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शाहीन बाग़ की कविताएं

प्रतिरोध की प्रेरक जगह बन चुका शाहीन बाग़ हौसले की अद्भुत मिसालें पेश कर रहा है। औरतों के इस धरने पर दुनिया भर की नज़र है। मुश्किल हालात से निकले इस आंदोलन में रंज और ग़म से टकराने के संकल्प की ऊंची सदाएं तो हैं ही, नारों के बीच रचनात्मकता की नाज़ुक सी पर अस्ल में मज़बूत-प्रतिबद्ध रोशनियां भी झिलमिल हो रही हैं।

मुख्य मंच की बगल में या कहें लगभग सामने बंद पड़ी दुकानों के सामने चल रही बच्चों की लाइब्रेरी कम क्रिएटिव वर्कशॉप ऐसी ही एक रोशनी है। इस बारे में विस्तार से बात करने से पहले यहां के कुछ कविता पोस्टरों जो पोस्ट कार्ड्स की शक़्ल में भी उपलब्ध हैं पर नज़र डालते हैं। इनमें कुछ कविताएं यह शानदार पहल करने वाले जामिया मिलिया इस्लामिया के अंग्रेजी के युवा अध्यापक उसामा ज़ाकिर की हैं और कुछ उनके भाई शहबाज़ रिज़वी की। जामिया के फाइन आर्ट्स के स्टूडेंट यूनुस नोमानी ने शानदार इलस्ट्रेशन किए हैं।

उसामा ज़ाकिर की कविताएं

हमारा रवीश कुमार

जब ऊंचे पेड़ की गहराइयों में बने
घोंसले में घुस कर
सांप फ़ाख्ता के अंडे खाने लगे
तो उस वक़्त ज़रूरी है
उस परिंदे की मौजूदगी
जो बेबसी से फड़फड़ा कर
चिल्ला-चिल्ला कर
पूरे जंगल की नींद उड़ा दे

जब जंगल का
पुकारने वाला आख़िरी परिंदा मार दिया जाए
या सधा लिया जाए
तो उसकी तबाही तय है

दरिंदे राजा की ताक़त और मक्कारी
हमेशा उस परिंदे से हारी है
ज़िंदा है हमारा परिंदा
ज़िंदा हैं हम
***

शाहीन बाग़

बड़ी ही नाज़ुक हैं उंगलियां ये
हर एक नारे में उठ रही हैं
मगर चमत्कार हो रहा है
हज़ारों जहनों से बुज़दिली
इनके एक इशारे में धुल रही है
हज़ारों जहनों की बर्फ़ अचानक ही
क़तरा-क़तरा पिघल रही है

बदन भी फ़ौलाद का नहीं ये
जो सर्द रातों में रास्ते पर पड़ा हुआ है
जो ज़ुल्म के रास्ते का पत्थर बना हुआ है
बस एक ज़िद पर अड़ा हुआ है
के नफ़रतों की नज़र का
तिनका बना रहेगा
अभी डटा है सदा रहेगा

तमाम जागी हुई निगाहें में जल रहे हैं
चराग ख़्वाबों के
जिनकी लौ सर्द रात के मन में
एकता का अलाव रौशन किए हुए हैं
के उनके दिल में धड़क रहा है
नए उजालों का सुर्ख़ सपना
के उनके कानों में आ रही हैं
नए सवेरों के नर्म क़दमों
की मद्धम आवाज़
***

लड़कियों!

बाल भ्रम के धागे उधेड़ने के लिए
इंक़िलाब को घी खिचड़ी के साथ लाने के लिए
मुहब्बत को किफ़ायत से ऊपर रखने के लिए
डर को मुंह चिड़ाने के लिए
सत्ता के चुटकी काटने के लिए
अहंकार को सिहरन में बदलने के लिए
ध्यान के लंबे मौसम के बाद
बेध्यानी का त्योहार मनाने के लिए
फ़र्ज़ी अक़्ल के पक्के रास्तों से बग़ावत करके
कल्पना और ख़्वाबों की पगडंडियों पर चलते चलते
दूर निकल जाने के लिए
सिक्के की खनक से बेख़बर
ज़िंदगी में हज़ारों रंग के सितारे टांकने के लिए
आज़ादी की लड़ाई में
बहादुरी की नई परिभाषा रचने के लिए
और सारे जहान के दर्द
दो आंखों में समेटने के लिए
दुनिया को ज़रूरत है तुम्हारी
***

शहबाज़ रिज़वी की कविता

सारी दुनिया अपना घर है

हम मिट्टी से बने हैं साथी
सारी दुनिया अपना घर है
पहाड़ हैं जितने 
भाई हैं अपने
और नदियां सब बहने हैं
पर आपको कौन समझाए
कि आप
अंधे, गूंगे, बहरे हैं

सेहरा सेहरा प्यास है अपनी
जंगल जंगल अपना कुंआ है
बस्ती-बस्ती नाम है अपना
सरहद-सरहद अपना मकां है
गलियां गलियां आंख हैं अपनी
और धरती पर ठहरे हैं
पर आपको कौन समझाए
कि आप
अंधे, गूंगे, बहरे हैं

आंखों-आंखों ख़्वाब है अपना
सुब्ह-शाम चमकीली है
चेहरा-चेहरा दु:ख है अपना
होठों पर रंगोली है
दिन में सूरज रात में चंदा
अपने लिए ही चलते हैं
पर आपको कौन समझाए
कि आप
अंधे, गूंगे, बहरे हैं
***

(शाहीन बाग से जनचौक के रोविंग एडिटर धीरेश सैनी की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on January 18, 2020 6:17 pm

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