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साम्यवाद ही क्यों? : राहुल सांकृत्यायन

आज दुनिया एक वैश्विक महामारी का सामना कर रही है। पूरी दुनिया के सभी संसाधनों पर क़ब्जा करने के लिए लार टपका रही और अपने लोभ के कारण प्रकृति को नोच-खसोट कर पूरे भूमंडल को युद्ध और जनसंहार के अस्त्र-शस्त्रों तथा परमाणु-बमों के जखीरों से लाद चुकी साम्राज्यवादी शक्तियां इस आपदा के सामने घुटने टेक चुकी हैं। इस समय सभी देशों में स्वास्थ्य पर कम बजट खर्च करने, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को ध्वस्त कर देने और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्र को मुनाफा कमाने के लिए प्राइवेट कॉरपोरेट सेक्टर के रहमो-करम पर छोड़ देने के कारण नागरिक अपनी सरकारों की आलोचना कर रहे हैं।

इनमें वे लोग भी शामिल हैं जो कल तक जोर-जोर से चिल्ला रहे थे कि “बिजनेस करना सरकार का काम नहीं है”। तो भाई, अगर शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सेवाएं बिजनेस हैं और कल तक आप भी चाहते थे कि इनको मुनाफा कमाने के लिए निजी क्षेत्र के लिए छोड़ देना चाहिए तो फिर आज इन चीजों को सार्वजनिक व्यवस्था में लेने की अपेक्षा क्यों? यह इकलौता मामला नहीं है। ऐसे हजारों मामले हैं जिनमें हम रोज-ब-रोज इसी तरह के विरोधाभास में जी रहे होते हैं।

दरअसल हम सभी लोग हमेशा सूचनाओं और बने-बनाए मतों-तर्कों के एक ऐसे जंगल में रहते हैं जिसमें अगर अपने दिमाग़ की बत्ती जलाकर सही और तर्कसंगत चिंतन प्रक्रिया नहीं अपनाते हैं तो उन्हीं मतों-तर्कों की जय-जयकार करते हुए कब खुद अपने और सार्वभौमिक सामाजिक हित के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। कभी-कभी पता भी चलता है तो इतनी देर हो चुकी होती है और हम सार्वजनिक हित का इतना नुकसान कर चुके होते हैं कि इस स्थिति में नहीं रह जाते हैं कि उस नुकसान की भरपाई करने के लिए कुछ कर सकें।

मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से ने खुद अपनी पढ़ाई-लिखाई, स्वास्थ्य, परिवहन आदि सेवाओं के लिए सार्वजनिक संस्थाओं का सहारा लिया है और इनमें से काफी लोगों को अपने रोजगार, वेतन-भत्तों, पेंशन और इन सबकी सुरक्षा करने वाले श्रम-क़ानूनों आदि के लिए दुनिया भर में चले मजदूर आंदोलनों और समाजवादी सरकारों का शुक्रगुजार होना चाहिए। उन्हें देखना चाहिए कि इन आंदोलनों और सरकारों के कमजोर पड़ने का ही नतीजा है कि बाद की पीढ़ी से रोजगार, वेतन, पेंशन की सुरक्षा छीन कर उन्हें ठेका-प्रथा के भरोसे छोड़ दिया गया है।

हमें समझना होगा कि अब तक मिली सुरक्षाएं तो हर मनुष्य की बराबरी, हर तरह के शोषण से मुक्ति, और सबको मानवीय गरिमा सुनिश्चित कराने के एक विराट साम्यवादी स्वप्न का मात्र एक छोटा सा हिस्सा भर थीं पूरे स्वप्न का साकार होना तो दरअसल धरती पर ही स्वर्ग को उतार लेने जैसा होता।

राहुल सांकृत्यायन ने साम्यवाद को संक्षेप में समझाने के लिए 1934 में एक पुस्तिका लिखी, ‘साम्यवाद ही क्यों?’ इस पुस्तिका में उन्होंने साम्यवादी व्यवस्था की कई विशेषताओं को समझाने और इसके बारे में मध्यवर्ग के दिमाग़ों में भरे गए कई भ्रमों को दूर करने की कोशिश किया है। राहुल लिखते हैं, “संसार में बिना कारण के कोई कार्य(बात) नहीं हुआ करता। पूंजीवाद भी तब पैदा हुआ था जब उसे उत्पन्न करने वाले कारण पैदा हो गए थे— अर्थात (1) थोड़ी मेहनत या बिना मेहनत के धनी हो जाने की मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा, (2) मशीनों के आविष्कार द्वारा थोड़ी सी मेहनत से बहुत सी चीजों को तैयार कर सस्ते दाम में बेच उससे फायदा उठाने का सुभीता, (3) मशीनों द्वारा बनी हुई चीजों से बाजार में मुकाबला न कर सकने के कारण स्वतंत्र कारीगरों की प्रतियोगिता का खत्म हो जाना, (4) अधिक जानकारी की जरूरत न होने से अनाड़ी से आदमियों का भी मशीनों द्वारा सुंदर चीजों का बना सकना। इसी तरह साम्यवाद—जिससे यहां हमारा मतलब वैज्ञानिक साम्यवाद से है— तब प्रकट हुआ जब उसको पैदा करने वाले कारण आ मौजूद हुए।(पृ.16)”

पूंजीवाद ने एक ओर बड़े पैमाने पर लोगों से रोजगार छीनकर, स्वतंत्र कारीगरी और खेती को उजाड़कर भूखा और बेबस बनाना शुरू किया वहीं दूसरी ओर कितने ही लोगों को कुछ ही दिनों में करोड़पति बनाना शुरू किया। अतः मजदूरों को यह समझने में दिक्कत नहीं हुई कि यह धन उन्हीं की मेहनत से इकट्ठा हुआ है। वे लिखते हैं, “पूंजीवाद ने जहां मजदूरों के लिए इतनी तकलीफों का सामान इकट्ठा कर दिया वहां उनके लिए एक बड़ा लाभ भी किया और वह था बड़ी-बड़ी तादाद में मजदूरों को कारखानों के पास इकट्ठा कर देना। जहां खेती के मजदूर इधर-उधर बिखरे रहने से अपनी तकलीफों को चुपचाप सह लिया करते थे, वहां कारखानों के मजदूर संगठित हो आंदोलन करने की ताक़त रखते थे। शुरू में चाहे रोग और उसके निदान का ज्ञान उनको बहुत धुंधला सा ही रहा हो, किंतु उन्होंने उसी समय से उससे बचने के लिए अपने हाथ-पैर हिलाने शुरू कर दिए थे।”

लेकिन यह केवल शुभेच्छा का मामला नहीं था, “जो साम्यवाद पूंजीवाद की असल दवा है, वह किसी व्यक्ति-विशेष की उदार शयता का परिणाम नहीं है.. वह है साइंस-विज्ञानों के लाभों को लेते हुए, उसकी तरक्की के रास्ते को खुला रखते हुए पूंजीवाद द्वारा खड़ी की गई विपत्ति को हटाना।…इसीलिए वैज्ञानिक साम्यवादी कहते हैं कि विज्ञान के आविष्कारों को कुछ आदमियों के नफे के लिए इस्तेमाल न कर सारे समाज की भलाई के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। यदि विज्ञान छह आदमियों के काम को एक आदमी के करने लायक कर देता है तो, पांच आदमियों को काम से छुड़ा कर उन्हें भूखा नहीं मारना चाहिए, बल्कि काम के घंटों को उन छह आदमियों में बराबर बांट देना चाहिए।”

वे आगे लिखते हैं, “पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों के ध्येय एक दूसरे से बिल्कुल उलटे हैं… जहां पूंजीवाद कुछ आदमियों के नफे के लिए सारे मनुष्य समाज के जीवन को नरक बनाने के लिए तैयार है, वहां साम्यवाद का ध्येय है कुछ मनुष्यों के स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि सारे मनुष्य समाज के लिए सुख-सामग्री की वृद्धि करना। जब तक चीजों को नफे के लिए तैयार किया जाता रहेगा, तब तक बेकारी के हटाने का नुस्खा—घंटों को बांट कर सभी लोगों को काम देना— बरता नहीं जा सकता। वस्तुतः जैसे बाइसिकिल तभी तक खड़ी रह सकती है जब तक कि वह चलती रहे, इसी तरह पूंजीवाद तभी तक चलता रह सकता है जब तक कि पूंजीपति को, व्यक्ति को, नफा होता रहे। नफा उसके लिए जीवन-मरण का प्रश्न है”(पृ.17-18)।

पूंजीवादी लोभ ने मनुष्य-जाति पर बेरोजगारी के साथ-साथ महायुद्धों की भयंकर आपदा थोप दिया। ये युद्ध कच्चे माल के स्रोतों और बाजारों पर कब्जे के लिए थे। इन युद्धों के लिए सीमित प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन करके उनसे एक से बढ़कर एक विनाशकारी हथियार बनाए जाने लगे। साथ ही इन हथियारों के लिए ग्राहक तैयार करने के लिए तमाम तरीक़ों से कोशिशें की जाने लगीं राष्ट्र आपस में भी लड़ते रहें और उनके भीतर भी लड़ाइयां चलती रहें और लड़ने वाले सभी गुट उन्हीं देशों और पूंजीपतियों से हथियार खरीदते रहें।

प्रतिभाओं की झूठी दुहाई देने वाला पूंजीवाद प्रतिभाओं के साथ कैसा अन्याय करता है, उसकी ओर इशारा करते हुए वे लिखते हैं, “पूंजीवाद का भयंकर परिणाम बहुत से व्यक्तियों को घोर दरिद्रता में रखना भी है। हम ऐसे कितने ही लड़कों को देखते हैं जिनमें उत्तम प्रतिभा है। यदि उनको अवसर मिलता, तो ये अच्छे गणितज्ञ, वैज्ञानिक, कलाकार हो सकते, मगर उनके माता-पिता के पास इतना धन नहीं कि वह अपने लड़के को उसकी रुचि और योग्यता के अनुसार आवश्यक शिक्षा दिला सकें। दूसरी ओर प्रतिभाहीन धनी संतानों को पढ़ाने-लिखाने में हजारों-लाखों रुपये बरबाद किए जाते हैं। पूंजीवाद की ही बदौलत वकालत जैसे व्यवसाय भी चल रहे हैं जिनके न रहने से मनुष्य-समाज की सुख-सामग्री में कुछ भी कमी नहीं हो सकती थी और जो प्रतिभा को दफनाने में कब्रिस्तान का काम देते हैं”(पृ.20)।

पूंजीवाद का निजी मालिकाना और मुनाफा किस तरह से सार्वजनिक विकास कार्यों को प्रभावित करता है इसे वे एक उदाहरण से समझाते हैं। “जनवरी 1934 में बिहार में भीषण भूकंप आया। शहर और देहात के लाखों घर, आने-जाने वाली सड़कें और पुल नष्ट हो गए। उनका फिर से बनना अब एक पीढ़ी का काम समझा जा रहा है। यह क्यों? क्या बिहार में पत्थर, ईंट, कंकड़, लकड़ी और लोहे का अभाव है? क्या काम करने वालों की कमी है? नहीं, अकेले उस इलाक़े में ही एक करोड़ आदमी बसते हैं जिनमें से आधे कोई न कोई काम जरूर कर सकते हैं। मुंगेर के आस-पास पत्थरों के पहाड़ हैं।

तराई का साखुओं का जंगल भी बहुत दूर नहीं है। इसी प्रकार झरिया की खानें, जिनका बहुत सा निकाला हुआ कोयला बेकार पड़ा रहता है, और टाटा का लोहे का कारखाना भी बहुत दूर नहीं है। तब क्या बात है जो उजड़े बिहार को बसने के लिए एक पीढ़ी तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी? क्योंकि उक्त चीजें राष्ट्र की न समझी जाकर कुछ व्यक्तियों की समझी जाती हैं और वह व्यक्ति या पूंजीपति नफे के बिना उन चीजों के इस्तेमाल करने की आज्ञा नहीं दे सकते। …फलतः इस व्यक्तिगत संपत्ति, इस पूंजीवाद और उसके नफे के सौदे के कारण बिहार को बसने के लिए अभी वर्षों तक प्रतीक्षा करनी होगी।”

राहुल सांकृत्यायन के समय में भी साम्यवाद के बारे में जो आशंकाएं जाहिर की जाती थीं, उनमें से कुछ आज भी दुहराई जाती हैं। उन्होंने उनका जवाब भी दिया था। वे लिखते हैं, “साम्यवाद क्या चाहता है?—(1) शोषक और शोषित के भेद को मिटा कर उपज के साधन (मशीन, भूमि,कच्चा माल) तथा उत्पादित वस्तुओं का स्वामी व्यक्ति को नहीं, समाज को बनाना, (2) सभी व्यक्तियों से योग्यतानुसार काम करवाना, (3) जीवन के लिए जरूरी चीजों, यंत्रों के उपयोग से मिलने वाले अवकाश और मानसिक विकास के अवसर को अपेक्षानुसार सभी को समान रूप से बांटना।”

लेकिन उसके ऊपर व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन का आरोप लगाने वालों से वे कहते हैं कि, “साम्यवाद पूंजीवाद की अपेक्षा कहीं अधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता देता है…पूंजीवाद जिस व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ढोल पीटता है, उसका रूप क्या है और वह समाज में कितनों को नसीब है? …सारी स्वतंत्रताओं की जननी है आर्थिक स्वतंत्रता, वह कितनों को प्राप्त है? सिर्फ उन्हीं को न जिनके पास धन है, अर्थात जो पूंजीपति हैं?

वह हजारों मजदूरों को खरीद सकता है, हां दास की तरह नहीं, बल्कि उससे भी बुरी तरह से।…क्या आप बता सकते हैं, संसार में कौन से साधन या व्यक्ति पूंजीपतियों के खरीदे नहीं हैं? क्या समाचार-पत्र जनता के सामने स्वतंत्र विचार रखते हैं?…क्या लेखकों और कवियों को पूंजीपतियों ने नहीं खरीद रखा है? दुनिया में ऐसों की संख्या बहुत कम है जिन्होंने अपनी कलम और प्रतिभा को न बेच खाया हो।…और राजनीतिज्ञ? राजनीति तो और भी पूंजीपतियों की दासी है। संसार के राजनीतिज्ञों की ओर नजर दौड़ाइए, आपको यह स्पष्ट मालूम हो जाएगा। सभी देशों के मंत्रिमंडलों में कारखाने वालों, बैंकों, प्रेस के मालिकों की ही तो भरमार है।

राजनीति तो शक्ति का स्रोत है, इसलिए उसे पूरी तरह हथियाना पूंजीपति लोग अत्यंत आवश्यक कर्तव्य समझते हैं। पूंजीवादी देशों की पार्लियामेंटों के चुनाव तो सिर्फ रुपयों के ही भरोसे लड़े जाते हैं।… क्या पंडित, मौलवी, पादरी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मालिक हैं? उनका तो अस्तित्व ही पूंजीपतियों की कृपा पर है। उनके बड़े-बड़े मंदिर, मकान, लंबी धोतियां और चोंगे सभी पूंजीपतियों की देन हैं।… आप तेज मशाल लेकर संसार के कोने-कोने में ढूढ़ आइए। आपको व्यक्तिगत स्वतंत्रता का किसी पूंजीवादी देश में पता न मिलेगा…समझना चाहिए कि जब दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति, धन, सिर्फ चंद आदमियों के हाथ की चीज है और वह उससे छोटे-बड़े सभी तरह के आदमियों को खरीद सकते हैं तो खरीदा आदमी कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता है।”

कुछ लोग सोचते हैं कि एक ही लाठी से सभी प्रकार की प्रतिभाओं को हांकने से प्रतिभाओं की हत्या हो जाएगी। इस पर वे लिखते हैं कि, “साम्यवाद सभी प्रकार की योग्यताओं को विकसित और सफल करने का पूरा अवसर देता है। आपका बतलाया दोष तो पूंजीवाद में ही है, जिसके यहां दरिद्र पिता के प्रतिभाशाली बालक को ऊसर के बीज की तरह अंकुरित भी होने नहीं दिया जाता।”

आज भी कई लोगों की राय है कि शारीरिक-मानसिक आदि श्रमों में अंतर तो करना ही चाहिए। इसके जवाब में राहुल कहते हैं, “साम्यवाद सभी प्रकार के श्रमों को समाज के लिए एक-सा आवश्यक समझता है। योग्यता, प्रतिभा और समाज के लिए की गई बड़ी सेवाओं का मूल्य धन द्वारा नहीं करना चाहता। प्रतिभाएं स्वयं इसे चिरकाल से तुच्छ समझती आई हैं। हां, वह अधिक श्रद्धा-सम्मान द्वारा उन्हें पुरस्कृत करने का विरोधी नहीं है। ऐसी प्रतिभाएं तो अपने कार्य की सफलता और सुखमय परिणाम से ही अपने को कृतकृत्य समझती हैं।”

चेतना, स्वतंत्र विचार और कला-साहित्य के रिश्ते पर राहुल का उत्तर है कि, “साम्यवाद मनुष्यों को अचेतन वस्तुओं की भांति तंग दायरे में बंद नहीं रखना चाहता, बल्कि पूंजीवाद के जेलखाने में जन्म से मरण तक बंद रखे जाने वाले असंख्य मनुष्यों को उनकी आर्थिक बेड़ी काट कर मुक्त करना चाहता है। कोल्हू के बैल की भांति जीवन भर पेट के पीछे घूमने वालों को भी ‘कोमल कला, सुंदर साहित्य, विज्ञान के निर्माण के लिए’ वह हजार गुना अधिक अवसर देता है।”

कुछ लोगों का मानना है कि अलग-अलग मनुष्यों में अगुवा बनने या अनुगामी बनने की नैसर्गिक प्रवृत्ति होती है जबकि साम्यवाद इस प्रवृत्ति को महत्व नहीं देता। इस पर राहुल लिखते हैं, “यदि अगुवापन और अनुगामीपन मनुष्य में मां के दूध से आता है, तो साम्यवादी उसके पीछे लाठी लेकर कहां फिरते हैं? वे तो सिर्फ यही चाहते हैं कि वह अगुवापन व्यक्ति की योग्यता और प्रतिभा के बल पर स्थापित हो। रुपये की रिश्वत देकर अगुवापन कायम करने के ही तो वह विरुद्ध है।”

अक्सर लोग कहा करते हैं कि पूंजीपति भी तो संगठन, निगरानी आदि द्वारा उत्पादन में मदद करते हैं! इस पर राहुल तर्क देते हैं कि, “बड़े-बड़े कारखानों के हजारों भगीदार(शेयर होल्डर) जो कारखाने के बारे में सिर्फ इतना ही जानते हैं कि उन्हें इस वर्ष 15 प्रति सैकड़ा मुनाफा मिला है, क्या श्रमिक कहे जाएंगे? अपनी जमींदारी-तालुकेदारी से जिनको गुलछर्रे उड़ाने के लिए रुपये मिल जाने भर का संबंध है, क्या वे श्रमिक हैं? पराई कमाई, पराये परिश्रम को हड़पने वाले व्यक्ति शोषक नहीं तो क्या हैं?  जो पूंजीपति अपने कारोबार की सीधी देखभाल करते हैं, उन्हें भी अपने मजदूरों की अपेक्षा हजार गुना अधिक पारिश्रमिक लेने का क्या हक है?”

बहुत सारे लोग तर्क देते हैं कि आखिर भूतकाल में राजा-महाराजाओं और पूंजीपतियों ने संस्कृति और कला के संरक्षण और विज्ञान के प्रसार में योगदान किया है तो उनका अस्तित्व क्यों मिटाया जाना जरूरी है? इस पर राहुल समझाते हैं कि केवल यही वजह “धनियों को हमेशा के लिए पट्टा नहीं दिला देती कि वे हमेशा लोगों को लूटा करें। यदि उन्होंने समाज की कोई वैसी भलाई —जो स्वार्थ शून्य तो कभी नहीं रही— की, तो उसका कई गुना अधिक फायदा वे उठा चुके। अब इस वर्ग के न रहने पर कला और विज्ञान की प्रगति में कोई हानि नहीं होगी, क्योंकि उसके लिए साम्यवाद राष्ट्र के अपार साधन, अपरिमित अवकाश और असंख्य प्रतिभाओं को लगा देने के लिए तैयार है।”

राहुल बताते हैं कि स्वैरिता, यानि स्वेच्छाचार ही स्वतंत्रता नहीं होता। “साम्यवाद स्वतंत्रता और स्वैरिता में भेद करता है। समाज के सभी व्यक्तियों की स्वतंत्रता का ख्याल जिसमें रखा जाए, वही स्वतंत्रता है। इस प्रकार स्वतंत्रता की भी सीमा और मर्यादा है।… सब व्यक्तियों की सम्मिलित भलाई-बुराई ही समाज के नाम से कही जाती है। देश के सैकड़ों प्रकार के क़ानूनों को तो आप स्वतंत्रता का बाधक नहीं समझते होंगे? साम्यवाद में तो उन क़ानूनों में से तीन चौथाई की आवश्यकता ही न होगी, क्योंकि उनमें अधिकांश तो व्यक्तिगत संपत्ति, उसके टैक्स और रक्षा के संबंध में बने हैं। जो सिद्धांत तीन-चौथाई क़ानूनों को अनावश्यक कर दे, वह अधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता देता है, या वह जो कि चौगुने की आवश्यकता को अनिवार्य समझता है?”

“पूंजीपतियों और सत्ताधारियों की जिस स्वतंत्रता का आपको ख्याल है, वह स्वतंत्रता नहीं स्वैरिता है। उसकी नींव असंख्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता के सत्यानाश पर रखी गई है। जैसा संबंध सारी घड़ी के साथ उसके पुर्जे का है, वैसा ही संबंध व्यक्ति का समाज के साथ है। व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता चाहिए, किंतु वह स्वतंत्रता दूसरे व्यक्तियों की स्वतंत्रता में बाधा पहुंचाने वाली न होनी चाहिए।”

“सब तरह देखने से मालूम होगा कि जिनकी स्वतंत्रता बहुसंख्यक मनुष्यों की स्वतंत्रता की बाधक है, उन्हें छोड़ कर बाकी सभी लोगों के लिए साम्यवाद बहुत अधिक स्वतंत्रता देता है।”

आज सर्वहारा का यह महान शिक्षक हमारे बीच नहीं है, लेकिन जीवन भर ज्ञान की खोज और उसकी समृद्धि में लगे रहे इस महामानव ने वह मशाल हमारे हाथों में सौंप दी है। उन्होंने उपलब्ध प्राचीनतम ग्रंथों और पांडुलिपियों को न केवल खोजा और पढ़ा, बल्कि उनका पुनरुद्धार भी किया। वे जीवन भर धैर्य के साथ और तर्कसंगत तरीक़े से लोगों को समझाते रहे और उनकी आशंकाओं का समाधान करते रहे। आधुनिक मनुष्य बनाने के इस क्रम में उन्होंने ‘दिमाग़ी ग़ुलामी’, ‘तुम्हारी क्षय’, ‘बाईसवीं सदी’, ‘भागो नहीं, दुनिया को बदलो’, ‘वोल्गा से गंगा तक’ जैसी अनेक छोटी-छोटी पुस्तिकाएं लिखीं।

‘भागो नहीं, दुनिया को बदलो’ के लिए तो उन्होंने गांव के जन-सामान्य को समझाने वाली आम बातचीत की भाषा और शैली का सहारा लिया। ज्ञान के प्राचीनतम स्रोतों से लेकर आधुनिकतम उपलब्धियों तक के सिलसिले को जोड़ने वाली जाज्वल्यमान जिज्ञासा वाली इस अप्रतिम विभूति की विरासत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की यह मशाल हमें बार-बार झिंझोड़ती रहती है कि धरती पर ही स्वर्ग को उतार लाने की जिम्मेदारी वाला वह कारवां कहीं ठहर तो नहीं गया?!

(इसके लेखक शैलेश हैं।)

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This post was last modified on April 13, 2020 3:40 pm

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