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जन्मदिन पर विशेष: निर्देशक एमएस सथ्यू और उनकी ऑल टाइम ग्रेट फिल्म ‘गर्म हवा’

हिन्दी सिनेमा में बहुत कम ऐसे निर्देशक रहे हैं, जिन्होंने अपनी सिर्फ एक फिल्म से फिल्मी दुनिया में ऐसी गहरी छाप छोड़ी कि आज भी उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। निर्देशक मैसूर श्रीनिवास सथ्यू यानी एमएस सथ्यू ऐसा ही एक नाम और साल 1973 में आई उनकी फिल्म ‘गर्म हवा’, ऐसी ही एक कभी न भूलने वाली फिल्म है। एमएस सथ्यू की इकलौती यही फिल्म, उनको भारतीय सिनेमा में बड़े फिल्मकारों की कतार में खड़ा करती है। ‘गर्म हवा’ को रिलीज हुए, आधी सदी होने को आई, मगर यह फिल्म आज भी अपने विषय और संवादों की वजह से हमारे मन को उद्वेलित, आंदोलित करती है। मुल्क के अंदर आजादी के शुरुआती सालों में हिंदुस्तानी मुसलमानों की जो मनःस्थिति थी, वह इस फिल्म में बखूबी उभरकर सामने आई है।

फिल्म न सिर्फ मुसलमानों के मन के अंदर झांकती है, बल्कि बंटवारे से हिंदुस्तानी समाज के बुनियादी ढांचे में जो बदलाव आए, उसकी भी सम्यक पड़ताल करती है। निर्देशक एमएस सथ्यू ने बड़े ही हुनरमंदी और बारीकी से उस दौर के पूरे परिवेश को फिल्माया है। ‘गर्म हवा’, एमएस सथ्यू की पहली हिन्दी फिल्म थी। इससे पहले उन्होंने फिल्म निर्माता-निर्देशक चेतन आनंद के सहायक निर्देशक के तौर पर फिल्म हकीकत में काम किया था। इस फिल्म के वे कला निर्देशक भी थे। जिसके लिए साल 1964 में उन्हें ‘फिल्म फेयर’ पुरस्कार का तमगा मिला।

रंगमंच और सिनेमा में एनिमेशन आर्टिस्ट, असिस्टेंट डायरेक्टर (चेतन आनंद), निर्देशन (फिल्म और नाटक), मेकअप आर्टिस्ट, आर्ट डायरेक्टर, प्ले डिजाइनर, लाइट डिजाइनर, लिरिक्स एक्सपर्ट, इप्टा के प्रमुख संरक्षक, स्क्रिप्ट राइटर, निर्माता जैसी अनेक भूमिकाएं एक साथ निभाने वाले एमएस सथ्यू की पैदाइश देश के दक्षिणी प्रदेश कर्नाटक के मैसूर की है। एक कट्टरपंथी ब्राह्मण परिवार में 6 जुलाई, 1930 को जन्मे एमएस सथ्यू को उनके परिवार वाले वैज्ञानिक बनाना चाहते थे, लेकिन सथ्यू ने अपने पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ बीए की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद सिनेमा और थियेटर में अपने भविष्य की तलाश में मुंबई रवाना हो गए। मुंबई रवाना होने से पहले उन्होंने तीन साल कथकली डांस सीखा।

कुछ जगह इसको परफॉर्म भी किया। मशहूर नृत्य निर्देशक उदय शंकर की फिल्म ’कल्पना’ में काम किया। जो मुल्क की पहली बैले फ़िल्म थी, लेकिन उन्हें आत्म संतुष्टि नहीं मिली। यही वजह थी कि वे सपनों की नगरी मुंबई पहुंचे। बहरहाल काम की तलाश में छह महीने तक इधर-उधर भटकते रहे। फिर उनकी मुलाकात ख्वाजा अहमद अब्बास और हबीब तनवीर से हुई। भारतीय जन नाट्य संघ यानी ‘इप्टा’ उस वक्त मुल्क में उरूज पर था, सथ्यू भी इससे जुड़ गए। हिंदी-उर्दू जबानों पर उनका अधिकार नहीं था, लिहाजा उन्होंने पर्दे के पीछे काम करने का रास्ता चुना। इप्टा के उस सुनहरे दौर में उन्होंने उसके लिए कई अच्छे नाटकों का निर्देशन किया। जिनमें ‘आखिरी शमा’, ‘रोशोमन’, ‘बकरी’, ‘गिरिजा के सपने’, ‘मोटेराम का सत्याग्रह’ और ‘सफ़ेद कुंडली’ के नाम शामिल हैं। ‘इप्टा’ से एमएस सथ्यू को ना सिर्फ एक वैचारिक चेतना मिली, बल्कि आगे चलकर उनकी जो अखिल भारतीय पहचान बनी, उसमें भी इप्टा का अहम योगदान है।

इप्टा के अलावा एमएस सथ्यू ने हिंदुस्तानी थिएटर, नाट्य निर्देशक हबीब तनवीर के ओखला रंगमंच, कन्नड़ भारती और दिल्ली के अन्य समूहों की प्रस्तुतियों के लिए थिएटर में सेट डिजाइन करने समेत एक डिजाइनर और निर्देशक के तौर पर भी काम किया। हिंदी, उर्दू और कन्नड़ में 15 से अधिक वृत्तचित्र और 8 फीचर फिल्मों के अलावा उन्होंने कई विज्ञापन फिल्में भी कीं। गरम हवा, चिथेगू चिंथे, कन्नेश्वरा रामा, बाढ़, सूखा, ग़ालिब, कोट्टा, इज्जोडू एमएस सथ्यू द्वारा निर्देशित फीचर फिल्में हैं। लेकिन उन्हें पहचान ‘गर्म हवा’ से ही मिली। फिल्म बनने का किस्सा भी अजब है, जो उन्हीं की ज़बानी ‘‘मैं ‘कहां कहां से गुज़र गया’ की स्क्रिप्ट लेकर फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन से लोन लेने गया। मगर चेयरमैन बीके करंजिया ने कहा कि हीरो निगेटिव है। उसके बाद अफसानानिगार राजिंदर सिंह बेदी, इस्मत चुगताई आदि दोस्तों से बात हुई। नतीजा, ’गर्म हवा’ की स्क्रिप्ट बनी और करंजिया साहब ने उसे पसंद कर ली।’’

इस तरह फिल्म ‘गर्म हवा’ के बनने की शुरुआत हुई। मौजूदा पीढ़ी को यह सुनकर तआज्जुब होगा कि ‘फिल्म फाइनेंस कॉर्पोरेशन’ ने इस फिल्म को बनाने के लिए एमएस सथ्यू को सिर्फ ढाई लाख रुपए दिए थे। दोस्तों से कुछ और पैसों का इंतजाम कर, उन्होंने जैसे-तैसे फिल्म पूरी की। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग रीयल लोकेशन यानी आगरा और फतेहपुर सीकरी में की गई। ताकि फिल्म बनाने में कम खर्च हो। फिल्म के ज्यादातर कलाकार रंगमंच से जुड़े हुए थे, लिहाजा फिल्म में रीटेक तो कम हुए ही, पूरी फिल्म में कम से कम सोलह ऐसे सीन हैं, जिनमें एक भी कट नहीं है। यह सुनकर भी लोग शायद ही यकीन करें कि फिल्म महज 42 दिन में बन कर तैयार हो गई थी।

फिल्म पूरी हो गई, तो सेंसर से लेकर रिलीज तक के लिए संकट आन खड़ा हुआ। सेंसर बोर्ड ने इसे पास करने से यह कहकर इंकार कर दिया कि फिल्म की रिलीज से मुल्क में सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। ‘सेंसर बोर्ड’ से फिल्म पास नहीं हुई, तो एमएस सथ्यू ने उस वक्त की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी से संपर्क किया। सथ्यू ने राजीव गांधी और संजय गांधी को ‘क्राफ्ट’ पढ़ाया था। लिहाजा उनसे उनके पारिवारिक संबंध थे। एक इंटरव्यू में खुद एमएस सथ्यू ने इस पूरे वाकये को कुछ इस अंदाज में बयां किया है, ‘‘उनकी सूचना पर इंदिरा जी ने फिल्म देखने की इच्छा व्यक्त की। जिसे तमाम झंझटों के बावजूद उन्होंने दिल्ली ले जाकर दिखाया।

इंदिरा जी के अनुरोध पर सत्ता व विपक्ष के सांसदों को भी दिखाया और इस तरह सूचना-प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल के कहने पर सेंसर सर्टिफिकेट तो मिल गया, लेकिन बाल ठाकरे ने अड़ंगा खड़ा कर दिया। अतः प्रीमियर स्थल ‘रीगल थियेटर’ के सामने स्थित ‘पृथ्वी थियेटर’ में शिव सेना वालों को भी फिल्म शो दिखाया गया, जिससे वे सहमत हो सके।’’ बावजूद इसके फिल्म ‘गर्म हवा’ के लिए अभी और भी आजमाइशें बाकी थीं। अब छोटे बजट की इस फिल्म में, जिसमें कोई बड़ा सितारा मौजूद नहीं था, इसकी रिलीज के लिए कोई फिल्म वितरक तैयार नहीं हुआ। सथ्यू ने बेंगलुरु के एक फिल्म वितरक से संपर्क किया। जिसने इसे सबसे पहले बेंगलुरु में साल 1974 में रिलीज किया। फिल्म की तारीफ सुनकर, बाद में दूसरे हिंदी फिल्म वितरकों ने भी इसे अपने-अपने क्षेत्रों में रिलीज किया।

‘गर्म हवा’ ने बॉक्स ऑफिस पर तो कोई कमाल नहीं दिखाया, लेकिन फिल्म क्रिटिक द्वारा यह फिल्म खूब पसंद की गई। साल 1974 में फ्रांस के मशहूर ‘कांस फिल्म फेस्टिवल’ में गोल्डन पॉम के लिए इस फिल्म का नॉमिनेशन हुआ। भारत की ओर से यह फिल्म ‘ऑस्कर’ के लिए भी नामित हुई। राष्ट्रीय एकता-अखंडता के लिए इसे सर्वोत्तम फीचर फिल्म का ‘नरगिस दत्त राष्ट्रीय पुरस्कार’ मिला। यही नहीं फिल्म को तीन ‘फिल्म फेयर अवार्ड्स’ भी मिले। जिसमें बेस्ट डायलॉग कैफी आज़मी, बेस्ट स्क्रीन प्ले अवार्ड शमा ज़ैदी व कैफी आज़मी और बेस्ट स्टोरी अवार्ड इस्मत चुगताई की झोली में गए। इसी फिल्म के बाद एमएस सथ्यू को साल 1975 में भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ सम्मान से भी सम्मानित किया।

साल 1994 में रंगमंच और कला के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘संगीत नाटक अकादमी अवार्ड’ से नवाजा गया। साल 2005 में ‘इंडिया टाईम्स मूवीज’ ने जब बॉलीवुड की सर्वकालिक बेहतरीन 25 फिल्में चुनी, तो उसमें उन्होंने ‘गर्म हवा’ को भी रखा। एक अकेली फिल्म से इतना सब कुछ हासिल हो जाना, कोई छोटी बात नहीं। वह भी जब यह निर्देशक की पहली ही फिल्म हो। एमएस सथ्यू ने ‘गर्म हवा’ के बाद और भी कई फिल्में बनाईं, लेकिन उन फिल्मों को वह शोहरत और चर्चा नहीं मिली, जो ‘गर्म हवा’ को हासिल हुई थी। सिर्फ साल 1984 में आई उनकी फिल्म ‘सूखा’ थोड़ा-बहुत चर्चा में रही। जिसे श्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और बेस्ट फिल्म का ‘फिल्म फेयर क्रिटिक्स अवार्ड’ हासिल हुआ।

अब बात भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्म ‘गर्म हवा’ की। फिल्म में ऐसा क्या है ? जो इसे सर्वकालिक महान फिल्मों की श्रेणी में रखा जाता है। खुद एमएस सथ्यू की नजर में ‘‘फिल्म की सादगी और पटकथा ही उसकी खासियत है।’’ जिन लोगों ने यह फिल्म देखी है, वे जानते हैं कि उनकी यह बात सौ फीसद सही भी है। साल 1947 में हमें आजादी देश के बंटवारे के रूप में मिली। देश हिंदुस्तान और पाकिस्तान दो हिस्सों में बंट गया। बड़े पैमाने पर लोगों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में पलायन हुआ। हिंदुस्तानी मुसलमानों के सामने बंटवारे के बाद, जो सबसे बड़ा संकट पेश आया, वह उनकी पहचान को लेकर था। आजाद हिंदुस्तान में उनकी पहचान क्या होगी ? गोया कि यह वही सवाल था, जो आज़ादी से पहले भी उनके दिमाग को मथ रहा था।

भारत के बंटवारे के बाद जिन मुसलमानों ने पाकिस्तान की बजाय हिंदुस्तान को अपना मुल्क चुना और यहीं रहने का फैसला किया, उन्हें ही इसकी सबसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी। देखते ही देखते वे अपने मुल्क में पराए हो गए। मानो बंटवारे के कसूरवार, सिर्फ वे ही हों। आज़ादी को मिले सात दशक से ज्यादा गुजर गए, मगर हिंदुस्तानी मुसलमान आज भी कमोबेश उन्हीं सवालों से दो-चार हैं। पहचान का संकट और पराए पन का दंश आज भी उनके पूरे अस्तित्व को झिंझोड़ कर रख देता है। यही वजह है कि ‘गर्म हवा’ आज भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। फिल्म जब रिलीज हुई, तब तो इसकी प्रासंगिकता थी ही, मौजूदा हालात में इसकी और भी ज्यादा प्रासंगिकता बढ़ गई है। फिल्म का शीर्षक ‘गर्म हवा’ एक रुपक है, साम्प्रदायिकता का रुपक ! यह साम्प्रदायिकता की गर्म हवा आज भी हमारे मुल्क पर फन फैलाए बैठी है। यह गर्म हवा जहां-जहां चलती है, वहां-वहां हरे-भरे पेड़ों को झुलसा कर रख देती है। फिल्म के एक सीन में सलीम मिर्जा और तांगेवाले के बीच का अर्थवान संवाद है,‘‘कैसे हरे भरे दरख्त कट जा रहे हैं, इस गर्म हवा में।’’

‘‘जो उखड़ा नहीं, वह सूख जाएगा।’’ एक तरफ ये गर्म हवा फिजा को जहरीला बनाए हुए है, तो दूसरी ओर सलीम मिर्जा जैसे लोग भी हैं, जो भले ही खड़े-खड़े सूख जाएं, मगर उखड़ने को तैयार नहीं। कट जाएंगे, मगर झुकने को तैयार नहीं।

फिल्म ‘गर्म हवा’ की शुरुआत रेलवे स्टेशन से होती है, जहां फिल्म का हीरो सलीम मिर्जा अपनी बड़ी आपा को छोड़ने आया है। एक-एक कर उसके सभी रिश्तेदार, हमेशा के लिए पाकिस्तान जा रहे हैं। सलीम मिर्जा के रिश्तेदारों को लगता है कि बंटवारे के बाद अब उनके हित हिंदुस्तान में सुरक्षित नहीं। बेहतर मुस्तकबिल की आस में वे अपनी सरजमीं से दूर जा रहे हैं। पर सलीम मिर्जा इन सब बातों से जरा सा भी इत्तेफाक नहीं रखते। वे अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि को ही अपना मुल्क मानते हैं। बदलते हालातों में भी उनका यकीन जरा सा भी नहीं डगमगाता। अपने इस यकीन पर वे जिंदा हैं, ‘’गांधी जी की कुर्बानी बेकार नहीं जाएगी, चार दिन के अंदर सब ठीक हो जाएगा।’’

बहरहाल पहले उनकी बड़ी बहिन, फिर भाई और उसके बाद उनका जिगर का टुकड़ा बड़ा बेटा भी हिंदुस्तान छोड़, पाकिस्तान चला जाता है। पर वे तब भी हिम्मत नहीं हारते। हर हाल में वे खुश हैं। जबकि एक-एक कर, दुःखों का पहाड़ उन पर टूटता जा रहा है। अपने उनसे जुदा हुए तो हुए, साम्प्रदायिक दंगों की आग में उनके जूते का कारखाना जलकर तबाह हो जाता है। पुरखों की हवेली पर कस्टोडियन का कब्जा हो जाता है। और तो और खुफिया महकमा उन पर पाकिस्तानी जासूस होने का इल्जाम भी लगा देता है, जिसमें वे बाद में बाइज्जत बरी होते हैं। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी सलीम मिर्जा को आस है कि एक दिन सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा। ज़िंदगानी के संघर्ष में वे उस वक्त पूरी तरह टूट जाते हैं, जब उनकी जान से प्यारी बेटी आमना खुदकुशी कर लेती है।

बेटी आमना की खुदकुशी के बाद, वे फैसला कर लेते हैं कि अब हिंदुस्तान नहीं रुकेंगे। अपने परिवार को लेकर पाकिस्तान चले जाएंगे। अब आखिर, यहां बचा ही क्या है ! पर फिल्म यहां खत्म नहीं होती, बल्कि यहां से वह फिर एक नई करवट लेती है। फिल्म के आखिरी सीन में सलीम मिर्जा अपना मुल्क छोड़कर, उसी तांगे से स्टेशन जा रहे हैं, जिस तांगे से उन्होंने अपनों को पाकिस्तान के लिए स्टेशन छोड़ा था। तांगा रास्ते में अचानक एक जुलूस देखकर ठिठक जाता है। जुलूस मजदूर, कामगारों और बेरोजगार नौजवानों का है, जो ‘‘काम पाना हमारा मूल अधिकार !’’ की तख्तियों को लिए नारेबाजी करता हुआ आगे जा रहा है। सिकंदर अपने अब्बा से आंखों ही आंखों में कुछ पूछता है।

सलीम मिर्जा, जो अब तक सिकंदर की तरक्की पसंद बातों को हवा में उड़ा दिया करते थे, कहते हैं ‘‘जाओ बेटा, अब मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा। इंसान कब तक अकेला जी सकता है ?’’ सिकंदर, जुलूस की भीड़ में शामिल हो जाता है। सलीम मिर्जा इस जुलूस को देखते-देखते यकायक खुद भी खड़े हो जाते हैं और अपनी बेगम से कहते हैं,‘‘मैं भी अकेली जिंदगी की घुटन से तंग आ चुका हूं। तांगा वापस ले लो।’’ यह कहकर वे भी उस भीड़ में शामिल हो जाते हैं, जो अपने हकों के लिए संघर्ष कर रही है। बेहतर भविष्य का सपना और उसके लिए एकजुट संघर्ष का पैगाम देकर, यह फिल्म अपने अंजाम तक पहुंचती है।

एक लिहाज से देखें तो यह फिल्म का सकारात्मक अंत है। जो एक विचारवान निर्देशक के ही बूते की बात है। और यह सब इसलिए मुमकिन हुआ कि इस फिल्म से जो टीम जुड़ी हुई थी, उनमें से ज्यादातर लोग तरक्की पसंद और वामपंथी आंदोलन से निकले थे। फिल्म उर्दू की मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित है। इस कहानी को और विस्तार दिया, शायर कैफी आजमी ने। एमएस सथ्यू की पत्नी रंगमंच की एक और मशहूर हस्ती शमा जैदी ने कैफी के साथ मिलकर इस फिल्म की पटकथा लिखी। संवाद जो इस फिल्म की पूरी जान हैं, उन्हें भी कैफी ने ही लिखा और उन्हें एक नई अर्थवत्ता प्रदान की। गर्म हवा के संवाद इतने चुटीले हैं कि फिल्म में कई जगह यह संवाद ही, अभिनय से बड़ा काम कर जाते हैं। मसलन‘‘अपने यहां एक चीज मजहब से भी बड़ी है, और वह है रिश्वत।’’

‘‘नई-नई आजादी मिली है, सब इसका अपने ढंग से मतलब निकाल रहे हैं।’’

फिल्म के मुख्य किरदार सलीम मिर्जा का रोल निभाया है, बलराज साहनी ने। उनके बिना इस फिल्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। बलराज साहनी की यह आखिरी फिल्म थी। ‘धरती के लाल’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘काबुलीवाला’, ‘हकीकत’, ‘लाजवंती’ और ‘वक्त’ जैसी कई फिल्मों में बलराज साहनी का अभिनय देखने के काबिल है। ‘गर्म हवा’ में भी उन्होंने जो अभिनय किया, वह मील का पत्थर है। अपने चेहरे के हाव-भाव से ही, वे फिल्म में बहुत कुछ कह देते हैं। ‘गर्म हवा’ में उनके ऐसे कई सीन हैं, जो भुलाए नहीं भूलते। फिल्म में एक सीन है, जब सलीम मिर्जा की जवान बेटी आमना खुदकुशी कर लेती है। इस सीन में बलराज साहनी ने जो रियेक्ट किया, वह लाजवाब है। अपनी मृत बेटी को देखकर, वह बिल्कुल अवाक् रह जाते हैं। उनके मुंह से न तो एक शब्द निकलता है और न ही आंखों से आंसू। निर्देशक यहीं सीन खत्म कर देता है। बलराज साहनी ही नहीं फिल्म में और जितने भी कलाकार हैं, उन्होंने भी इसमें गजब का काम किया है।

सलीम मिर्जा की बेगम के रोल में मशहूर रंगकर्मी शौकत आजमी, तो उनकी मां के रोल में बदर बेगम खूब जमी हैं। मशहूर चरित्र अभिनेता एके हंगल का जिक्र किए बिना इस फिल्म की बात पूरी नहीं हो सकती। एके हंगल ने फिल्म में कराची से भागे एक सिंधी व्यापारी अजमानी साहब की भूमिका निभाई है। अजमानी साहब भी पाकिस्तान से अपने सीने में वही जख्म लेकर आए हैं, जो सलीम मिर्जा को हिंदुस्तान में मिल रहे हैं। बावजूद इसके उनके मन में मुसलमानों के खिलाफ बिल्कुल भी बदले की भावना नहीं है। सलीम मिर्जा के दर्द को यदि कोई सबसे ज्यादा समझता है, तो वह अजमानी साहब हैं। अजमानी साहब के किरदार को एके हंगल ने बड़े ही संजीदगी और सादगी से निभाया है। सिकंदर मिर्जा के रोल में फारुख शेख, हलीम मिर्जा-दीनानाथ जुत्शी, शमशाद-जलाल आगा, बेदार मिर्जा-अबू शिवानी, आमना-गीता काक भी खूब जमे हैं।

फिल्म में निर्देशक एमएस सथ्यू ने कैफी आजमी की नज्म का बहुत बढ़िया इस्तेमाल किया है। कैफी की यह बेहतरीन नज्मों में से एक है। नज्म साम्प्रदायिकता पर है और फिल्म में बिल्कुल सटीक बैठती है। नज्म दो हिस्सों में है। नज्म का पहला हिस्सा फिल्म की शुरुआत में शीर्षक के दौरान पार्श्व में गूंजता है,‘‘तक्सीम हुआ मुल्क, तो दिल हुआ टुकड़े-टुकड़े/हर सीने में तूफां यहां भी था, वहां भी/हर घर में चिता जलती थी, लहराते थे शोले/हर घर में श्मशान वहां भी था, यहां भी/गीता की न कोई सुनता, न कुरान की/हैरान इंसान यहां भी था और वहां भी।’’ नज्म का बाकी हिस्सा फिल्म के अंत में आता है, ‘‘जो दूर से करते हैं नजारा/उनके लिए तूफान वहां भी है, यहां भी/धारे में जो मिल जाओगे, बन जाओगे धारा/यह वक्त का एलान यहां भी है, वहां भी।’’ बंटवारे की त्रासदी और उसके बाद एक सकारात्मक संदेश, गोया कि फिल्म का पूरा परिदृश्य नज्म में उभरकर सामने आ जाता है।

हिंदी सिनेमा इतिहास में ‘गर्म हवा’ ऐसी पहली फिल्म है, जो बंटवारे के बाद के भारतीय समाज की सूक्ष्मता से पड़ताल करती है। फिल्म का विषय जितना नाजुक है, निर्देशक एमएस सथ्यू और पटकथा लेखक कैफी आजमी ने उतना ही उसे कुशलता से हैंडल किया है। जरा सा भी लाउड हुए बिना, उन्होंने साम्प्रदायिकता की नब्ज पर अपनी अंगुली रखी है। ‘गर्म हवा’ में ऐसे कई सीन हैं, जो विवादित हो सकते थे, लेकिन एमएस सथ्यू की निर्देशकीय सूझ-बूझ का ही नतीजा है कि यह सीन जरा सा भी लाउड नहीं लगते। बड़े ही संवेदनशीलता और सावधानी से उन्होंने इन सीनों को फिल्माया है।

फिल्म का कथानक और इससे भी बढ़कर सकारात्मक अंत, फिल्म को एक नई अर्थवत्ता प्रदान करता है। विभाजन से पैदा हुए सवाल और इन सबके बीच सांस लेता मुस्लिम समाज। विस्थापन का दर्द और कराहती मानवता। उस हंगामाखेज दौर का मानो एक जीवंत दस्तावेज है, ‘गर्म हवा’। भारतीय सिनेमा का जब-जब इतिहास लिखा जाएगा, उसमें फिल्म ‘गर्म हवा’ का नाम जरूर शामिल होगा। अपनी इस अकेली फिल्म से निर्देशक एम एस सथ्यू भारतीय सिनेमा में अमर रहेंगे। एमएस सथ्यू ने अपनी जिंदगानी के 90 साल पूरे कर लिए हैं। वे आज भी रंगमंच और इप्टा में उसी जोश-ओ खरोश के साथ सरगर्म हैं, जैसे कि शुरुआत में थे। इतनी उम्र के बाद भी न तो उनके जज्बे में कोई कमी आई है और न ही कमिटमेंट में। यही सब बातें हैं जो निर्देशक एमएस सथ्यू और उनकी फिल्म ‘गर्म हवा’ को ऑल टाइम ग्रेट बनाती हैं।

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल एमपी के शिवपुरी में रहते हैं।)

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This post was last modified on July 6, 2020 4:27 pm

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