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शहीद गांधी जीवित गांधी से ज्यादा शक्तिशाली हैं…

भारतीय राजनीति और समाज में गांधी की प्रासंगिकता पर लंबे समय से बहस होती रही है। गांधी के जीवनकाल में उनके अनुयाइयों की बड़ी संख्या थी तो उनके विरोधी भी कम नहीं थे। गांधी की हत्या करने वाली जमात ने सोचा था कि गांधी के साथ ही उनका विचार एवं दर्शन भी दफन हो जाएगा। लेकिन 30 जनवरी 1948 के बाद भी गांधी की लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। यह लोकप्रियता सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बढ़ रही है।

यह वर्ष राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती का है। भारत सरकार के साथ विश्व भर में सरकारी गैर सरकारी संस्थाएं बापू की डेढ़ सौवीं जयंती पर तरह-तरह के आयोजन कर रहे हैं। इसी क्रम में भोपाल के पत्रकारों की संस्था ‘पब्लिक रिलेशंस सोसायटी’ ने ‘देश समाज और गांधी’ के नाम से एक स्मारिका प्रकाशित की है। स्मारिका के संपादक पुष्पेन्द्र पाल सिंह हैं। 165 पृष्ठों और 45 अध्यायों में गांधी के विभिन्न रूपों पर प्रकाश डाला गया है। स्मारिका को पढ़ने के बाद महात्मा गांधी के विभिन्न क्षेत्रों में किए गए काम और विचारों का परिचय होता है। अक्सर गांधी के महात्मा या राजनीतिक जीवन ही बहस-विवाद के केंद्र होते हैं। लेकिन जीवन का कोई क्षेत्र अछूता नहीं है जिस पर गांधी ने गंभीरता और समग्रता से विचार न किया हो। ‘देश समाज और गांधी’ में राष्ट्रपिता के संपूर्ण विरासत पर चर्चा की गई है।

वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी ने गांधी को याद करने के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए प्रो. मकरंद परांजपे के ‘डेथ एंड आफ्टर लाइफ ऑफ महात्मा गांधी’पुस्तक का हवाला दिया है। जिसमें परांजपे लिखते हैं, “ शहीद गांधी जीवित गांधी से ज्यादा शक्तिशाली हैं। ” ऐसे में शहीद होने के सत्तर साल बाद भी गांधी वैश्विक शख्सियत बने हुए हैं।

‘याद आते रहेंगे गांधी…’ शीर्षक में स्मारिका के संपादक पुष्पेन्द्र पाल सिंह लिखते हैं, “ मेरा मानना यह रहा है कि दुनिया में कई विचार समय के साथ अप्रासंगिक हो गए, किंतु गांधी विचार जितने पुराने होते जा रहे हैं, उतनी ही उनकी प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है।”

हर वर्ष 2 अक्टूबर और 30 जनवरी को महात्मा गांधी को याद किया जाता है। स्कूलों-कालेजों और सरकारी संस्थानों में गांधी को याद करने का यह रस्म 70 सालों से चल रहा है। कुछ राजनीति दल इस रस्म अदायगी कार्यक्रम पर भी नाक-भौं सिकोड़ते हैं। उनकी राय में महात्मा गांधी को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जाता रहा है। उनके अनुसार देश में और भी कई महापुरुष हुए हैं जिनको याद किया जाना जरूरी है। ऐसी राय रखने वाले देश में बहुतेरे व्यक्ति आपको मिल जाएंगे। लेकिन उनकी यह राय गांधी के योगदान का समग्र मूल्यांकन किए बगैर राजनीतिक दलों के दुष्प्रचार पर आधारित है।
पत्रकारिता से गांधी का बहुत नजदीकी संबंध था। दक्षिण अफ्रीका से ही वह पत्रकारिता की ताकत से परिचित थे। इसलिए पत्रकारिता के जोखिमों और गुणों को देखते हुए उन्होंने कुछ मानक तय किए थे, जो आज के कारपोरेट मीडिया के दौर में भी कारगर हैं। शिक्षा, रोजगार, स्त्री शिक्षा, छुआछूत पर गांधी के विचार आज भी हमको रास्ता दिखाते हैं।

देश की बेहतरी के लिए गांधी जी ग्राम स्वराज का सपना देखा था। “आज भी शास्वत है बापू का ग्राम स्वराज” में पद्मश्री बाबूलाल दाहिया लिखते हैं कि – “उनके ग्राम स्वराज की अवधारणा में गांव अपने आप में एक आत्म निर्भर इकाई था। जिसमें गांव के संसाधनों से ही गांव का विकास निहित था। उनकी अवधारणा में मुट्ठी भर शहर नहीं,बल्कि 7 लाख गांव थे। क्योंकि गांव के स्वावलम्बन से ही 75 प्रतिशत भारत का स्वावलम्बन है।”

इसी तरह गांधी के शिक्षा पर बुनियादी चिंतन को नई तालीम के नाम से जानते हैं। उनकी नजर में शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य चिंतन, अनुभूति और कर्म में एक अहिंसक व्यक्ति का निर्माण करना है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मोहनदास कर्मचंद गांधी के पहले और उनके समय में भी बहुत लोगों ने आजादी की लड़ाई में अपने प्राणों की आहूति दी। घर-परिवार छोड़ कर ब्रितानी हुकूमत से संघर्ष किया। लेकिन जो बात गांधी को अन्य क्रांतिकारियों और नेताओं से अलग करती है वह है उनका विचार और नैतिक साहस। गांधी जी के विचार किसी एक कालखंड के लिए नहीं बल्कि आने वाले समय में भी प्रासंगिक रहेंगे, ऐसा कहने वाले तब भी थे और आज भी हैं। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है गांधी की प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है। क्योंकि गांधी जी के विचार किसी खास परिस्थिति से नहीं बल्कि सृष्टि और जीवन के शाश्वत मूल्यों से जुड़े हैं। सत्य,अहिंसा और सत्याग्रह उनके बुनियादी सिद्धांत हैं तो छुआछूत, जात-पात और सांप्रदायिकता के वे कट्टरविरोधी थे। वरिष्ठ पत्रकार एल.एन. हरदेनिया ने अपने लेख में 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या के बाद नेहरू के भाषण का जिक्र किया है-

“हमारे बीच से प्रकाश चला गया। चारों तरफ अंधकार ही अंधकार है। इस अवसर पर मैं आपसे क्या कहूं और कैसे कहूं ? हमारे सर्वाधिक प्यारे नेता, जिन्हें हम बापू कहते थे,जिन्हें हम राष्ट्रपिता कहते थे, वे अब नहीं रहे परंतु क्या यह कहना उचित होगा ? वैसे तो यह वास्तविकता है कि अब हम उन्हें उस रूप में नहीं देख पाएंगे, जिस रूप में हम उन्हें पिछले अनेक वर्षों से देख रहे थे। अब हमें किसी भी मुद्दे पर बापू की सलाह और मार्गदर्शन नहीं मिल सकेगा। यह सोचकर ही हमारा मन कांप जाता है। यह स्थिति अकेली मेरी नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों लोगों की है। मैंने कहा था प्रकाश चला गया है, परंतु अब मैं सोचता हूं कि मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था, क्योंकि वह प्रकाश जो हमें इतने वर्षों से रास्ता दिखाता था, वह कोई साधारण प्रकाश नहीं था। मैं सोचता हूं कि बापू की शारीरिक मृत्यु के बावजूद यह प्रकाश हमें हजारों वर्ष तक रास्ता दिखाता रहेगा, क्योंकि यह प्रकाश सिर्फ वर्तमान को ही नहीं दिखाता है वरन् भविष्य दृष्टा भी है।”

12 फरवरी 1948 को प्रयाग के संगम पर महात्मा गांधी की अस्थियों का विसर्जन करते हुए नेहरू जी ने भाषण दिया-

“वैसे सतही तौर पर यह लगता है कि बापू की हत्या एक पागल व्यक्ति ने की थी, जिसके कारण गांधी जी की हत्या हुई थी। सच तो यह है कि संपूर्ण देश में घृणा और शत्रुता का जहर फैला दिया गया था और उस जहर के कारण ही यह जघन्य कांड हुआ। इस जहर का बोया हुआ बीज अब एक वृक्ष का स्वरूप ले चुका है। आवश्यकता इस बात की है कि अब हम इस जहर के विरूद्ध संघर्ष करें, लड़ाई करें। परंतु इसका एक सबक यह भी है कि हम किसी के भी विरूद्ध अपने मन में घृणा और दुर्भावना का स्थान न दें। ऐसा करना किसी के भी हित में नहीं होगा।

यह तथ्य सही है कि गांधी जी की हत्या के पीछे एक खास किस्म की राजनीतिक घृणा काम कर रही थी,जिसकी चपेट में उस समय कई युवा थे। लेकिन आज उस घृणा की राजनीति करने वाले सत्ता पर काबिज हो गए हैं। ऐसे में गांधी को याद करने और उनके बताए रास्तों पर चलने की अधिक जरूरत है। और यही गांधी की प्रासंगिकता है।

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This post was last modified on July 21, 2019 9:53 pm

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