दो ‘आपातकालों’ का कैदी

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‘आगे और लड़ाई है’ प्रबीर पुरकायस्थ की आत्मकथा है। अंग्रेजी में लिखी उनकी आत्मकथा ‘किपिंग अप द गुड फाइट’ का यह अनुवाद है। इसमें छात्र-जीवन, आपातकाल (1975-77) और आज के अघोषित ‘ताकतवर आपातकाल’ की भी कहानी है। प्रबीर पेशे से इंजीनियर और ऊर्जा, दूरसंचार व साफ्टवेयर क्षेत्र के सक्रिय विज्ञान-कार्यकर्ता रहे हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी दर्शन और विचारधारा से प्रभावित होने के कारण उनके इंजीनियर में एक समाजविज्ञानी भी हमेशा उपस्थित रहा है।

आमतौर पर अपने शांत, कामकाजी और वैज्ञानिक मिजाज के बावजूद वह छात्र-जीवन से लेकर अब तक कम से कम दो बार राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय चर्चा और विवाद का विषय बने। पहला मौका था-आपातकाल के दौरान(1975) जेएनयू के छात्र के तौर पर उनकी गिरफ्तारी। दूसरा मौका 2023 का है, जिसकी दुनिया भर में चर्चा हुई, जब 3 अक्तूबर को ‘न्यूजक्लिक ‘के संचालक और प्रधान संपादक के रूप में प्रबीर पुरकायस्थ को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने गिरफ्तार किया। 

उसी दिन प्रबीर द्वारा संचालित वेबसाइट व उसके यूट्यूब चैनल से किसी न किसी रूप में जुड़े चालीस से ज्यादा पत्रकारों या अन्य कर्मियों के घरों-दफ्तरों पर दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने छापे मारे। इसके पहले न्यूजक्लिक के दफ्तर और प्रबीर सहित कुछ अन्य लोगों के घरों पर ईडी या सीबीआई आदि ने छापे डाले थे।

3 अक्तूबर की छापेमारी के बाद स्पेशल सेल ने प्रबीर सहित न्यूजक्लिक के दो लोगों को गिरफ्तार किया। 2024 के 15 मई को जिस वक्त मैं लोकसभा चुनाव की राजनीतिक सरगर्मियां ‘कवर’ करने लखनऊ जा रहा था, अचानक किसी पत्रकार-मित्र का फोन आया कि प्रबीर की रिहाई हो रही है। मैं शताब्दी ट्रेन में बैठा था इसलिए फोन करने वाले सज्जन की आवाज कट-कट कर आ रही थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अंततः प्रबीर को जमानत पर रिहा किया गया। 

चुनाव रिपोर्टिंग के अपने दौरे से लौटने के बाद प्रबीर की आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद ‘आगे और लड़ाई है’ पढ़ गया। इसे वाम प्रकाशन (न्यू रंजीत नगर, नई दिल्ली) ने इसी वर्ष छापा है। किताब से प्रबीर के बारे में ढेर सारी नई जानकारी मिलती है। किताब की प्रस्तावना ललिता रामदास ने लिखी है। वह विदु्षी होने के साथ देश के पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल रामदास की पत्नी हैं। ललिता जी ने प्रस्तावना बहुत सुंदर ढंग से लिखी है। किताब में सात अध्याय हैं। पहला अध्याय है-‘क्या हर पीढ़ी को आपातकाल का सामना करना पड़ता है?’ सातवां और आखिरी अध्याय है-‘जीवंत राजनीति।’ पहले अध्याय में ही प्रबीर ने अपने दोनों दौर की कहानी दर्ज की है।

इसमें इंदिरा-राज की इमरजेंसी में नाटकीय ढंग से हुई उनकी गिरफ्तारी की कथा है तो मोदी-राज में उनके दफ्तर और घर पर हुई प्रवर्तन निदेशालय(ईडी) की छापेमारी की कहानी भी है। पहली कहानी 25 सितम्बर,1975 की है और दूसरी 9 फरवरी, 2021 की है। पहली का कथा-स्थल दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का कैम्पस है और दूसरी का स्थल प्रबीर का दिल्ली का साकेत स्थित घर है। पहली में प्रबीर की इमरजेंसी दिनों में जेएनयू परिसर से हुई गिरफ्तारी की कहानी है। प्रबीर को जेएनयू के छात्र-संघ का अध्यक्ष डी पी त्रिपाठी समझकर दिल्ली पुलिस के तत्कालीन रौबीले डीआईजी पीएस भिंडर ने जबरन गिरफ्तार कर लिया और उन्हें ‘मीसा’ के तहत जेल में रखा गया।

लगभग पांच दशक बाद मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रबीर के घर और दफ्तर पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) सहित कई एजेंसियों ने बारी-बारी से छापे मारे। पहली छापेमारी 9 फरवरी, 2021 को हुई थी। गिरफ्तारी ढाई साल बाद हुई। लेकिन उसकी ब्योरेवार कथा इस किताब में नहीं है। इसमें सिर्फ पहली छापेमारी की कहानी शामिल की गई है, जो पांच दिन, तकरीबन 113 घंटे चलती रही। आजादी के बाद भारत में शायद ही किसी संपादक के घर इतनी लंबी छापेमारी चली हो! 

‘क्या हर पीढ़ी को आपातकाल का सामना करना पड़ता है’ शीर्षक अध्याय में प्रबीर ने आठवें दशक की इमरजेंसी और उसके पांच दशक के बाद की अघोषित इमरजेंसी के अपने कुछ आब्जर्वेशन के जरिये आज़ादी के बाद के भारत के राजनीतिक परिदृश्य और शासन व्यवस्था में व्याप्त निरंकुशता को बहुत बारीकी से पेश किया है। न्यूजक्लिक जैसी एक छोटे आकार की मीडिया संस्था को शासकों ने क्यों निशाना बनाया? प्रबीर ने इसका बहुत तथ्यात्मक और तर्कसंगत जवाब दिया हैः’ शायद समस्या न्यूजक्लिक से उतनी नहीं थी, जितनी कि उसके द्वारा कवर किये गये आंदोलनों की रेंज से थी।

सरकार के अप्रिय इरादे से ठीक पहले न्यूजक्लिक ने किसानों के आंदोलन को बहुत अच्छी तरह से कवर किया था और इस कवरेज से न केवल भारत बल्कि उसके बाहर भी महत्वपूर्ण ढंग से पाठकों-दर्शकों को आकर्षित किया था। लेकिन तब भी न्यूजक्लिक अपनी कवरेज में अनूठा नहीं था और न है। बहुत से अन्य डिजिटल प्लेटफार्म और यहां तक कि कुछ मुख्यधारा के मीडिया के लोगों, उनकी आजीविका और तर्कशीलता पर होने वाले हमलों और प्रतिक्रिया में हुए सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों को भी कवर किया था। हमारी ही तरह इनमें से कुछ मीडिया संस्थान सरकार की जांच के दायरे में हैं।’ इसी अध्याय में मीडिया ‘तब और अब उपशीर्षक से प्रबीर ने आज के दौर की जटिल और बेहद भयानक चुनौतियों का तनिक विस्तार से वर्णन किया है।

आखिर में वह सवाल उठाकर उसका जवाब भी तलाशते हैं- ‘बिना नाम वाले इस नए ताकतवर आपातकाल का विरोध हम कैसे करें? मुझे लगता है कि हमें बड़े पैमाने पर लोगों को एक साथ लाने की जरूरत है।’ वह ज्यादा यथार्थवादी होते हुए कहते हैंः एक ऐसी सरकार जो कि एक भिन्न और पहले से भी अधिक खतरनाक आपातकाल लागू कर रही है, के तत्वावधान में 1975 के आपातकाल के खिलाफ अपनी लड़ाई को याद करना एक प्रहसन ही होगा। इसके बजाय हमें उस प्रतिरोध को फिर से निर्मित करने की आवश्यकता है जिसकी वजह से आपातकाल की पराजय हुई। हमें उन ताकतों को पराजित करने की जरूरत है ,जो नयनतारा सहगल के शब्दों में ‘राष्ट्र को नष्ट करने ‘की धमकी दे रही हैं।’ 

यह किताब प्रबीर के बारे में कई सच्चाइयों और उनकी कई खूबियों को सामने लाती है। वह पेशे से इंजीनियर और ऊर्जा, दूरसंचार तथा साफ्टवेयर के क्षेत्र में सक्रिय विज्ञान-कार्यकर्ता रहे हैं। उससे पहले मार्क्सवादी पार्टी के छात्र-संगठन से सम्बद्ध छात्र-कार्यकर्ता भी रहे। फिर न्यूजक्लिक के संस्थापक-संपादक रहे हैं। लेकिन उनके अंदर एक बहुत सहज और सहृदय लेखक भी है। उनकी आत्मकथा के तीन अध्याय ‘लड़ना सीखनाः एक निजी यात्रा’, ‘दिल्ली का सफर और एक अहम मोड़’ और ‘आपातकाल के साये में एक विश्वविद्यालय’ इसकी तस्दीक करते हैं।

पहले अध्याय में अपने बचपन, मां-पिता और पिता के स्थानांतरणों के चलते पुरकायस्थ परिवार के अलग-अलग स्थानों पर रहने और वहां के माहौल में रचने-बसने की कहानी वह बहुत सुंदर ढंग से पेश करते हैं। इस क्रम के तीसरे अध्याय में दिल्ली का जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय है, जहां प्रबीर को आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किया गया और वह ‘मीसा’ के तहत जेल साल भर रहे। 

आत्मकथा में दमन और प्रतिरोध की अनगिनत कहानियों के साथ प्रेम और संवेदना के कुछ मार्मिक प्रसंग भी हैं। ऐसे ही एक प्रसंग में प्रबीर ने अपनी दिवंगत पत्नी अशोकलता जैन को याद किया है कि उन्होंने लंबे इंतजार के बाद कैसे एक दिन जेएनयू की लाइब्रेरी में अशोका से अपनी मोहब्बत और साथ जीने-रहने के इरादे का इजहार किया था। लेकिन दोनों का दाम्पत्य जीवन बहुत छोटा रहा और अत्यंत दुखद परिस्थितियों में अशोका की महज 31 वर्ष की उम्र में सेरिब्रल हेमरिज से मौत हो गई। पुस्तक के समर्पण पृष्ठ पर दिवंगत दोस्त-पत्नी के चित्र के नीचे प्रबीर ने लिखा हैः  ‘अशोका की स्मृति में’। 

प्रबीर को प्यार करने वालों और उनके बारे में तरह-तरह का दुष्प्रचार करने वालों को निश्चय ही ऐतिहासिक संदर्भों और समकालीन घटनाक्रमों को किसी कहानी की तरह पेश करते उनके ऐसे रोचक, ज्ञानात्मक और सूचनात्मक आत्मकथ्यों का इंतजार रहेगा। 

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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