Monday, October 18, 2021

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सबकी खबर ले, सबको खबर दे!

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दिल्ली के बहादुर शाह जफ़र मार्ग पर जो एक्सप्रेस बिल्डिंग है, वह रामनाथ गोयनका की बनवाई हुई है। देश की राजनीति पर इस बिल्डिंग का कितना असर रहा है यह जानेमाने पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी अपनी आत्मकथा में लिखा है। मुझे भी इस बिल्डिंग में आने का सौभाग्य रामनाथ गोयनका की वजह से ही मिला था। इस पर फिर कभी। पर फिलहाल संदर्भ अलग है। पांच नवंबर को ‘सबकी खबर ले, सबकी खबर दे’ यानी जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी की पुण्यतिथि थी। हम सब उन्हें हर साल याद करते हैं।

निधन से ठीक एक दिन पहले प्रभाष जी लखनऊ की एक्सप्रेस बिल्डिंग में अपने से मिलने आए और दो घंटे से ज्यादा बातचीत हुई थी। एक काम भी दे गए थे, जो पूरा होना तो दूर ठीक से शुरू भी नहीं हो पाया। वह काम था जनसत्ता की टीम के बारे में एक पुस्तिका निकालना। सभी के बारे में लिखना। बहरहाल अब लगता है कुछ तो उस दिशा में किया जाना चाहिए। इसकी शुरुआत जनसत्ता के उस वरिष्ठ साथी से कर रहा हूं, जिसने वह लोकप्रिय लाइन लिखी थी जो कभी एक्सप्रेस बिल्डिंग के ऊपर रंगीन लाइट में चमकती थी। सबकी खबर ले, सबको खबर दे! यह लाइन कुमार आनंद ने लिखी थी। उनका पूरा नाम है कुमार आनंद टिकमानी। बिहार के मुजफ्फरपुर से वे आए और जनसत्ता में छा गए।

प्रभाष जोशी के बाद इस अखबार में अगर किसी का सबसे ज्यादा जलवा था तो वे कुमार आनंद ही थे। हालांकि लोकप्रिय आलोक तोमर रहे पर अख़बार को गढ़ने में कुमार आनंद की बड़ी भूमिका थी। रिपोर्टिंग टीम का नेतृत्व उन्हीं के हाथ में था। जनसत्ता की कवरेज की सारी जिम्मेदारी उनकी ही थी। चाहे सिख विरोधी दंगों की कवरेज कराना हो या फिर मशहूर फिल्म अभिनेता राजकपूर के अंतिम दिनों की कवरेज हो सबकी कमान वे ही संभालते थे। चाहे दिल्ली की राजनीति हो या फिर सिख राजनीति, दिल्ली विश्विद्यालय में छात्रसंघ हो या शिक्षक संघ दोनों पर जनसत्ता की कवरेज बेहतर होती थी।

कौन नहीं पढ़ता था तब जनसत्ता। मैं तिमारपुर की एक कॉलोनी में रहता था, जिसमें ज्यादातर सिख परिवार थे। मेरा फ़्लैट तीसरे माले पर था और बड़ी बालकनी। सुबह देखता ज्यादातर लोग वही जनसत्ता तो पढ़ते थे जो हम सब रात में बनाकर आते थे। तब मैं दिल्ली राजधानी के दो पेज देखता था और मेरे साथ होते थे संजय स्वतंत्र जो संभवतः जनसत्ता में सबसे कम उम्र के साथी थे और आज भी जनसत्ता में हैं। ये दोनों पेज रिपोर्टर की खबरों के ही होते। कुमार आनंद तो अक्सर पेज का ले आउट तक बना देते। वैसे भी उस दौर में संवाददाता की खबर को पहले पेज पर जगह जरूर मिलती।

खुद कुमार आनंद राजनीतिक रपट लिखते तो आलोक तोमर कुछ हटकर भी लिखते। कुमार आनंद रपट की हेडिंग तक लगा कर दे देते जो आमतौर पर वैसे ही जाती। कुछ साथी उनसे काफी स्नेह रखते थे जो कई बार हेडिंग बदल भी देते। दरअसल जनसत्ता की रपट पर कुमार आनंद की छाया नजर आती। प्रोफेशनल पत्रकार तो वे रहे ही जनसत्ता में उत्सव और दावत का माहौल भी उन्होंने ही बनाया।

मेरे विवाह की अग्रिम दावत उन्होंने अपने घर में दी थी। सुबह उन्हीं के घर से शताब्दी पकड़ कर लखनऊ गया था। शुद्ध शाकाहारी पर ऐसे व्यंजन उनकी दावत में होते कि खाने से मन न भरे। प्रभाष जोशी उन्हें इंतजाम बहादुर कहते थे। हड़ताल का दौर हुआ करता था और कई दिन चलने वाली हड़ताल में भी शाम की बैठकी उनके घर ही जमती। सुमित मिश्र, विवेक सक्सेना, पुनीत टंडन, आलोक तोमर, प्रदीप श्रीवास्तव से लेकर राजेश तक कई साथी होते।

मुझे भी एक रिपोर्टर के रूप में उन्होंने ही गढ़ा। पर दुर्भाग्य देखिए मेरी वजह से ही उन्हें जनसत्ता छोड़ना पड़ा। प्लांट यूनियन की राजनीति के चलते। मैं चुनाव लड़ रहा था एक्सप्रेस की पत्रकार गैर पत्रकार यूनियन में जनसत्ता की तरफ से। नतीजा आया और मेरी जीत के साथ ही हिंसा की शुरुआत हुई। दरअसल जीत की नारेबाजी से खुन्नस खाए विरोधी खेमे ने संपादक प्रभाष जोशी के खिलाफ नारा लगा दिया था। यह कौन बर्दाश्त करता। फिर जो हिंसा हुई वह दुर्भाग्यपूर्ण थी। प्रबंधन से जो टकराव हुआ उसके चलते कुमार आनंद ने इस्तीफा दे दिया। प्रभाष जोशी भी उन्हें मना नहीं पाए। वह दिन अंतिम दिन था जिसके बाद कुमार आनंद ने कभी एक्सप्रेस बिल्डिंग में कदम नहीं रखा। उसके बाद भी वे कई अख़बारों में रहे और कुछ समय पहले तक किसान चैनल के सलाहकार थे।

उनकी रपट में कांग्रेस विरोध झलकता था। उनकी क्या जनसत्ता में हर किसी की रपट में कांग्रेस विरोध झलकता था। तब कांग्रेस के खिलाफ सबसे मुखर अख़बार जनसत्ता ही था। यह कहा भी जाता था कि कांग्रेसी बाथरूम में जनसत्ता पढ़ते हैं, ताकि किसी को पता न चले। वह दौर था जब विजय गोयल प्रेस रिलीज लेकर आते और पुनीत टंडन के साथ विनम्र अंदाज में बैठे रहते। हरियाणा के मुख्यमंत्री देवीलाल प्रभाष जोशी से मिलने से पहले रिपोर्टिंग में आते और महादेव चौहान से मिलते। बसपा के संस्थापक कांशीराम, मुलायम सिंह से लेकर मुरली मनोहर जोशी तक प्रभाष जोशी से मिलने आते और कई बार जहां उनके सचिव रामबाबू बैठते थे उसके बगल में भी बैठ जाते, क्योंकि प्रभाष जोशी जब संपादकीय लिखते तो कोई उनके कमरे में नहीं जा सकता था। न ही कोई फोन काल उन्हें दी जाती।

उस दौर में कुमार आनंद को काफी अधिकार मिले थे। वे योजना बनाकर कवरेज कराते। मुझे याद है कि टिकैत की बड़ी रैली बोट क्लब पर हुई, जिसकी कवरेज की जिम्मेदारी मुझे दी गई। टिकैत बोट क्लब पर जम गए तो जनसत्ता ने बड़ी कवरेज की। मुझे याद है राज बब्बर उसी के बाद एक दिन मिलने आए थे। मुझे भी देश के बड़े किसान नेताओं से मिलने और जनसत्ता के लिए इंटरव्यू करने का मौका मिला था।

दरअसल तब का जनसत्ता आम आदमी का अख़बार था। समाज की हर छोटी बड़ी घटना पर नजर रखता था और नजर रखने का काम कुमार आनंद ने भी संभाला और जनसत्ता को गढ़ा भी। प्रभाष जोशी की टीम के हरावल दस्ते का नेतृत्व उन्हीं के हाथ में ही था, इसलिए कुमार आनंद को जो लोग नहीं जानते हैं उन्हें जानना समझना चाहिए। इस फोटो में मेरे सामने जैकेट में कुमार आनंद ही खड़े हैं। मौका था आलोक तोमर और सुप्रिया राय की बेटी की शादी का।

(वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार शुक्रवार के संपादक हैं और 26 वर्षों तक एक्सप्रेस समूह में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।)

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