Thursday, December 2, 2021

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किस काम की पीएचडी!

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खबर पढ़ी कि देश के नामी उद्यमी रतन टाटा को एमिटी यूनिवर्सिटी ने पीएचडी की उपाधि दी। दक्षिण भारत के बड़े उद्यमी जीएम राव को भी यह सम्मान मिला। इस निजी विश्वविद्यालय के नोएडा परिसर में आयोजन के दौरान रतन टाटा मौजूद नहीं थे। श्री राव ने अपने आदर्श व्यक्ति के साथ ऐसी मानद उपाधि पाना अपने लिए सम्मान का विषय बताया।

प्रसिद्ध लोगों, खासकर उद्यमियों, राजनेताओं, अभिनेताओं इत्यादि को विश्वविद्यालयों द्वारा पीएचडी की मानद उपाधि देना सामान्य सी बात है। इसकी शुरुआत कब हुई, नियम क्या हैं, ऐसे पहलुओं पर चर्चा अलग विषय है। यहां चर्चा यह है कि विद्यार्थियों को जो डिग्री वर्षों अध्ययन और परिश्रम के बाद मिलती हो, वह किसी विशिष्ट व्यक्ति को इस प्रक्रिया से गुजरे बगैर देने का क्या मनोविज्ञान है?

इसे उलटकर देखें, तो पीएचडी हासिल करने के बाद विद्यार्थियों को क्या मिला, इसका आकलन दिलचस्प होगा। एक व्यक्ति ने राजनीति या व्यवसाय में समय और उर्जा लगाकर सफलता हासिल की। बदले में उसे प्लेट में सजाकर मानद पीएचडी दे दी गई। लेकिन जिन लोगों ने कड़ी मेहनत करके डिग्री हासिल की हो, क्या उसे भी बदले में कोई लाभ इतनी आसानी से मिल जाता है? देश में ऐसे पीएचडी धारियों की संख्या हजारों में है, जिन्होंने किसी विश्वविद्यालय में पढ़ाने या शोध संस्थानों में अच्छे अवसर की उम्मीद की थी। लेकिन इसका कोई हासिल नहीं निकला।

यह दरअसल शिक्षा और साधना को कमतर आंकने तथा अन्य क्षेत्रों के कथित सफल लोगों को महान समझने की मानसिकता है।

फ़िलहाल प्रसंगवश आए दोनों नाम संयोगवश स्वयं उच्च डिग्रीधारी हैं। रतन टाटा के पास आर्किटेक्चर की डिग्री है। श्री राव भी मैकेनिकल इंजीनियर हैं। श्री टाटा को तो पद्म विभूषण और पद्मभूषण जैसे सम्मान भी हासिल हैं। एमिटी की यह उपाधि लेने में उनकी कितनी दिलचस्पी रही होगी, और इसका वह क्या करेंगे, यह नहीं मालूम। लेकिन शिक्षा का महत्व तब स्थापित होगा, जब वास्तविक पीएचडी धारियों को भी इसके एवज में समुचित अवसर और सम्मान मिले। जो विश्वविद्यालय कथित सफल लोगों को खोजकर ऐसी उपाधि प्रदान करते हैं, वे वास्तविक पीएचडी धारकों को अध्यापन, शोध इत्यादि के अल्पकालिक अवसर  देकर उनकी शिक्षा को प्रासंगिक बना सकते हैं।

ऐसा कोई प्रयास अब तक किसी सरकारी अथवा निजी विश्वविद्यालय द्वारा किए जाने का कोई उदाहरण नहीं मिलता। संभव है, अच्छी संख्या में ऐसे पीएचडी धारक मिल जाएं, जिन्हें कभी कोई अवसर न मिला हो।

विश्वविद्यालयों का काम मौलिक अध्ययन, अध्यापन, शोध और चिंतन को बढ़ावा देना है। विशिष्ट व्यक्तियों को ऐसी उपाधि मिलने से उनका क्या भला होगा, यह करना मुश्किल है, लेकिन वास्तविक अध्येताओं को संबल प्रदान करने शिक्षा और ज्ञान को बढ़ावा मिलेगा। श्री टाटा और श्री राव इस ऊंचाई पर आने के बाद ऐसी मानद उपाधि का चाहे जो करें, वास्तविक डिग्रीधारियों को मिला छोटा अवसर भी उनके जीवन और सम्मान के लिए बड़ा होगा।

विष्णु राजगढ़िया

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