कम्युनिस्ट आचरण पर कुछ बातें: संदर्भ कन्हैया

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अशोक कुमार पांडेय

एक बात तो तय है कि मूर्खताएं संघियों या दक्षिणपंथियों का एकाधिकार नहीं। ख़ुद को कम्युनिस्ट कहने वालों में इनकी बड़ी संख्या है तो फ़िलहाल 32 मेम्बर 36 पार्टी वाले अति (मूर्ख) क्रान्तिकारियों और फेसबुक के हुल्लड़बाज चे टीशर्ट छाप लोगों के बारे में कुछ कहना समय की बर्बादी है। सीधे मुद्दे पर आता हूं।

1- क्या एक कम्युनिस्ट धार्मिक हो सकता है?

ज़वाब है नहीं। एक कम्युनिस्ट द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को अंगीकार करता है और यह सभी तरह की पारलौकिक ताक़तों का निषेध करता है। वह निश्चित तौर पर नास्तिक होता है।

लेकिन

क्या वामपंथी के लिए धर्म के विरोध का तरीका एक ही है? क्या सार्वजनिक जीवन में उसे कोलतार लेकर चलना चाहिए और वह फेंकते रहना चाहिए मंदिरों मस्जिदों चर्चों वगैरह पर? यह उतना ही मूर्खतापूर्ण है जितना धर्मांधों द्वारा नास्तिकों की हत्या और उन पर लगातार हमले। एक ऐसे समाज मे जहां धार्मिक लोग बहुसंख्यक हैं उसे सबसे पहले धार्मिक और धर्मांध में अंतर करना सीखना चाहिए। धार्मिक फ़ासीवाद के वह हमेशा ख़िलाफ़ होगा लेकिन धार्मिक जनता से संवाद करेगा। जैसे उसकी सभा में आने से पहले यह शर्त नहीं रखी जाती कि आने वाले सब नास्तिक होंगे वैसे ही वह यह तय नहीं करता कि वह सिर्फ़ नास्तिक जुटान में शामिल होगा।

त्यौहार जनता का उत्सव हैं। धर्म ने इन पर क़ब्ज़ा ज़रूर किया है लेकिन यह भी सच है कि लोग इस अवसर पर खुशियां मनाने निकलते हैं। मेला मेल से बना है। तो अगर एक वामपंथी वहां उनके साथ शामिल होता है तो यह संवाद का अवसर है। मूर्ख उस दिन घर मे क़ैद होने को आज़ाद हैं ही।

बात कन्हैया से शुरू हुई थी तो दशहरा पंडाल में जाना और तिलक लगवा लेना मुझे इसी संवाद का हिस्सा लगता है। टैक्टिस कहते हैं इसे। मैं नहीं लगवाता टीका क्योंकि मुझे चुनाव नहीं लड़ना। मेरी ऑडिएंस सीमित है। एक लेखक के तौर पर मेरी भूमिका अलग है। कन्हैया की भूमिका अलग है बेगूसराय जैसी जगह से उसे चुनाव लड़ना है।

सच कहूं तो लखनऊ में खानदानी कम्युनिस्ट पार्टी की एक “होलटाइमर” क्रांतिकारी को दस लाख की शोफर ड्रिवेन कार में दो करोड़ के मकान में जाते देखना मुझे बहुत अधिक अश्लील लगा था, ख़ैर उनका ऑडिएंस इतना भयावह भक्त है कि उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

यह सीरीज़ जारी रहेगी लेकिन अंत से पहले एक बात और। माओ चीन जैसे पिछड़े समाज मे क्रांति के नेता थे। वह बार-बार कहते हैं – जनता से सीखो। सिखाते हैं कि गांव में जाओ तो ऐसे कि फ़सलें ख़राब न हों। घरों में रुकने के तरीके और सावधानियां बताते हैं। इसलिए कि जिस जनता की लड़ाई उन्हें लड़नी थी वह कम्युनिस्ट नहीं थी। उसकी पारंपरिक समझ थी। आपको उन्हें सिखाना ही नहीं था सीखना भी था। असल मे सिखाने के तरीके भी सीखने थे।

तो जब मैं अकड़ में चूर ऐसे कथित युवा वामपंथियों को देखता हूं जो लिख तो एक वाक्य सही नहीं सकते लेकिन अदा यह कि सबको सिखा सकते हैं तो मुझे हंसी नहीं आती तरस आता है। विनम्रता की जगह बद्तमीज़ी जिन्हें मैचो लगती है वे दुनिया क्या बदलेंगे लाइक्स जुटा लें वही बहुत है। सच कहूं तो वे उस विचारधारा के सबसे बड़े शत्रु हैं जिसकी वकालत करने का भरम पालते हैं।

जारी…

(अशोक कुमार पांडेय कवि और साहित्यकार हैं। कुछ महीनों पहले प्रकाशित उनकी किताब “कश्मीरनामा: इतिहास और समकाल” बेहद चर्चित रही थी।)

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