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Categories: बीच बहस

मोदी जी! सुलह नहीं, सजा की है दरकार

महेंद्र नाथ

कल एक अभूतपूर्व घटना घटी जब सीबीआई ने ही सीबीआई मुख्यालय पर छापा मारा और अपने एक डिप्टी एसपी को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन उससे भी पहले एक और अभूतपूर्व घटना घटी थी जब देश की सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाली संस्था को एक भ्रष्ट अफसर के हवाले करने की कोशिश की थी। इस काम को उसने भ्रष्टाचार के कई मामलों में घिरे राकेश अस्थाना को सीबीआई का स्पेशल डायरेक्टर बनाने के जरिये किया था।

और उससे भी ज्यादा अभूतपूर्व ये था कि उनकी नियुक्ति के बाद सीबीआई के मौजूदा चीफ आलोक वर्मा को दरकिनार कर सरकार ने एजेंसी से जुड़ा सारा काम अस्थाना से लेना शुरू कर दिया था। सीबीआई में नई नियुक्तियों का मसला हो या फिर कोई दूसरा काम सब कुछ अस्थाना के हवाले था। आलोक वर्मा के एतराज के बाद भी ये सिलसिला जारी रहा। पानी सिर के ऊपर चढ़ गया तो आलोक वर्मा ने सीवीसी को बाकायदा पत्र लिखकर अपनी गैरमौजूदगी में किसी महत्वपूर्ण फैसले में अस्थाना के न बुलाए जाने का निवेदन किया। लेकिन सरकार फिर भी नहीं चेती।

ऐसा शायद ही किसी संगठन में होता हो जिसमें उसके मुखिया के विरोध के बावजूद किसी की नियुक्ति की जाए। लेकिन यहां हुआ और आलोक वर्मा के विरोध के बाद भी अस्थाना की नियुक्ति की गयी। अस्थाना का विरोध केवल एजेंसी में नहीं हुआ था। बल्कि ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। जब प्रशांत भूषण ने पीआईएल दायर कर अस्थाना की नियुक्ति पर रोक लगाने की मांग की थी।

उसके पक्ष में उन्होंने अस्थाना पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को सामने रखा था। जिसमें स्टर्लिंग बायोग्रुप और उसके मालिक संदेसरा की डायरी में अस्थाना का नाम होने का उन्होंने सबूत पेश किया था। आपको बता दें कि संदेसरा इस समय देश से फरार है। और सीबीआई को उसकी तलाश है। लेकिन उस समय सुप्रीम कोर्ट ने भी उसको तवज्जो नहीं दी और सरकार के काम में गैरजरूरी हस्तक्षेप समझकर मामले को खारिज कर दिया। लेकिन वही गल्ती अब देश के सामने काले धब्बे के रूप में खड़ी है।

क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए बनायी गयी किसी एजेंसी को भ्रष्ट अफसर के हवाले किया जा सकता है? इस तरह की सोच कोई मोदी ही रख सकता है। दरअसल गोधरा से लेकर सरकार के पक्ष से जुड़े तमाम मामलों की जांच अस्थाना ने ही की थी। और इस कड़ी में अस्थाना मोदी के गुर्गे के तौर पर काम करने लगे थे। और वैसे भी मोदी पूरे देश को गुजरात के हवाले कर देना चाहते हैं। वो नौकरशाही हो या कि पूंजीपतियों का घराना। सभी जगहों पर गुजरातियों को सर्वोच्च प्राथमिकता हासिल है। और ये काम अगर मेरिट के आधार पर हो तो भला किसी को क्या एतराज हो सकता है। लेकिन अगर उसके पीछे दोनों पक्षों का निहित स्वार्थ है तो सवाल उठना लाजमी है।

दरअसल मोदी समझ नहीं पाए कि सीबीआई चीफ आलोक वर्मा अपने अधिकारों को एसर्ट करना शुरू कर देंगे। वैसे भी किसी के दबने की एक सीमा होती है। एक ऐसी एजेंसी जिसकी अपनी साख हो और जिससे निष्पक्ष काम की उम्मीद की जाती रही हो। और जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए बनायी गयी हो उसका इस तरह से बेजा इस्तेमाल होते हुए भला कौन चीफ देख सकता था। लिहाजा उन्होंने पलट कर वार किया और मीट एक्सपोर्टर मोइन कुरैशी केस में अस्थाना द्वारा लिए गए घूस और सौदेबाजी को उजागर कर उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। जिसका नतीजा एफआईआर और डिप्टी एसपी देवेंद्र कुमार की गिरफ्तारी के तौर पर सामने आया है।

मामले की गंभीरता को देख कर आनन-फानन में पीएम मोदी ने दोनों पक्षों को बुलाया और उनके बीच बातचीत कराने की कोशिश की। लेकिन सुधरने की जरूरत सीबीआई चीफ को नहीं बल्कि सरकार को है। जो नियमों और परंपराओं को ताक पर रखकर अपने मन मुताबिक काम कर रही है। और खुलेआम एक भ्रष्ट अफसर को संरक्षण दे रही है। भ्रष्टाचार के किसी मामले पर पीएम कैसे फैसला कर सकता है?

उसे देश के बनाए नियम और कानून के मुताबिक हल किया जाना चाहिए। क्योंकि इस देश में अगर सर्वोच्च कुर्सी पर बैठा व्यक्ति भी कानून से ऊपर नहीं है तो हमें ये भी समझना चाहिए कि कानून का पालन करवाने वाला भी कानून से ऊपर नहीं है। इसलिए अस्थाना के खिलाफ कार्रवाई की जगह अगर मामले की लीपापोती की जाती है तो ये अपने आप में सबसे बड़ा अपराध होगा। इससे व्यक्तिगत तौर पर मोदी-अमित शाह का कोई भला भले हो जाए लेकिन देश और संस्थाओं का बहुत ज्यादा नुकसान होगा। जिसकी भरपाई निकट भविष्य में हो पाना बहुत ही मुश्किल है।

लेकिन इन तमाम कवायदों के बाद भी सरकार को जो न्यूनतम काम करना चाहिए था उसने उसे भी करना जरूरी नहीं समझा। दरअसल इस पूरे मामले में सरकार भी एक पक्ष बन गयी है। लिहाजा उसे अपनी गलती को सुधारते हुए सबसे पहले राकेश अस्थाना को बर्खास्त कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करनी चाहिए। लेकिन अभी भी वो किसी भी हालत में उन्हें बनाए रखना चाहती है। बताया तो यहां तक जा रहा है कि सरकार के इसी रवैये के चलते सीबीआई चीफ आलोक वर्मा ने अस्थाना को सस्पेंड करने तक का मन बना लिया है।

जो सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के नाम पर बनी थी। और जिसके मुखिया ने खुद को चौकीदार घोषित किया था। और जो अपने किसी भी भाषण में कांग्रेस के 70 सालों के कीचड़ की सफाई का हवाला देना नहीं भूलता। उसकी सच्चाई यही है कि उनके शासन में सीबीआई को भ्रष्ट अफसर के हवाले कर देने की कोशिश की गयी। दरअसल ये पीएम मोदी और अमित शाह की मोडसआपरेंडी है जिसमें वो किसी भी संस्था में भ्रष्ट अफसर को बैठाना पसंद करते हैं। जिससे उसका गला पकड़कर अपने मनमुताबिक उससे काम करवाया जा सके। गुजरात से लेकर दिल्ली तक यही उनका यही इतिहास रहा है।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सरकार ने सीबीआई जैसी एक साख वाली संस्था का कबाड़ा निकाल दिया है। उसके भीतर का बजबजाता कीचड़ देश के सामने है। संस्थाओं को ध्वस्त और बर्बाद करना कोई मोदीजी से सीखे। शायद ही कोई संस्था बची हो जिसकी उन्होंने इन चार सालों में ऐसी-तैसी न कर डाली हो। वो न्यापालिका हो या कि योजना आयोग। रिजर्व बैंक हो या कि लोक सेवा आयोग।

सार्वजनिक क्षेत्रों से लेकर कार्यपालिका और संसद तक यही हाल है। ये बात कोई बताने की नहीं है लेकिन याद रखने के लिए बार-बार बताया जाना चाहिए कि लोकतंत्र संस्थाओं से चलता है। और इन संस्थाओं को मारकर सरकार दरअसल लोकतंत्र को ही मारने की साजिश रच रही है। और उसके मरने के साथ ही एक नागरिक के तौर पर हमारी भी मौत हो जाएगी।

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This post was last modified on December 3, 2018 6:47 am

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