेरीगाथा में उल्लेख मिलता है कि सुन्दरी की माता अपनी पुत्रियों के बौद्ध संघ में प्रवेश करने के लिए मना करती है ताकि वे अपने पिता की समस्त सम्पत्ति की उत्तराधिकारिणी हो सके, क्योंकि वह भिक्षु बन गया था (थेरीगाथा – 327) बौधायन आपस्तम्ब, गौतम और महाभारत में कन्या को औरस पुत्र के अभाव में अन्य पुत्रों की अपेक्षा अधिक ऊँचा स्थान दिया गया है। नारद ने भी पुत्रों के अभाव में दुहिता को ही दायद बताया है।

कात्यायन ने अविवाहित कन्या को पत्नी के अभाव में ‘खिचहर‘ माना है। वृहस्पति ने भी पुत्र के अभाव में पुत्री को दायद माना है। लेकिन मनु ने स्त्रियों को ताबेदार घोषित करते हुए साम्पत्तिक अधिकार प्रदान नहीं किए है। स्त्रियों को मात्र स्त्रीधन पर अधिकार है जिसका अर्थ था कि वे अपने सम्बन्धियों द्वारा दिए गये वस्त्रों, रत्नों और इसी प्रकार की चल सम्पत्ति की वस्तुओं के रूप मे दान और उपहार ले सकती थी। वास्तव में इसका लाभ केवल उच्चत्तर एवं समृद्ध महिलायें ही उठा सकती थी। बाद में स्थिति बदली और उनकी गणना सम्पत्ति के तौर पर की जाने लगी। बहुत से परिच्छेदों में स्त्रियॉँ चल सम्पत्ति के तौर पर मानी गई है। ऋग्वेद और महाभारत के कुछ उद्धरणों से पता चलता है कि पति का पत्नी के शरीर पर पूरा अधिकार था और वह उसे इच्छानुसार उपहार में दे सकता था। इसी अधिकार का प्रयोग करते हुए युधिष्ठिर ने द्रौपदी को द्यूतक्रीड़ा में दांव पर लगा दिया था।

वैदिक युग में प्रयुक्त दम्पत्ति शब्द का यह निहितार्थ है कि सभ्य परिवारों में पत्नी को पति के समान ही सम्पत्ति में समान अधिकारी माना गया है। विवाह के अवसर पर पति यह प्रतिज्ञा करता था कि वह आर्थिक मामलों मे अपनी पत्नी के अधिकारों तथा हितों की उपेक्षा नहीं करेगा। परन्तु संयुक्त परिवार के सिद्धान्त से स्त्री को बहुत कम लाभ हुए। उसे केवल अपने निर्वाह के लिए पति से हर्जाना प्राप्त करने का अधिकार मिला। मनुस्मृति में कहा गया है कि अपने पत्नी के उचित निर्वाह की व्यवस्था किए बिना पति कहीं यात्रा पर नहीं जा सकता है। यदि पुरुष एक पत्नी को छोड़कर दूसरी शादी करता है तो ऐसे प्रथम स्त्री के जीवन-निर्वाह के लिए उचित व्यवस्था करनी चाहिए।

प्रारम्भिक विधि-व्यवस्थाकारों ने पत्नी को पति के विरुद्ध राजकीय न्यायालय में जाने की अनुमति दी है फिर भी विज्ञानेश्वर जैसे शास्त्रकारों ने इस बात पर जोर दिया है कि यदि पति अपनी साध्वी पत्नी का त्याग करे अथवा उसकी सम्पत्ति का अपहरण करे तो वह न्यायालय में उपस्थित हो सकती है। निरुक्त से भी पता चलता है कि कभी-कभी स्त्रियाँ अपने अधिकारों को सिद्ध करने के लिए न्यायालय में जाती थी।

(शैलेन्द्र चौहान जयपुर में रहते हैं।)

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