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Friday, September 24, 2021

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पुण्यतिथि पर विशेषः इस्मत चुग़ताई को कुर्रतुल ऐन हैदर ने कहा था, ‘लेडी चंगेज़ खां’

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उर्दू मॉडर्न कहानी के चार स्तंभ रहे हैं। कृश्न चन्दर, राजिंदर सिंह बेदी और सआदत हसन मंटो। चौथा कंधा जनाना था। इस अकेले स्तंभ में इतनी ताक़त रही कि उन्हें मदर ऑफ़ मॉडर्न स्टोरी कहा गया। वह चंगेज़ खां के खानदान से आती हैं। ननिहाल उस्मान गनी से मिलता है। 10 भाई-बहनों में 9वें नंबर पे थीं। तीन बड़ी ब्याही बहनों के बाद वह भाईयों के साथ बड़ी हुईं। उन्हें गुड़िया नहीं खेलनी थी। क्रिकेट, गिल्ली-डंडा खेलना था। सीना-पिरोना, बुनाई-कढ़ाई से चिढ़ खाई बैठी उन्हें पेड़ों पर चढ़ना था। हर वक़्त पीठ पे धौल जमाने वाले भाईयों को पलट कर न मार सकने की कसमसाहट थी। उन्हें रोना नहीं था। कहीं से कमज़ोर भी नहीं दिखना था।

कुछ बड़े भाई अज़ीम बेग़ की शह रही। कहते, खेल में हार जाती हो तो उनको पढ़ाई में हरा दो। तीन दर्जे आगे शमीम भाई हर क्लास में फेल होते रहे। हत्ता यह दिन भी आया कि होमवर्क में उनकी मदद करने लगीं और इस तरह एक दिन वह अचानक शमीम भाई से बड़ी हो गई। वह इस्मत चुग़ताई हैं। ज़िददी हैं। अड़ियल हैं। खरखरी। ज़ुबानदराज़। बेहद सवाल पूछने वाली। खार खाए बैठी अम्मा जवाब के बजाये जूतियां फेंक मारतीं। निशाना हर बार चूकता। अम्मा निशानचीं नहीं थीं न। वह भी हस्सास न हुईं। बेशर्मी से हंस के भाग जातीं।

यही बेशर्मी उनके लिए संजीवनी बूटी बनी। ‘लिहाफ़’ (समलैंगिक रिश्तों पर उर्दू की पहली कहानी) छपने के बाद गाली भरे खतों का सिलसिला शुरू हुआ। तब तक शाहिद लतीफ़ (फिल्म डायरेक्टर) ‘मजाज़ी खुदा’ बन चुके थे। लिहाफ़ पर अखबारों में मज़मून निकलने लगे। महफिल की बहसों में लिहाफ़ छा गया। लाहौर कोर्ट ने लिहाफ़ को फ़ुहश (अश्लील) मानते हुए उन्हें समन भेजा।

शाहिद मुक़द्दमों की ज़िल्लत और बदनामी से खाएफ़ थे। ससुर साहब के दर्द, बल्कि गुज़ारिश भरे खत में इस्मत के लिए ताक़ीद थी, ‘दुल्हन को समझाओ। कुछ अल्लाह-रसूल की बातें लिखें कि आक़बत दुरुस्त हो। मुक़दमा और वह भी फ़ुहशी पर। हम लोग बहुत परेशान हैं।’

परेशान तो वह भी थीं कि इस एक कहानी से उनसे जुड़े सब लोग परेशान थे और यह भी कि उसी एक लिहाफ़ की तहों के नीचे उनकी तमाम कहानियां दब जातीं हैं। चूंकि वह कहीं, कभी, किसी से नहीं हारीं। मुक़द्दमा भी जीत गईं।

ज़िंदगी में बज़ाहिर उतार-चढ़ाव कम रहे। या शायद हर बात पर तवज्जोह की ज़रूरत नहीं समझी। एएमयू में पढ़ने की ज़िद्द की। कहा, न पढ़ाया तो घर से भाग कर ईसाई हो जाऊंगी। एक-आध दिन रूठी हुईं, हड़ताल पे रहीं। फिर अब्बा मान गए। तब जा कर इस्मत देश की पहली बीए, बीएड करने वाली मुस्लिम महिला बन पाईं।

खुद-मुख्तारियत की ख्वाहिश थी। बरेली में प्रिंसिपल की पोस्ट पर लगीं। अम्मा से मिलने आईं। मुल्क़ के बंटवारे में आधा खानदान पाकिस्तान जा चुका था। 10 बच्चों को जनने वाली अम्मा तन्हा थीं। हवेली पर फौज का क़ब्ज़ा था। अम्मा उसी हवेली के सामने एक छोटे से कमरे में शाहजहां की तरह अपने ताजमहल को निहारा करतीं। बेटी को देखा तो लिपट कर ज़ार ओ कतार रो पड़ीं। अम्मा के थप्पड़ों, घूंसों की आदी इस्मत यूं उनका रोना देख कर सिहर गईं। उनके आखिरी दिनों में इस्मत ही उनका सहारा बनीं।

रिश्तेदार जी का जंजाल थे, लेकिन मुसन्निफ़ों (लेखकों) से रिश्तेदारी कमाल कर गई। हार्डी, ब्रांटी, चार्ल्स डिकेंस, ओलिवर ट्विस्ट, चेखव, टालस्टाय, दास्तोयव्स्की और बर्नार्ड शा को तो जैसे घोलकर पी गई हों। जितना उन्होंने पढ़ा, उससे ज़्यादा बतियाया। दुकानदारों, टैक्सी वालों यहां तक कि भिखारियों से भी। जचगी के बाद अस्पताल में बाईयों से की गई बतकही ही तो है ‘मुट्ठी मालिश’।

इस्मत चुन्नी के रूप में एक क्यूरियस बच्चा हैं। वह अपने कोचवान से शबरी के झूठे बेरों का क़िस्सा पूछती हैं। शेख़ानी बुआ से पूछती हैं, अली असगर को हलक़ में तीर क्यूं मारा? वह सांवले श्रीकृष्ण पर मोहित हैं। पड़ोसी के घर जन्माष्टमी पर विराजे भगवान को लेकर उनमें हीन भावना है। सोचती हैं, उनके भगवान क्या मज़े से आते जाते हैं। एक हमारे अल्लाह मियां हैं, न जाने कहां छिप कर बैठे हैं!

इस्मत की ज़्यादातर कहानियां मध्य-निम्न वर्गीय औरतों को केंद्र में रखकर बुनी गई हैं। यह आज़ादी से पहले और बाद का दौर है, जब मीना कुमारी का ट्रैजिक अपरोच अपीलिंग था, लेकिन उनकी नायिकाएं मीना कुमारी नहीं हैं। वे सड़क पे कुलांचे मारती, दूधवाले-सब्ज़ीवाले को गरियाती रखैलें हैं। बलत्कृत किशोरियां हैं। सास को चकमा दे मियां से लप-झप करती होशियार बहुएं हैं। और कभी पति की मार से तंग आकर पलटवार करती बीवियां हैं। कोई औरत मार खाकर आती तो वे कहतीं, मियां से तलाक़ लो या पलट के तुम भी मार दो। फिज़ूल रो-धो के मेरा मूड न खराब करो।

हमदर्दियों से चिढ़न खाए बैठी इस्मत की भाषा में फिज़ूल फलसफ़े का दखल नहीं, फिर भी संजीदा हैं। ज़बान दाल-चावल जैसी सादी, लेकिन बीच-बीच में आम के अचार का चटखारापन है। बक़ौल जावेद अख्तर, उनकी कहानियों को पढ़ो तो लगता है इस्मत आपा बात कर रही हैं। इस्मत आपा को सुनो तो लगता है उनके क़िरदार बोल रहे हैं। वे औरत को अपने पैरों पे खड़ा और खुद अपनी हिफाज़त करते हुए देखना चाहती थीं। शायद इसीलिए क़ुर्रतुल ऐन हैदर ने उन्हें ‘लेडी चंगेज़ खां’ कहा था।

उन्होंने फेमिनिज्म की शुरुआत उस वक़्त की थी, जब लोग इसका एफ़ भी नहीं जानते थे। दफ़नाने से खौफज़दा इस्मत ने मरने के बाद जिस्म को जलवाने की ख्वाहिश का इज़हार किया। उनकी ख्वाहिश का एहतराम हुआ, हालांकि रिश्तेदारों ने काफी विरोध किया। अपनी आत्मकथा ‘कागज़ी है पैरहन’ में बचपन से लेकर एएमयू में एडमिशन, आगे की जारी तालीम और नौकरी का ज़िक्र किया है। आलोचक मानते हैं, ये ईमानदार आत्मकथा नहीं है। हां, काफी हद तक या शायद ज़िंदगी के इतने ही हिस्से में वह असल इस्मत रहीं हों। कौन जानता है!

वे बौद्ध धर्म से प्रभावित थीं। अलमारी में कृष्ण की मूर्ति भी थी। मैं समझती हूं कृष्ण से की उनकी गुफ्तगू को साहिब ए मसनद को सुनवाया जाना चाहिए। और पूछना चाहिए जिस भारतीय संस्कृति, सभ्यता की ट्रंप द्वारा सराहना सुनते हुए वे गौरान्वित महसूस करते हैं, उसमें मुसल्मान इस्मत आपाओं का क्या कोई रोल नहीं?

“मैं मुसलमान हूं। बुत परस्ती शिर्क है। मगर देवमाला (पुराण) मेरे वतन का विरसा (धरोहर) है। इसमें सदियों का कल्चर और फलसफा समोया हुआ है। ईमान अलहदा है। वतन की तहजीब अलहदा है। इसमें मेरा बराबर का हिस्सा है। जैसे उसकी मिट्टी, धूप और पानी में मेरा हिस्सा है। मैं होली पर रंग खेलूं, दीवाली पर दीए जलाऊं तो क्या मेरा इमान मुतज़लज़ल (shake, हिलना) हो जाएगा। मेरा यकीन और शऊर क्या इतना बोदा है, इतना अधूरा है कि रैज़ा-रैज़ा हो जाएगा?”

“और मैंने पर परस्तिश की हदें पार कर लीं। तब अलमारी में रखे हुए बाल कृष्ण से पूछा, क्या तुम वाकई किसी मनचले शायर का ख्वाब हो? क्या तुमने मेरी जन्मभूमि पर जन्म नहीं लिया? बस एक वहम, एक आरजू से ज्यादा तुम्हारी हकीकत नहीं। किसी मजबूर और बंधनों में जकड़ी हुई अबला के तखययुल की परवाज़ हो कि तुम्हें रचने के बाद उसने जिंदगी का जहर हंस-हंस के पी लिया?”

“क्या तुम धरती के हलक में अटका हुआ तीर नहीं निकाल सकते? मगर पीतल का भगवान मेरी हिमाक़त पर हंस भी नहीं सकता कि वह धात के खोल मुंजमिद (अचल) हो चुका है। सियासत के मैदान में एक-दूसरे की नाअहली साबित करने के लिए इंसानों को कुत्तों की तरह लड़ाया जाता है। क्या एक दिन पीतल का यह खोल तोड़कर खुदा बाहर निकल आएगा?”

बहरखैर, सवाल पूछने की हिम्मत रखने वाली इस्मत आपा को हमारा सलाम!!

(नाज़िश अंसारी स्वतंत्र लेखिका हैं।)

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