Friday, December 2, 2022

स्मृति दिवस पर विशेष: उदयशंकर ने भारतीय नृत्य और संगीत को दिया वैश्विक फ़लक

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देश में उदयशंकर की पहचान भारतीय नृत्य और संगीत को वैश्विक फ़लक पर स्थापित करने वाले एक अद्भुत कलाकार की है। जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी नृत्य के लिए समर्पित कर दी। जब देश परतंत्र था, तब उन्होंने भारतीय शास्त्रीय, लोक और जनजातीय नृत्य के तत्वों के साथ पश्चिमी रंगमंचीय तकनीकों को अपनाकर, एक ऐसी नृत्य-संरचना तैयार की, जिसे दुनिया भर ने सराहा। एक लिहाज़ से कहें, तो यह आधुनिक भारतीय नृत्य था। बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में उदयशंकर ने इस नृत्य-संरचना को अपने देश में ही नहीं, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में भी लोकप्रिय बनाया। भारतीय नृत्य को दुनिया के मानचित्र पर असरदार ढंग से स्थापित किया। उदय शंकर से शुरू हुई नृत्य की यह परंपरा, आज देश में कई शैलियों और घरानों से होती हुई, एक नई शक्ल अख़्तियार कर चुकी है। भारतीय नृत्य में इस क्रांतिकारी पहल के लिए वे हमेशा जाने-पहचाने जाएंगे।

8 दिसंबर, 1900 में राजस्थान के उदयपुर में जन्मे उदयशंकर ने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई और उसके बाद गंधर्व महाविद्यालय में चित्रकला का प्रशिक्षण लिया। एक दौर था जब उदयशंकर, चित्रकला की दुनिया में ही रमे थे। ‘रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट’, लंदन में उनकी बाक़ायदा आला तालीम हुई। लंदन में रहकर उन्होंने एक तरफ चित्रकारी की तमाम शैलियों का अध्ययन किया, तो दूसरी ओर नृत्य में उन तमाम शैलियों, युगों और पात्रों को उतारने की भी कोशिश की। उदय शंकर ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य के किसी भी स्वरूप में कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था, बावजूद इसके उनकी सभी प्रस्तुतियां रचनात्मक थीं। कम उम्र से ही वे भारतीय शास्त्रीय और लोक नृत्य शैलियों के संपर्क में आते रहे थे, यूरोप में रहने के दौरान वे बैले से प्रभावित हुए। आगे चलकर उन्होंने इन दोनों शैलियों के तत्वों को मिलाकर, नृत्य की एक नयी शैली की रचना कर दी। जिसे हाई-डांस कहा गया। अलबत्ता वे खु़द इसे क्रिएटिव डांस कहते थे। 20 साल की उम्र में उदयशंकर ने अपना पहला डांस परफॉर्मेंस ‘डांस ऑफ शिवा’ किया। जो खू़ब पसंद किया गया। उस वक़्त की मशहूर रूसी बैले डांसर और हीरोइन अन्ना पावलोवा ने उनके नृत्य को देखा, तो उन्हें अपने बैले ग्रुप ‘ओरिएंटल इम्प्रेशंस’ में शामिल कर लिया। करीब तीन साल तक उदय शंकर उनके साथ रहे।

उदयशंकर ने अन्ना पावलोवा के साथ कनाडा और दक्षिण अमेरिका में अनेक शो किए। ‘ओरिएंटल इम्प्रेशंस’ के लिए उन्होंने दो बैले ‘एन इंडियन मैरिज’ और ‘राधाकृष्ण’ तैयार करवाए। ‘राधाकृष्ण’ बैले में उदयशंकर, कृष्ण और पावलोवा राधा का रोल निभाते थे। दोनों ही बैले कामयाब रहे। दर्शकों ने इन्हें जी भर कर सराहा। अन्ना पावलोवा के ग्रुप  में रहने से उदयशंकर को यह फ़ायदा हुआ कि वे नृत्य-परिकल्पना एवं उसकी प्रस्तुति में और भी ज़्यादा निपुण हो गए। स्टेज क्राफ़्ट, लाइटिंग और किसी भी नृत्य-संरचना के सीमित समय में कितना और कैसे नृत्य प्रदर्शित किया जा सकता है, इसे उन्होंने बारीकी से सीखा। अलबत्ता, आगे चलकर उन्होंने इस कला की पूरी तरह से एक नई शैली निर्मित कर ली। जिसमें बैले या वेस्टर्न डांस का कुछ भी हिस्सा शामिल नहीं था।

कथकलि, इन्दाराय, भरतनाट्यम् और लोकनृत्य को मिलाकर उन्होंने बिल्कुल एक अलग अपना स्टाइल बना लिया। जिसमें भारतीय संगीत के शास्त्रीय और लोक सुरों का भी समावेश होता था। इस डांस स्टाइल में भारतीयता स्पष्ट झलकती है। सच बात तो यह है कि भारतीयता उदयशंकर की कला की आत्मा है। पं. रविशंकर ने अपने एक लेख ‘मेरे दादा उदयशंकर’ में लिखा है, ‘‘कहीं से भी बैले अथवा कोई विजातीय तत्व उन्होंने अपनी नृत्य-संरचनाओं में नहीं लिया, वे अपने नृत्य को भारत का एक प्रतिबिम्ब बनाना चाहते थे, भारत की एक तस्वीर।’’ (‘मेरे दादा उदयशंकर’, पेज-104, पत्रिका-‘संगना’ अक्टूबर-दिसंबर 2014 जनवरी-मार्च 2015)

आगे चलकर उदयशंकर ने फ्रेंच पियानोवादक साइमन बार्बियरे जो उनके शिष्य और डांस पार्टनर थे और स्विस संगतराश एलिस बोन्नर के साथ यूरोप की पहली भारतीय नृत्य कंपनी की स्थापना की। इस ट्रुप में भारत के एक से बढ़कर एक बेहतरीन कलाकार और संगीतकार शामिल थे। तिमिरवरण, हरेन घोष, सितार वादक विष्णुदास शिराली, तबला वादक भद्रपुरुष और उनके छोटे भाई पं. रविशंकर यह कुछ नाम हैं। ‘उदय शंकर एंड हिज हिंदू बैले’ शीर्षक से उदयशंकर ने अपने ग्रुप के साथ पूरे यूरोप और अमेरिका में दौरा शुरू किया। तक़रीबन 84 शहरों में उन्होंने शो किए। अपनी एक विशेष नृत्य शैली, नए-नए प्रयोग और नृत्य में पश्चिमी रंगमंचीय तकनीकों को अपनाने के लिए उदय शंकर काफ़ी प्रसिद्ध हुए। उदयशंकर की जोड़ी कई महिला कलाकारों के संग बनी, मगर फ्रेंच डांसर सिमकी के साथ उनकी जो केमिस्ट्री थी, वह लाजवाब थी। इन दोनों का नृत्य दर्शकों पर अलग ही जादू जगाता था।

साल 1938 में उदयशंकर ने भारत को अपना केन्द्र बनाया। उत्तराखंड में अल्मोड़ा के एक छोटे से गांव सिमतोला में ‘उदयशंकर इंडिया कल्चरल सेंटर’ की स्थापना की। उनकी ख़्वाहिश थी कि यह एक विश्व प्रसिद्ध नृत्य केंद्र बने, जहां सारी दुनिया से नृत्य प्रेमी आएं। भारतीय संगीत, नृत्य कला को सीखें। अपने इस ख़्वाब को पूरा करने के लिए उन्होंने देश के सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञों, कलाकारों को इकट्ठा किया। मसलन कथकली सिखाने के लिए शंकरण नम्बूदरी, भरतनाट्यम-कण्डप्पन पिल्लई, मणिपुरी नृत्य-अम्बी सिंह और संगीत सिखाने के लिए उस्ताद अलाउद्दीन खान को आमंत्रित किया।

इन महान कलाकारों के अलावा उस्ताद अली अकबर खान, शांति बर्धन, सिमकी, अमला शंकर, सत्यवती, नरेंद्र शर्मा, रुमा गुहा ठाकुरता, प्रभात गांगुली, ज़ोहरा सहगल, उज़रा, लक्ष्मी शंकर, शांता गांधी, पं. रविशंकर, सचिन शंकर और गुरुदत्त आदि भी ‘उदयशंकर इंडिया कल्चरल सेंटर’ से जुड़े रहे। सहकर्मी, अध्यापक और विद्यार्थी के तौर पर। बाबा अलाउद्दीन और उदयशंकर के बीच भी रिश्ता अज़ब था। बाबा उन्हें बहुत प्यार और उनका आदर करते थे। यहां तक कि उदयशंकर से वे कहते, ‘‘आप मनुष्य नहीं, साक्षात शिव हैं। शिव के अवतार।’’ वहीं उदयशंकर के दिल में भी बाबा अलाउद्दीन के लिए बहुत सम्मान था। जो ताउम्र रहा। दूसरे विश्व युद्ध के चलते उदयशंकर को बाहर से आर्थिक मदद मिलना बंद हुई, तो उनकी महत्वाकांक्षी योजना गड़बड़ा गई। अल्मोड़ा का उनका विश्व प्रसिद्ध नृत्य केन्द्र चार साल अस्तित्व में रहने के बाद, पैसे की कमी की वजह से बंद हो गया। उदयशंकर मद्रास चले गए। 

उदयशंकर ने एक हिंदी फ़िल्म ‘कल्पना’ भी बनाई, जो नृत्य पर आधारित थी। इस फ़िल्म में उन्होंने और उनकी पत्नी अमला शंकर ने अभिनय किया था। भारतीय सिनेमा में ‘कल्पना’ अपनी तरह की एक अलग ही फ़िल्म है। जिसकी सत्यजित राय से लेकर राजकपूर तक ने जी-भर कर तारीफ़ की। कथकलि नृत्य से उदयशंकर को बेहद प्यार था और उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इस नृत्य के लिए समर्पित कर दी। कथकलि से एक बार लगाव हुआ, तो इस कला से संबंधित देश में जितनी गुफाएं, पीठ और मंदिर हैं मसलन अजंता एलोरा, महाबलिपुरम्, कोणार्क, खजुराहो गए। वहां इस कला शिल्प को आत्मसात किया। अपने नृत्य को निखारा।

ख़ास तौर पर जब मुद्राओं और भाव-भंगिमा के द्वारा कोई कथा कहते हुए नवरसों की अभिव्यक्ति की जाती, तो उसमें कथकलि नृत्य का असर साफ़ दिखलाई देता। उनकी रचना ‘कार्तिकेय’ और ‘शिव पार्वती’ इसकी एक बड़ी मिसाल है। उदयशंकर की सभी प्रस्तुतियां त्रुटि-रहित होती थीं। वे लगातार 13-14 घंटे तक प्रेक्टिस करते थे। बिजली जैसी फुर्ती थी, उनके जिस्म में। वे जब नृत्य करते, तो एक समां बंध जाता था।

भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से भी उदयशंकर का नाता रहा। उन्होंने इसके लिए कई छाया नाटिकाओं का निर्देशन किया। उदयशंकर और उनके बैले स्क्वाड ने इप्टा के तत्वावधान में मुंबई के मज़दूरों के लिए शो किए। उदयशंकर द्वारा तैयार किए गए शैडो प्ले का अनुकरण करते हुए इप्टा की दिल्ली और बंगाल शाखा ने ‘शहीद की पुकार’ नामक बैले डांस के शो देश के अनेक जिलों में किया।

‘उदय शंकर इंडिया कल्चरल सेंटर’ बंद हो जाने के बाद इस सेंटर के अनेक होनहार कलाकार शांतिवर्धन, अबनी दासगुप्ता, नरेंद्र शर्मा, ज़ोहरा सहगल, उज़रा, शांता गांधी, पं. रविशंकर, शचीन शंकर इप्टा में शामिल हो गए और उन्होंने अपनी कला के ज़रिए देश में जन-जागरण का काम किया। इप्टा के केन्द्रीय सांस्कृतिक दल द्वारा निर्मित प्रसिद्ध नृत्य नाटक (बैले) ‘स्पिरिट ऑफ इंडिया’ और ‘इंडिया इम्मोर्टल’ पर अप्रत्यक्ष तौर पर उदयशंकर की कला का ही असर था। भारत में बैले का चलन उन्होंने ही किया था। उदयशंकर साल 1960 में कोलकाता में बस गए। जहां उन्होंने ‘उदय शंकर नृत्य केंद्र’ खोला। इस केन्द्र का मक़सद भारतीय शास्त्रीय नृत्य और कलाओं का दुनिया भर में प्रचार प्रसार करना था।

उदयशंकर ने अपनी ज़िंदगी में कई बड़े-बड़े कारनामे अंज़ाम दिए। समूचे यूरोप और अमेरिका को भारतीय नृत्य और संस्कृति से वाकिफ़ करवाया। उनकी अथक लगन और कार्य के प्रति समर्पण की भावना ने भारतीय नृत्य को दुनिया के मानचित्र पर प्रभावशाली ढंग से स्थापित किया। भारतीय नृत्य में पश्चिमी नाट्य तकनीकों के इस्तेमाल से उनकी कला भारत और पश्चिमी जगत दोनों में बेहद लोकप्रिय हुई। उदयशंकर ने ताण्डव नृत्य, इन्द्रनृत्य, गन्धर्व, सपेरा, शिव-पार्वती, लंका दहन, रिदम ऑफ़ लाइफ़, श्रम और यंत्र, तलवार नृत्य, रामलीला और भगवान बुद्ध नाम से अनेक नृत्यों की रचना की। यही नहीं ‘रिदम ऑफ़ लाइफ़’, ‘श्रम और यंत्र’ और ‘शिव-पार्वती जैसे बैले काफी प्रसिद्ध हुए। जिसमें वेशभूषा, संगीत और निर्देशन तक उन्हीं का होता था। कुमाऊंनी रामलीला में भी उदय शंकर ने नाट्यकला, लोककला को लेकर अनेक प्रयोग किए।

जिसमें छायांकन विधि से रामलीला का मंचन, उनका उल्लेखनीय काम है। भारतीय कला और नृत्य में उदयशंकर के योगदान को देखते हुए उन्हें कई सम्मानों और पुरस्कार से सम्मानित किया गया। संगीत नाटक अकादमी ने अपने सर्वोच्च पुरस्कार ‘संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप’ से सम्मानित किया, तो साल 1971 में भारत सरकार ने उन्हें अपने दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पद्म विभूषण’ से नवाज़ा। यही नहीं विश्वभारती ने उन्हें ‘देशी कोत्तम’ सम्मान प्रदान किया। 26 सितंबर, 1977 को इस महान नर्तक ने इस फ़ानी दुनिया से अपनी आखि़री विदाई ली।

(ज़ाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल मध्य प्रदेश के शिवपुरी में रहते हैं।)

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