तेलंगाना विधानसभा चुनाव के चतुष्कोणीय मुकाबले में क्या केसीआर फिर मार पाएंगे बाजी?

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चंद्र प्रकाश झा

तेलंगाना में चुनावी घमासान जारी है। यह स्वतंत्र भारत का नवीनतम 29 वां राज्य है। वहां की दूसरी विधान सभा के लिए चुनाव प्रक्रिया के तहत  वोटिंग सात दिसम्बर को होगी।  परिणाम 11 दिसंबर को निकलेंगे। दक्षिण भारत के इस राज्य में ये चुनाव  पूर्वोत्तर भारत के मिजोरम राज्य  और उत्तर भारत के तीन राज्यों  – राजस्थान , मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के साथ ही नवम्बर–दिसम्बर 2018 में कराये जा रहे हैं। इन्हीं के संग दक्षिण भारत के ही कर्नाटक में मौजूदा 16 वीं लोकसभा की तीन रिक्त सीटों मांड्या , शिमोगा और बेलारी तथा  एक विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव कराये जा रहे हैं।

इन राज्यों में मतदान की तारीख अलग-अलग है। लेकिन मतगणना एक साथ  मंगलवार 11 दिसम्बर को होनी है। उसी दिन परिणामों की घोषणा होने की संभावना है। मतदान , इलेकट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से होगा।  मतगणना भी ईवीएम से ही होगी। सिर्फ तेलंगाना के विधान सभा चुनाव निर्धारित समय से करीब सात माह पहले कराये जा रहे हैं।  तेलंगाना की 2014 में चुनी गई प्रथम विधानसभा का कार्यकाल जुलाई 2019 में समाप्त होना था। 

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नए चुनाव , 17 वीं लोकसभा के मई 2019 से पहले निर्धारित चुनाव के साथ कराने की संभावना थी। लेकिन पहली विधान सभा, राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री एवं सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस ) के अध्यक्ष  के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) के मंत्रिमंडल की सिफारिश पर पिछले 6 सितम्बर  को भंग कर दी गई और  नया चुनाव कराने का निर्णय किया गया। इस निर्णय के पीछे कुछ राजनीतिक निहितार्थ थे। उसी का नतीजा है कि वहां चुनावी लड़ाई बहुत तीखी हो गयी है। केसीआर  को तेलंगाना के चुनाव, लोकसभा चुनाव के साथ कराने में जोखिम नज़र आया होगा। क्योंकि अगली लोकसभा के चुनाव के साथ ही जिन  करीब दस राज्यों के भी चुनाव कराये जा सकते हैं उनमें आंध्र प्रदेश भी शामिल है। तेलंगाना राज्य का गठन, आंध्र प्रदेश को ही विभाजित कर किया गया है।

चुनावी मोर्चा

तेलंगाना विधानसभा चुनाव के लिए अधिसूचना 12 नवम्बर को जारी की जाएगी। उसी दिन से नामांकन-पत्र दाखिल करने का सिलसिला शुरू हो जाएगा।  नामांकन-पत्र दाखिल करने की आखरी तारीख 19 नवम्बर है। तेलंगाना के पिछले विधानसभा चुनाव में टीआरएस ने भारतीय जनता पार्टी  (भाजपा) के साथ गठबंधन किया था। आंध्र प्रदेश के पिछले चुनाव  में भाजपा ने तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) से गठबंधन किया था। तेलंगाना में इस बार टीआरएस और भाजपा का औपचारिक गठबंधन नहीं है।

दोनों यह चुनावी लड़ाई अपने ही बूते पर लड़ने के लिए बाध्य हैं। उन्हें अन्य कोई साथी दल नहीं मिल सका। हालांकि, इस बार भी टीआरएस और भाजपा का  गठबंधन होने की खूब अटकलें लगाई जा रही थीं। अब दोनों ने ही सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने की घोषणा कर दी है। टीआरएस प्रत्याशियों के नामों की घोषणा सितम्बर 2018 से ही शुरू कर दी गई थी। उसके 107  उम्मीदवारों के नाम घोषित किये जा चुके हैं।

भाजपा ने अपने 38 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है।  उसके अन्य उम्मीदवारों के नाम दिवाली तक घोषित कर दिए जाने की संभावना है।  पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य में चुनाव प्रचार का श्रीगणेश हैदराबाद में पिछले रविवार भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय सम्मलेन को सम्बोधित करने के अलावा महबूबनगर और करीमनगर में आयोजित जनसभाओं से कर दिया था । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार के लिए तेलंगाना आने का कार्यक्रम अभी नहीं बना है।  भाजपा का चुनाव घोषणापत्र तैयार किया जा रहा है।

चुनाव का स्वरुप देख टीडीपी  ने अभूतपूर्व राजनीतिक पलटी मार कर करीब चार दशक के अपने इतिहास में पहली बार कांग्रेस से हाथ मिला लिया। इन दोनों ने ‘ महा-कुटुमी ‘  मोर्चा बनाया है। इसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और तेलंगाना जन समिति (टीजेएस) भी शामिल है।  कांग्रेस ने खुद के प्रत्याशी खड़े करने के लिए 95 सीटें रख कर 14 सीटें टीडीपी के लिए और शेष सीटें इस मोर्चा के अन्य दलों के वास्ते छोड़ दी हैं। उम्मीदवारों की सूची कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की हरी झंडी मिलने पर अगले सप्ताह तक जारी कर दिए जाने की संभावना है। इसी सिलसिले में तेलांगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष उत्तम कुमार रेड्डी  दिल्ली आए हुए हैं।

तेलंगाना में नई मोर्चाबंदी यहीं ख़त्म नहीं हुई।  मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी  (सीपीएम) ने कांग्रेस और  टीडीपी से ही नहीं  भाकपा तक से अलग चुनावी लड़ाई छेड़ दी है।  माकपा ने 28 छोटी पार्टियों के साथ मिलकर ‘बहुजन लेफ्ट फ्रंट’ (बीएलएफ) नाम का एक और नया चुनावी मोर्चा बनाया है। गौरतलब है कि माकपा ने राजस्थान में भी भाजपा और कांग्रेस, दोनों के ही खिलाफ अन्य कम्युनिस्ट और मध्यमार्गी पार्टियों एवं किसान संगठनों के साथ मिल कर नई मोर्चाबंदी कर ‘राजस्थान लोकतांत्रिक मोर्चा’ का गठन किया है।

किसी ज़माने में तेलंगाना में कम्युनिस्ट पार्टी बड़ी ताकत होती थी। कम्युनिस्टों ने  किसानों को संगठित कर हैदराबाद के तत्कालीन निज़ाम और सामंती सत्ता के खिलाफ 1946 से 1951 तक तेलंगाना के क्षेत्रों में सशत्र संघर्ष भी किया था।  इसका  विशद विवरण स्वीडन के नोबेल पुरस्कार विजेता गुणार मृदाल और अल्वा मृदाल के पुत्र जान मृदाल की पुस्तक ‘इंडिया वेट्स’ में दर्ज है। इस पुस्तक में जान मृदाल की कलाकर्मी पत्नी गन केसल की क्लिक की गई अनेक दुर्लभ तस्वीरें भी हैं।

दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी इस चुनावी मैदान में कूद पड़ी है।  दक्षिणी राज्यों के पार्टी प्रभारी एवं दिल्ली के विधायक सोमनाथ भारती के अनुसार सभी सीटों पर आप के उम्मीदवार खड़े किये जाएंगे।  पार्टी ने चुनावी  वादा किया है कि उसकी सरकार बनने पर किसानों के तीन लाख रूपये तक के क़र्ज़ माफ कर दिए जाएंगे।  असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाले मुस्लिम संगठन, एआईएमआईएम ने भी 8 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं।  इसके कुछेक और उम्मीदवार घोषित किये जा सकते हैं। लेकिन  आंध्र विधान सभा में मुख्य विपक्षी दल, ‘युवजन श्रमिक रायथू (वायएसआर) कांग्रेस के नेता वाय एस जगनमोहन रेड्डी ने अपनी पार्टी को तेलंगाना के चुनाव से अलग रखा है। आंध्र में  फिल्म अभिनेता से राजनीतिज्ञ बने पवन कल्याण की ‘जन सेना पार्टी’  भी तेलंगाना का चुनाव नहीं लड़ रही है।

टीआरएस

कांग्रेस कहती रही है कि टीआरएस ने भाजपा के साथ ‘ गुप्त’ चुनावी समझौता कर लिया है। टीसीआर इसका खंडन कर कहते हैं कि वह आगामी आम चुनाव के लिए भाजपा और  कांग्रेस, दोनों के ही खिलाफ क्षेत्रीय दलों का  ‘ फेडरल फ्रंट’ बनाने के अपने इरादे को लेकर अटल हैं। उनका कहना है कि वह कोई हड़बड़ी में नहीं हैं। फेडरल फ्रंट बनने में समय लग सकता है। लेकिन उसकी वास्तविक जरूरत है। उन्होंने टीआरएस कार्यकारणी की बैठक के बाद पत्रकारों से कहा कि उनकी पार्टी तेलंगाना में  लोकसभा चुनाव  भी अपने बूते पर लड़ेगी। केसीआर ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से पहले ही पिछले 15 अगस्त को चुनावी बिगुल बजा दिया था ।

उन्होंने स्वतन्त्रता दिवस पर हैदराबाद में मुख्य राजकीय समारोह में  अपने भाषण में राज्य के लोगों से अपील की थी कि वे  उन्हें ‘ स्वर्णिम तेलंगाना ‘ बनाने  के उनके प्रयास का समर्थन करें। उन्होंने उक्त भाषण में  मोदी जी की तारीफ करने में कोई कोर-कसर  नहीं छोड़ी थी।  टीआरएस, एनडीए में अभी शामिल नहीं है। स्पष्ट है कि केसीआर, चुनावी कदम फूंक-फूंक कर उठा रहे हैं। उन्हें बखूबी पता है कि तेलांगाना में अल्पसंख्यक मतदाता किसी भी पार्टी की संभावित जीत को हार और निश्चित हार को जीत में तब्दील कर सकते हैं।  खुद टीआरएस ने कहा है  उनकी पार्टी ‘सेकुलर’ बनी रहेगी और उसके भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन करने की कोई संभावना नहीं है। केसीआर कहते रहे हैं कि उनकी पार्टी का एनडीए के प्रति समर्थन, मुद्दों पर आधारित है।

केसीआर

केसीआर का पूरा नाम कल्वाकुन्तला चंद्रशेखर राव है। वह 2 जून 2014 राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बने।   उन्होंने टीआरएस का गठन 27 अप्रैल  2001  को  किया था। टीआरएस ने 2004 का लोक सभा चुनाव कांग्रेस से गठबंधन कर लड़ा था। यह पार्टी  केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन, यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) में शामिल थी।  केसीआर खुद मनमोहन सिंह सरकार में काबिना मंत्री रहे थे।  बाद में टीआरएस यूपीए से अलग हो गई और  केसीआर ने अपना राजनीतिक करियर ही दिवंगत  संजय गांधी के संसर्ग में युवक कांग्रेस से शुरू किया था।

वह आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी के संस्थापक एनटी रामाराव की सरकार में और एन चंद्राबाबू नायडू की भी पहले की सरकार में मंत्री रहे हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस ( एनडीए) की सरकार का नेतृत्व कर रही भाजपा और ख़ास कर प्रधानमंत्री  मोदी के साथ उनके  सम्बन्ध कुछ  मित्रवत रहे हैं। टीआरएस, एनडीए में शामिल नहीं है पर उसने कई मौकों पर मोदी सरकार का साथ दिया है।

टीआरएस  ने राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में  एनडीए में शामिल,  बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के जनता दल – यूनाइटेड के प्रत्याशी एवं  प्रभात खबर हिंदी दैनिक के पूर्व सम्पादक , हरिवंश सिंह का समर्थन किया था। टीआरएस  ने मोदी सरकार के विरुद्ध लोकसभा के मानसून सत्र में कई दलों द्वारा पेश अविश्वास प्रस्ताव पर मत- विभाजन में भाग नहीं लेकर मोदी सरकार का अप्रत्यक्ष साथ दिया था। टीआरएस ने  राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव में भी भाजपा के प्रत्याशियों क्रमशः  रामनाथ कोविंद और एम वेंकैया नायडू का समर्थन किया था। माना जाता है कि केसीआर ‘ घाट-घाट की राजनीति का पानी पिये हुए हैं ‘। उनके पुत्र केटी रामाराव राजन्ना जिला की सिरसिला सीट से विधायक हैं और पुत्री  के कविथा निज़ामाबाद से  लोकसभा सदस्य हैं।  उनके भतीजे हरीश राव भी राज्य में मंत्री हैं। केसीआर खुद सिद्दीपेट जिला के अपने परम्परागत गजवेल विधान सभा सीट से चुनाव लड़ेंगे।

राहुल गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राज्य में चुनाव प्रचार का पहला दौर पूरा कर चुके हैं। उन्होंने  हाल में तेलंगाना में चुनावी जनसभा में मुख्यमंत्री केसीआर पर आरोपों की झड़ी लगा दी। उनका कहना था कि राज्य पर दो लाख करोड़ रूपये का क़र्ज़ है।  उन्होंने दावा किया कि राज्य में टीआरएस शासन में 4500 किसानों को आत्महत्या करने पर विवश होना पड़ा।

उन्होंने ऐलानिया कहा  कि कांग्रेस के राज्य की सत्ता में आने पर किसानों के दो लाख रूपये तक के कर्ज माफ कर दिए जाएंगे, साल भर में एक लाख सरकारी नौकरियों की रिक्ति भरी जाएगी और आदिवासियों के  हितों की रक्षा की जाएगी। कांग्रेस अध्यक्ष ने टीआरएस सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि इसने राज्य पर दो लाख करोड़ रूपये का कर्ज लाद दिया है, प्रत्येक तेलंगानावासी  पर  60 हज़ार रूपये का कर्ज है, मुख्यमंत्री राव  ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है और अपने परिवार का प्रभुत्व जमाया है।

सर्वे

सेंटर फॉर डेवलपिंग स्टडीज (सीएसडीएस)- लोकनीति के मई 2018  के सर्वेक्षण के अनुसार मोदी सरकार के प्रति असंतोष पूरे देश में बढ़ा है। दक्षिण भारत में असंतोष सबसे ज्यादा  है। तेलंगाना के 63 प्रतिशत लोग मोदी सरकार से असंतुष्ट बताये जाते हैं। तेलंगाना में भाजपा का कुल वोटों में हिस्सा 18 फीसदी ही रहने की संभावना है।

पृथक तेलंगाना

तेलुगु, उर्दू भाषी पृथक तेलंगाना राज्य का  गठन कुछ हड़बड़ी में 2013 में केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) की मनमोहन सिंह सरकार के द्वितीय शासन-काल में किया गया था। कांग्रेस और भाजपा को छोड़, आंध्र प्रदेश के लगभग सभी दल इसके विरोध में थे। आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनकिरण कुमार रेड्डी ने मनमोहन सिंह सरकार के तैयार आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम  के विरोध में फरवरी 2014 में मुख्यमंत्री पद और कांग्रेस से भी इस्तीफा देकर अलग पार्टी बना ली थी। वह हाल में कांग्रेस में लौट आये हैं। किरण रेड्डी  सरकार के इस्तीफा दे देने के बाद आंध्र प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था।

राष्ट्रपति शासन के दौरान ही आंध्र प्रदेश का विभाजन किया गया। उसके तीन क्षेत्रों तेलंगाना, तटीय आंध्र और रायलसीमा में से तेलंगाना को भारत संघ-राज्य का 29 वां राज्य बना दिया गया। तेलंगाना में आंध्र प्रदेश के 10 उत्तर पश्चिमी जिलों को शामिल किया गया। प्रदेश की राजधानी हैदराबाद को दस साल के लिए तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की संयुक्त राजधानी बनाया गया। तेलंगाना विधान सभा की कुल 19 सीटें हैं।  भंग विधानसभा में  टीआरएस के  90, कांग्रेस के 13, भाजपा के 5 ,  टीडीपी के 3  और माकपा के एक सदस्य थे। पिछले चुनाव में टीआरएस ने 63 सीटें ही  जीती थी। उसमें अन्य विधायक टीडीपी समेत दूसरे दलों से दल बदल कर आये थे।  टीडीपी ने पिछले चुनाव में 15 सीटें जीती थी जिनमें से अधिकतर बाद में टीआरएस में चले गए।

(चंद्र प्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं आजकल आप दिल्ली में रहते हैं।)

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