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Wednesday, September 29, 2021

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शोषितों के आर्थिक सामाजिक विषमता को पाटे बिना राष्ट्र नहीं हो सकता : बाबू जगदेव प्रसाद

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“दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।”

“सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है”

“धन-धरती और राजपाट में नब्बे भाग हमारा है।”

तथा

“मानववाद की क्या पहचान, ब्राह्मण भंगी एक समान”

पुनर्जन्म और भाग्यवाद, इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद”- जैसे समाजिक न्याय के नारे गढ़ने वाले ‘बिहार के लेनिन’ बाबू जगदेव प्रसाद का परिनिर्वाण दिवस है। 05 सितम्बर 1974 को आज ही दिन की उनकी मृत्यु हुयी थी।

बाबू जदगेव प्रसाद कहते थे राष्ट्र – निर्माण के लिए प्रजाति, भाषा, धर्म या किसी खास प्रकार की संस्कृति का होना ज़रूरी नहीं है बल्कि इसके लिए राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में सभी की बराबर भागीदारी तथा प्रतिनिधित्व का होना ज़रूरी है। राष्ट्र- निर्माण के  लिए जगदेव प्रसाद ने बहुत बारीक परिकल्पना की थी। उनका मानना था कि 90% शोषितों को जब तक देश में 90% राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक भागीदारी तथा प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, तब तक राष्ट्र – निर्माण असंभव है।”

राष्ट्र होने के लिए राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में सबकी भागीदारी जितना अनिवार्य है, उतना प्रजाति, भाषा, धर्म और संस्कृति का एकात्म ज़रूरी नहीं है। उन्होंने कहा था कि राष्ट्र देश की जनता के हृदय में बसने वाली एकात्म की भावना है, जो किसी राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधती है और यह एकात्म की भावना किसी देश के भीतर बसने वाले लोगों के बीच राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक भागीदारी से आएगी। यदि किसी देश की सरकार हिंसात्मक साधनों से जैसे फौज, पुलिस, लाठीचार्ज, कर्फ्यू आदि से जमीन और आसमान जैसे फासले पर खड़े लोगों के बीच राष्ट्र का निर्माण करना चाहती है तो यह असंभव है। या कोई क्रूर सत्ता पूरे देश को जेल में तब्दील कर, एक मनोवैज्ञानिक दहशत फैलाकर वाच टावर से भी राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकती है। राष्ट्र – निर्माण के लिए शोषितों को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में बराबर की हिस्सेदारी देनी होगी। तभी कोई भूगोलवाची देश वाकई राष्ट्र हो सकता है।

जगदेव प्रसाद ने अपनी भाषा में कहा था कि राष्ट्र निर्माण का मुख्य बिंदु है सामाजिक और आर्थिक समानता, समाजिक आर्थिक उद्देश्य अगर एक है या एक जैसा है तो वो राष्ट्र है। अगर निचले तबके का सामाजिक उद्देश्य अलग है और ऊपरी तबके का सामाजिक उद्देश्य अलग है तो राष्ट्र कैसे बनेगा। अगर आर्थिक आधार पर दोनों तबकों के बीच ज़मीन आसमान का फासला होगा तब भी राष्ट्र नहीं बनेगा।

भारत में 90 प्रतिशत शोषित हैं। उन्हें मुख्यधारा में लाकर आर्थिक सामाजिक विषमता को पाटकर ही राष्ट्र हो सकता है। राष्ट्र स्वैच्छिक चीज है। हाशिए के लोगों को विश्वास में लेकर उनको मुख्यधारा में लाकर ही एक देश को राष्ट्र में तब्दील किया जा सकता है।

 

सांस्कृतिक विमर्शकार भी थे जगदेव प्रसाद

जगदेव प्रसाद का सांस्कृतिक पक्ष भी बहुत महत्वपूर्ण था। वो कहते थे राजनीतिक गुलामी तो 2-4 पीढ़ी ही होती है लेकिन सांस्कृतिक गुलामी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। क्योंकि राजनीतिक गुलामी से सिर्फ़ आपका शरीर ग़ुलाम होता है जबकि सांस्कृतिक गुलामी दिल दिमाग पर इस तरह छा जाती है कि आप अपने ही ख़िलाफ़ अनेक काम करने लगते हैं, और खुद अपने हाथ पांव में गुलामी पहन लेते हैं।

जगदेव प्रसाद ने राम स्वरूप वर्मा द्वारा बनाए गए संगठन अर्जक संघ को अपनाया था। जिसे रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक कहा उसे ही जगदेव प्रसाद ने शोषित कहा। सम्राट अशोक पहले शख्स थे जिन्होंने अपने शिलालेखों में बहुजन कल्याण शब्द का लिखित इस्तेमाल किया। ये शब्द काशी के उनके दूसरे शिलालेख में लिखे मिलते हैं। जबकि बुद्ध ने अपने साहित्य में बहुजन शब्द का इस्तेमाल किया था। बहुजन शब्द से पूरा संविधान प्रभावित है। इसीलिए पार्लियामेंट में सर्वसम्मति से कुछ भी पास नहीं होता, बहुमत से होता है। सर्वसम्मति हो ही नहीं सकती। 

शोषित शब्द का जितना इस्तेमाल भारत में जगदेव ने किया है उतना किसी और राजनेता ने नहीं। शोषित उनकी ज़बान पर था। उनके सिद्धांत में, झंडे में, राष्ट्रगान में, वक्तव्य में शोषित आता था। मार्क्स के देश में वर्ग-संघर्ष था लेकिन जगदेव के देश में वर्ण-संघर्ष है। यहां फ्रॉयड का यौन कुंठा का सिद्धांत नहीं चलेगा। यहां समूचे देश में वर्ण-कुंठा का उबाल है। फ्रॉयड के सिद्धांत से इस देश की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। लेकिन विडंबना यह है कि  भारत में राजनीतिक विज्ञान के कोर्स में शोषितवाद नहीं है। गांधीवाद है, लोहियावाद है, समाजवाद है, प्रोलेटेरियन समाजवाद है पर शोषितवाद को पाठ्यक्रम में जगह नहीं दिया गया हैं। 

मीडिया ने उनके योगदान को कमतर किया

बिहार में उस वक्त दो समानांतर आंदोलन हुये, जेपी (जय प्रकाश) आंदोलन और जगदेव प्रसाद का आंदोलन। जेपी का आंदोलन छात्र आंदोलन नहीं बल्कि राजनीतिक आंदोलन था। जगदेव प्रसाद शोषितों के नेता थे उनका रिस्पांस मीडिया में छपता ही नहीं था। मीडिया ने जगदेव प्रसाद को भी शॉर्ट में जेपी कर दिया था। कुछ छपता भी था इस नाम से पता नहीं चलता था कि इस जेपी (जगदेव प्रसाद) ने या उस जेपी (जय प्रकाश) ने।

जगदेव प्रसाद ने कहा था कि जेपी आंदोलन की कमान सामंतों, द्विजवादियों के हाथ में है। लिखने वाले तो ये भी लिखते हैं कि जेपी आरएसएस से मिले हुए थे। उनके आंदोलन का फायदा लेकर जनता पार्टी सत्ता में आई और बाद में जनता पार्टी का जनसंघ में विलय हो गया। दरअसल इंदिरा गांधी ने प्रिवी पर्स खत्म करने और बैंकों के राष्ट्रीयकरण का जो कदम उठाया था उससे ये सामंत और द्विजवादी तिलमिलाये थे। उसी के आंड़ में जेपी आंदोलन खड़ा किया गया था।

जगदेव प्रसाद पर किताबें

जददेव प्रसाद पर पहली किताब सन् 1999 में अशोक कुमार सिन्हा द्वारा लिखी गई। अशोक सिन्हा जगदेव प्रसाद के बेटे नागमणि के सचिव थे। उन पर दूसरी किताब सच्चिदानंद श्याम ने लिखी। ये सच्चिदानंद श्याम उसी स्कूल में पढ़ाते थे जिसमें जगदेव प्रसाद हेड मास्टर थे।

उन पर तीसरी किताब 2004-05 में आई जिसे बजरंग प्रकाश केसरी ने लिखा है। उन पर चौथी किताब 2006 में आई। इस किताब में क्रांतिबीज नाम से जगदेव प्रसाद के भाषणों का भी संपादन किया गया था। इस किताब को शोषित पत्रिका के संपादक जयराम प्रसाद सिंह ने लिखा था। बता दें कि शोषित पत्रिका का पहला अंक बाबू जगदेव प्रसाद ने निकाला था उसके बाद के सारे अंक जयराम प्रसाद सिंह ने ही निकाली थी। जगदेव प्रसाद पर 2007 में आई पांचवीं किताब ‘शहीद का संग्रम’ का संपादन अशोक सिन्हा ने किया था। उन पर छठवीं किताब राकेश कुमार मौर्य ने 2009 में लिखी। जबकि राजेंद्र कुमार सिंह ने साल 2011 में उनके संपूर्ण वांग्मय का संपादन किया था। 2012 में उन पर जितेंद्र वर्मा की लिखी अगली किताब आई।

बहुत कम उम्र से उन्होंने प्रतिरोध करना शुरु कर दिया था

02 फरवरी 1922 को बोधगया के समीप कुर्था प्रखंड के कुरहारी गांव के कोइरी (दांगी) परिवार में हुआ था। इनके पिता प्रयाग नारायण पास के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे तथा माता रासकली गृहिणी थीं। पिता के मार्गदर्शन में बालक जगदेव ने मिडिल की परीक्षा पास की और हाईस्कूल के लिए जहानाबाद चले गए।

निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा होने के कारण जगदेव जी की प्रवृत्ति शुरू से ही संघर्षशील तथा जुझारू रही तथा बचपन से ही ‘विद्रोही स्वाभाव’ के थे। उनसे जुड़ा एक किस्सा है। दरअसल उस जमाने में गया जिले में साढ़े नौ हजार ज़मीदार थे। उनके गांव का स्थानीय ज़मींदार पनुई थे। उनकी ज़मींदारी में हर काश्तकार के 05 कठा हाथी को चराने के लिए देना पड़ता था। इसे पंचकढ़िया प्रथा कहते थे। तेली पर तेल और अहीर पर घी का टैक्स लगता था। एक बार जब महावत हाथी लेकर आया तो उन्होंने छात्रों के साथ मिलकर बिना कुछ दिए ही उसे भगा दिया।

इससे पहले जब वो मैट्रिक में प्रथम श्रेणी में पास हुए तो उनके पहलवान दादा ने उन्हें नया कपड़ा बनवा दिया। जब वो नया कपड़ा पहनकर बाहर निकले तो जमींदार के कारिंदे ने छीटाकशी की। वो सुन लिए और धूल उठाकर उसके मुंह पर डाल दिया।

इससे पहले सहजानंद सरस्वती के जमाने में एक मीटिंग हुई। उस मीटिंग में एक वक्ता ने कहा कि एक नहीं हजारों आंबेडकर आ जाएं तब भी इस देश से ज़मींदारी प्रथा नहीं खत्म होगी। उन्होंने वहीं खड़े होकर इसका तीव्र विरोध किया। वहां उन्होंने लाठियां भी खायी। वो उस समय हाईस्कूल में थे।

पिता के गुज़रने पर उन्होंने घर में रखे भगवान की सभी मूर्तियां और तस्वीरें उनकी चिता में रखकर जला डाला।

आगे चलकर वो सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े और वो सोशलिस्ट पार्टी की पत्रिका जनता के संपादक बने। बाद में उन्होंने अंग्रेजी साप्ताहिक सिटीजन और उदय पत्रिका का संपादन भी किया। 1970 में उनकी पार्टी ‘शोषित दल’ के समर्थन से दरोगा प्रसाद राय मुख्यमंत्री बने। वीपी मंडल के सरकार में जगदेव बाबू ने महामाया प्रसाद पर भ्रष्टाचार के आरोप में जांच आयोग बिठाया। जगदेव बाबू एक सजग आदमी थे। उन्होंने कभी भी सत्ता के लिये अपने समाज और अपने विचारों से समझौता नहीं किया।

बिहार में राजनीति का प्रजातंत्रीकरण को स्थाई रूप देने के लिए उन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति की आवश्यकता महसूस कर उन्होंने रामस्वरूप वर्मा द्वारा 01 जून 1968 को स्थापित ‘अर्जक संघ’ में शामिल हुये, और फिर 07 अगस्त 1972 को जगदवे प्रसाद के ‘शोषित दल’ तथा रामस्वरूप वर्मा जी की पार्टी ‘समाज दल’ का एकीकरण हुआ और ‘शोषित समाज दल’ नमक नयी पार्टी का गठन किया गया।

25 अगस्त 1967 को वीपी मंडल के जन्मदिन के दिन उन्होंने शोषित दल की स्थापना करते हुये कहा था-

“जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मैं एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी, परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।”

(लेख जनचौक के विशेष संवादाता सुशील मानव द्वारा लिखा गया है)

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