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शकील बदायूंनी की जयंती पर विशेष: ’‘मैं ‘शकील’ दिल का हूं तर्जुमा…’’

‘‘मैं ‘शकील’ दिल का हूं तर्जुमा, कि मुहब्बतों का हूं राज़दां/मुझे फ़क्र है मेरी शायरी, मेरी जिंदगी से जुदा नहीं’’ शायर शकील बदायूंनी की गजल का यह शानदार शेर वाकई उनकी पूरी जिंदगी और फलसफे की तर्जुमानी करता है। शकील बदायूंनी ने अपनी गजलों, गीतों में हमेशा दिल की बात की, मुहब्बत के दिलफरेब अफसाने लिखे। मुहब्बत के दर्द को एक अज्मत बख्शी। उनके गीतों के बिना हिंदी फिल्मी दुनिया की मानों महफिल अधूरी है। मशहूर तरक्कीपसंद शायर अली सरदार जाफ़री, जिन्होंने अपनी अदबी जिंदगी में ज्यादातर नज्में लिखीं, वे भी शकील बदायूंनी की गजलों के मुरीद थे।

उनकी गजलों के बारे में जाफरी की राय थी, ‘‘शकील ग़ज़ल कहना भी जानते हैं और गाना भी। मैं अपनी अदबी ज़िन्दगी में उनसे दूर रहा हूं, लेकिन उनकी ग़ज़ल से हमेशा कुर्बत महसूस की है।’’ वहीं एक और तरक्कीपसंद शायर, गीतकार साहिर लुधियानवी की नजर में, ‘‘जिगर मुरादाबादी और फ़िराक गोरखपुरी के बाद आने वाली पीढ़ी में शकील एक अदद शायर हैं, जिन्होंने अपनी कला के लिए ग़ज़ल का क्षेत्र चुना है।’’ अलबत्ता यह बात जुदा है कि साहिर के इस ख्याल से शायद ही सभी इत्तफाक रखें। क्योंकि शकील बदायूंनी के ही समकालीन मजरूह सुल्तानपुरी भी गजल के लिए ही जाने-पहचाने जाते हैं और उन्होंने ना के बराबर नज्में लिखीं हैं।

3 अगस्त, 1916 को उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर बदायूं में जन्मे शकील बदायूंनी को बचपन से ही शायरी का शौक था। महज तेरह साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने अपनी पहली गजल लिख डाली थी, जो उस वक्त के नामी अखबार ’शाने-हिंद’ में शाया हुई। इसके बाद उनकी शायरी का सिलसिला चल निकला। वैसे उनका असली नाम गफ्फार अहमद था। उन्होंने ’सबा’ और ’फरोग’ जैसे तखल्लुस से गजल लिखी, लेकिन उनकी सही पहचान बनी शकील बदायूंनी के नाम से। शकील बदायूंनी की शुरुआती तालीम बदायूं में ही हुई। अरबी, उर्दू और फारसी जबान उन्होंने घर में ही सीखी। साल 1936 में वे आला तालीम के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पहुंचे। इस दौरान वे मुशायरों में बराबर शिरकत करते रहे।

जल्द ही उनकी एक अलहदा पहचान बन गई। मशहूर शायर निदा फाजली ने अपनी किताब ‘चेहरे’ में शकील बदायूंनी का खाका खींचते हुए लिखा है,‘‘शकील की शोहरत में उनके तरन्नुम का बहुत बड़ा हाथ था। वे जिस दौर में शेर कह रहे थे वह ‘यगाना’, ‘फिराक’ और ‘शाद आरिफी’ का नई गज़ल तथा जोश, फैज़ और अख्तर-उल-ईमान की नज़्म में नए बदलाव का दौर था। नई काव्य-भाषा रची जा रही थी, नए जीवन-अनुभवों और नए दर्शनों से वातावरण जगमगा रहा था। प्रगतिशील तहरीक अपने यौवन का उत्सव मना रही थी। साथ में, ‘हलक-ए-अरबाब-ए-जोक’ (पंजाब में) शायरी में नए तेवर दिखा रही थी, लेकिन इस समय शकील की शायरी इसी काव्य परंपरा का साथ निभा रही थी, वे दाग के बाद पीढ़ी-दर-पीढ़ी दोहराई जा रही थी और मुशायरों में धूम मचा रही थी।’’

बहरहाल, बदायूं से अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी तक के सफर में शकील बदायूंनी की पहचान एक ऐसे मंचीय शायर के तौर पर बन चुकी थी, जिसे उस वक्त के नामी शायर भी नजरअंदाज नहीं कर पाए। शकील शुरुआत से ही अपने दौर के शायरों से बिल्कुल जुदा थे। उनके समकालीन शायर जहां समाजी, मआशी और सियासी मसलों पर लिख रहे थे, शकील की शायरी का मौजू सिर्फ इश्क-मोहब्बत और उससे हासिल दर्द-जुदाई था। फिल्मी गीतों के लेखन में भी शकील की यही खासियत नजर आती है। मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी ने उनकी उस वक्त की शायरी को ‘लाजवाब पूंजी’ कहा, तो जिगर मुरादाबादी ने उनके सुनहरे मुस्तकबिल की दुआ करते हुए कहा था,‘‘अगर शकील इसी तरह पड़ाव तय करते रहे, तो भविष्य में अदब के इतिहास में वह अमर हो जाएंगे।’’ इतिहास गवाह है, हुआ भी यही।

अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद, शकील बदायूंनी सरकारी नौकरी में आ गए। नौकरी, आपूर्ति विभाग में थी। भले ही नौकरी लग गई, मगर शेर-ओ-शायरी से लगाव-मोहब्बत नहीं छूटी। नौकरी भी बदस्तूर चलती रही और मुशायरों मे भी हिस्सा लेते रहे। मुशायरों से उन्हें मुल्क भर में शोहरत मिली। उनकी गजलें खास तौर पर नौजवानों में बहुत मकबूल थीं। शकील की शायरी उन्हें अपने दिल की आवाज लगती। यकीन नहीं हो, तो उनकी चंद मकबूल गजलों के कुछ शेरों पर नजर डालिए, ‘‘मेरी ज़िन्दगी है ज़ालिम, तेरे ग़म से आश्कारा (ज़ाहिर)/तेरा ग़म है दर-हक़ीक़त मुझे ज़िन्दगी से प्यारा/कोई ऐ शकील देखे, ये जुनूं नहीं तो क्या है/कि उसी के हो गए, हम जो न हो सका हमारा।’’, ‘‘ऐ इश्क़ ये सब दुनिया वाले बेकार की बातें करते हैं/पायल के ग़मों का इल्म नहीं, झंकार की बातें करते हैं।’’,

‘‘नई सुबह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है/ये सहर भी रफ्ता-रफ्ता कहीं शाम तक न पहुंचे।’’, ‘‘क्या कीजिये शिकवा दूरी का मिलना भी गज़ब हो जाता है/जब सामने वो आ जाते हैं अहसासे-अदब हो जाता है।’’, मेरी बर्बादी को चश्मे मोतबर से देखिये/मीर का दीवान ग़ालिब की नज़र से देखिये।’’ शकील बदायूंनी की गजल के पहले मजमुए ‘रानाइयां’ में कुछ ऐसे ही शेरों की बुनियाद पर ‘जिगर’ मुरादाबादी’ ने अपनी भूमिका में शकील की तारीफ में लिखा था,‘‘इस तरह के कुछ शेर भी अगर कोई शख्स अपनी जिंदगानी में कह दे, तो मैं उसे सही मायनों में शायर तस्लीम करने को तैयार हूं।’’ जिस शायर की शायरी के बड़े-बड़े शायर जिगर मुरादाबादी, फिराक गोरखपुरी, अली सरदार जाफरी, साहिर लुधियानवी, निदा फाजली वगैरह  मद्दाह (प्रशंसक) हों, अवाम का तो वो प्यारा होगा ही।

शकील बदायूंनी का फिल्मों में कैसे रुख हुआ? इसका किस्सा कुछ इस तरह से है। उस दौर में अदब के बाद सिनेमा अवाम में सबसे ज्यादा मकबूल था। बड़े से बड़े अदीब और फनकार को सिनेमा अपनी ओर खींचता था। सिनेमा एक बड़ा माध्यम भी था, लोगों तक पहुंचने का। अपनी बात उन तक पहुंचाने का। लिहाजा शकील बदायूंनी ने भी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने के लिए नौकरी छोड़ दी और साल 1946 में वे दिल्ली से बंबई पहुंच गए। यहां पहुंच कर, उन्होंने फिल्म निर्माता एआर कारदार और मौसिकार नौशाद से मुलाक़ात की। तजुर्बेकार नौशाद ने उन्हें एक सिचुएशन बतलाई और उस पर कुछ लिखने को कहा। शकील ने फौरन ही उस सिचुएशन को नगमे में ढाल दिया, ‘‘हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की आग लगा देंगे।’’ जाहिर है कि यह नगमा, नौशाद साहब को खूब पसंद आया।

कारदार साहब ने नौशाद के कहने पर फिल्म ’दर्द’ के गानों के लिए शकील बदायूंनी को साइन कर लिया। साल 1947 मे आई फिल्म ’दर्द’ के इस टाइटल गीत के अलावा ‘‘अफसाना लिख रही हूं दिले बेक़रार का, आंखों में रंग भर के तेरे इंतज़ार का…।’’ उमा देवी उर्फ टुनटुन के गाए, इस गीत ने पूरे मुल्क में धूम मचा दी। फिल्म के गीतों की कामयाबी के साथ ही शकील बदायूंनी फिल्मी दुनिया में स्थापित हो गए। इस फिल्म से शुरुआत हुई मौसिकार नौशाद और नगमानिगार शकील बदायूंनी की जोड़ी की। इस जोड़ी ने आगे चलकर एक के बाद एक कई नए रिकॉर्ड कायम किए। फिल्म ‘दर्द’ के बाद, साल 1951 में इस जोड़ी की पिक्चर ‘दीदार’ आई। इस फिल्म के भी सारे गाने सुपर हिट साबित हुए। खास तौर पर ‘‘बचपन के दिन भुला न देना, आज हंसे कल रुला न देना…’’ जवां दिलों की धड़कन बन गया।

नौशाद और शकील बदायूंनी ने एक साथ बीस साल से ज्यादा काम किया। या यूं कहिए शकील ने अपनी जिंदगी के आखिर तक नौशाद की मौसिकी के लिए नगमे लिखे। और नगमे भी एक से बढ़कर एक लाजवाब ! आलम यह था कि नौशाद और शकील बदायूंनी की जोड़ी, किसी भी फिल्म की कामयाबी की जमानत होती थी। ‘दुलारी’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘आदमी’, ‘राम और श्याम’, ‘पालकी’, ‘उड़नखटोला’, ‘मदर इंडिया’, ‘मुगल-ए-आजम’, ‘गंगा जमुना’, ‘बाबुल’, ‘दास्तान’, ‘अमर’, ‘दीदार’, ‘आन’, ‘बैजू बावरा’, ‘कोहिनूर’ आदि सदाबहार फिल्मों के गीत-संगीत शकील और नौशाद के ही हैं। शकील बदायूंनी ने हिंदुस्तानी अवाम की बोली-वानी में वे गीत रचे, जो उनके दिल के करीब थे, तो कुछ ऐसे गीत भी लिखे,  जो उन्हें खूब पसंद आए। मिसाल के तौर पर फिल्म ‘गंगा जमुना’ और ‘मदर इंडिया’ की स्टोरी की मांग के मुताबिक गीत, लोक धुनों पर रचे जाने थे। जिसमें भी फिल्म ‘गंगा जमुना’ के सारे गीत भोजपुरी बोली में लिखे जाने थे।

शकील बदायूंनी ने इस चुनौती को मंजूर किया और ऐसे-ऐसे गीत लिखे, जो ऑल इंडिया हिट साबित हुए। ‘‘दगाबाज तोरी बतियां..’’, ‘‘ढूंढ़ो-ढ़ूंढ़ो रे साजना’’ और ‘‘नैन लड़ जइहें तो मनवा मा….’’ समेत ‘गंगा जमुना’ के सभी गाने आज भी पसंद किए जाते हैं। फिल्म ‘मदर इंडिया’ की बड़ी कामयाबी के पीछे भी उसका गीत-संगीत था और इस गीत-संगीत को भी शकील-नौशाद की जोड़ी ने ही सजाया था। ‘‘पी के आज प्यारी दुल्हनिया चली’’, ‘‘ओ गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हांक रे’’, ‘‘होली आई रे’’, ‘‘दुख भरे दिन बीते रे भइया’’, ‘‘नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे ढ़ूंढ़ूं रे सांवरिया’’ जैसे गाने लोक धुनों में होने के बावजूद ऑल इंडिया सुपर हिट रहे। एक तरफ शकील बदायूंनी ने इस तरह के गीत लिखे, तो दूसरी ओर ‘मुगल-ए-आजम’, ‘मेरे महबूब’ और ‘चौदहवीं का चांद’ के गाने हैं। दोनों ही एक-दूसरे से जुदा।

एक लोक की आवाज, तो दूसरे शेर-ओ-शायरी के रंग में डूबे हुए। एक नगमानिगार की लिखने की क्या हाईट होती है ? इन फिल्मों के गाने सुनने के बाद एहसास होता है। ‘‘प्यार किया तो डरना क्या..’’, ‘‘जिंदाबाद-जिंदाबाद ए मोहब्बत जिंदाबाद…’’(मुगल-ए-आजम) ‘‘ऐ हुस्न जरा जाग तुझे इश्क..’’, ‘‘मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की..’’(मेरे महबूब)। यहां तक कि जब फिल्मों में भजन लिखने की बारी आई, तो यहां भी शकील ने अपनी काबिलियत का सिक्का जमाया। सुनकर यकीन ही नहीं होता कि इतने धार्मिक और भावनात्मक भजन एक मुस्लिम रचनाकार ने लिखे हैं। ‘‘ओ दुनिया के रखवाले…’’, ‘‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज..’’ (बैजू बावरा), ‘‘इंसाफ का मंदिर है, ये भगवान का घर है…’’ (अमर), ‘‘जय रघुनन्दन जय गोपाला..’’ (घराना)।

शकील बदायूंनी ने अपने फ़िल्मी करियर में तकरीबन 89 फिल्मों के लिए गाने लिखे। जिसमें सबसे ज्यादा गीत उन्होंने नौशाद के लिए लिखे। नौशाद के बाद उनकी जोड़ी संगीतकार रवि के साथ बनी और इन दोनों ने भी अपने चाहने वालों को कई सुपर हिट गाने दिए। ‘चौदहवीं का चांद’, ‘दो बदन’, ‘घराना’, ‘नर्तकी’, ‘फूल और पत्थर’ आदि फिल्मों में इस जोड़ी ने कमाल कर दिखाया। लोगों को इस बात का तआज्जुब होगा कि शकील बदायूंनी ने सबसे ज्यादा सुपर हिट फिल्में नौशाद के साथ कीं, लेकिन उन्हें उन फिल्मों के लिए कोई अवार्ड हासिल नहीं हुआ।

शकील बदायूंनी को तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड मिला,  जिसमें दो बार ‘चौदहवीं का चांद’ और ‘घराना’ फिल्म के संगीतकार रवि थे, तो फिल्म ‘बीस साल बाद’ में संगीतकार हेमंत कुमार थे। यह तीनों ही अवार्ड उन्हें लगातार तीन साल इन गानों ‘‘चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो, जो भी तुम ख़ुदा की कसम लाजवाब हो..’’ (फिल्म चौहदवीं का चांद, साल 1961), ‘‘हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं…’’ (फिल्म घराना, साल 1962) और ‘‘कहीं दीप जले कहीं दिल…’’ (फिल्म बीस साल बाद, साल 1963) के लिए मिले।

इश्क-मोहब्बत, दर्द-गम-जुदाई के मिले-जुले जज्बात से शकील बदायूंनी की गजलें और नगमे आकार लेते थे। एक शायर और गीतकार के तौर पर उनका अवाम से गहरा ताल्लुक था। शकील बदायूंनी ने फिल्मों में जो भी गाने लिखे, उनमें भाषा, शिल्प और शायरी के स्तर पर कभी कोई समझौता नहीं किया। अवाम के जौक और शौक को देखते हुए, उन्होंने बेमिसाल गाने रचे। जो दुनिया भर में मकबूल हुए। फिल्मों के अलावा उन्होंने कई ऐसी शानदार गज़लें ‘‘मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे’’, ‘‘ऐ मुहब्बत, तेरे अंजाम पे रोना आया..’’ भी लिखीं, जिन्हें ‘मलिका-ए-गजल’ बेगम अख्तर ने गाकर अमर कर दिया। 20 अप्रैल, 1970 को सिर्फ 53 साल की उम्र में शकील बदायूंनी ने इस फानी दुनिया को अलविदा कर दिया।

अपने मुल्क में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में उर्दू जबान को जिन शायरों ने गजलों, नज्मों और फिल्मी नगमों के हवाले से आगे बढ़ाया, उनमें शकील बदायूंनी का नाम हमेशा अव्वल नंबर पर रहेगा। एक दौर ऐसा भी था कि उनकी गजलों और नगमों की वजह से उर्दू जबान की मकबूलियत बढ़ी। उनके नगमों को प्यार-पसंद करने वालों ने उर्दू सीखी। उर्दू जबान, अवाम में मकबूल हुई। मगर अफसोस, शकील बदायूंनी को उर्दू अदब में वह एजाज-एहतराम और मुकाम नहीं मिला, जिसके वे वास्तविक हकदार थे। और न ही सरकार को यह ख्याल आया कि हिंदोस्तानी ख्याल और इंसानियत की खुशबू दुनिया भर में फैलाने वाले, इस शायर-नगमानिगार को मरने के बाद ही सही, देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों ‘पद्मश्री’, ‘पद्म भूषण’ या ‘पद्म विभूषण’ में से एक से ही नवाज देते।

(मध्यप्रदेश निवासी लेखक-पत्रकार जाहिद खान, ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ समेत पांच किताबों के लेखक हैं।)

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This post was last modified on August 3, 2020 10:20 pm

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