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Categories: बीच बहस

दोभाल के गठबंधन विरोधी बयान में तानाशाही के गहरे संकेत

राजू पांडेय

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजीत डोभाल ने ऑल इंडिया रेडियो द्वारा आयोजित सरदार पटेल मेमोरियल लेक्चर देते हुए -सपनों का भारत 2030- विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारत को अपने राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अगले 10 वर्षों तक एक सशक्त, स्थिर और निर्णय लेने में सक्षम सरकार की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि कमजोर गठबंधन सरकारें देश के लिए घातक सिद्ध होंगी। उन्होंने जहां एक ओर यह कहा कि लोकतंत्र भारत की शक्ति है और इसे संरक्षित रखने की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर उन्होंने यह भी कहा कि कमज़ोर लोकतंत्र में देश को निर्बल बनाने की प्रवृत्ति होती है।

देश को अगले 10 वर्ष तक शक्तिशाली नेतृत्व की आवश्यकता है जो लोकप्रिय और लोकलुभावन निर्णयों के स्थान पर ऐसे निर्णय ले सके जो भले ही अलोकप्रिय हों किन्तु जिनका लिया जाना राष्ट्र हित में अनिवार्य हो। उन्होंने कहा कि अस्थिर सरकार के बिखरने और भ्रष्टाचार में लिप्त होने की आशंका अधिक होती है। उन्होंने यह भी कहा कि देश को बाहरी शत्रु शक्तियों की तुलना में अंदरूनी राष्ट्र विरोधी शक्तियों से ज्यादा बड़ा खतरा है।

श्री अजीत डोभाल ने पुलिस और गुप्तचर सेवाओं में लंबे समय तक कार्य किया है और कोई आश्चर्य नहीं कि उनके विचार लोगों पर संदेह करने की प्रवृत्ति और उन्हें अनुशासित करने की इच्छा को प्रदर्शित करें, यह तो ऑक्यूपेशनल हैजर्ड है। यदि इस तर्क को स्वीकारा जाए कि आवश्यक नहीं कि एक अच्छा खिलाड़ी अच्छा नेता भी हो या एक सफल अभिनेता सफल प्रशासक भी हो तो इस व्याख्यान को एक अच्छे गुप्तचर की निजी राय के तौर पर भी लिया जा सकता है । यह राय केवल इसलिए पठनीय है कि यह एक क्षेत्र विशेष में सफलता अर्जित करने वाले सेलेब्रिटी की राय है अन्यथा इसमें परिपक्वता का अभाव है क्योंकि वह उन विषयों पर बोल रहा है जिनके संबंध में उसकी विशेषज्ञता नहीं है।

किंतु यह व्याख्यान इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि श्री अजीत डोभाल प्रधानमंत्री जी के अत्यंत प्रिय और विश्वासपात्र हैं तथा उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में ऐसी विशेष शक्तियां प्रदान की गई हैं जो उन्हें किसी भी विवाद या घटनाक्रम में हस्तक्षेप करने की सहूलियत मुहैया करती हैं। उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से लार्जर दैन लाइफ छवि दी गई है और वे तेजी से गढ़े जा रहे आभासी महामानवों में अग्रणी हैं। यह व्याख्यान इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि सेना और पुलिस के कल्याण के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों की मार्केटिंग करते समय यह खास तौर पर रेखांकित किया जा रहा है कि सैनिक और पुलिस कर्मी पिछली असंवेदनशील सरकारों द्वारा उपेक्षित किए गए हैं और अन्यथा सार्वजनिक टीका टिप्पणी से दूर रहने वाले उच्च सैन्य अधिकारी भी सरकार की नीतियों के प्रति अपनी प्रशंसात्मक राय की खुलेआम अभिव्यक्ति करते देखे जा रहे हैं।

अतः यह सोचना स्वाभाविक है कि श्री डोभाल कहीं प्रधानमंत्री जी के मन की बात तो नहीं कर रहे हैं। यदि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए उसकी आधारभूत विशेषताओं को ही नष्ट किया जाने लगे तो फिर यह ऐसी तानाशाही का रूप ले लेता है जिसे लोकतंत्र के आवरण में इसलिए परोसा जा रहा है कि इसका प्रतिरोध कम हो और इसके विरोधी हमेशा भ्रम और अनिश्चय से ग्रस्त रहें। लोकतंत्र में जनता यदि खंडित जनादेश देती है और गठबंधन की सरकारें अस्तित्व में आती हैं तो इसका आदर किया जाना चाहिए। गठबंधन सरकारें हमारी बहुलवादी संस्कृति की राजनीतिक अभिव्यक्ति हैं और जनता द्वारा अपने अनूठे तथा अनगढ़ ढंग से दिया गया विविधता में एकता का संदेश भी। गठबंधन सरकारों के साथ सर्वसहमति और अहंकार के परित्याग के गुण सहज सम्बद्ध हैं। जनता ने गठबंधन सरकारों के माध्यम से देश पर एकक्षत्र राज्य करने वाली कांग्रेस पार्टी को यह बताया कि अधिनायकवाद की ओर ले जाता उसका विकल्पहीनता और सर्वश्रेष्ठता का अहंकार कितना खोखला है।

यह गठबंधन सरकारें ही थीं जिन्होंने कट्टर और संकीर्ण हिंदुत्व की विचारधारा के कारण अस्पृश्य समझी जाने वाली भाजपा को यह सिखाया कि बिना उदार बने राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता और स्वीकार्यता अर्जित नहीं की जा सकती। हो सकता है कि गठबंधन सरकारों के दौर में अनेक विषयों पर कठोर निर्णय न लिए जा सके हों और कई मामलों में निर्णय लेने में विलंब भी हुआ हो लेकिन यह भी सत्य है कि एकपक्षीय, अविचारित और अनुचित निर्णयों पर रोक लगाने में गठबंधन सरकारों की अहम भूमिका रही है। गठबंधन दलों के अवरोध सरकारों को अपनी पसंदीदा विचारधाराओं की फिसलपट्टी पर निर्बाध गति करने से रोकते रहे हैं। वाजपेयी के कार्यकाल में यह एनडीए के क्षेत्रीय और समाजवादी रुझान वाले सहयोगी ही थे जिन्होंने हिंदुत्व के एजेंडे को मुल्तवी करने पर उन्हें मजबूर कर दिया था।

इसी प्रकार यूपीए के कार्यकाल में यह वाम दलों का अंकुश ही था जिसने उदारीकरण के रथ की बेलगाम दौड़ पर आंशिक और अंशकालिक अंकुश लगाया था। लोकतांत्रिक अनुशासन अधिनायकवादी सोच को अराजक लग सकता है किंतु यह स्वतः स्फूर्त और आत्म आरोपित होने के कारण अधिक स्थायी और सर्व स्वीकृत होता है जबकि अधिनायकवादी अनुशासन और दमन के बीच की विभाजक रेखा अकसर मिट जाया करती है तथा इसकी परिणति हिंसक असन्तोष में होती है। जहां तक भ्रष्टाचार, दलबदल और अवसरवादी राजनीति का प्रश्न है खंडित जनादेश भारतीय राजनीति में उपस्थित इन प्रवृत्तियों को अभिव्यक्त होने का अवसर अवश्य प्रदान करता है किंतु यह इन प्रवृत्तियों का जन्मदाता है यह कहना शायद उचित नहीं है।

एक प्रश्न विकास की गति, स्वरूप और उसके उद्देश्य का भी है। क्या हमें एक ऐसा विकसित भारत चाहिए जहां उच्च विकास दर जनता के मानवाधिकारों का हनन कर प्राप्त की जाए और जहां जनता के भले बुरे का निर्धारण एक ऐसे आत्ममुग्ध नेतृत्व द्वारा किया जाए जो उसकी दैनंदिन की समस्याओं के प्रति निर्मम होने की सीमा तक असंवेदशील हो?  हम सबने देखा है कि वामपंथ या दक्षिण पंथ किसी का भी अवलम्बन लेकर तानाशाही के जरिए लाई गई भौतिक समृद्धि सामाजिक विघटन और राजनीतिक विप्लव का कारण बनती है।

श्री डोभाल ने यह भी कहा कि देश को बाहरी शक्तियों से अधिक देश के अंदर उपस्थित राष्ट्र विरोधी शक्तियों से खतरा है। उनका यह कथन केवल इसलिए ही गंभीर नहीं है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की सुविचारित राय है बल्कि उक्त कथन इसलिए भी चिंता उत्पन्न करता है कि यह 1974 से 1977 के मध्य आपातकाल और उससे पूर्व श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा प्रयुक्त अभिव्यक्तियों से सादृश्य रखता है। क्या सरकार विरोधी होना राष्ट्र विरोधी होना है? क्या हिंसा से निपटने के लिए सरकार की वैचारिक प्रतिबद्धताओं और उसकी पसंद नापसंद को आधार बनाया जाना चाहिए? क्या मॉब लिंचिंग के आरोपियों, हिंसक गोरक्षकों, जम्मू कश्मीर के पत्थरबाजों और सहारनपुर के दंगों तथा भीमा कोरेगांव की घटना के लिए उत्तरदायी लोगों के लिए हमारा रुख एक जैसा नहीं होना चाहिए?

क्या सरकार हिंसा के विरुद्ध अपनी कार्रवाइयों में सेलेक्टिव नहीं हो रही है? यदि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के विरुद्ध महाभियोग लाने पर कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देने की दोषी है तो फिर श्री अमित शाह के उस कथन पर क्या प्रतिक्रिया दी जाए जिसमें वे सबरीमाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट को जन भावनाओं के अनुकूल और पालन करने योग्य आदेश पारित करने का परामर्श देते नजर आते हैं। श्री डोभाल ने कहा कि पिछले चार वर्ष राष्ट्रीय इच्छा शक्ति को जाग्रत करने वाले रहे हैं। राष्ट्रीय इच्छा शक्ति के जागरण के लिए किसी सरकार विशेष या नेता विशेष के प्रयासों को श्रेय देना राष्ट्रीयता की भावना के सुदृढ़ और परिपक्व होने की ऐतिहासिक प्रक्रिया को नकारने की दुर्भाग्यपूर्ण चेष्टा ही कही जा सकती है।

श्री अजीत डोभाल की राय संभव है कि एक अनुभवी गुप्तचर और सुरक्षा विशेषज्ञ द्वारा देश की जनता से निर्णायक जनादेश देने हेतु किया गया अनुरोध हो किन्तु यदि यह महत्वाकांक्षी राजनेता के विश्वासपात्र सिपहसालार द्वारा जनता को दी गई चेतावनी है तो चिंता और चिंतन दोनों आवश्यक हैं।

(राजू पांडेय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)

This post was last modified on December 3, 2018 6:58 am

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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