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Tuesday, September 28, 2021

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सज्जाद ज़हीर : तरक्की पसंद तहरीक की जिंदा रूह

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हिंदुस्तानी अदब में सज्जाद जहीर की शिनाख्त, तरक्की पसंद तहरीक के रूहे रवां के तौर पर है। वे राइटर, जर्नलिस्ट, एडिटर और फ्रीडम फाइटर भी थे। साल 1935 में अपने चंद तरक्कीपसंद दोस्तों के साथ लंदन में प्रगतिशील लेखक संघ की दागबेल डालने वाले सज्जाद जहीर ने अपनी सारी ज़िन्दगी प्रगतिशील मूल्यों को स्थापित करने और अवाम को वाजिब हक दिलवाने, समाजी इंसाफ की लड़ाई लड़ने में गुजार दी। वे मुल्क के लाखों पसमांदा इंसानों में ऐसा शऊर पैदा करना चाहते थे, जो उन्हें सामाजिक, आर्थिक शोषण और सियासी गुलामी से निजात दिलाने में मददगार साबित हो।

5 नवम्बर, 1905 को लखनऊ में जन्मे सज्जाद जहीर अपने दोस्तों में बन्ने भाई के नाम से मकबूल थे। सांस्कृतिक आंदोलन के जरिए वे अवाम में बेदारी लाना चाहते थे। गोया कि अवाम में सियासी, समाजी जागरूकता और सांस्कृतिक सजगता पैदा करके ही उन्हें अपनी आजादी, हक और हुकूक को हासिल करने के लिए प्रेरित किया जा सकता था। सज्जाद जहीर का इस बारे में साफ-साफ मानना था कि हिंदुस्तान की आजादी में लेखक, संस्कृतिकर्मी ही एक अहम भूमिका निभा सकते हैं।

सज्जाद जहीर की ये क्रांतिकारी सोच यकायक नहीं बनी थी, बल्कि इसके पीछे उस दौर का हंगामाखेज बैकग्राउंड था। कानूनी तालीम के लिए अपने मुल्क से दूर गये सज्जाद ज़हीर लंदन में साल 1927 से 1935 तक रहे। लंदन में जहीर की तालीम के साल, दुनियावी ऐतबार से बदलाव के साल थे। साल 1930 से 1935 तक का दौर परिवर्तन का दौर था। पहली आलमी जंग के बाद सारी दुनिया आर्थिक मंदी झेल रही थी। जर्मनी, इटली में क्रमशः हिटलर और मुसोलिनी की तानाशाही और फ्रांस की पूंजीपति सरकार के जनविरोधी कामों से पूरी दुनिया पर साम्राज्यवाद और फासिज्म का खतरा मंडरा रहा था। इन सब संकटों के बावजूद उम्मीदें खत्म नहीं हुई थीं। हर ढलता अंधेरा, पहले से भी उजला नया सबेरा लेकर आता है।

जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी के लीडर जॉर्जी दिमित्रोव के मुकदमे, फ्रांस के मजदूरों की बेदारी और ऑस्ट्रिया की नाकामयाब मजदूर क्रांति से सारी दुनिया में क्रांति के एक नये युग का आगाज हुआ। चुनांचे, साल 1933 में प्रसिद्ध फ्रांसीसी साहित्यकार हेनरी बारबूस की कोशिशों से फ्रांस में लेखक, कलाकारों का फासिज्म के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा ‘वर्ल्ड कान्फ्रेंस ऑफ राइटर्स फार दि डिफेन्स ऑफ कल्चर’ बना। जो आगे चलकर पॉपुलर फ्रंट (जन मोर्चा) के तौर पर तब्दील हो गया। इस संयुक्त मोर्चे में मैक्सिम गोर्की, रोम्या रोलां, आंद्रे मालरो, टॉमस मान, वाल्डो फ्रेंक, मारसल, आंद्रे जीद, आरांगो जैसे विश्वविख्यात साहित्यकार शामिल थे। लेखक, कलाकारों के इस मोर्चे को जनता की बड़ी तादाद की हिमायत हासिल थी।

विश्व परिदृश्य में तेजी से घट रही इन सब घटनाओं ने सज्जाद जहीर को काफी मुतास्सिर किया। जिसका सबब, लंदन में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना थी। आगे चलकर उन्होंने तरक्कीपसंद तहरीक को आलमी तहरीक का हिस्सा बनाया। स्पेन के फासिस्ट विरोधी संघर्ष में सहभागिता के साथ-साथ सज्जाद जहीर ने साल 1935 में आंद्रे गीडे व मेलरौक्स द्वारा आयोजित विश्व बुद्धिजीवी सम्मेलन में भी हिस्सा लिया। इस सम्मेलन के अध्यक्ष मैक्सिम गोर्की थे। अपनी जिंदगी को एक नयी राह देने और एक खास मक़सद को हासिल करने के इरादे से सज्जाद जहीर ने साल 1936 में लंदन को छोड़ा। लंदन से भारत वापस लौटते ही उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की तैयारियां शुरू कर दीं।

‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के घोषणा-पत्र पर उन्होंने भारतीय भाषाओं के तमाम बड़े लेखकों से विचार-विनिमय किया। इस दौरान वे कन्हैयालाल मुंशी, फिराक गोरखपुरी, डॉ. सैयद ऐजाज हुसैन, शिवदान सिंह चौहान, पं. अमरनाथ झा, डॉ. ताराचंद, अहमद अली, मुंशी दयानरायन निगम, महमूदुज्जफर, सिब्ते हसन आदि से मिले। ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के घोषणा-पत्र पर सज्जाद जहीर ने उनसे राय-मशिवरा किया। वह दिन भी आया, जब प्रगतिशील लेखक संघ की पहली कॉन्फ्रेंस लखनऊ में आयोजित हुई।

कॉफ्रेंस की सदारत मुंशी प्रेमचंद ने की। प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन बेहद कामयाब रहा। जिसमें साहित्य से जुड़े कई विचारोत्तेजक सत्र हुए। अहमद अली, फिराक गोरखपुरी, मौलाना हसरत मोहानी आदि ने अपने आलेख पढ़े। अधिवेशन में उर्दू के बड़े साहित्यकार तो शामिल हुए ही, हिन्दी से भी प्रेमचंद के साथ जैनेन्द्र कुमार, शिवदान सिंह चौहान ने शिरकत की। अधिवेशन में लेखकों के अलावा समाजवादी लीडर जयप्रकाश नारायण, यूसुफ़ मेहर अली, इंदुलाल याज्ञनिक और कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने हिस्सा लिया।

सज्जाद जहीर इस संगठन के पहले महासचिव चुने गये। वे साल 1936 से 1949 तक प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव रहे। बन्ने भाई के व्यक्तित्व और दृष्टिसम्पन्न परिकल्पना की ही वजह से तरक्कीपसंद तहरीक आगे चलकर, हिंदुस्तान की आजादी की तहरीक बन गई। मुल्क के तमाम तरक्कीपसंद अदीब, कलाकार और संस्कृतिकर्मी इस आंदोलन के इर्द-गिर्द जमा हो गये। साल 1942 से 1947 तक का दौर, प्रगतिशील लेखक संघ के आंदोलन का सुनहरा दौर था। यह आंदोलन आहिस्ता-आहिस्ता देश की सारी भाषाओं में फैलता चला गया। इन सांस्कृतिक आंदोलनों का आखिरी मकसद मुल्क की आजादी था।

अपनी शुरूआती जिंदगी में सज्जाद जहीर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य भी रहे। इलाहाबाद शहर कांग्रेस कमेटी के महासचिव होकर, उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ काम किया। आगे चलकर वे अखिल भारतीय कांग्रेस के मेम्बर चुने गए। कांग्रेस के मुख्तलिफ महकमों, खास तौर पर विदेशी मामलों और मुस्लिम जनसंपर्क से भी वे जुड़े रहे। सज्जाद जहीर में रचनात्मक, संगठनात्मक गुण अद्भुत थे। अपने संगठनात्मक कौशल से ही उन्होंने ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ और ‘ऑल इंडिया किसान सभा’ जैसी किसानों और मजदूरों की जबर्दस्त संस्थाएं बनाईं। उनकी बेहतरी के लिए काम किया।

कांग्रेस पार्टी में काम करने के दौरान सज्जाद जहीर का वास्ता, उस वक्त अंडरग्राउण्ड चल रहे कम्युनिस्ट लीडर कॉमरेड पीसी जोशी से हुआ। पीसी जोशी के साम्यवादी विचारों से वे बेहद प्रभावित हुए। आगे चलकर कांग्रेस छोड़ वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हो गए। वे उत्तर प्रदेश इकाई के सचिव भी रहे। यह बतलाना लाजिमी होगा कि उस वक्त कम्युनिस्ट पार्टी, अंग्रेज सरकार के कोपभाजन से बचने की खातिर अंडरग्राउण्ड होकर काम करती थी। साल 1942 में अंग्रेजी हुकूमत ने कम्युनिस्ट पार्टी से पाबंदी हटा ली। पार्टी से पाबंदी हटते ही सज्जाद जहीर अपने काम में दोबारा पहले से भी ज्यादा जी-जान और जोश के साथ जुट गए।

अपने राजनैतिक, सांस्कृतिक आंदोलन के दौरान सज्जाद जहीर को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भड़काऊ लेखन व तकरीर देने के जुर्म में तीन मर्तबा जेल हुई। अपनी सजा और कैद के बावजूद वे अलग-अलग नामों से अखबारों के लिए लगातार लिखते रहे। कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ‘कौमी जंग’ और ‘नया ज़माना’ अखबार में उन्होंने प्रधान सम्पादक की हैसियत से काम किया। लंदन में जर्नलिज्म के कोर्स, उनकी संपादकीय सूझबूझ और अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि की वजह से इन पत्रों ने अवाम के बीच जल्द ही एक नया मुकाम हासिल कर लिया। यह पत्र हिंदुस्तान के प्रगतिशील लेखकों के मुख्य पत्र और उनकी आवाज बन गए।

इन अखबारों के मार्फत अवाम में बेदारी फैलाना ही उनका अहम मकसद था। प्रगतिशील लेखक संघ की लोकप्रियता, देश के सभी प्रदेशों के लेखकों के बीच फैल गई। इस आंदोलन में लेखकों का शामिल होना, प्रगतिशीलता की पहचान हो गई। प्रगतिशील आन्दोलन ने जहां धार्मिक अंधविश्वास, जातिवाद व हर तरह की धर्मांधता की मुखालफत की, तो वहीं साम्राज्यवादी, सामंतशाही व आंतरिक सामाजिक रूढ़ियों रूपी दोहरे दुश्मनों से भी टक्कर ली।

एक समय ऐसा भी आया, जब उर्दू के सभी बड़े साहित्यकार प्रगतिशील लेखक संघ के बैनर तले थे। फैज़ अहमद फैज़, अली सरदार जाफरी, मजाज़, कृश्न चंदर, ख्वाजा अहमद अब्बास, कैफी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी, इस्मत चुगताई, महेन्द्रनाथ, साहिर लुधियानवी, हसरत मोहानी, उपेन्द्रनाथ अश्क, सिब्ते हसन, रशीद जहां, जोश मलीहाबादी, फिराक गोरखपुरी, राजिंदर सिंह बेदी, सागर निजामी जैसे आला नाम तरक्कीपसंद तहरीक के हमनवां, हमसफर थे।

इन लेखकों की रचनाओं ने मुल्क में आजादी के हक में एक समां बना दिया। यह वह दौर था, जब तरक्कीपसंद लेखकों को नये दौर का रहनुमा समझा जाता था। तरक्कीपसंद तहरीक को पं. जवाहरलाल नेहरू, सरोजनी नायडू, रविन्द्रनाथ टैगोर, अल्लामा इकबाल, खान अब्दुल गफ्फार खान, प्रेमचंद, वल्लथोल जैसी हस्तियों की सरपरस्ती हासिल थी। वे भी इन लेखकों के लेखन एवं काम से बेहद मुतास्सिर और पूरी तरह से मुतमईन थे।

आजादी मिलने और तक्सीम के बाद सज्जाद जहीर को कम्युनिस्ट पार्टी के फैसले की वजह से कुछ समय के लिए कम्युनिस्ट पार्टी को संगठित करने के लिहाज से पाकिस्तान जाना पड़ा। पाकिस्तान में उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ पाकिस्तान का महासचिव चुन लिया गया। वहां उन्होंने विद्यार्थियों, मजदूरों और ट्रेड यूनियन के संगठन का जिम्मा संभाला। मगर पाकिस्तान में भी हालात उनके मनमाफिक नहीं थे। उस वक्त की कट्टरपंथी सरकार के चलते, उन्होंने वहां भी अंडरग्राउण्ड रहकर काम किया।

चंद साल बाद ही हुकूमत-ए-पाकिस्तान ने ‘रावलपिंडी साजिश’ केस में उन्हें तरक्कीपसंद शायर फैज़ अहमद फैज़ के साथ गिरफ्तार कर लिया। मुकदमे और सजा के दरमियान उन्होंने हैदराबाद, सिंध, लाहौर, मच्छ और कोयटा की जेलों में बेहद जुल्मो-सितम सहते हुए, जैसे-तैसे अपने पांच साल गुजारे। अदालत में सरकारी वकील ने उन्हें सजा-ए-मौत देने की मांग की। भारत सरकार के अभियान और सारी दुनिया के बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों के दबाव से पाकिस्तान सरकार को आखिरकार, सज्जाद जहीर को जेल से रिहा करना पड़ा।

रिहाई के बाद सज्जाद जहीर, हिंदुस्तान वापस आ गये। वापस आते ही उन्होंने एक बार फिर प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियां तेज कर दीं। आजादी मिलने के बावजूद, उनकी लड़ाई अब भी अधूरी थी। दुनिया में जाति, रंग, नस्लवाद, साम्राज्यवाद के खतरे अब भी बरकरार थे। हिंदुस्तान आने के साल भर के अंदर ही उन्होंने डॉ. मुल्कराज आनंद के साथ रूस में अफ्रो-एशियाई साहित्यकारों की पहली कॉन्फ्रेंस आयोजित की। जो आखिरकार अफ्रो-एशियाई लेखकों का जबर्दस्त आंदोलन साबित हुआ। भारतीय लेखक और सांस्कृतिक नेता के तौर पर सज्जाद जहीर ने कई देशों की यात्राएं कीं। भारत से बाहर उन्होंने जर्मनी, पौलेण्ड, रूस, चैकेस्लोवाकिया, हंगरी, बुल्गारिया, रोमानिया आदि देशों में इस आंदोलन का विस्तार किया। समाजवाद में गहरा अकीदा रखने वाले सज्जाद जहीर, फासिस्टों को छिपा हुआ साम्राज्यवादी मानते थे।

यूं तो सज्जाद जहीर की जिंदगी का ज्यादातर अरसा संगठनात्मक कार्यों में ही बीता। लेकिन फिर भी वे साहित्यिक लेखन के साथ-साथ देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक और राजनैतिक मसलों पर मुसलसल लिखते रहे। साहित्यिक लेखन में उन्होंने जितना भी लिखा, वह सब मील का पत्थर है। साल 1935 में प्रकाशित कहानी संग्रह ‘अंगारे’ में डॉ. रशीद जहां, महम्मूदर जफर, अहमद अली के साथ उनकी भी कहानी शाया हुई थी। समाजी और सियासी ऐतबार से उस समय यह संग्रह काफी मशहूर रहा। अंग्रेजी हुकूमत की पाबंदी के साथ-साथ इस किताब को अपने ही मुल्क के प्रतिक्रियावादियों और संकीर्णतावादियों की तंगनजरी का भी सामना करना पड़ा।

उस वक्त इस संग्रह के लेखकों का हाल यह था कि वे जहां भी जाते, उन्हें ‘अंगारे’ के लेखकों के नाम से ही पुकारा जाता था। साल 1935 में ही पेरिस में लिखा गया उनका छोटा उपन्यास ‘लंदन की एक रात’ जैसा कि नाम से बजाहिर है सिर्फ एक रात का तफसरा है। इस उपन्यास में सज्जाद जहीर ने जिस अनोखे शिल्प का इस्तेमाल किया है, ऐसा शिल्प और भाषा हमें बिरले ही उपन्यासों में देखने को मिलता है। उपन्यास में उन्होंने अपने मुल्क की आजादी की चाह लिए, परदेस में रह रहे नौजवानों के जज्बात का शानदार चित्रण किया है। ‘पिघला नीलम’ सज्जाद जहीर की नज्मों का संग्रह है, जो उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी दौर में लिखा।

इन सब रचनाओं के अलावा उनका अहम अदबी शाहकार ‘रौशनाई’ है। यह किताब उन्होंने पाकिस्तान की जेलों में कैद की हालत में लिखी थी। ‘रौशनाई’ को अदबी हल्कों में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रमाणिक इतिहास के तौर पर मकबूलियत हासिल है। यह किताब ‘तरक्कीपसंद मुसन्निफ अंजुमन’ का ही अकेला दस्तावेज नहीं है, बल्कि आजादी के जद्दोजहद के पूरे हंगामाखेज दौर और उस वक्त के सियासी, समाजी हालातों का भी मुकम्मल खाका हमारी नजरों के सामने पेश करती है। ‘रौशनाई’ में सज्जाद जहीर की आलोचकीय प्रतिभा का प्रत्यक्ष दीदार होता है।

इस किताब में अदब और ललित कलाओं के नुक्तों पर तरक्कीपसंद नजरिए से तो रोशनी डाली ही गई है, साथ ही प्रगतिशील साहित्य की बुनियादी समस्याओं, बहसों, संवाद, कॉन्फ्रेंस, उद्देश्यों को भी कलमबद्ध किया गया है। बकौल रौशनाई के हिन्दी अनुवादक जानकी प्रसाद शर्मा,‘‘रौशनाई में इतिहास, संस्मरण और शेरो अदब की समीक्षा के साथ-साथ मार्क्सवादी सिद्धांत निरूपण की धाराएं एक दूसरे में पैबस्त नजर आती हैं।’’ सज्जाद जहीर ने किताब ‘रौशनाई’ के साथ-साथ ईरान के अजीम गज़लगो शायर हाफिज शिराजी की शायरी पर भी एक शोध प्रबंध ‘जिक्र-ए-हाफिज’ लिखा है। ‘तरक्की पसंद तहरीक, अदब और सज्जाद जहीर’, ‘मजामीन-ए-सज्जाद जहीर’, ‘उर्दू हिंदी हिंदुस्तानी’, ‘उर्दू का हाल और मुस्तकबिल’ उनकी दीगर किताबें हैं।

13 सितम्बर 1973 को अल्मा-अता, (सोवियत संघ) अब कजाकिस्तान में अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। अवाम दोस्त सज्जाद जहीर ने अदब को कलावादी दायरे से बाहर निकाल कर, अवाम की जिंदगी और उसके उतार-चढ़ावों से जोड़ा था। अदब और हिंदुस्तानी तहजीब को वे ऐसा हथियार मानते थे, जिसकी धार से गुलामी की बेड़ियों को तोड़ा जाना मुमकिन है। हमें आजादी मिले सात दशक से ज्यादा गुजर गए, लेकिन आज भी मुल्क में रंग, नस्ल, जाति, महजब की जकड़बंदियां ज्यों के त्यों कायम हैं। फिरकापरस्त, पूंजीवादी, साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया के कई हिस्सों में अवाम के हकों पर कुठाराघात कर रही हैं। मानवाधिकारों पर नित्य नए हमले हो रहे हैं। धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक आवाजों का दमन किया जा रहा हो। ऐसे हालात में सज्जाद जहीर, उनके विचार और प्रगतिशील आंदोलन पहले से भी ज्यादा मौजूं हो जाता है।

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