Saturday, March 2, 2024

दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में विमोचित होगी पहाड़ी भाषाओं पर लिखी गयी किताब भाखा बहता नीर

शिमला। लंबे समय से हिमाचल प्रदेश के पर्यावरण व इतिहास पर शोध कर रहे लेखक, पत्रकार गगनदीप सिंह द्वारा संपादित तीसरी किताब भाखा बहता नीर, पहाड़ी भाषाओं के विकास की चुनौतियां विश्व पुस्तक मेला 2024 में विमोचित की जाएगी। इससे पहले उनकी सुकेत रियासत के इतिहास पर ‘सुकेत रियासत के विद्रोह’ नामक किताब बहुत ही चर्चित हुई थी। उन्होंने बताया कि इस किताब में डॉ. न्गुगी वा थ्योंगो, डॉ. भोलानाथ तिवारी, प्रो. वरायाम सिंह, डॉ. जोगा सिंह, डॉ. सुभाष चंद्र, डॉ. हरिराम जास्टा, गणेश देवी, सदानंद साही, डॉ. अमरनाथ, सतीश कुमार लोप्पा जैसे देश-विदेश के कई भाषाशास्त्रियों के लेखकों को स्थान दिया गया है जिसमें मातृभाषाओं के समक्ष आ रही चुनौतियों पर केंद्रित किया गया है।

वहीं प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक ग्रियर्सन द्वारा चुनी गयी करीब 150 साल पुरानी एक मानक कहानी का अनुवाद भी लगभग 13 पहाड़ी भाषाओं में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। यह किताब ईबुक के रूप में गूगल बुक्स और किंडल बुक्स पर भी प्रकाशित की गयी है। इस किताब में यतीन पंडित, ठाकुर सेन नेगी, प्रमिति नेगी, अजय, सुरेंदर पाल सिंह के लेख भी शामिल हैं और पहाड़ी भाषाओं में कहानी के अनुवाद में कृष्ण कुमार महादेविया, अशोक दर्द, नरेश दियोग, ज्योति, सक्षम, अनामिका, बालक राम ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया है।

पुस्तक इस बात को रेखांकित करती है कि पहाड़ी हिमाचल वासियों की मातृभाषा है, जो सभी घरों में बोलचाल की भी भाषा है। इस भाषा की मौखिक परम्परा की बहुत पुरानी धरोहर है। इसका व्यवस्थित लिखित रूप इसे विशिष्ट स्थान प्रदान करने की क्षमता रखता है। पहाड़ी भाषाओं का इतिहास सदियों पुराना है। हजारों सालों से हमारे पुरखे इस को अपनी लोक गाथाओं, गीतों, देव भार्थाओं में बचाए हुए यहां तक लेकर आए हैं। लेकिन चिंता का सबब यह है कि रोजगार, सभ्यता, राष्ट्र भाषा जैसे जुमलों के तहत पहाड़ी भाषाओं को पिछड़ा घोषित करने की कोशिशें जारी हैं। 60 लाख की आबादी वाली पहाड़ी भाषाएं आज भी प्रदेश में अपने लिए उचित स्थान खोज रही हैं। 

भाषाविद् गणेश देवी के सर्वे के मुताबिक भारत में तकरीबन 900 भाषाएं बोली जाती हैं। 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 16-17 सौ भाषाएं थीं। पिछले पचास-साठ वर्षों में यह संख्या आधी रह गई है। आशंका व्यक्त की गई है कि आने वाले पचास वर्षों में इनमें से लगभग एक तिहाई भाषाएं खत्म हो जाएंगी। 

पुस्तक की भूमिका हिमाचल के सुप्रसिद्ध कवि अजेय द्वारा लिखी गयी जिसमें वह कहते हैं कि यह किताब एक बहुत बड़ी बहस के डॉक्यूमेंटेशन का अनूठा प्रयास है। इस संवेदनशील विषय पर संकलन कर्ता की अपनी दृष्टि काफी स्पष्ट दिखती है। चूंकि वे हिमाचल से बाहर के हैं, तो उन की सीमाएं भी साफ-साफ दिख रहीं हैं और शक्तियां भी। सीमाएं इस अर्थ में कि इस ऐतिहासिक बहस का कुछ पक्ष इन से छूट गया लगता है। आठवें नवें दशक में भी हिमाचल की पत्र पत्रिकाओं में भाषा पर गम्भीर बहस हुई थी। मैं समझता हूं कि दैनिक जनसत्ता तथा अनूप सेठी की पत्रिका हिमाचल मित्र में हुई बहस के कुछ अंश यहां ज़रूर जाने चाहिए थे। शक्तियां इस अर्थ में कि इस पूरे काम में भावुकता के स्थान पर तार्किकता से काम लिया गया है। एक वांछित तटस्थता भी निभाई गई है, जो काम एक गैर हिमाचली ही कर सकता था। स्थानीय लेखक ऐसे मामलों में पूर्वाग्रह, भावुकता, और राजनीतिक पक्षधरता से शायद ही बचा रह पाता। खैर, यह पक्षधरता भी एक स्तर पर जरूरी भी है। हम सब अपनी-अपनी मातृभाषा के अनूठेपन, सौंदर्य और ताक़त को ले कर बेहद पज़ेसिव और भावुक होते हैं। आखिरकार भाषा आप की सामूहिक व सामुदायिक स्मृतियों, अस्मिता एवं सांस्कृतिक वजूद का सब से महत्वपूर्ण संवाहक होती है। 

साथ ही साथ यह बता देना जरूरी है कि इस किताब में लिखी हर बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता। निस्सन्देह यह एक जरूरी बहस है और इस किताब ने हिमाचल में भाषा के यक्ष प्रश्न को एक बार फिर से खड़ा करने का तथा इस पुरानी बहस को आगे बढ़ाने का सराहनीय दुस्साहस किया है। 

मातृभाषाओं के माध्यम से हम बहुत कुछ ऐसा सीखते हैं जो हमें सामाजिक और समावेशी बनाता है। मातृभाषाओं में एक खास तरह की सामूहिकता होती है। वह हमें समावेशी होना सिखाती है। आज दुनिया भौतिक उन्नति और विकास के पीछे पागल हो रही है, बिना यह परवाह किए कि अंत:करण का आयतन संक्षिप्त होता जा रहा है। भाषा से अंत:करण का निर्माण होता है, उसे गहराई मिलती है। भाषा के प्रति हमारी बेपरवाही से हमारा अंत:करण छीज रहा है। आलम यह है कि हम दिनों-दिन भाषाई संपदा को नष्ट हो जाने दे रहे हैं। 

मातृभाषा से विमुखता की प्रवृत्ति भाषा विहीनता की ओर ले जाती है। यह भाषा विहीनता हमारी मनुष्यता को विकलांग बना रही है। धीरे-धीरे हम ऐसे समाज में बदल रहे हैं, जो मातृभाषाओं से पीछा छुड़ाने को बेताब, हिन्दी के प्रति बेपरवाह और अंग्रेजी के सामने लाचार है। यह तथ्य हमें समझना होगा कि अंग्रेजी हो या संसार की कोई अन्य भाषा, मातृभाषा के रास्ते ही हम उस तक पहुंच सकते हैं।

(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)

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