Saturday, July 2, 2022

टोपी का रंग और उसकी राजनीति

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‘विधान मंडल पहनावे अथवा भाषाओं को परिभाषित, निर्देशित अथवा  उपहासित करने का सभाकक्ष नहीं है।’ सत्तर के दशक की बात है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में एक बड़े नेता नवागन्तुक सदस्यों के बोलने-बैठने के आचरण के विषय में भाषण कर रहे थे, तभी समाजवादी युवजन सभा के युवा एमएलए (वर्तमान में भाजपा रूट से बड़े संवैधानिक पद पर आसीन) ने टोका, “मान्यवर, सदन बड़े घर की लड़कियों का ड्राइंग रूम नहीं है जहां उनके परिवारों के सलीके तथा आचरण सिखाए जाएं। यह गरीब, दबे-कुचले, उत्पीड़ित न्याय की पुकार करती हुई जनता की आवाज उठाने का स्थान है।”

सदस्य कुछ भी पहन कर आ सकता है तथा अपनी समझ की भाषा में बोल सकता है। नंगे सिर अथवा साफा बांधे या टोपी पहने, वह सदस्य की सुविधा है। इन वस्त्रों का क्या रंग है? ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। पैरों में चप्पल, जूते, सैंडल या खड़ाऊ का आकार व रंग क्या हो अथवा नंगे पैर रहें, यह भी सांसद या विधायक का ही नहीं, प्रत्येक नागरिक की अपनी सुविधा का अधिकार है। केवल उन अपवादों को छोड़कर जब व्यक्ति सैनिक या अर्ध सैनिक अथवा पुलिस बल आदि का वेतन भोगी हो तथा ड्यूटी का  समय हो।

साफा अच्छा पहनावा है। धूप सर्दी से बचाव का अच्छा साधन भी है। हमारी तीहरी पीढ़ी ऊपर के परिजन साफा पहन कर इसलिए भी निकलते थे, क्योंकि अंग्रेजी अफसरों को देखकर नारे लगाने पर पुलिस की लाठी से सिर फटने का खतरा कम रहता था। फेरे लेने के समय कुछ लमहों के लिए साफा-कलंगी का धारण आमतौर पर सभी करते हैं। स्थायी साफा कलंगी वाले वर्ग के अधिकांश सदस्य भाजपा के साथ हैं, जो पूर्व में कभी अंग्रेजी सरकार के साथ हुआ करते थे। लाल टोपी वाले कांग्रेस के प्रखर विरोधी रहे हैं, परंतु कुछ मामलों में इंदिरा की प्रशंसा भी करी है, विशेषतौर पर जब इंदिरा गांधी ने साफे से प्रिवीपर्स की कलंगी उतार दी थी।

परंतु वर्तमान में मूल आपत्ति हरे, लाल व नीले रंग पर है। जब उत्तर प्रदेश में संविद अथवा केंद्र की गठबंधन सरकारें थी तो रंगों पर आपत्ति नहीं थीं। 2017 में हरी टोपी पहनकर जब हमारे किसान भाई भाजपा का प्रचार कर रहे थे, तो कोई आपत्ति नहीं थी। बसपा की सरकार का समर्थन करते या लेते समय नीली टोपी से भी परहेज नहीं था। देश के किसी भी नागरिक ने कभी भी भाजपा की पीली टोपी या पीले वस्त्रों पर आपत्ति नहीं की और न उपहास किया है। यह भारत की महान संस्कृति है।

हमारे प्रारंभ से लेकर अब तक के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा अन्य संविधानिक पदों पर आसीन महानुभाव, विदेशी राष्ट्रों के प्रमुख  भारत भ्रमण में जिन क्षेत्रों में जाते हैं वहां के लोक कलाओं के वस्त्रों में, उनके पहनावे के प्रतीक के साथ सम्मिलित होते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में गए तो टियारा पहना, दक्षिण में गए तो लुंगी बांधी, यह परंपरा है। लाल टोपी ने भाजपा को 1967 व 1977 में सत्ता के द्वार तक पहुंचाया था।

(गोपाल अग्रवाल समाजवादी चिंतक व लेखक हैं और आजकल मेरठ में रहते हैं।)

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