Thursday, September 29, 2022

स्मृति दिवस पर विशेष: दिनेश ठाकुर, थिएटर जिनकी सांसों में बसता था

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हिन्दी रंगमंच की दुनिया में दिनेश ठाकुर की पहचान रंगकर्मी, अभिनेता और नाट्य ग्रुप ‘अंक’ के संस्थापक और निर्देशक के तौर पर है। ‘अंक’ का सफ़र साल 1976 में शुरू हुआ, जो उनके इस दुनिया से जाने के बाद आज भी जारी है। रंगमंच की दुनिया में नाट्य ग्रुप ‘अंक’ के छियालिस साल पूरे हो गए हैं। रंगमंच हो, टेलीविज़न या फिर सिनेमा हर क्षेत्र में दिनेश ठाकुर ने अपनी एक अलग छाप छोड़ी। उन्होंने अपनी अभिनय यात्रा की शुरुआत रंगमंच से की। बाद में फ़िल्मों में भी काम किया। बुनियादी तौर पर वे पूर्णकालिक रंगकर्मी ही थे। थिएटर उनकी सांसों में बसता था, यह उनका जुनून था।

8 अगस्त, 1947 को जयपुर में जन्मे दिनेश ठाकुर का नाटक के जानिब लगाव स्कूल के दिनों से ही था। जब वह नौंवी क्लास में थे, तभी उन्होंने अपना पहला नाटक ‘औरंगजेब की आखि़री रात’ डायरेक्ट किया। नाटक कामयाब रहा और इस कामयाबी ने उनमें नाटक के प्रति गहरा लगाव पैदा किया। अठारह साल के होते-होते उन्होंने पक्का इरादा कर लिया था, ‘‘एक्टर बनूंगा, एंटरटेनर बनूंगा। लोगों को मनोरंजन दूंगा। हंसाऊंगा, बस!’’

दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान दिनेश ठाकुर कॉलेज की ड्रामेटिक सोसायटी का हिस्सा बन गए और पांच सालों तक ख़ूब नाटक किए। ‘द ग्रेजुएट 67’ में बुद्धिजीवी और ‘आधे अधूरे’ में अशोक का निभाया उनका किरदार दर्शकों ने काफ़ी पसंद किया। उन दिनों दिल्ली में कहीं भी नाटक खेले जाते, वे उन्हें देखने ज़रूर जाते। दिल्ली में ही दिनेश ठाकुर  को हिन्दी रंगमंच के दो दिग्गज निर्देशकों बी.वी. कारंत और हबीब तनवीर के साथ काम करने का मौक़ा मिला। इन दोनों के साथ उन्होंने नाटक की लम्बी रिहर्सल की। लेकिन अफ़सोस कि इन दोनों ही नाटकों के शो किसी वजह से नहीं हो सके।

नाटक के शो भले ही नहीं हो पाए, पर इन दोनों ही निर्देशकों के साथ किए काम का तजुर्बा दिनेश ठाकुर को बाद में बहुत काम आया। कॉलेज की पढ़ाई के बाद वे ‘अभियान’ नाट्य संस्था से जुड़ गए। ‘अभियान’ में उन्होंने राजिन्दर नाथ, टी. पी. जैन, किशोर कपूर, नमित कपूर जैसे दिग्गज कलाकारों-निर्देशकों के साथ काम किया। बाद में ओम शिवपुरी के नाट्य ग्रुप ‘दिशांतर’ से भी जुड़े। दिनेश ठाकुर का पहला फुललेंथ प्ले ‘केयरटेकर’ था, जिसे उन्होंने ही निर्देशित किया। रंगमंच में उनके काम की ख्याति उन्हें मुंबई खींच ले गई। निर्देशक बासु भट्टाचार्य उन दिनों फ़िल्म ‘अनुभव’ बना रहे थे, जिसके एक रोल के लिए उन्होंने दिनेश ठाकुर को मुंबई बुला लिया।

साल 1971 में आई ‘अनुभव’ टिकट खिड़की पर हिट रही और फ़िल्म देखने वालों को दिनेश ठाकुर का काम बहुत पसंद आया। ‘अनुभव’ के बाद उन्हें एक साथ कई फ़िल्में और मिल गईं, जिसमें बासु चटर्जी की फ़िल्म ‘रजनीगंधा’ भी शामिल थी। ‘रजनीगंधा’ न सिर्फ़ सुपर हिट हुई, बल्कि इस फ़िल्म को बेस्ट मूवी का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला। इस फ़िल्म की क़ामयाबी के बाद दिनेश ठाकुर ने दिल्ली को हमेशा के लिए छोड़ दिया। मायानगरी मुंबई में उनकी फ़िल्मों का सफ़र शुरू हो गया।

‘मेरे अपने’, ‘छोटी सी बात’, ‘परिणय’, ‘कालीचरण’, ‘कर्म’, ‘मधु मालती’, ‘घर’, ‘नैय्या’, ‘मीरा’, ‘गृह प्रवेश’, ‘ख़्वाब’, ‘अग्नि परीक्षा’, ‘बग़ावत’, द बर्निंग ट्रेन’, ‘आमने-सामने’, ’आज की आवाज़’, ‘आस्था’, ‘फ़िज़ा’ जैसी ऑफ बीट और कामर्शियल फ़िल्मों में उन्होंने एक साथ अदाकारी की। कुछ फ़िल्मों के लिए उन्होंने कहानी और स्क्रीनप्ले भी लिखा। साल 1978 में आई फ़िल्म ‘घर’ की स्टोरी, स्क्रीनप्ले और संवाद दिनेश ठाकुर के ही थे। इस फ़िल्म के लिए 1979 में उन्हें बेस्ट स्टोरी का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला। निर्देशक बासु भट्टाचार्य के साथ दिनेश ठाकुर किसी न किसी तौर पर जुड़े रहे, चाहे अदाकार के तौर पर या फिर स्क्रिप्ट और डायलॉग लेखक या फिर क्रिएटिव कंसल्टेंट के रूप में।

दिनेश ठाकुर फ़िल्में ज़रूर कर रहे थे, लेकिन उनकी आखि़री मंज़िल रंगमंच था। फ़िल्मों में एक मुक़ाम पाने के बाद, उन्होंने खुद ही इनसे दूरी बना ली। वे पूरी तरह से रंगमंच के क्षेत्र में आ गए। रंगमंच की दुनिया में जमने के लिए, मगर उन्हें काफ़ी संघर्ष करना पड़ा। उस वक़्त मुंबई में ‘इप्टा’ का बड़ा नाम था। मशहूर रंग-निर्देशक सत्यदेव दुबे के निर्देशन में इप्टा के लगातार नाटक हो रहे थे। नाटक करने के लिए दिनेश ठाकुर ने सभी निर्देशकों से मेल-मुलाक़ात और बातचीत की, लेकिन कहीं कोई बात नहीं बनी। सब तरफ़ से निराश होकर, आखि़रकार उन्होंने ख़ुद ही नाटक करने का फ़ैसला किया।

साल 1976 में सुरेन्द्र गुलाटी के लिखे नाटक ‘शाबास अनारकली’ से वे मुंबई में रंगमंच पर उतरे। इस नाटक के साथ ही उनका नाट्य ग्रुप ‘अंक’ भी अस्तित्व में आया। दिनेश ठाकुर ने अपने नाटक का पहला प्रोडक्शन ‘अंक’ के बैनर पर ही किया। इस नाटक के सफल प्रदर्शन के बाद, उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। शुरुआत में उन्हें रंगमंच की दुनिया में पांव जमाने में काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा। पैसे के लिए उन्होंने दुर्गा पूजा और गणेशोत्सव के मौक़ों पर भी नाटक किए। रंगमंच पर उनकी मेहनत आहिस्ता-आहिस्ता रंग लाई और उनके पास नाटक के प्रस्ताव आने लगे।

अपने प्रोडक्शन हाउस ‘अंक’ के बैनर पर दिनेश ठाकुर ने ‘बाक़ी इतिहास’, ‘पगला घोड़ा’ (बादल सरकार), ‘काग़ज़ की दीवार’, ‘बीवियों का मदरसा’, ‘आला अफ़सर’, ‘कमला’, ‘जात ही पूछो साधो की’, ‘ख़ामोश ! अदालत जारी है’, ‘अंजी’ (विजय तेंदुलकर), ‘जिस लाहौर नहीं देख्या’ (असगर वजाहत), ‘शह या मात’ (बीएम शाह), ‘रक्तबीज’ (शंकर शेष), ‘आधे अधूरे’ (मोहन राकेश), ‘टोपी शुक्ला’ (राही मासूम रज़ा), ‘हाय मेरा दिल’ (रणवीर सिंह), ‘महाभोज’ (मन्नू भंडारी), ‘हंगामाख़ेज़’ (आगा हश्र काशमीरी), ‘जाने न दूंगी’, ‘जिया जाए ना’, ‘हमेशा’, ‘हम दोनों’, ‘राकेश पत्रों में’, ‘रवीन्द्र भावांजलि’ समेत साठ नाटकों का निर्देशन किया। पर उन्हें असली पहचान और प्रसिद्धि नाटक ‘तुगलक’ (गिरीश कर्नाड) से मिली। साल 1988 में पहली बार प्रदर्शित हुआ उनका यह नाटक, इतना कामयाब हुआ कि मुंबई में अठारह दिन के अंदर इसके तीस शो हुए और तेईस शो हाउसफुल। मुंबई रंगमंच के इतिहास में सचमुच यह एक बड़ी घटना थी।

‘तुगलक’ की कामयाबी के बाद थिएटर में दिनेश ठाकुर के क़दम रूके नहीं, बल्कि आगे और आगे बढ़ते चले गए। इस नाटक के बाद उनका नाटक ‘महाभोज’ आया और इसे भी ‘तुगलक’ की तरह कामयाबी हासिल हुई। अंग्रेज़ी नाटक ‘सेन्ड मी नो फ़्लावर’ का हिन्दी रूपान्तरण (नाटककार-रणवीर सिंह) ‘हाय मेरा दिल’ दिनेश ठाकुर का एक और लोकप्रिय नाटक था। इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि पृथ्वी थिएटर में साल 1980 में शुरू किए गए इस नाटक के पांच महीने में ही सौ शो हो गए थे। देश भर में इसके अभी तलक डेढ़ हज़ार से ज़्यादा शो हो चुके हैं, लेकिन इस नाटक की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। यह नाटक जहां भी होता है, दर्शकों का दिल जीत लेता है। दिनेश ठाकुर जब तक जिंदा रहे, उन्होंने इस नाटक में मुख्य किरदार की भूमिका निभाई।

‘हाय मेरा दिल’ के अलावा उनका नाटक ‘हत्तेरी किस्मत’ भी ख़ासा कामयाब रहा। इस नाटक के उन्होंने कुल एक हज़ार दो सौ बीस शो किए। वहीं ‘अंजी’ के भी 450 से ज़्यादा शो हुए। साल 1978 में मुंबई में पृथ्वी थिएटर का आग़ाज़ हुआ, दिनेश ठाकुर इससे शुरू से ही जुड़े रहे। उनके ज़्यादातर नाटकों का प्रदर्शन पृथ्वी थिएटर में ही हुआ। वे पेशेवर रंगकर्मी थे। थिएटर ही उनकी रोजी-रोटी का ज़रिया था। दिनेश ठाकुर की सोच थी, दर्शक पास लेकर नहीं, टिकट खरीदकर उनके नाटक देखे। साल 2001 में दिनेश ठाकुर ने अपने थिएटर ग्रुप ‘अंक’ की सिल्वर जुबली मनाई। यह पूरा आयोजन उन्होंने अपने मनपसंद नाटककार विजय तेंदुलकर पर फोकस किया। वे प्रयोगधर्मी नाटककार थे। अपने नाटकों में नये-नये प्रयोग करने से वे कभी नहीं हिचके। ऐसे प्रयोगों की जब नाट्य आलोचकों ने आलोचना की, तो दिनेश ठाकुर का उन्हें मुंह तोड़ जवाब था, ‘‘मैं आलोचकों के लिए नाटक नहीं करता।’’ अलबत्ता दर्शकों की पसंद का उन्होंने हमेशा ख़याल रखा।

दिनेश ठाकुर का जब भी मूल्यांकन होता है, तो उनके रंगकर्म को हल्का-फुल्का, अगंभीर करार दे दिया जाता है। महज़ इसलिए कि उन्होंने थिएटर को पेशेवर तरीके़ से अपनाया। लोकप्रिय नाटकों के खूब प्रदर्शन किए। आलोचना करने वाले यह भूल जाते हैं कि दिनेश ठाकुर ने यदि ‘हाय मेरा दिल’ और ‘हत्तेरी किस्मत’ जैसे कॉमेडी ड्रामे किए, तो उन्होंने ‘तुगलक’, ‘बाक़ी इतिहास’, ‘पगला घोड़ा’ ‘सखाराम बाइंडर’, ‘हम दोनों’, ‘आधे अधूरे’ और ‘जिस लाहौर नहीं देख्या’ जैसे ऑलटाइम क्लासिक नाटक भी उसी कामयाबी के साथ निर्देशित किए। उनमें शानदार अभिनय किया। नाटककार विजय तेंदुलकर के उन्होंने तक़रीबन सभी नाटकों का मंचन किया। जो कि अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।  

उस वक़्त जब मुंबई के रंगमंच पर गुजराती और मराठी नाटक राज कर रहे थे, दिनेश ठाकुर ही थे जिन्होंने दर्शकों को हिन्दी रंगमंच की तरफ दोबारा मोड़ा। हिन्दी नाटकों के प्रति दर्शकों में दिलचस्पी जगाई। समय और ज़रूरत के मुताबिक अपने नाटकों में बदलाव करने के वह बड़े हामी थे। उनका मानना था, ‘‘नाटक में समय के साथ-साथ नवीनता ज़रूरी है।’’ वहीं नाटक में प्रयोगधर्मिता के बारे में उनका ख़याल था, ‘‘मैं ऐसे प्रयोगधर्मी काम को गलत मानता हूं, जो आप कर रहे हैं, लेकिन दर्शकों को कुछ समझ में नहीं आ रहा।’’ हो सकता है कि बहुतेरे लोग उनकी इस बात से इत्तिफ़ाक़ न रखें। रंगमंच के प्रति दिनेश ठाकुर का अपना नज़रिया और अलग सोच थी और इस सोच के ही मुताबिक उन्होंने नाटक निर्देशित किए। निर्देशन के लिए वह जब भी कोई नाटक चुनते, तो उसमें यह ज़रूर देखते कि मनोरंजन के साथ-साथ उसमें दर्शकों के लिए एक ऐसा संदेश हो, जो उन्हें सोचने पर मज़बूर करे। रंगमंच के ज़ानिब दिनेश ठाकुर का ग़ज़ब का जुनून था।

एक बार जब वे पूरी तरह से रंगमंच में जम गए, तो उन्होंने फ़िल्मों से बिल्कुल किनारा कर लिया। रंगमंच के लिए पूरी तरह से समर्पित हो गए। रंगमंच न सिर्फ़ उनकी ज़िंदगी था, बल्कि जीने का सहारा भी था। अपने इंटरव्यू में वह अक्सर एक बात कहते थे, ‘‘थिएटर मेरी सांसें हैं, जिसके बिना मैं एक क़दम आगे नहीं चल सकता।’’ दिनेश ठाकुर आखि़री सांस तक थिएटर से वाबस्ता रहे। उनकी दिली तमन्ना थी कि गुजराती और मराठी रंगमंच की तरह हिन्दी रंगमंच भी आत्मनिर्भर बने। आत्मनिर्भरता को वे इसलिए ज़रूरी मानते थे कि ‘‘जिस दिन सरकारी अनुदान मिलना बंद हो जाएगा या कोई स्पॉन्सर नहीं मिलेगा, तो उस पर निर्भर रहने वाला रंगकर्म भी बिखर जाएगा।’’ मौजूदा दौर में हिन्दी रंगमंच की जो हालत है, उसमें दिनेश ठाकुर की यह बात सौ फीसदी सही साबित हुई है। 20 सितम्बर, साल 2012 को ज़िंदगी के रंगमंच पर अपने हिस्से की भूमिका निभाकर, दिनेश ठाकुर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल एमपी के शिवपुरी में रहते हैं।)

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