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राम मंदिर निर्माण से पहले उत्तर भारत पहुंची ‘सच्ची रामायण’, पेरियार और पोंगापंथ का होगा आमना-सामना

(भारतीय विधायिका और न्यायपालिका ने मिलकर पिछले दिनों ऐसा परिदृश्य बनाने की कोशिश की मानो राम भारत के संपूर्ण बहुसंख्यक हिंदू जन मानस का प्रतिनिधित्व करते हों। कमोवेश इसी मूल तर्क पर अयोध्या में राम मंदिर बनने जा रहा है, जिसका शिलान्यास 5 अगस्त को होना है। इस पूरे प्रकरण में किस प्रकार भारत से अल्पसंख्यक तबक़ों की भावनाओं और मनोबल को कुचला गया है, इससे हम सभी परिचित हैं। लेकिन क्या राम सचमुच संपूर्ण हिंदू जन मानस का प्रतिनिधित्व करते हैं? उत्तर भारत के दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों का एक बड़ा तबका राम की जगह शंबूक, एकलव्य, महिषासुर आदि से अपना मिथकीय रिश्ता जोड़ता है, जबकि दक्षिण भारत का द्रविड़ आंदोलन राम काे पूरी तरह खारिज करता है और रावण को अपना नायक बनाता है। द्रविड़ आंदोलन के प्रणेता पेरियार ई. वी. रामासामी के साहित्य का एक प्रमुख हिस्सा राम और ब्राह्मणवादी हिंदुत्व के विरोध में है।

पेरियार के मूल तमिल लेखन का हिंदी अनुवाद अभी तक उपलब्ध नहीं था, इस कारण उनकी वैचारिकी से हमारा उस तरह का सघन रिश्ता विकसित नहीं हो पाया, जैसा कि डॉ. आम्बेडकर और बहुत हद तक जोतिराव फुले से हो सका है।

इस कमी को बहुजन साहित्य के अध्येता प्रमोद रंजन ने पेरियार पर केंद्रित तीन पुस्तकों की ऋंखला का संपादन कर पूरा किया है। इन किताबों में पेरियार के राम विषयक विचारों के अतिरिक्त, स्त्री, साहित्य, विज्ञान और भविष्य की परिकल्पना संबंधी लेख व दस्तावेज शामिल किए गए हैं। पेरियार की नास्तिकता, ईसाइयत, इस्लाम और बौद्ध धर्म से संबंधित विचारों को भी इसमें जगह दी गई है।

राजकमल प्रकाशन समूह ने लॉकडाउन के बाद नई किताबों के प्रकाशन का दौर शुरु करते हुए सबसे पहले इन किताबों को प्रकाशित किया है, जिसे अयोध्या के बहाने भारत की बहुलता की घेराबंदी करने की कोशिश कर रही उत्तर भारत की सांप्रदायिक शक्तियों को प्रगतिशील हिंदी समाज के एक सशक्त उत्तर के रूप में भी देखा जा सकता है। प्रस्तुत है, पुस्तक- ऋंखला का संपादकीय: संपादक)

हिंदी पट्टी में पेरियार

प्रमोद रंजन

‘हिंदी पट्टी में पेरियार’ विषय पर बात करनी हो तो, एक चालू वाक्य को उलट कर कहने पर बात अधिक तथ्यगत होगी। वह यह कि पेरियार के विचार हिंदी की दुनिया में परिचय के मोहताज हैं! उत्तर भारत, दक्षिण भारत के महान सामाजिक क्रांतिकारी, दार्शनिक और देश एक बड़े हिस्से में सामाजिक-संतुलन की विधियों और राजनीतिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन लाने वाले ईवी रामासामी पेरियार (17 सितम्बर, 1879-24 दिसम्बर, 1973) के बौद्धिक योगदान के विविध आयामों से अपरिचित हैं। यह सुनने में अजीब है, लेकिन सच है।

जबकि स्वयं पेरियार चाहते थे कि उनके विचार उत्तर भारत के प्रबुद्ध लोगों तक पहुंचे। उन्होंने अपने जीवनकाल में उत्तर भारत के कई दौरे किए और विभिन्न जगहों पर भाषण दिए। इस दौरान उन्होंने अपने कुछ लेखों व एक पुस्तक को हिंदी में प्रकाशित करने का अधिकार भी उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख बहुजन कार्यकर्ताओं, क्रमशः चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु और ललई सिंह को दिए थे। लेकिन वह बात न हो सकी, जो पेरियार चाहते थे।

उत्तर भारत में आज भी पेरियार को मुख्य रूप से नास्तिक और हिंदी विरोधी के रूप में जाना जाता है। यह गलत तो नहीं, लेकिन उनका एकांगी चित्रण अवश्य है। उन्होंने धर्म के आधार पर होने वाले शोषण की कड़ी आलोचना की, लेकिन उसे तार्किक परिणति तक पहुंचाया। डॉ. आंबेडकर के बौद्ध धर्म स्वीकार करने का उन्होंने स्वागत किया और उसे ऐतिहासिक दिन बताया। इसी तरह उनका हिंदी-विरोध सांस्कृतिक वर्चस्ववाद का विरोध था, जिसने बाद के वर्षों में दक्षिण और उत्तर भारत में राजनीतिक संतुलन बनाया और देश की अखंडता को संभव किया। वे हिंदी भाषा के विरोधी नहीं थे।

इन चीजों से इतर पेरियार ने विवाह संस्था, स्त्रियों की आजादी, साहित्य के महत्ता और उपयोग, भारतीय मार्क्सवाद की कमजोरियों, गांधीवाद और उदारवाद की असली मंशा और पाखंड आदि पर जिस मौलिकता से विचार किया है, उसकी आज हमें बहुत आवश्यकता है। वे अपने काल तक ही सीमित नहीं थे, उनसे दृष्टि निरंतर भविष्य पर बनी रही। विज्ञान और तकनीक भी उनके प्रिय विषय थे। यही कारण है कि आज के उत्तर सूचना-युग में भी हम उनकी भविष्यवाणियों को फलीभूत होते देख रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में हिंदी क्षेत्र के सामाजिक आन्दोलनों व अकादमियों में समाज के वंचित तबकों से बड़ी संख्या में लोग आए हैं। वे सिर्फ ‘नास्तिक पेरियार’ से परिचित हैं। हालांकि उनके इस रूप के प्रति नई पीढ़ी में जबरदस्त आकर्षण भी है। लेकिन उसने वस्तुत: पेरियार को पढ़ा नहीं है। इस पीढ़ी के पास पेरियार के विचारों के बारे में कुछ सुनी-सुनाई, आधी-अधूरी बातें ही हैं। यह स्वभाविक है क्योंकि हिंदी में अब तक पेरियार का साहित्य उपलब्ध नहीं था।

सकते में डाल देने वाली इस कमी का अहसास मुझे वर्ष 2011 में हुआ था। उन दिनाें मैं नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहा था। अपने एक लेख के लिए मुझे ई.वी. रामासामी पेरियार के विचारों को जानने की जरूरत महसूस हुई। लेकिन, यह जानकर हैरानी हुई कि ‘सच्ची रामायण’ के अतिरिक्त उनका कोई भी साहित्य हिंदी में उपलब्ध ही नहीं है। 1970 में चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने ‘ई.वी. रामासामी पेरियार नायकर’ नाम पेरियार के कुछ लेखों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया था। वह भी अनुपलब्ध था।

‘सच्ची रामायण’ का जो अनुवाद उपलब्ध था, वह भी शुद्ध नहीं था। अंग्रेजी से मिलान करने पर साफ पता चल रहा था कि कई हिस्सों का अनुवाद ही नहीं किया गया है तथा कई स्थानों पर अनुवादक/प्रकाशक ने अपनी भावनाओं का समावेश कर दिया है। इस दिशा में खोजबीन करने पर सच्ची रामायण के हिंदी में प्रचार-प्रसार और राजनीतिक उपयोग-उपेक्षा के बारे कुछ अन्य रोचक जानकारियां भी मिलीं।

राम-कथा की व्याख्या पर केन्द्रित पेरियार की रामायण मूल रूप से तमिल में 1944 में छपी थी। तमिल में इसका नाम था – ‘रामायण पातिरंगल (रामायण के चरित्र)’ अंग्रेजी में यह 1959 में ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से प्रकाशित हुई, जिसका हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ शीर्षक से किन्हीं रामाधार ने किया था; जो 1968 में प्रकाशित हुआ। हिंदी में इसे अर्जक संघ से जुड़े लोकप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक ललई सिंह (1 सितंबर, 1911- 7 फरवरी, 1993) ने प्रकाशित किया था। बाद के वर्षों में वे स्वयं भी अपने प्रशंसकों के बीच ‘पेरियार ललई सिंह’ और उत्तर भारत के पेरियार के नाम से जाने गए।

उन्होंने सिर्फ इसे प्रकाशित ही नहीं किया बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में भी कोई कसर नहीं छोड़ी, जिससे राम-पूजक उत्तर प्रदेश में हड़कंप मच गया। दिसंबर, 1969 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस किताब को (सिर्फ हिंदी अनुवाद नहीं) हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में प्रतिबंधित कर दिया और हिंदी अनुवाद की प्रतियां जब्त कर ली। ललई सिंह यादव ने इसके खिलाफ लंबी न्यायिक लड़ाई लड़ी।

सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर, 1976 के अपने फैसले में इस किताब पर प्रतिबंध को गलत बताया एवं जब्त की गई प्रतियां ललई सिंह को लौटाने का निर्देश दिया। लेकिन, कोर्ट के आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘सच्ची रामायण’ से प्रतिबंध नहीं हटाया। 1995 में प्रदेश में पेरियार को अपने प्रमुख आदर्शों में गिनने वाले कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सत्ता में आई, तब जाकर इससे प्रतिबंध हटा। उस समय बसपा कांशीराम के हाथ में थी और वे दलित-ओबीसी नायकों का राजनीतिक उपयोग करने की रणनीति पर काम कर रहे थे।

लेकिन पेरियार के विचार तब भी हिंदी भाषी जनता तक नहीं पहुंच सके। कांशीराम की मुख्य प्रतिबद्धता दलित समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी के प्रति थी। उन्होंने पेरियार मेला का भी आयोजन किया। नायकों की मूर्तियों की स्थापना, मेलों का आयोजन आदि शीघ्र फल देने वाले बहुत महत्वपूर्ण काम थे। लेकिन कांशीराम से इन नायकों के मूल विचारों को जनता तक पहुंचाने का बीड़ा उठाने की उम्मीद करना अतिरेक ही कहा जाएगा। यह बीड़ा साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे समतावादी कार्यकर्ताओं को उठाना चाहिए था। लेकिन यह नहीं हुआ।

यही कारण था कि, 2007 में जब उत्तर प्रदेश में ‘सच्ची रामायण’ का एक बार फिर जोरदार विरोध हुआ था, तब बसपा को पेरियार से कन्नी काटनी पड़ी। विरोधियों के प्रश्नों का उसके पास सैद्धांतिक उत्तर नहीं था। उस समय भी बसपा उत्तर प्रदेश की सत्ता में थी और मायावती ही मुख्यमंत्री थीं।

अक्टूबर, 2007 में भारतीय जनता पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी पर आरोप लगाया कि वह सरकार के सहयोग से ‘सच्ची रामायण’ का प्रचार-प्रसार कर रही है तथा बड़े पैमाने पर इसकी बिक्री की जा रही है। उस समय विधानसभा का सत्र चल रहा था। इसलिए यह मामला मीडिया में भी खूब गूंजा। भाजपा विधानमंडल दल के नेता ओमप्रकाश सिंह का कहना था कि “हिंदू देवी-देवताओं के विरोधी तथा द्रविड़िस्तान की मांग करने वाले अलगाववादी पेरियार रामासामी की सरकार निंदा करे तथा उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में न माने।” इस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती का उत्तर अप्रत्याशित था। मायावती ने कहा कि ‘‘बसपा तथा सरकार का पेरियार की सच्ची रामायण की बिक्री से कोई लेना-देना नहीं है। भाजपा मामले का राजनीतिकरण कर रही है।’’

भाजपा के विरोध और बसपा द्वारा पेरियार से रणनीतिक दूरी बना लेने की इस घटना का एक आश्चर्यजनक पक्ष भी था; जिसका पता इंडियन एक्सप्रेस की एक ख़बर से लगता है।

पत्रकार अलका पांडेय ने 7 नवंबर, 2007 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपनी खोजी रिपोर्ट में लिखा कि, “जिस ‘सच्ची रामायण’ के लिए भाजपा और बसपा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रही थीं उसकी प्रति न भाजपा के पास उपलब्ध है, न ही बसपा के पास। बसपा का सारा साहित्य बेचने वाले ‘बहुजन चेतना मंडप’ के पास भी यह किताब उपलब्ध नहीं है।’’ भाजपा इस दौरान कई जगहों पर ‘सच्ची रामायण’ के दहन का आयोजन कर रही थी। लेकिन, “जलाने के लिए भी पार्टी के पास किताब की प्रति नहीं थी। उसने जिस किताब का दहन किया, वह किताब के कथित आपत्तिजनक अंशों की फोटोकॉपी थी।”

अखबार  ने अपनी पड़ताल में पाया कि “सिर्फ बसपा से जुड़े स्टॉलों पर ही नहीं, बल्कि पूरे लखनऊ में किसी भी दुकान पर ‘सच्ची रामायण’ उपलब्ध नहीं है।’’ लखनऊ के सबसे बड़े पुस्तक विक्रेता ‘यूनिवर्सल बुक सेलर’ ने भी अखबार को बताया कि “‘सच्ची रामायण’ कभी बिक्री के लिए उपलब्ध ही नहीं थी।”

वस्तुत: ‘बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज इंप्लाइज फेडरेशन’ (बामसेफ) से जुड़े ‘मूलनिवासी प्रचार-प्रसार केंद्र’ तथा ‘आंबेडकर प्रचार समिति’ आदि ने ‘सच्ची रामायण’ की लाखों प्रतियां अपने समर्थकों-कार्यकर्ताओं के बीच वितरित की थीं। लेकिन, इसकी पहुंच न तो विश्वविद्यालयों तक हो सकी थी, न ही उन दुकानों तक, जहां कथित ‘मुख्यधारा’ की किताबें पढ़ने वाले लोग जाते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। एक ओर बहुजन तबकों को ज्ञान की कथित मुख्यधारा से दूर रखने की कोशिश की जाती है, दूसरी ओर इन तबकों के पास उपलब्ध ज्ञान और उनके नायकों की यह सचेत उपेक्षा की जाती है।

बहरहाल, इन स्थितियों से चिंतित होकर मैंने वर्ष 2014 में ही तमिलनाडु निवासी विश्वविद्यालय में अपने सहपाठी मनीवन्नन मुरुगेसन और तमिल पत्रिका कत्तारू के सदस्य टी. थमराईकन्नन   के साथ मिलकर पेरियार ग्रंथावली हिंदी में लाने की योजना बनाई थी।

थोड़े विषयांतर का खतरा मोल लेते हुए भी, उपरोक्त तमिल पत्रिका की विशिष्टता का उल्लेख कर देना यहां प्रासंगिक होगा।

कोयंबटूर से प्रकाशित ‘कात्तारू’अपने कलेवर, विषयों के चुनाव आदि में यह एक श्रेष्ठ और गंभीर मासिक पत्रिका है, जो आज भी नियमित प्रकाशित हो रही है। उत्तर भारत से जो साहित्यिक – वैचारिक अथवा  दलित-बहुजन मुद्दों पर केंद्रित लघु पत्रिकाएँ निकलती हैं, उनमें से अधिकांश के पीछे प्राय: कोई एक व्यक्ति मिशनरी भाव से जुड़ा होता है। कुछ मामलों में तो पत्रिका के माध्यम से स्वनामधन्य हो जाने की ख्वाहिश भी काम कर रही होती है। लेकिन, कोयंबटूर में ‘कात्तारू’ की युवा टीम इससे बिलकुल अलग है।

‘कात्तारू’ में किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं प्रकाशित होता है। सारा काम ‘टीम’ की ओर से किया जाता है। सबसे अधिक हैरान करने वाली बात है पत्रिका के प्रकाशन स्थल के निकटवर्ती गांव-कस्बों के परिवारों का इससे जुड़ाव। उस वार्षिकोत्सव के दौरान  ‘टीम कात्तारू’ ने मुझे बताया कि इससे आसपास के गांवों के लगभग 500 परिवार जुड़े हैं, जिनके अनुदान से यह चलती है।

सम-सामयिक मुद्दों की इस  पत्रिका में कुछ पृष्ठ इन परिवारों में होने वाले जन्मदिन, विवाह व अन्य छोटी-बड़ी उपलब्धियों, शोक समाचार आदि के संक्षिप्त समाचारों व तस्वीरों के लिए सुरक्षित हैं। हिंदी की लघु पत्रिकाओं में इसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते। पत्रिका के जिस समारोह में मैं शामिल हुआ था, उसमें पुरुषों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में किशोरियां, युवतियां, बहुएं, बच्चे, बुजुर्ग महिलाएं भी सक्रिय भागीदारी कर रहीं थीं। वे विविध वैचारिक मुद्दों पर सवाल पूछ रहीं थीं और वक्ताओं के भाषणों के बाद हस्तक्षेप कर रहीं थीं।

पेरियार ने अपने आन्दोलन को महिलाओं से जोड़ने पर बहुत बल दिया था, जिसका असर उस समारोह में दिख रहा था। इसके विपरीत, आज उत्तर भारत के सारे जातिवाद-विरोधी आन्दोलन मुख्य रूप से सिर्फ पुरुषों के आन्दोलन हैं। जो महिलाएं इन आन्दोलनों में हमारे कंधे-से-कंधा मिला सकती थीं, उन्हें भी हमने विवश कर दिया है कि वे हमारे पुरुषवाद के विरोध में अपना अलग आन्दोलन चलाएँ। उत्तर भारत का ‘दलित स्त्रीवाद’ इसी का परिणाम है।

बहरहाल, पेरियार को हिंदी में लाना इतना आसान नहीं था। धारा के खिलाफ जाने वाले कामों में ऐसे अप्रत्याशित विघ्न आ खड़े होते हैं, जिनसे पार पाना बहुत कठिन होता है।

अंतत: कोविड:19 के इस दौर में पेरियार के विचार हिंदी में तीन पुस्तकों की ऋंखला के रूप में प्रकाशित हो गए हैं। इनमें संबंधित विषयों पर पेरियार के लेख और भाषण हैं। इसके अतिरिक्त सभी खंडों में संबंधित विषय के अध्येताओं के आलोचनात्मक लेख तथा पेरियार के जीवन का वर्ष वार लेखाजोखा दिया गया है।

आज ये किताबों जिस रूप में प्रकाशित हो रही है, उसमें कई लोगों की भूमिका रही है। ललई सिंह द्वारा प्रकाशित सच्ची रामायण का अंग्रेजी संस्करण से मिलान और पुनः पूरी पुस्तक का नया और सटीक अनुवाद, तमिल भाषा के शब्दों के सही भावार्थ को समझने के लिए तमिल भाषी साथियों से निरंतर  संपर्क एक बहुत श्रम साध्य काम था, जिसे मित्र अशोक झा ने अपनी अनेक व्यस्तताओं के बीच पूरी प्रतिबद्धता से पूर्ण किया।

कंवल भारती, ओमप्रकाश कश्यप युवा शोधार्थी धर्मवीर गगन के परामर्शों इस किताब को समृद्ध किया है। पेरियार की विलक्षण अध्येता व्ही.गीता, ब्रजरंजन मणि, टी मार्क्स, ललिता धारा, विद्याभूषण रावत,  देवीना अक्षयवर, पूजा सिंह, संजय जोठे और ‘द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन’ के निदेशक मित्र संजीव चंदन ने न सिर्फ इसमें अपना रचनात्मक योगदान दिया, बल्कि इसके प्रकाशन के दौरान आई बाधाओं को दूर करने में भी साथ खडे रहे। इन मित्रों के लिए आभार शब्द तो पर्याप्त नहीं ही होगा।

उम्मीद करता हूं कि अनेकानेक मित्रों के सहयोग से तैयार यह पुस्तक हिंदी पाठकों के लिए उपयोगी साबित होगी और हम अब कह सकेंगे कि पेरियार हिंदी पट्टी में भी परिचय के मोह ताज नहीं हैं!

(राजकमल समूह द्वारा प्रकाशित पेरियार पुस्तक ऋंखला के संपादकीय का संपादित अंश।)




राजकमल समूह द्वारा  प्रकाशित पेरियार पुस्तक श्रंखला की तीन पुस्तकें

  1. धर्म और विश्वदृष्टि
  2. जाति व्यवस्था और पितृसत्ता
  3. सच्ची रामायण

संपादक : प्रमोद रंजन
प्रकाशक : राधाकृष्ण  प्रकाशन, दिल्ली, फोन : 9311397733


(यह दोनों किताबें राजकमल प्रकाशन समूह की वेबसाइट www.rajkamalbooks.in पर उपलब्ध हैं। आज से ही आप इन्हें खरीद सकते हैं। यही नहीं, आप राजकमल प्रकाशन समूह के सेल्स वाट्सएप्प नंबर 9311397733 पर कॉल करके या संदेश भेजकर भी किताबें खरीद सकते हैं।)

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This post was last modified on July 28, 2020 4:46 pm

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