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राजिंदर सिंह बेदी की पुण्यतिथिः चिट्ठी का जवाब क्या दिया कि रूठ गए मंटो

राजिंदर सिंह बेदी का दौर वह हसीन दौर था, जब उर्दू अदब में सआदत हसन मंटो, कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे महारथी एक साथ अपने अफसानों से सारे मुल्क में धूम मचा रहे थे। इन सबके बीच एक प्यार भरी नोंक-झोंक हमेशा चलती रहती थी। एक बार सआदत हसन मंटो ने बेदी को एक खत लिखा। खत का मजमून कुछ इस तरह से था, ‘‘बेदी! तुम्हारी मुसीबत यह है कि तुम सोचते बहुत ज्यादा हो। मालूम होता है कि लिखने से पहले सोचते हो, लिखते हुए सोचते हो और लिखने के बाद भी सोचते हो।’’

बहरहाल अब बारी राजिंदर सिंह बेदी की थी। कुछ अरसा बीता, बेदी ने जब मंटो के कुछ अफसानों में लाउबालीपन (लापरवाही) देखा, तो उन्हें लिखा, ‘‘मंटो तुममें एक बुरी बात है और वह यह कि तुम न लिखने से पहले सोचते हो और न लिखते वक्त सोचते हो और न लिखने के बाद सोचते हो’’ (‘अफसानवी तजरबा और इजहार के तखलीकी मसाइल’, बेदी समग्र, पेज 249-250) इसके बाद मंटो और राजिंदर सिंह बेदी में खतो-किताबत बंद हो गई। बाद में पता चला कि उन्होंने बेदी की तनकीद का उतना बुरा नहीं माना, जितना इस बात का ‘‘कि वे लिखेंगे खाक!, जबकि शादी से परे उन्हें किसी बात का तजरबा ही नहीं।’’

उर्दू अदब में राजिंदर सिंह बेदी की शिनाख्त अफसानानिगार के तौर पर है। उपन्यास की यदि बात करें, तो बेदी ने सिर्फ एक उपन्यास ‘एक चादर मैली सी’ लिखा और वह भी संग-ए-मील है। साल 1962 में छपे इस उपन्यास को साल 1965 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाजा गया। उपन्यास पर बाद में एक फिल्म भी बनी, लेकिन वह टिकिट खिड़की पर कामयाब नहीं हुई। इस बात की बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि उपन्यास ‘एक चादर मैली सी’ सबसे पहले ‘नुकूश’ पत्रिका के कहानी विशेषांक में शाया हुआ था। पाठकों की बेहद पसंदगी और मांग पर बाद में यह अलग से प्रकाशित हुआ।

राजिंदर सिंह बेदी ने कुछ नाटक भी लिखे। उनके नाटकों का पहला संग्रह ‘बेजान चीजें’ शीर्षक से साल 1943 में प्रकाशित हुआ। साल 1982 में प्रकाशित किताब ‘मुक्तिबोध’ में राजिंदर सिंह बेदी के लेख, संस्मरण और भाषण शामिल हैं। इस किताब में पाठकों को बेदी के लेखन के दीगर पहलू देखने को मिलते हैं। किताब के ‘अफसानवी तजरबा और इजहार के तखलीकी मसाइल’ लेख में फन और अदब के तआल्लुक से राजिंदर सिंह बेदी ने क्या खूब लिखा है, ‘‘फन किसी शख्स में सोते की तरह से नहीं फूट निकलता। ऐसा नहीं कि आज रात आप सोएंगे और सुब्ह फनकार होकर जागेंगे। यह नहीं कहा जा सकता कि फलां आदमी पैदाइशी तौर पर फनकार है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि उसमें सलाहियतें हैं, जिनका होना बहुत जरूरी है। चाहे वो उसे जिबिल्लत (सहजवृत्ति) में मिले और या वह रियाजत (अभ्यास) से उनका इक्तिसाब (अर्जन) करे।

पहली सलाहियत तो यह है कि वह हर बात को दूसरों के मुकाबले में ज्यादा महसूस करता हो, जिसके लिए एक तरफ तो दादो-तह्सीन (प्रशंसा) पाए और दूसरी तरफ ऐसे दुख उठाए जैसे कि उसके बदन पर से खाल खींच ली गई हो और उसे नमक की कान (खान) से गुजरना पड़ रहा हो। दूसरी सलाहियत यह कि उसके कामो-दहन (दांत और मुंह) उस चरिंद (शाकाहारी पशु) की तरह से हो, जो मुंह चलाने में खुराक को रेत और मिट्टी से अलग कर सके।

फिर यह ख्याल उसके दिल के किसी कोने में न आए कि घासलेट या बिजली का ज्यादा खर्च हो गया या कागज के रिम के रिम जाया हो गए। वह जानता हो कि कुदरत के किसी बुनियादी कानून के तहत कोई चीज जाया नहीं होती। फिर वह ढीठ ऐसा हो कि नक्शे-सानी (दूसरा खाका) को हमेशा नक्शे-अव्वल (पहला खाका) पर तरजीह दे सके। फिर अपने फन से परे की बातों पे कान दे-मसलन मौसिकी और जान पाए कि उस्ताद आज क्यों सुर की तलाश में बहुत दूर निकल गया है।

मुसव्विरी के लिए निगाह रखे और समझे कि विशी-वाशी में खुतूत (रेखाएं) कैसी रानाई (सुंदरता) और तवानाई (ऊर्जा) से उभरे हैं। अगर यह सारी सलाहियतें उसमें हों, तो आखिर में एक मामूली सी बात रह जाती है और वह यह कि जिस एडिटर ने उसका अफसाना वापस कर दिया है, नाअह्ल (अयोग्य, मूर्ख )है।’’ (‘अफसानवी तजरबा और इजहार के तखलीकी मसाइल’, बेदी समग्र, पेज 245-246)

राजिंदर सिंह बेदी न तो एक बंधे-बंधाए ढांचे में लिखने के कायल थे और न ही उन्होंने अपना लेखन किसी विचारधारा में कैद होकर लिखा। कृश्न चंदर और ख्वाजा अहमद अब्बास के बेश्तर लेखन में जहां वैचारिक आग्रह साफ दिखाई देता है, तो वहीं बेदी किसी भी तरह के मंसूबाबंद लेखन के सख्त खिलाफ थे। बेदी का इस बारे में साफ कहना था, ‘‘आखिर क्या किसी का दिमाग ये सोच कर बैठता है कि बस इसी ढांचे पर छांट-छांट कर बात लिखेगा। वही लिखेगा जो उनके उसूलों पर फिट बैठता है। नहीं जी। हर आदमी का अपना एक फलसफा होता है और दुनिया के सारे हादिसात वो कबूल करता है और उसकी तहरीर में वो उसके जेह्न की छलनी से छनकर आता है। ख्याल कोई चीज नहीं, वो एक पैटर्नलेस बहाव है। पुरअस्रार ही है। ये जो मार्क्सवादी समाज के सोशलिस्ट पैटर्न की बात करते हैं, उसमें अगर मुझे कोई चीज नापसंद है, तो वो है रेजिमेंटेशन।’’

अलबत्ता एक अदीब से वे इस बात की जरूर उम्मीद करते थे, ‘‘अदीब फिलॉस्फर होता है। अगर वो समझता है कि उसके चारों तरफ जो रवायतें या अकीदे हैं, उनकी बुनियाद गलत है, तो जरूरत है कि उनके खिलाफ लिखा जाए। किसी बिलीफ को तोड़ा जाए, चोट की जाए और नए मौजूआत सामने लाए जाएं। इसी में अदब की कामयाबी है।’’

(मध्य प्रदेश निवासी लेखक-पत्रकार जाहिद खान, ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ समेत पांच किताबों के लेखक हैं।)

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This post was last modified on November 11, 2020 8:25 pm

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