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कृश्न चंदर की पुण्यतिथि: कड़वी हकीकत का सच्चा अफसानानिगार

उर्दू अदब, खास तौर से उर्दू अफसाने को जितना कृश्न चंदर ने दिया, उतना शायद ही किसी दूसरे अदीब ने दिया हो। इस मामले में सआदत हसन मंटो ही उनसे अव्वल हैं, वरना सभी उनसे काफी पीछे। उन्होंने बेशुमार लिखा, हिंदी और उर्दू दोनों ही जबानों में समान अधिकार के साथ लिखा। कृश्न चंदर की जिंदगी के ऊपर तरक्कीपसंद तहरीक का सबसे ज्यादा असर पड़ा। यह अकारण नहीं है कि उनके ज्यादातर अफसाने समाजवाद से प्रेरित हैं। वे एक प्रतिबद्ध लेखक थे। उनके सम्पूर्ण साहित्यिक लेखन को उठाकर देख लीजिए, उसमें हमेशा एक उद्देश्य, एक विचार मिलता है। किसी उद्देश्य के बिना उनकी कोई रचना पूरी नहीं होती थी। कृश्न चंदर ने अपनी कलम के जरिये हमेशा दीन-दुखियारों के दुःख-दर्द, उम्मीदों-नाकामियों की बात की। साम्प्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता पर प्रहार किए। 23 नवम्बर, 1914 को अविभाजित भारत के वजीराबाद, जिला गूजरांवाला में जन्मे कृश्न चंदर का बचपन और जवानी का शुरूआती हिस्सा कश्मीर में बीता। यही वजह है कि उनकी भाषा पर डोगरी और पहाड़ी का साफ असर दिखलाई देता है। साल 1936 से ही कृश्न चंदर ने लिखना शुरू कर दिया था। उनके लिखने की शुरूआत एक लघु कथा से हुई। लघु कथा एक पत्रिका में प्रकाशित हुई और इसकी खूब तारीफ भी हुई। इस तरह से कृश्न चंदर के अफसानानिगार बनने का आगाज हुआ।

उनकी शुरूआती कहानियां ‘हुमायूं’, ‘अदबी दुनिया’, ‘अदब-ए-लतीफ’ और ‘नया अदब’ वगैरह पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। अपनी नौजवानी के दिनों में कृश्न चंदर ने सियासत में भी हिस्सा लिया। वे बाकायदा सोशलिस्ट पार्टी के मेंबर भी रहे। इस बात का बहुत कम लोगों को इल्म होगा कि मुल्क की आजादी की तहरीक में वे एक बार शहीद-ए-आजम भगत सिंह के साथ गिरफ्तार हो, जेल भी गए थे। बंटवारे के बाद कृश्न चंदर लाहौर से हिंदुस्तान आ गए। बंटवारे के बाद मिली आजादी को कृश्न चंदर हमेशा त्रासद आजादी मानते रहे और उसी की नुक्ता-ए-नजर में उन्होंने अपनी कई कहानियां और रचनाएं लिखीं। उनकी कहानी ‘पेशावर एक्सप्रेस’ भारत-पाक बंटवारे की दर्दनाक दास्तां को बयां करती है। इस कहानी में उन्होंने बड़े ही खूबसूरती से इस ख्याल को पिरोया है,‘‘कब आदमी के भीतर का शैतान जाग उठता है और इंसान मर जाता है।’’

पढ़ाई पूरी करने के बाद कृश्न चंदर ने अपनी पहली नौकरी ऑल इंडिया रेडियो में की। पहली पोस्टिंग लाहौर में हुई और उसके बाद दिल्ली आना हुआ। कुछ दिन वे ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ में भी रहे। ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी के दौरान उनकी मुलाकात अपने दौर के कई मशहूर लेखकों से हुई। जिनके साथ रहकर उन्होंने बहुत कुछ सीखा। कृश्न चंदर का फिल्मों में जाना कैसे हुआ, इसके पीछे भी एक दिलचस्प वाकिआ है। लखनऊ में नौकरी के दौरान कृश्न चंदर की कहानी ‘सफेद खून’ एक पत्रिका में छपी, जिसे एक फिल्म निर्माता डब्ल्यू. जैड. अहमद ने पढ़ा, तो उन्होंने कृश्न चंदर से फिल्म के लिए लिखने की पेशकश की। पेशकश को मंजूर करते हुए कृश्न चंदर ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया और पुणे आकर ‘शालीमार पिक्चर्स’ में शामिल हो गए। उन्हांने अपनी इसी कहानी ‘सफेद खून’ पर फिल्म ‘मन का मीत’ की स्टोरी लिखी, जो बेहद कामयाब रही। बहरहाल कृश्न चंदर का ‘शालीमार पिक्चर्स’ में पूना जाना हुआ, तो वे फिल्मी दुनिया के ही हो के रह गए। उनकी बाकी जिंदगी मायानगरी मुंबई में ही गुजरी। फिल्मों के लिए उन्होंने कहानियां, पटकथा, संवाद लिखे। अपनी फिल्मी मशरुफियतों के बावजूद, उन्होंने अदब से नाता नहीं तोड़ा।

कृश्न चंदर ने कहानियां, उपन्यास, व्यंग्य लेख, नाटक यानी साहित्य की सभी विधाओं में खूब काम किया। मगर उनकी मुख्य पहचान कहानीकार के तौर पर ही बनी। दूसरी आलमी जंग के दौरान बंगाल में पड़े भीषण अकाल पर लिखी ‘अन्नदाता’ उनकी कालजयी कहानी है। ‘अन्नदाता’ का अंग्रेजी जबान में भी तर्जुमा हुआ। जो कि हिंदी से भी ज्यादा मकबूल हुआ। इस कहानी के साथ ही कृश्न चंदर अंतरराष्ट्रीय अदबी दुनिया में एक बेहतरीन अफसानानिगार के तौर पर तस्लीम कर लिए गए। ‘अन्नदाता’ के बाद उन्होंने कई शाहकार अफसाने लिखे। ‘गड्डा’, ‘दानी’, ‘पूरे चांद की रात’, ‘आधे घंटे का खुदा’ जैसी उनकी कई दूसरी कहानियां भी उर्दू अदब में क्लासिक मानी जाती हैं। कृश्न चंदर की ज्यादातर कहानियां ऐसे इंसानों पर केन्द्रित हैं, जिनको दूसरे लोग आम तौर पर नोटिस भी नहीं करते। मसलन कहानी ‘कालू भंगी’ में वे बड़े ही मार्मिकता से समाज में सबसे ज्यादा हाशिए पर रहने वाले दलित समुदाय के एक शख्स ‘कालू’ की जिंदगी की दर्दनाक दास्तां को बयां करते है। कृश्न चंदर में हर इंसान को बराबरी और सम्मान देने का एक अद्भुत गुण था। उन्होंने अपनी कहानियों में व्यवस्था पर भी तीखे प्रहार किए। लालफीताशाही और अफसरशाही ने देश की व्यवस्था को कैसे चौपट किया है ?, यह उनकी कहानी ‘जामुन का पेड़’ में दिलचस्प तरीके से आया है। व्यंग्यात्मक शैली में लिखी गई यह कहानी सरकारी महकमों की कार्यशैली, अफसरों के काम करने के तौर-तरीकों और लाल फीताशाही पर गंभीर सवाल उठाती है।

उर्दू कथा साहित्य को कृश्न चंदर ने बहुत कुछ दिया। उन्होंने उर्दू कहानी को किसान-मजदूर आंदोलन से बाबस्ता किया और उसमें जन संघर्षों को अभिव्यक्ति देने की ताकत पैदा की। उर्दू कहानी को कृश्न चंदर की सबसे बड़ी देन, टेकनीक है। उनकी कहानियों की टेकनीक, रिपोर्ताज की टेकनिक है। वे शब्द चित्रों के माध्यम से अपनी कहानियों में एक शानदार वातावरण बना दिया करते थे। यह वातावरण पाठकों पर जादू करता था। फिर भी उनकी कहानी में उद्देश्य ओझल नहीं होता था। कृश्न चंदर की कोई भी कहानी उठाकर देख लीजिएगा, उनमें बुद्धि और भावना का लाजवाब तालमेल मिलेगा। मशहूर उर्दू आलोचक सैयद एहतिशाम हुसैन, कृश्न चंदर की कहानियों पर तंकीद करते हुए लिखते हैं,‘‘कभी-कभी उनका मकसद, उनकी कला पर छा जाता है।’’ लेकिन कृश्न चंदर अपनी कहानियों के बारे में खुद क्या सोचते हैं, यह उनके आत्मकथ्य में मिलता है। अपने आत्मकथ्य में वे लिखते हैं,‘‘मेरी हर कहानी उस सफेद हत्थेवाले चाकू को हासिल करने की कोशिश है, जो कि बचपन में एक जागीरदार के बेटे ने मुझसे छीना था।’’

मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी ने अपनी किताब ‘उर्दू भाषा और साहित्य’ में कृश्न चंदर की कहानी कला का विश्लेषण करते हुए लिखा है,‘‘कृश्न चंदर की कला की दो विशेषताएं हैं-एक तो उनकी सार्वभौमिक दृष्टि और जागरूक बौद्धिकता। दूसरी उनकी विशिष्ट टेकनिक। जहां तक जागरूक बौद्धिकता का प्रश्न है, कृश्न चंदर को कथा क्षेत्र में वही स्थान प्राप्त है, जो अली सरदार जाफरी को काव्य क्षेत्र में। उनकी कहानियों की सर्जनात्मक दृष्टि विशाल भी है और स्पष्ट भी। वे जागरूक समाजवादी हैं। साथ ही उनका परिप्रेक्ष्य भी इतना विस्तृत है, जितना और किसी कथाकार का नहीं हुआ। वे कश्मीर के खच्चरवालों का भी उतना ही सजीव वर्णन करते हैं, जितना बंगाल के अकाल पीड़ितों और तेलंगाना के विद्रोही किसानों का। बंबई के फिल्म आर्केस्ट्राओं के दयनीय जीवन का भी विस्तृत चित्रण उन्होंने किया है। और वर्मा के मोर्चे पर लड़ते हुए अमेरिकी सैनिकों तथा कोरियाई युद्ध में आहुति देती हुई वीरांगनाओं का भी। किन्तु अपनी लगभग हर कहानी में सामाजिक क्रांति की आवश्यकता, बल्कि समाजवादी क्रांति की आवश्यकता चिल्ला-चिल्ला कर बोलती दिखाई देती है।’’

कृश्न चंदर की किताबों की संख्या तीन दर्जन से ज्यादा है। ‘एक गधे की आत्मकथा’, ‘एक वाइलिन समुन्दर के किनारे’, ‘एक गधा नेफा में’, ‘तूफान की कलियां’, ‘कार्निवाल’, ‘एक गधे की वापसी’, ‘गद्दार’, ‘सपनों का कैदी’, ‘सफेद फूल’, ‘प्यास’, ‘यादों के चिनार’, ‘मिट्टी के सनम’, ‘रेत का महल’, ‘कागज की नाव’, ‘दौलत और दुनिया’, ‘प्यासी धरती, प्यासे लोक’, ‘पराजय़’ आदि उनके प्रमुख उपन्यास हैं। तो वहीं ‘जिंदगी के मोड़ पर’, ‘टूटे हुए तारे’, ‘तीन गुंडे’, ‘समुन्दर दूर है’, ‘अजंता से आगे’, ‘हम वहशी हैं’, ‘मैं इंतजार करूंगा’, ‘दिल किसी का दोस्त्त नहीं’, ‘किताब का कफन’, ‘अन्नदाता’, ‘तिलस्मे-ख्याल’, ‘सुबह होती है’, ‘बावन पत्ते’, ‘हवाई किले’, ‘यरकान’ आदि उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं। कृश्न चंदर की किताबों के अनुवाद भारतीय भाषाओं के अलावा दुनिया की प्रमुख भाषाओं में भी हुए। मसलन अंग्रेजी, रूसी, चीनी, चेक, पोलिश, हंगेरियन आदि। उन्होंने रेडियो नाटक और फिल्मी पटकथाएं भी लिखीं। बंगाल के अकाल पर उन्होंने ‘अन्नदाता’ कहानी के अलावा दिल को छू लेने वाला एक नाटक, ‘भूखा बंगाल’ भी लिखा। जिसे इप्टा ने उस वक्त पूरे देश में खेला। उनकी एक और दीगर मशहूर कहानी ‘जामुन का पेड़’ का नाट्य रूपान्तरण ‘बड़ी देर की मेहरबान आते आते’ के रूप में हुआ। कृश्न चंदर का लिखा रिपोर्ताज ‘पौदे’ उर्दू अदब में एक खास मुकाम रखता है। कहानियों की तरह कृश्न चंदर के उपन्यास भी खासे चर्चित रहे। खास तौर पर ‘एक गधे की आत्मकथा’। इस उपन्यास में उन्होंने देश के तत्कालीन सियासी और समाजी सिस्टम को बड़े ही व्यंग्यात्मक शैली में चित्रित किया है। वहीं उनका छोटा सा उपन्यास ‘एक गधा नेफा में’ साल 1962 में भारत-चीन के बीच हुई जंग के पसमंजर में लिखा गया है।

कृश्न चंदर उन मुट्ठी भर साहित्यिक दिग्गजों में से एक थे, जिन्होंने भारतीय फिल्म उद्योग को अपनी प्रतिभा से सजाया, संवारा। उन्होने तकरीबन दो दर्जन फिल्मों के लिए पटकथा और संवाद लिखे। इनमें से ‘धरती के लाल’, ‘आंदोलन’, ‘एक दो तीन’, ‘ममता’, ‘मनचली’, ‘शराफत’, ‘दो चोर’ और ‘हमराही’ जैसी फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी मिली। फिल्म ‘धरती के लाल’ और ‘शराफत’ उनकी कहानी पर ही बनी हैं। कृश्न चंदर को अपने जीवन में कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया। उनकी अनगिनत साहित्यिक उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने भी उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। कृश्न चंदर का नाम उन साहित्यकारों में शुमार होता है, जिन्हें सोवियत संघ के प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ से नवाजा गया। आखिरी समय तक कृश्न चंदर ने अपनी कलम नहीं छोड़ी। 8 मार्च, 1977 को मुंबई में जब कृश्न चंदर का निधन हुआ, तो उस वक्त भी उनके हाथ में कलम मौजूद थी। कृश्न चंदर ताउम्र प्रगतिशील, मानवतावादी रहे। उनका बेश्तर लेखन हिंदू-मुस्लिम अलगाववाद के खिलाफ है। समाज के दलित, दमित, शोषित वर्गों के हक में उनकी कलम हमेशा आग उगलती रही। अपने भावपूर्ण लेखन, जमीन से जुड़े किरदारों और सर्वहारा के मार्मिक-सजीव चित्रण की खातिर कृश्न चंदर अपने पाठकों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल शिवपुरी में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 8, 2021 10:46 am

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