Monday, August 15, 2022

रूसी जमीन पर क्रांति के नायक लेनिन से एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी की मुलाकात

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भारत के स्वाधीनता संग्राम पर मार्क्सवादी विचारधारा का व्यापक प्रभाव पड़ा है। 1857 के प्रथम स्वाधीनता पर कार्ल मार्क्स ने भी एक किताब लिखी है और उस संघर्ष को उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक प्रतिरोध कहा है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम पर रूसी क्रांति और लेनिन के संघर्षों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक अन्तर्धाराओं की तरह यहां की राजनीतिक सोच पर भी वैश्विक विचारधाराओं का व्यापक प्रभाव पड़ा है। फ्रांसीसी क्रांति के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के महान घोष और ब्रिटिश लोकतंत्र के निरन्तर विकास के साथ रूसी क्रांति और लेनिन की सोच, रणनीति और उनके नायकत्व ने भारत के आज़ादी के आंदोलन के नायकों को बहुत प्रभावित किया और उन्हें तराशा भी। 

लेनिन से जुड़ा यह रोचक और दिल को छू लेने वाला यह संस्मरण पढ़ें। यह संस्मरण है राजा महेंद्र प्रताप और लेनिन की मुलाक़ात का। मथुरा से जब आप हाथरस की ओर चलेंगे तो हाथरस जिले में प्रवेश करते ही एक कस्बा पड़ेगा मुरसान । मुरसान एक छोटा सा कस्बा है। वहां के राजा थे राजा महेंद्र प्रताप सिंह। राजा महेंद्र प्रताप उन विलक्षण और प्रतिभाशाली स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में से एक रहे हैं जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारत के बाहर आज़ादी की मशाल और स्वतंत्र चेतना को जगाये रखा। उनका जन्म 1 दिसंबर, 1896 को और मृत्यु 29 अप्रैल, 1979 को हुयी थी। वे मथुरा से आज़ादी के बाद सांसद भी रहे हैं । वे स्वाधीनता संग्राम के सेनानी के साथ-साथ पत्रकार, लेखक और समाज सुधारक भी थे। मुरसान एक छोटी सी रियासत रही है ।

राजा महेंद्र प्रताप प्रथम विश्व युद्ध के समय यूरोप में ही थे। उस समय वे रूस भी गए थे और वर्ष 1919 में उनकी मुलाकात लेनिन से हुई थी। वे जर्मनी से रूस जाकर लेनिन से मिले थे। अपनी इस मुलाकात का जिक्र उन्होंने स्वयं किया है। उनकी मुलाकात का संस्मरण मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।

कॉमरेड लेनिन के साथ मेरी मुलाकात

यह 1919 की कहानी है। मैं जर्मनी से, रूस वापस आ गया था। मैं पूर्व शुगर-राजा (रूस के जार के अधीन एक सामंत) के महल की इमारत पर रहा। मौलाना बरकतुल्ला (ये भी क्रांतिकारी आंदोलन में राजा महेंद्र प्रताप के साथ थे) इस स्थान पर अपने मुख्यालय की स्थापना करना चाहते हैं। उनका रूसी विदेश कार्यालय के साथ बहुत अच्छा संबंध था। जब मैं वहां था तो शहर में भोजन की कमी थी। और हम सब सच मे तंगी में थे। मेरे भारतीय मित्रों ने इस यात्रा के लिये धन और साधन एकत्र किया था। जो बर्लिन से यहां आने पर मुझे मिलना था।

एक शाम को हमें सोवियत विदेश कार्यालय से फ़ोन कॉल मिला। मुझे बताया गया कि विदेश मंत्रालय से कोई व्यक्ति आ रहा है और मुझे अपनी पुस्तकों को उस आदमी को सौंप देना है। मैंने ऐसा ही किया । अगली सुबह वह दिन आया जब मैं अपने दोस्तों के साथ क्रेमलिन में कॉमरेड लेनिन से मिलने गया। प्रोफेसर वोसेंसस्की जो लेनिन के सहयोगी थे , हमें मास्को के प्राचीन इम्पीरियल पैलेस में ले गये । हमें सुरक्षा गार्ड के माध्यम से यह बताया गया कि हम ऊपर चले जायें।  हमने एक बड़े कमरे में प्रवेश किया ‘जिसमें एक बड़ी मेज थी। कमरे में प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता कॉमरेड लेनिन बैठे हुये थे। मैं सरकार के मुखिया ( राजा महेन्द्र प्रताप ने 1 जनवरी 1915 में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना प्रवास , गवर्नमेंट इन एक्जाइल, में ही की थी , वे खुद को राष्ट्रपति और मौलाना बरकुतल्लाह खान को प्रधानमंत्री घोषित कर चुके थे।

यह सरकार काबुल, अफगानिस्तान में घोषित की गयी थी ) होने के कारण पहले कमरे में प्रवेश किया। तब मेरे समक्ष बैठा व्यक्ति या नायक अचानक खड़ा हो गया, और एक कोने में जाकर मेरे बैठने के लिये एक छोटी सी कुर्सी लाया। और उसे अपनी कुर्सी के पास रखा। जब मैं उसके पास आया तो उसने मुस्कुरा कर मुझ से बैठने के लिए कहा। एक पल के लिए मैंने सोचा था कि, कहाँ बैठना है, क्या मुझे खुद श्री लेनिन द्वारा लायी गयी इस छोटी कुर्सी पर बैठना चाहिए या कमरे में ही रखी मोरक्को के चमड़े से ढकने वाली विशाल कुर्सियों में से किसी भी एक पर बैठना चाहिए।

वे कुर्सियां दूर रखी थीं। लेकिन लेनिन ने जो कुर्सी मेरे लिये लायी थी, वह एक साधारण सी कुर्सी थी। मुझे बैठने के लिये कमरे में और भी कुर्सियाँ थीं। पर मैं अचंभित था कि लेनिन ने खुद ही मेरे लिये उठ कर एक कुर्सी उठायी और उसे अपनी कुर्सी के पास रखा। मैं उस छोटी सी कुर्सी पर जिसे लेनिन खुद ही उठा कर लाये थे, बैठ गया, जबकि मेरे दोस्त, मौलाना बरकातुल्लाह और मेरे साथ आये अन्य साथियों ने बड़े पैमाने पर रखी बड़ी कुर्सियों पर अपना स्थान ग्रहण किया। लेनिन खुद एक साधारण और छोटी कुर्सी पर बैठे थे।

कॉमरेड लेनिन ने मुझसे पूछा, मुझे किस भाषा में संबोधित करना था- अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन या रूसी । मैंने उन्हें बताया कि हम अंग्रेजी में बेहतर बोल और समझ सकते हैं। मैंने उन्हें भारतीय इतिहास से जुड़ी कुछ पुस्तकें दीं। मुझे आश्चर्य हुआ जब उन्होंने कहा कि वह पहले से ही इसे पढ़ चुके हैं। मैं देखा कि एक दिन पहले विदेश मंत्रालय द्वारा मांगे जाने वाले पर्चे और पुस्तिकाएं लेनिन ने खुद के लिए मंगाये थे। उन पर उन्होंने कुछ निशान भी लगाए थे। निश्चित ही रूप से लेनिन ने उन्हें पढ़ा होगा। लेनिन का अध्ययन बहुत गम्भीर और व्यापक था। लेनिन ने मेरी किताब “टॉल्स्टॉयविम” की चर्चा की।

उन्होंने टॉलस्टॉय, पुश्किन, गोर्की आदि पर बहुत मजे हुए साहित्य के आलोचक के समान चर्चा की। फिर बातें मार्क्सवाद, सर्वहारा की क्रांति से लेते हुये नवजात रूसी सरकार और जनता के लिये गेहूं, चावल, मक्खन, तेल, कोयले आदि जैसे आवश्यक वस्तुओं के सम्बंध में हुईं। लेनिन का ज्ञान और मेधा शक्ति व्यापक थी। वे एक-एक छोटी से छोटी चीज पर भी अपनी पैनी नज़र रखते थे। हमने काफी समय तक बातचीत की। भारत में ब्रिटेन के राज्य के अलावा किसान और उद्योगों में मज़दूरों की स्थिति पर भी बात हुई।

इस साक्षात्कार के बाद विदेश कार्यालय ने फैसला किया कि मुझे अफगानिस्तान में पहले रूसी राजदूत सुरिट्स के साथ जाना चाहिए। क्योंकि मेरी सरकार का मुख्यालय काबुल था। मैं रूस के समर्थन हेतु कॉमरेड लेनिन से मिलने गया था। लेकिन मुझे इस मिशन में बहुत सफलता नहीं मिली। मेरा काम अमानुल्लाह खान को रूसी राजदूत सुरिट्स से परिचय कराना था। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध में इंग्लैंड के विजयी होने और रूस की स्थिति भी बहुत मजबूत न होने के कारण हम अपने लक्ष्य में बहुत आगे नहीं बढ़ सके । उस समय रूस में नयी-नयी क्रांति हुई थी और रूस अपनी ही समस्याओं से जूझ रहा था। लेनिन ऐसी स्थिति में थे ही नहीं कि ब्रिटेन की ताक़त के सामने मेरी कोई मदद कर सकें। पर मैं लेनिन की प्रतिभा, जुझारूपन, अध्ययन स्पष्टता और सादगी से बहुत ही प्रभावित हुआ।”

वीआई लेनिन, विश्व के सर्वप्रथम समाजवादी क्रांति के महानायक थे। वे रूस की जारशाही और सामन्तवाद के विरुद्ध उठी जनक्रांति के सूत्रधार थे। उनका निधन 21 जनवरी, 1924 को रूस के गोर्की नामक स्थान पर हुआ था। उनकी आज पुण्यतिथि है। इस महान क्रांतिकारी और सिद्धांतकार समाजवादी योद्धा को उनके पुण्यतिथि पर विनम्र स्मरण ।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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