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पेरियार जयंती: सच्ची रामायण का विरोध धार्मिक से कहीं ज्यादा राजनीतिक है

(ई.वी. रामासामी नायकर ‘पेरियार’ (17 सितंबर, 1879—24 दिसंबर, 1973) बीसवीं शताब्दी के महानतम चिंतकों और विचारकों में से एक हैं। उन्हें वाल्तेयर की श्रेणी का दार्शनिक, चिंतक, लेखक और वक्ता माना जाता।‘  भारतीय समाज और भारतीय व्यक्ति का मुकम्मल आधुनिकीकरण जिन भारतीय चिंतकों एवं विचारकों के विचारों के आधार पर किया जा सकता है, उसमें वे अग्रणी हैं।

पेरियार एक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने उन सभी बिंदुओं को चिह्नित और रेखांकित किया है, जिनका खात्मा भारतीय समाज और व्यक्ति के आधुनिकीकरण के लिए अनिवार्य है। वे भारत की प्रगतिशील श्रमण-बहुजन परंपरा के ऐसे लेखक हैं, जो भारत में वर्चस्व के सभी रूपों के खिलाफ आजीवन लिखते और संघर्ष करते रहे हैं। उन्होंने उत्तर भारतीय द्विजों की आर्य श्रेष्ठता के दंभ, मर्दवादी उत्तर भारतीय द्विज राष्ट्रवाद, ब्राह्मणवाद, वर्ण-जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और शोषण-अन्याय के सभी रूपों को चुनौती दी।

वे मानवीय विवेक पर भरोसा करते हैं। किसी भी किस्म की अंधश्रद्धा, कूपमंडूकता, जड़ता, अतार्किकता और विवेकहीनता उन्हें स्वीकार नहीं है। वर्चस्व, अन्याय, असमानता, पराधीनता और अज्ञानता के हर रूप को वे चुनौती देते हैं। उनकी विशिष्ट तर्कपद्धति, तेवर और अभिव्यक्ति शैली के चलते जून 1970 में यूनेस्को ने उन्हें ‘आधुनिक युग का मसीहा’, ‘दक्षिण-पूर्वी एशिया का सुकरात’, ‘समाज सुधारवादी आंदोलनों का पितामह’ तथा ‘अज्ञानता, अंधविश्वास, रूढ़िवाद और निरर्थक रीति-रिवाजों का कट्टर दुश्मन’ स्वीकार किया ।

उनकी सशक्त आवेगात्मक अभिव्यक्ति पाठक के मन-मस्तिष्क को हिला देती है। पाठक को उनका लेखन बिजली के झटके की तरह लगता है, जो उसे बेचैन और उद्विग्न कर देता है और वर्चस्व, अधीनता व अन्याय के सभी रूपों का खात्मा करने के लिए प्रेरित करता है। सबके लिए समृद्धि, न्याय और समता आधारित दुनिया रचने के लिए उद्धत करता है। आज उनका जन्मदिन है। इस अवसर पर पेश है लेखक और चिंतक ओम प्रकाश कश्यप का लेख-संपादक)

  • मैं मानव समाज का सुधारक हूँ। मैं देश, धर्म, ईश्वर, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता। मुझे केवल मनुष्यता के विकास और उसके कल्याण की चिंता है: पेरियार
  • बाइबिल का परमात्मा पक्के तौर पर सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सर्वाधिक नाकारा, सर्वाधिक क्रूर, सर्वाधिक अन्यायी, सर्वाधिक रक्त पिपासु, सबसे ज्यादा निरंकुश तथा मानवीय गरिमा एवं स्वतंत्रता का सबसे बड़ा शत्रु था। जबकि शैतान शाश्वत विद्रोही और पहला मुक्त चिंतक था: मिखाइल बाकुनिन (ईश्वर और राज्य)

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’ प्रथम दृष्ट्या लोकतांत्रिक लगने वाली ये पंक्तियां तुलसी की हैं। पढ़कर लगता है कि लिखने वाले का लोकतंत्र में अटूट विश्वास है। वह साधक को अपनी भावना के अनुसार साध्य गढ़ने की छूट देता है। मगर इनमें लोकतंत्र की व्याप्ति मान लेना वैसा ही संभ्रम है, जैसे यह कहना कि कण-कण में भगवान हैं, इसलिए चराचर जगत में सभी बराबर हैं, दुनिया में आदर्श समानता है। ऊंच-नीच, जात-पात, छोटा-बड़ा, छूत-अछूत जैसा कुछ भी नहीं है।

असल में धर्म का यह उदार चेहरा उतना ही बनावटी है, जितना किसी पुरोहित का दक्षिणा मिलते ही ‘कल्याणम् भव’ कह, निस्पृह भाव से आगे बढ़ जाना। भारतीय समाज छोटे-छोटे समुदायों, धार्मिक और सांप्रदायिक समूहों, गोत्रों-उपगोत्रों तथा जातियों-उपजातियों में हमेशा बंटा रहा। उनके बीच वर्चस्व को लेकर संघर्ष भी लगातार चलते रहे।

हालांकि एक सीमा तक तुलसी गलत भी नहीं थे। जिस दौर में वे रामचरितमानस लिख रहे थे, समाज में रामकथा के अलग-अलग रूप प्रचलित थे। प्रत्येक समूह अपनी रामकथा को असली मानता था। बावजूद इसके रामायण के भिन्न कथारूपों पर विश्वास करने वाले समूहों में परस्पर कोई द्वेष नहीं था। अकेले राम सभी के ‘भगवान’ नहीं थे, लेकिन कोई राम को सबसे बड़ा देवता और भगवान माने, इस पर उन्हें कोई आपत्ति न थी।

आदिवासियों, जनजातियों, शूद्रों, अति शूद्रों के अपने-अपने देवता थे, जो राम जैसे अवतारी, उतने ही पराक्रमी और चमत्कारी; कहीं-कहीं तो उनसे भी आगे थे। राम के देवत्व पर भरोसा कर अपना आराध्य मानने वालों ने भी, उन्हें अपनी परंपरा और संस्कृति के अनुसार ढालने के बाद ही स्वीकार किया था। यही कारण है कि उस जमाने में सीता को राम की बहन बताने वाली जैन रामायण ‘पउमचरिय’ उतनी ही लोकप्रिय और सम्माननीय मानी जाती रही, जितनी राम-सीता को पति-पत्नी बताने वाली वाल्मीकि रामायण।

विभिन्न रामायणों के मुख्य पात्र भले ही एक हों, किंतु उनके चरित्र में आधारभूत अंतर है। जैन रामायण में ब्राह्मणों पर रावण को बदनाम करने का आरोप लगाया गया है। जैन मान्यता के अनुसार रावण उनके 63 शलाका पुरुषों में से एक था। उसके अनुसार राम और रावण दोनों जैन थे। मृत्यु के बाद राम को कैवल्य; तथा लक्ष्मण को नर्क प्राप्त हुआ था। वाल्मीकि, तुलसी, विमलसूरि (पउमचरिय) द्वारा रचित रामायणों के अलावा भी रामकथा के सैंकड़ों रूप दुनिया-भर में प्रचलित हैं।

फादर कामिल बुल्के ने देश-विदेश में प्रचलित रामकथाओं की गणना कर, उनकी संख्या को 300 माना था। अपने लेख ‘थ्री हंड्रेड रामायण’ में एके रामानुजन रामकथा की विविधता को दर्शाने के लिए जिस लोकश्रुति का सहारा लेते हैं, उसके अनुसार रामकथा अनंत रूपों में, अनादि कालीन कथा है। फिर पेरियार ने ऐसा क्या लिखा था, जिससे उनकी लिखी ‘सच्ची रामायण’ का नाम सुनकर ब्राह्मणवादी लाल-पीले होने लगते हैं?

मुख्य कारण था, पेरियार का रामकथा के प्रति दृष्टिकोण। पेरियार स्वयं नास्तिक थे। जहां रामायण के अन्य प्रारूपों के साथ कोई न कोई धार्मिक दृष्टिकोण जुड़ा था, पेरियार उसे धार्मिक पुस्तक मानने से ही इन्कार करते थे। उनका कहना था कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है। उसकी रचना ब्राह्मणों ने द्रविड़ों पर अपना प्रभुत्व दर्शाने के लिए की है। वह द्रविड़ों के आत्मसम्मान की विरोधी, उनकी अस्मिता का हनन करने वाली है। ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ की भूमिका में वे लिखते हैं-

‘रामायण और बरधाम (महाभारत) काल्पनिक ग्रंथ हैं….इन्हें आर्यों ने द्रविड़ों को अपने जाल में फंसाने, उनके आत्मसम्मान को नष्ट करने, निर्णय सामर्थ्य को कुंद करने तथा उनकी इंसानियत को पथभ्रष्ट करने के लिए रचा है। इन दोनों कथाओं के नायक क्रमशः राम और कृष्ण हैं। जो कि आर्य हैं और बेहद साधारण व्यक्ति हैं। ये कथाएं इसलिए थोपी गईं हैं, ताकि इनके कथा नायकों, उनके परिजनों एवं सहायकों को अलौकिक एवं अतिमानवीय मान लिया जाए; तथा उन्हें पूजनीय मानकर, जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना की जाए।’ बावजूद इसके रामासामी पेरियार की पुस्तक ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ जब तक तमिल और अंग्रेजी में थी, तब तक हिंदी पट्टी के ब्राह्मणवादियों को उससे कोई आपत्ति नहीं थी। इसलिए करीब 40 वर्षों तक उसके तमिल और अंग्रेजी में संस्करण पर संस्करण निकलते रहे।

पुस्तक को लेकर तूफान तब उठा जब कानपुर देहात के रहने वाले पेरियार ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ शीर्षक से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया। हिंदी अनुवाद दुलालपुर निवासी, राम आधार द्वारा किया गया था। उसे छापने के लिए उस समय कोई प्रकाशक तैयार नहीं था। इसलिए ललई सिंह ने उसे अपने प्रकाशन, ‘अशोक पुस्तकालय’ कानपुर से 1 अक्टूबर, 1968 को प्रकाशित किया था। मूल कृति ‘रामायण पादिरंगल’ (रामायण के कथापात्र) शीर्षक से 1930 में प्रकाशित हुई थी।

1972 तक उसके दस संस्करण प्रकाशित हो चुके थे। पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद 1959 में आया था। उसके बाद दो और संस्करण क्रमशः 1972 और 1980 में प्रकाशित हुए। पुस्तक के हिंदी में आने की संभावना उसके अंग्रेजी अनुवाद के बाद ही बनी थी। ‘रामायण पादिरंगल’ की रचना से पहले पेरियार ने लगभग सभी उपलब्ध रामकथाओं यथा जैन, बौद्ध, कंब आदि का गहन अध्ययन किया था। विषय से संबंधित विद्वानों से बातचीत की थी।

रामकथा संबंधी उनके अध्ययन-चिंतन की सफल परिणति एक साथ दो पुस्तकों के रूप में हुई थी। दूसरी पुस्तक का नाम था- रामायण कुरीप्पुकल (रामायण के बारे में कुछ बातें)। वह पहली की अपेक्षा अधिक गंभीर तथा कथानक की दृष्टि से मूल रामकथा के करीब थी। उनमें प्रसिद्धि मिली पहली पुस्तक को। अंग्रेजी में उसे मूल शीर्षक से थोड़ा हटकर, ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से छापा गया। उसका हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ के रूप में सामने आया। हम सोच सकते हैं कि तमिल कृति ‘रामायण पादिरंगल’ यानी ‘रामायण के कथापात्र’ के हिंदी में ‘सच्ची रामायण’ के रूप में अनूदित होते-होते, शीर्षक के स्तर पर भी काफी अर्थ-परिवर्तन हो चुका था।

‘सच्ची रामायण’(रामायण पादिरंगल) की रचना विखंडनात्मक शैली में हुई है। वह रामकथा की स्थापित छवियों का खंडन करती थी। उसका उद्देश्य रामायण के कथा पात्रों के चरित्र का वस्तुनिष्ठ विवेचन है। जिस राम को तुलसी मर्यादा पुरुषोत्तम कहकर ईश्वर तुल्य बना देते हैं, उसके बारे में पेरियार आरंभ में ही साफ कर देते हैं कि- ‘राम कोई आदर्श व्यक्ति नहीं हैं।’ आगे वे विस्तार से राम के चरित्र को लेकर अपने विचार पेश करते हैं। शंबूक प्रसंग का उल्लेख करते हुए वे आगे लिखते हैं-

‘राम जिसने तपस्या कर रहे शंबूक की बगैर किसी गलती के निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी थी, उस राम को विष्णु का अवतार माना जाता है। अगर आज राम की तरह का कोई राजा होता तो उन लोगों की क्या दशा होती, जिन्हें शूद्र (जो गाली नुमा संबोधन है) कहा जाता है!’

ऐसी वैचारिक प्रखरता, प्रतिबद्धता और साफगोई के कारण उसकी लोकप्रियता उत्तरोत्तर बढ़ती गई।

पेरियार ललई सिंह ने न केवल ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया था, अपितु ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार के तर्कों की पुष्टि के लिए, विभिन्न रामकथाओं से कुछ संदर्भ भी दिए थे। जिसे उन्होंने ‘सच्ची रामायण की चाबी’ कहा था। पाठकों की सुविधा के लिए दोनों पुस्तकों को एक ही जिल्द में छापा गया था। उदाहरण के लिए पेरियार ने सीता का वर्णन करते हुए उसके चरित्र की दुर्बलताओं को उजागर किया था तो पेरियार ललई सिंह ने उसकी पुष्टि के लिए रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से, ‘श्रीरामावतार भजन तरंगिनी’ से एक पद उद्धृत किया था। पद में यूं तो पति-पत्नी का सहज रति प्रसंग है। लेकिन एक ‘वनवासी मर्यादा पुरुषोत्तम’ के संदर्भ से जुड़कर वह अशालीन लगने लगता है। पद में सीता का कथन देखिए-

‘हमारे प्रिय ठाड़े सरजू तीर।।टेक।।

छोड़ लाजि मैं जाय मिली, जहां खड़े लखन के वीर

मृदु मुसुकाय पकरि कर मेरी खेच लियो तब चीर

झाऊ वृक्ष की झाड़ी भीतर करन लगे रति धीर.1

कह सकते हैं कि पेरियार द्वारा, ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’, के रूप में रामायण की विखंडनवादी अन्वीक्षा, ‘सच्ची रामायण’ में थोड़ी और मुखर, और अधिक व्यंजनात्मक हो चुकी थी। इसलिए ब्राह्मणवादियों के कान खड़े होना स्वाभाविक था। हिंदी में प्रकाशित होने के साथ पूरे हिंदी जगत में तूफान सा उठ गया। ललई सिंह पर मुकदमा ठोक दिया गया। यह कहकर कि पुस्तक हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर, सामाजिक विद्वेष फैलाने वाली है, उसकी सभी प्रतियों को जब्त करने के आदेश सुना दिए गए।

गौरतलब है कि प्रतिबंध और जब्ती के आदेश पुस्तक के केवल अंग्रेजी और हिंदी संस्करण के थे। तमिल तथा दूसरी दक्षिणी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तक की बिक्री पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई थी। गोया तमिलनाडु या दक्षिण भारत के दूसरे हिस्सों में हिंदू रहते ही नहीं थे। इससे पेरियार के कथन कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है-की पुष्टि होती है। सच तो यह है कि ‘सच्ची रामायण’ के माध्यम से ब्राह्मणवादी राजनीतिक ताकतें, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सत्ता की पुनर्वापसी को अंजाम देने में लगी थीं।

पुस्तक को प्रतिबंध मुक्त कराने के लिए ललई सिंह यादव को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। उसका समापन 16 सितंबर, 1976 के उच्चतम न्यायालय के फैसले से हुआ। शीर्षतम अदालत ने प्रतिबंध को गलत बताकर, पुस्तक की जब्त की गई प्रतियां लौटाने का आदेश दिया था। उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार औपचारिक आदेश जारी करने से बचती रही। 1995 में मायावती सरकार के दौरान पुस्तक प्रतिबंध-मुक्त हो सकी। उसके बाद से हिंदी पट्टी में ‘सच्ची रामायण’ की लोकप्रियता बढ़ती गई, मगर पोंगापंथी भी शांत न थे। वे विरोध के लिए नए सिरे से एकजुट होने लगे थे।

नया दौर हिंदुओं का न होकर, हिंदुत्ववादियों का था। उनके भीतर पेरियार के प्रति नफरत कूट-कूट कर भरी थी। इसलिए नहीं कि पेरियार ने रामायण के पात्रों के चरित्र पर उंगलियां उठाई थीं। बल्कि इसलिए कि उन्होंने इन धर्मग्रंथों के पीछे छिपे ब्राह्मणवादियों के राजनीतिक मंसूबों को उजागर कर दिया था। पेरियार के प्रति उनके भीतर कितनी नफरत भरी थी, इस समझने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा।

2002 में लखनऊ स्थित आंबेडकर पार्क जब बन रहा था तो उसमें योजनानुसार ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, शाहूजी महाराज, डॉ. आंबेडकर, बिरसा मुंडा, कांशीराम जैसी बहुजन शख्सियतों की मूर्तियां स्थापित की गईं। मायावती उसमें पेरियार की मूर्ति भी लगवाना चाहती थीं। कलाकार को मूर्ति-निर्माण का आदेश जारी हो चुका था। उस समय प्रदेश में भाजपा के सहयोग से बनी बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी। पेरियार का नाम सुनते ही विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू महासभा जैसे उग्रपंथी संगठन भड़क उठे। विनय कटियार ने ऐलान किया कि पेरियार की मूर्ति लगाई गई तो वे उसे ढहा देंगे।

भाजपा ने समर्थन वापस लेने की धमकी दे डाली। बसपा पेरियार को अपना ‘आइकन’ मानती थी। उसके हर कार्यक्रम में ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर, शाहूजी महाराज के साथ-साथ पेरियार के चित्र भी लगे होते थे। उस समय मायावती चाहतीं तो सामाजिक न्याय समर्थित वैचारिकी को महत्व देकर, सरकार को दांव पर लगाने का खतरा उठा सकती थीं। लेकिन उन्होंने राजनीतिक सत्ता को बचाने का अवसरवादी विकल्प चुना। बयान दिया कि सरकार का पेरियार की मूर्ति लगाने का कोई इरादा नहीं है। जबकि मूर्ति तैयार होकर शिल्पकार के स्टूडियो में प्रतीक्षारत थी।

मंदिर आंदोलन की आड़ में प्रदेश में दक्षिणपंथी ताकतें दुबारा मजबूत हुईं तो उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद पुस्तक पर नए सिरे से प्रतिबंध लगाने की मांग की जाने लगी। 2007 में प्रदेश में मायावती की सरकार थी। उस समय भाजपा की प्रादेशिक इकाई ने आरोप लगाया कि ‘बहुजन समाज पार्टी’ सच्ची रामायण का प्रचार-प्रसार कर रही है। उसके संरक्षण में प्रदेश में बड़े पैमाने पर पुस्तक की बिक्री की जा रही है। भाजपा की प्रदेश इकाई ने, पुस्तक को हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने वाली बताकर, उस पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की थी।

भाजपा विधान मंडल के तत्कालीन नेता ओमप्रकाश सिंह ने सरकार से मांग की थी कि-‘हिंदू देवी-देवताओं के विरोधी तथा द्रविड़िस्तान की मांग करने वाले, अलगाववादी पेरियार रामासामी की सरकार निंदा करे तथा उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में स्थान न दे।’ भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी ने दावा किया था कि 9 अक्टूबर को बसपा की रैली में ‘सच्ची रामायण’ की 4000 प्रतियां बेची गई थीं। हैरानी की बात यह है कि सामाजिक न्याय की बात करने वाली समाजवादी पार्टी भी, ‘सच्ची रामायण’ के विरोध में भाजपा का साथ दे रही थी। विधानसभा में विपक्ष के नेता और समाजवादी पार्टी के सदस्य अहमद हसन ने ‘सच्ची रामायण’ के जरिये सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि—

‘भगवान राम के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना अच्छी बात नहीं है। पूरी दुनिया के मुसलमान स्वीडिश कार्टूनिस्ट द्वारा बनाए गए पैगंबर मोहम्मद के कार्टून की भर्त्सना कर रहे हैं। विवादित पुस्तक पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।2

इससे अनुमान लगाया जाता है कि मामला जब धर्म की आलोचना का हो तो समय-समय पर एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी की भूमिका में उतरने वाले धर्मावलंबी भी एक-दूसरे के समर्थन पर उतर आते हैं।

देखा जाए तो भाजपा का आरोप सरकार पर न होकर, ‘बहुजन समाज पार्टी’ पर था। उस पार्टी पर जो पेरियार को अपना आदर्श मानती थी। अपनी वैचारिकी पर दृढ़ रहने के बजाए, मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर पीछे हटने का फैसला किया। उनकी ओर से वक्तव्य जारी हुआ—‘बसपा तथा सरकार का सच्ची रामायण की बिक्री से कोई लेना-देना नहीं है।’ मामले पर राजनीति करने के बजाय, पुस्तक पर प्रतिबंध की मांग कर रहे नेताओं को केंद्र सरकार से संपर्क करना चाहिए, जहां उनकी अपनी पार्टी की सरकार है।3

इस प्रसंग का सबसे रोचक पहलू यह है कि जिस ‘सच्ची रामायण’ के विरोध को लेकर भाजपा सरकार पर लगातार आरोप लगा रही थी, तथा बिना आगा-पीछा सोचे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी उसका साथ दे रही थीं, उसकी प्रति न तो भाजपा के पास थी, न सपा, न कांग्रेस और न ही बसपा के पास। यहां तक कि बसपा के साहित्य के प्रकाशक ‘बहुजन चेतना मंडप’ के पास भी उस पुस्तक की प्रतियां उपलब्ध नहीं थीं।

जबकि लखनऊ के सबसे बड़े पुस्तक विक्रेता ‘यूनिवर्सल बुक सेलर’ का दावा था, ‘हमने वह पुस्तक कभी नहीं बेची, न ही वह पुस्तक फिलहाल हमारे पास है।’ उल्लेखनीय है कि भाजपा के लखनऊ मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ को लेकर 27-28 अक्टूबर 2007 को एक बैठक हुई थी। उसमें पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह और नेता लालकृष्ण आडवाणी भी मौजूद थे। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से प्रदेश भर में ‘सच्ची रामायण’ की बिक्री का विरोध करने को कहा था। जबकि जिस पुस्तक का बहिष्कार किया जाना था, उसकी एक भी प्रति उस बैठक में उपलब्ध नहीं थी.

भाजपा नेताओं द्वारा विधानसभा परिसर के आगे स्थित, अपने पार्टी मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ की प्रतियों का दहन(का नाटक) किया था।4 भाजपा का ‘सच्ची रामायण’ के दहन का दावा कितना खरा था, इसे इंडियन एक्सप्रेस में अलका एस. पांडे की 7 नवंबर की रिपोर्ट से समझा जा सकता है। उसके अनुसार पार्टी ने जैसे-तैसे ‘सच्ची रामायण’ के कुछ पन्ने जुटाए थे। उन्हीं को जलाकर, पुस्तक के दहन का नाटक किया गया था। वे भूल गए कि किसी व्यक्ति को महापुरुष मानना या न मानना, सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा तय नहीं होता। थोपे गए महापुरुषों की कलई अल्पावधि में ही खुलने लगती है। उसके बाद जनता की निगाह में वे खलनायक सरीखे बन जाते हैं।

एक महत्वपूर्ण बात और भी है। रामायण को धार्मिक ग्रंथ न मानकर पेरियार ने उसे विशुद्ध राजनीतिक ग्रंथ माना है। पेरियार के आलोचक भी उन पर कुछ ऐसा ही आरोप लगाते हैं। उनके अनुसार पेरियार द्वारा हिंदू धर्म तथा उसके मिथकों की आलोचना पूर्णतः राजनीति से प्रेरित थी। पेरियार इससे इन्कार नहीं करते थे। अंतर सिर्फ इतना है कि ब्राह्मण कभी यह मानने को तैयार नहीं होते कि रामायण तथा रामकथा को हिंदू संस्कृति के केंद्र में रखने के पीछे उनकी राजनीति है। खुद को सबसे ऊपर, शिखर पर बनाए रखने की राजनीति। जबकि पेरियार अपनी मंशा को छिपाते नहीं हैं-

‘मैं अपने समाज के कुछ ऐसे पहलुओं पर प्रहार करता हूं, जो हमें नीचा दिखाते हैं। मेरा जोर इस बात पर है कि जब तक हिंदू धर्म, हिंदू देवताओं, हिंदू शास्त्रों, पुराणों, वेदों और इसके इतिहास पर हमारा विश्वास रहेगा, और जब तक हम इनका अनुसरण करते जाएंगे, तब तक हमारा दमन और शोषण जारी रहेगा। हम समाज की असमानताकारी स्थितियों से कभी उबर ही नहीं पाएंगे। इन सड़ी हुई स्थितियों से उबरने की कोशिश के बजाए, जो केवल इनका पालन करने में लगा रहेगा-वह चाहे जितनी बेहतर स्थिति में आ जाए, खुद को अपनी अवनति और अपमानजनक स्थितियों से कभी उबार नहीं पाएगा।’5

एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा था—

‘मैं किसी को चाहे प्यार करूं अथवा घृणा; दोनों स्थितियों में मेरा सिद्धांत एक ही रहता है। वह सिद्धांत यह है कि मैं यह शिक्षा देता हूं कि धनी लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों को गरीब लोगों का खून नहीं चूसना चाहिए।’6

पेरियार का मानना था कि बगैर हिंदू धर्म को मिटाए, जाति-भेद को मिटाना संभव नहीं है। वे धर्मांतरण के विरोधी थे। जाति-आधारित उत्पीड़न और अवमानना से बचने के लिए जिन लोगों ने धर्मांतरण का सहारा लिया था, उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया था। हिंदू धर्म में जो अछूत था, धर्मांतरण के बाद भी उसकी हैसियत अछूत जैसी ही रहती थी। इसलिए शूद्रों और अतिशूद्रों की राजनीतिक, सामाजिक भागीदारी को आवश्यक मानते थे। राजनीति में प्रवेश के साथ ही उन्होंने सभी वर्गों को उनकी संख्या के अनुपात में संरक्षण की मांग शुरू कर दी थी। उन दिनों अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की स्वतंत्रता नहीं थी।

पेरियार स्वयं नास्तिक थे। मगर मंदिर प्रवेश का मसला सामाजिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा था। इसलिए तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद उसके तिरुपुर सम्मेलन में उन्होंने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें सभी अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की इजाजत की मांग की गई थी। लेकिन कांग्रेस कमेटी के ब्राह्मण सदस्यों ने उस प्रस्ताव का जोरदार विरोध विरोध किया। नाराज पेरियार ने तत्काल घोषणा की कि वे मनुस्मृति, रामायण आदि पुस्तकों, जिनका उपयोग कुटिल ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक हथियारों के रूप में किया जाता है-दहन करेंगे।

वह अवसर 1956 में आया। पेरियार ने ऐलान किया कि 1 अगस्त 1956 को वे मद्रास के समुद्री तट पर राम की तस्वीरों की होली जलाएंगे। उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर हर वर्ष रावण के पुतले को आग लगाई जाती है। पेरियार रावण को आदर्श द्रविड़ राजा मानते थे। इसलिए उत्तर भारतीयों द्वारा रावण के पुतले को आग लगाने के विरोध में उन्होंने राम की तस्वीरों का दहन करने का ऐलान किया था। एक तरह से वह ब्राह्मणवादी संस्कृति का प्रतीकात्मक विरोध था।

पेरियार की घोषणा के बाद तमिलनाडु के सभी नेताओं ने उनसे संपर्क कर, कार्यक्रम को टाल देने का अनुरोध किया। तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पी. काक्कन ने कहा कि राम की तस्वीरें जलाना ईश्वर के प्रति उस विश्वास की अवमानना होगी, जिसके भरोसे गांधी ने आजादी प्राप्त की है। उन्हें पेरियार के प्रस्तावित कदम को ‘असामाजिक कृत्य’ घोषित किया था। इस पर पेरियार ने अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हुए जवाब दिया कि उनका यह कदम सामाजिक परिवर्तन के लिए अपरिहार्य है।

अगले ही दिन सुबह, घर से निकलने के साथ ही पुलिस उपायुक्त ने पेरियार को गिरफ्तार कर लिया। पेरियार इस स्थिति के लिए पहले से ही तैयार थे। घर से निकलते समय उनके पास माचिस की डिब्बियों, राम की तस्वीरों के अलावा एक बिस्तर भी था, जिसे वे जेल यात्रा की संभावना के कारण अपने साथ लेकर निकले थे। पेरियार के गिरफ्तार होते ही उनकी पत्नी समुद्र तट पर पहुंची जहां उनके समर्थक इकट्ठा थे। उन्होंने पेरियार की गिरफ्तारी की सूचना दी। इससे उनके समर्थक उग्र हो गए और साथ लाई राम की तस्वीरों को आग के हवाले करने लगे।

उस समय तक पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी। करीब आधा घंटे तक पुलिस से बचने और गिरफ्तार होने का नाटक चलता रहा। लोग पिटते रहे, खुद को बचाने के लिए भागते भी रहे। भागते-भागते एक व्यक्ति रेत पर फिसल गया। पुलिस उसे गिरफ्तार करने को दौड़ी। लेकिन तब तक वह राम की तस्वीर को आग लगा चुका था। बाद में पेरियार सहित सभी को रिहा कर दिया गया। पेरियार का उद्देश्य पूरा हो चुका था।

पेरियार के जीवन से जाना जा सकता है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। वे जनता के बीच में खड़े होकर खुलेआम देवी-देवताओं का मखौल उड़ाते थे। धर्म और उसके प्रतीकों में आस्था और विश्वास को जनसाधारण की गरीबी और दैन्य के लिए जिम्मेदार मानते थे। कहते थे कि धर्म का मूल उद्देश्य, ईश्वर के गौरवगान की खातिर मनुष्यता का तिरष्कार करना है। इस पर धर्म भीरू लोग कहते कि पेरियार मूर्ख है। एक न एक दिन ईश्वर का कोप उनपर कहर टूटेगा।

उस समय वह संभल नहीं पाएंगे। मगर पेरियार ने 94 वर्ष लंबा संघर्षमय जीवन जिया। अपनी मृत्यु से एक दिन पहले भी वे अपने मिशन को लेकर सतर्क थे। वे अंत तक कहते रहे कि यदि ईश्वर में जरा-भी शक्ति तो वह उन्हें दंड क्यों नहीं देता! उनसे उनका जीवन छीन क्यों नहीं लेता! खुद को ‘पंडित’ और धर्माधिकारी कहने वाले लोगों के पास पेरियार के इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था। आस्था और धर्म के नाम पर दूसरों को मूर्ख बनाते आए लोगों के पास पेरियार के तार्किक प्रश्नों का उत्तर हो भी नहीं सकता था।

(ओमप्रकाश कश्यप द्वारा लिखित ‘समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि’, ‘समाजवादी चिंतन के विविध आयाम’ सहित 35 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आप उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान एवं हिंदी अकादमी द्वारा सम्मानित लेखक हैं।)

संदर्भ :

  1. सच्ची रामायण और सच्ची रामायण की चाबी, अंबेडकर प्रचार समिति, मोती कटरा आगरा, पृष्ठ 76
  2. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/ar_showdetails.asp?id=711050918&cat=&n_date=20071105
  3. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/articles/India/20071027/805535.html.
  4. वन इंडियाhttps://www.oneindia.com/2007/10/30/bjp—workers—burnt—copies—of—sacchi—ramayan—1193744742.html
  5. रिपब्लिक 19 जनवरी, 1945
  6. दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग के प्रथम संस्करण के प्रकाशकीय से उद्धृत, 1959
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This post was last modified on October 4, 2020 1:05 pm

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